श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 141, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ११ ] सारकाण्डम् १२५
जवाद्रथो मयुद्धायोल्लङ्घ्य प्रयादध्रुवन्नमः । कुम्भकर्णं ततो दृष्ट्वा कपयो भयविह्वलाः ॥ १४८ ॥
चक्रुः पलायनं सर्वे रामपार्श्वमुपागताः । कुम्भकर्णस्तत्र दृष्ट्वा प्रणनाम विभीषणः ॥ १४९ ॥
उवाच प्रणतो भूत्वा मया शत्रुनियोजितः । सीतां रामाय देहीति तेन धिग्धिग्कृतस्त्वहम् ॥ १५० ॥
तच्छ्रुत्वाहं गतस्तस्य सेवां कर्तुमुपागतः । तच्छ्रुत्वा बन्धुवचनं कुम्भकर्णस्तमब्रवीत् ॥ १५१ ॥
सम्यक्कृतं त्वया बन्धो मदग्रे मा स्थितो भव । युद्धस्यायः परो राज्यं ज्ञायते न मयाऽद्य हि ॥ १५२ ॥
इतो बंधुं नमस्कृत्य रामपार्श्वमुपागमत् । कुम्भकर्णोऽपि हस्ताभ्यां पादाभ्यां पेषयन्हरीन् ॥ १५३ ॥
बचार वानरीं सेनां तत्र दृष्ट्वा कपीश्वरम् । त्रिशूलेनार्दितं भित्त्वाऽऽनयामास पुरीं तु तम् ॥ १५४ ॥
मार्गे स्वस्थोऽथ सुग्रीवः कर्णौ घ्राणं शिरोमियः । छित्त्वा ययौ रामपार्श्वं सोऽपि दीर्घगलञ्जितः ॥ १५५ ॥
पुनर्ययौ रणभुवं तं दृष्ट्वा रघुनंदनः । विव्याध निशितैर्बाणैः सोऽपि गर्त्तं दुमैर्नगैः ॥ १५६ ॥
ताडयामास संन् वार्यानथ रघुनन्दनः । वायव्यास्त्रेण विच्छेद तद्धस्ता त्स्रायुधा क्षणात् ॥ १५७ ॥
त्रिशूलमुद्यमायांतं नदन्तं वीक्ष्य राघवः । द्वावद्धचन्द्रौ निशितावादायास्य पदद्वयम् ॥ १५८ ॥
चिच्छेद पतितौ पादौ लङ्काद्वारि महाध्वनी । निकृत्तहस्तपादोऽपि कुम्भकर्णोऽतिभीषणः ॥ १५९ ॥
वडवामुखवद्वक्त्रं व्यादाय रघुनन्दनम् । अभ्यद्रवद्विनदन् राहुश्चन्द्रमसं यथा ॥ १६० ॥
अपूरयच्छिताग्रैश्च सायकैर्वदनान्तरम् । सम्पूर्णेऽस्त्रौघैर्मुख्या युक्ताशानितिमस्करः ॥ १६१ ॥
अथ सूर्यप्रभाकर्षमैन्द्रं शरममुञ्चत । मुमोच तेन चिच्छेद कुम्भकर्ण शिरो महत् ॥ १६२ ॥
ववा दुन्दुभयो दिवि नदं कुसुमवृष्टिभिः । चरणन्मरुद्गणं नद्युवाशिवदैः स्तुतः ॥ १६३ ॥
पितृव्य निधनं श्रुत्वा विवशो वारु विह्वलन् । रावणो माययामास स्वं म पश्चाद्य म बलम् ॥ १६४ ॥
...वण कहा ॥ १४६ ॥ जान दिया गया है जाकर सो जाओ। मैंने तुमको उपदेश देनेके लिये नहीं जगाया है। यह सुन, विनीत होकर सुन्दर बान रावणको नमस्कार किया ॥ १४७ ॥ तदनन्तर वह जब वह भयानक रण गर्गया और ... मस्तक गिर गया। उस भयानक कुम्भकर्णको देखते ही सब वानर ... रामके पास चल गये। उस समय विभीषणको आता देखकर नमस्कार किया ॥ १४८ ॥ १४९ ॥ फिर कहा कि मैंने राजा रावणको बहुत समझाया कि महाराज ! तुम माता रामकी सीताजी देदो इसपर उसने मुझे ... निकाल दिया। तब मैं उनके (श्रीरामजीके) पास चला आया। यह सुनकर कुम्भकर्णने कहा— ॥ १५० ॥ १५१ ॥ तुमने बहुत अच्छा काम किया, पर इस समय तुम मेरे सामनेसे हट जाओ। इस समय युद्ध और पराया नहीं जान पड़ता ॥ १५२ ॥ तब विभीषण भाईको नमस्कार करके रामके पास गया। कुम्भकर्णने हाथों और पैरोंसे दबाते हुए वानरी सेनामें उपद्रव विचरने लगा। असमय वानरराज सुग्रीवको देखकर त्रिशूलसे मारकर मूर्च्छित कर लङ्काकी ओर ले चला ॥ १५३ ॥ १५४ ॥ रास्तेमें सुग्रीवको होश आया तब सुग्रीव कुम्भकर्णके नाक कान को काटकर व रात्रवन्द रामके पास लौट आये। कुम्भकर्ण भी लङ्का नगरीमें छोड़ कर, फिर पुनः रण भूमिमें लड़ने चला गया। उसे देखकर रघुनन्दन रामने अपने तीक्ष्ण बाण मारना आरम्भ किया। कुम्भकर्णने उस समय उसके हाथ काट गिराये ॥ १५५-१५७ ॥ रामने देखा कि भुज कटने पर त्रिशूलको ले कूदता हुआ नादता चला आ रहा है तब उन्होंने दो अर्धचन्द्राकार बाण चलाकर उसके दोनों पैर काट दिये। वे कटे पैर जाकर लङ्काके दरवाजेपर गिरे। हाथ पैरोंसे रहित होनेपर भी कुम्भकर्ण अति भीषण बड़वानलके समान मुख फैलाकर घोर नाद करता हुआ चन्द्रमापर राहुके समान टूटकर झपटा ॥ १५८-१६० ॥ तब रघुनन्दनने उसके मुखमें बाण भर दिये। मुखमें बाण भर जानेसे वह और भी भयानक तथा रुद्ध हो गया। तब श्रीरामने उसपर सूर्य समान प्रकाश इन्द्र बाण छोड़ा। उससे कुम्भकर्णका महान् सिर कटकर गिर गया ॥ १६२ ॥ उस समय आकाशमें देवताओने दिव्य बाजे बजाये और पुष्पोंकी वर्षा करके उनका विविध प्रकारसे अभिनन्दन किया ॥ १६३ ॥ चाचा कुम्भकर्णका मारा जाना पिताका विह्वल सुनकर रावण अत्यन्त विलाप सान्त्वना देकर बोला-हे पिताजा ! आप आज