श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 145, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ११ ] सारकाण्डम् १२९
सुलोचना दिव्यवेषा वैकुण्ठं पतिना ययौ । रावणोऽपि सुहृन्मित्रैः पुत्राद्यैर्दुः ययो रणम् ॥ १२८॥
ततो रामेण निहताः सर्वे ते राक्षसा युधि । लङ्कायां रावणः क्षिप्तः शरेण राघवेण सः ॥१२९॥
ततः कृत्वा रामशिरः कृत्रिमं मयहस्ततः । ययौ सीतां दर्शयितुं रावणोऽशोककाननम् ॥१२०॥
एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मा बोधयामास जानकीम् । कृतमस्ति रावणेन कृत्रिमं राममच्छिरः ॥१२१॥
तद्दृष्ट्वा मा भजस्वाथ खेदं स्वमधुनाऽबले । इति प्रबोध्य तां मातां ब्रह्माऽन्तर्धानमाययौ ॥ १२२॥
रावणोऽपि समागत्य दर्शयामास तच्छिरः । सीतां प्राह हतो रामस्त्वधुना स्वं भजस्व माम् ॥१२३॥
तदा साऽधोमुखी प्राह नर्तवांह शिरांसि हि । रामवाणैश्च पश्यामि पतितानि रणांगणे ॥१२४॥
इति तद्वाक्यशराघातताडितः स दशाननः । ययौ तूष्णीं स्वयं गेहं लज्जाऽवनतमस्तकः ॥१२५॥
अथ रामाज्ञया सर्वे लङ्कां प्रासादखण्डिताम् । ईपिकाग्रडहस्तास्ते वानराः कोटिशः क्षणात् ॥ १२६॥
ज्वालयामासुः सर्वत्र दत्त्वा वह्निं मुहुर्मुहुः । तदा कोलाहलश्चासील्लङ्कादाहे पुरा यथा ॥१२७॥
दग्ध्वा स्वनगरीं दृष्ट्वा स्वगृहाण्यपि रावणः । दृष्ट्वा दग्धानि कपिभिर्मद्यास्त्रं समुमो जबान् । २२८॥
तेनाग्नीदनलः शांतस्तद्दृष्ट्वा कपयो ययुः । ततः स रावणः शुक्रवचनाद्गहने स्थिताम् ॥१२९॥
गुहां प्रविश्य चैकांते मौनी होमं प्रचक्रमे । लङ्काद्वार कपाटानि बद्ध्वा सर्वत्र यत्नतः ॥१३०॥
होमद्रव्याणि सङ्गृह्य यान्युक्तानि यथा पुरा । रक्तावगाढिनो मुण्डमाली प्रेतासनस्थितः ॥१३१॥
परस्तीर्याथ शस्त्राणि होमकुण्डसमन्ततः । आदशाहबालकानां शिरोभिर्मांसलोहितैः ॥१३२॥
एवं स रिपुनाशार्थं चकार हवनं गृहुः । उत्थितं धूममालोक्य रामं प्राह विभीषणः ॥१३३॥
यदि होमसमाप्तिः स्यात्तदाऽजेयो भवेदद्यम् । ततो रामो हरीन्सर्वान्प्रेषयामास सादरम् ॥१३४॥
गलेपर रखकर जोड़ दिया। २१६। पश्चात् त्रिकाय पतिको देहसे उसे मिलाकर यथाविधि पतिके शरीरके साथ अग्निमें जलकर सती हो गयी ॥ १२७ ॥ तदनन्तर सुलोचना दिव्य देह धारण करके पतिके साथ वैकुण्ठ चली गयी। उधर रावण पुनः बन्धुओं तथा मित्रोंको साथ लेकर रणभूमिमें युद्ध करने लगा। १२८ ॥ वहाँ रामने सब राक्षसोंको मारकर रावणको बाणसे उठाकर लंकाम फेंक दिया ॥ २१९ ॥ तदनन्तर रावण मयदानवके हाथसे रामका नकली मस्तक बनवाकर सीताको दिखलानेके लिए अशोकवनमें गया । २२० ॥ यहाँ इसी बीच ब्रह्माने सीताको पहले ही बता दिया था कि रावण रामका नकली सिर तुम्हें दिखायेगा । यह कहकर वे अन्तर्धान हो गये । इसके बाद रावण उनके पास पहुँचा और रामका मस्तक दिखलाते हुए कहा— हे सीते ! देखो, मैंने रामका शिर काटा है। अब तुम मेरी सेवा करनेके लिए तैयार हो जाओ ॥ १२१-१२३ ॥ यह सुनकर सीताजीने वे मुख करके कहा— मैं तो रामके बाणसे कटकर रणस्थलीमें गिरे हुए सब ही सिरोंको देखना चाहती हूँ ॥ १२४ । सीताके इस वाक्यरूपी बाणसे ताड़ित होकर दशानन लज्जित हो और मुँह नीचा करके चुपचाप अपने महलमें चला गया ॥ १२५ ॥ तभी रामकी आज्ञासे करोड़ों वानर शत्रुके घासके पूले ले-लेकर प्रासादों ( हवेलियों ) से भूषित लंका नगरीमें घुस पड़े ॥ १२६ । उन्होंने क्षणभरमे चारों ओरसे आग लगा दी। उस समय लंकामे प्रथम लंकादहनकी ही तरह महान् कोलाहल तथा हाहाकार मचने लगा ॥ १२७ ॥ रावणने नगर तथा अपने मकानोंको जलने देखकर मेद्यास्त्र छोड़ा ॥ १२८ ॥ उससे आगको शान्त देखकर कपिसमूह भाग गया। पश्चात् रावण दैत्यगुरु शुक्राचार्यके कथनानुसार एकान्तकी एक गुहामें गया और मौन धारण करके होम करने लगा। उसने यत्नपूर्वक लंकाके दरवाजे अच्छी तरह बंद कर लिये ॥ १२९ ॥ १३० ॥ पहले मैंने जो-जो हवनके द्रव्य कहे हैं, वे सब इकट्ठे कर लिये । उसने अपने सब शरीरमें लोहू लपेट लिया । गलेम मुण्डोंकी माला पहिन ली। मृत पुरुषके शरीरको आसन बनाया ॥१३१॥ होमकुण्डके चारों ओर शस्त्र रख लिये और दस दिनमे प्रथम उत्पन्न बालकोंके सिर तथा मांस और रुधिर से एकान्तमे शत्रुओंके नाशके लिये हवन आरम्भ कर दिया। ऊपर उठ होमके धुएँको देखकर विभीषणने रामसे कहा—॥ १३२ ॥ १३३ ॥ हे राम ! यदि होम निर्विघ्न समाप्त हो गया तो रावण सर्वथा अजेय हो