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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात

Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)

DevanagariHindipublished811 pages

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१२८ आनन्दरामायणे [ सर्गः १२


रावणोऽपि भुजं दृष्ट्वा श्रुत्वा पुत्रवधं तथा पपात पुत्रदुःखेन मग्ना मूच्छितो भुवि ॥१२०॥
क्रोधान्धः खङ्गमुद्यम्य ययौ हंतुं विदेहजाम् । सुपार्श्वो नाम मेधावी मंत्री तं मन्यवारयत् ॥१२१॥
ममङ्क तत्करं धृत्वा मन्दोद्रे न्यगन्वितः । उवाच नीतियुक्तं वचनं रावणं तदा ॥१२२॥
कथं नाम दशग्रीव स्त्रीणाम्ग्रीवधर्मकलंकम् अस्माभिः सहितो युद्धं कृत्वा रामं सलक्ष्मणम् ॥१२४॥
प्राप्स्यसे जानकीं शीघ्रमित्युक्तः स न्यवर्तत । सुलोचनाऽग्रे संन्यस्य भुवं केयूरभूषितम् ॥२०५॥
दृष्ट्वा ममार्चणं स्वायग्रतः पतितं भुवि तदा विलापमकरोन्मुहुर्मुहुः तन्वङ्गीष्वाणि सा ॥२०६॥
भुजोऽपि भांत्वयन्तां स लब्ध्व भूम्या शरेण हि। सुलोहिताक्षरैः प्राह मा खेदं भज भामिनि ॥२०७॥
साक्षाच्छेषशगघातैर्हतोऽहं मुक्तिमागतः त्वं चापि गत्वा श्रीरामं नत्वा याचस्व मच्छिरः ॥२०८॥
तच्चां दास्यति रामोपि तेना'य विज्य याहि माम् । सुलोचना पठित्वा सा लिखित्वा न्वक्षगणि हि ॥२०९॥
नृण दृष्ट्वा रावणाय मद्राश्यं विभूषिता । यथा गर शिबिकाया ना दृष्ट्वा वानरगणाः । २१०॥
मैत्रेय रावणेनाद्य भयाद्रामं विभाजेता । इति मन्वान्पुच्छे सीताया दर्शनिच्छया ॥२११॥
शिबिकां वेष्टयामासुर्ज्ञात्वा तां तु सुलोचनाम् । शिबिकावाहकास्तेनययू श्रीरामवं पुनः ॥२१२।
सुलोचनाऽपि श्रीरामं ननाम शिरसा मुहुः मर्तु, म्नि कांक्षमाणां तां गमो वाक्यमब्रवीत् २१३.।
कृपया तव भर्तारं करोम्यद्य सजीविनम् । मा निद्राव्याद्य वं दुःस्वं रोचते चेद्भवस्व मम् ॥२१४।
तदा सा प्राह श्रीरामं पुनः सौमित्रिहस्ततः कुतो भवेन्मरणं मोक्षदं जीवयस्व मा ॥२१५।
इत्युक्त्वा राघवं दन्द्वी मस्मिनं कपिराजतः । कृत्वा शिरः पतेश्छत्र लब्ध्वा सा भर्तृमन्विताः २१६॥
लक्ष्मणास्तौ म्मानीय भुजौ गत्वा निकुम्भिलाम् । भर्तृदेहेन सयोऽप विवेश त्रि यथाविधि ॥२१७।


मेघनादका कटा सिर दिखाया । इस प्रकार समस्त लक्ष्मणजी के हाथ लगा दिया और बहुत आनन्दित हुए ॥ २०० ॥ रावणने पहले पुत्रका कटा हुआ हाथ देखा। उसके उपरांत पुत्रकी मृत्यु सुनकर वह मूच्छित होकर मद्यपान की जमीनपर गिर पड़ा । २०१ । बादस वह क्रोधपूर्वक खड्ग रखकर जानकीको मारनेको फिर लगा । उस समय सुपार्श्व नामके बुद्धिमान मंत्रीने उसको रोका और मका हाथ पकड़कर अपने हृदयपर रखकर नीतियुक्त उपदेश देते हुए कहा । २०३ । हे दशानन ! स्त्रीहत्याका जघन्य काम तुम्हें नहीं करना योग्य है। हमारे साथ चलकर युद्ध करोगे तब हम लक्ष्मणसहित श्रीरामचन्द्रजीको जीतकर सीताको अपना बनाओगे इस तरह समझानेपर रावण शान्त हो गया। उधर सुलोचनाके आगे अपने पति मेघनादका केयूरविभूषित नया बाजूबंदयुक्त हाथ अपने सामने पृथ्वीपर पड़ा देखकर अपने हृदयको दुःखपूर्वक स्मरण कर विलाप करनेलगी । २०४ । २०५ । फिर उस कटी भुजान वाण द्वारा अपने सामने जमीनपर हे भामिनी मत दुःखित हो ऐसा लिखकर सुलोचनाको आश्वासन दिया । २०६ ॥ २०७ । उसमें यह भी लिखा कि मैं साक्षात् शेषावतार लक्ष्मणके बाणसे मरकर मुक्तिको प्राप्त हुआ हूँ। अब तुम रामके पास जाकर मेरा सिर माँगो । वे तुमको अवश्य मेरा सिर दे देंगे तुम सिरको ले तथा अग्निमें प्रवेश करके मेरी अनुगामिनी बनो ऐसा लिखा उन रक्ताक्षरिन अक्षरोंको पढ़कर प्रसन्न हुई। तदनन्तर रावण और मन्दोदरीसे आज्ञा ले नया शृंगार धारण करके वह पर्थ्यस बैठकर श्रीरामके पास चली। वानरगण उसको देखकर यह समझे कि रावणने डरकर सीता रामके पास भेज दी है। ऐसा समझकर वे उनके दर्शनकी इच्छासे दौड़ पड़े ॥ २०८-२११ ॥ पास जाकर पालकीको घेर लिया पर जब चमकी होलखनेपे पता लगा कि यह सुलोचना है तो वे सब वानर रामके पास दौड़ गये । २१२ । सुलोचना श्रीरामके पास पहुंची तो शिर नवाकर प्रणाम किया और पतिके सिरकी प्राप्तिके लिये प्रार्थना की। तब रामने कहा- ॥ २१३ ॥ हे सुलोचने ! हम कृपा करके तुम्हारे पतिको जीवित कर देता हूँ। तुम अग्निमें प्रवेश करनेका विचार छोड़ दो, बोलो, यह पसन्द है ? ॥ २१४ ॥ उसने कहा हे महाराज ! फिर ऐसे मोक्षप्रद लक्ष्मणके हाथसे मृत्यु इन्हें कहाँ प्राप्त होगी ? इसलिये अब आप इन्हें न जिलाएं। २१५॥ इतना कहकर उसने फिर रामको प्रणाम किया और कपिराज सुग्रीवके आज्ञानुसार पतिके सिरको पाकर हंसती हुई वह पतिके