श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
सर्गः ११ ] सारकाण्डम् १२९
सुलोचना दिव्यवेषा वैकुण्ठं पतिना ययौ । रावणोऽपि सुहृन्मित्रैः पुत्राद्यैर्दुः ययो रणम् ॥ १२८॥
ततो रामेण निहताः सर्वे ते राक्षसा युधि । लङ्कायां रावणः क्षिप्तः शरेण राघवेण सः ॥१२९॥
ततः कृत्वा रामशिरः कृत्रिमं मयहस्ततः । ययौ सीतां दर्शयितुं रावणोऽशोककाननम् ॥१२०॥
एतस्मिन्नन्तरे ब्रह्मा बोधयामास जानकीम् । कृतमस्ति रावणेन कृत्रिमं राममच्छिरः ॥१२१॥
तद्दृष्ट्वा मा भजस्वाथ खेदं स्वमधुनाऽबले । इति प्रबोध्य तां मातां ब्रह्माऽन्तर्धानमाययौ ॥ १२२॥
रावणोऽपि समागत्य दर्शयामास तच्छिरः । सीतां प्राह हतो रामस्त्वधुना स्वं भजस्व माम् ॥१२३॥
तदा साऽधोमुखी प्राह नर्तवांह शिरांसि हि । रामवाणैश्च पश्यामि पतितानि रणांगणे ॥१२४॥
इति तद्वाक्यशराघातताडितः स दशाननः । ययौ तूष्णीं स्वयं गेहं लज्जाऽवनतमस्तकः ॥१२५॥
अथ रामाज्ञया सर्वे लङ्कां प्रासादखण्डिताम् । ईपिकाग्रडहस्तास्ते वानराः कोटिशः क्षणात् ॥ १२६॥
ज्वालयामासुः सर्वत्र दत्त्वा वह्निं मुहुर्मुहुः । तदा कोलाहलश्चासील्लङ्कादाहे पुरा यथा ॥१२७॥
दग्ध्वा स्वनगरीं दृष्ट्वा स्वगृहाण्यपि रावणः । दृष्ट्वा दग्धानि कपिभिर्मद्यास्त्रं समुमो जबान् । २२८॥
तेनाग्नीदनलः शांतस्तद्दृष्ट्वा कपयो ययुः । ततः स रावणः शुक्रवचनाद्गहने स्थिताम् ॥१२९॥
गुहां प्रविश्य चैकांते मौनी होमं प्रचक्रमे । लङ्काद्वार कपाटानि बद्ध्वा सर्वत्र यत्नतः ॥१३०॥
होमद्रव्याणि सङ्गृह्य यान्युक्तानि यथा पुरा । रक्तावगाढिनो मुण्डमाली प्रेतासनस्थितः ॥१३१॥
परस्तीर्याथ शस्त्राणि होमकुण्डसमन्ततः । आदशाहबालकानां शिरोभिर्मांसलोहितैः ॥१३२॥
एवं स रिपुनाशार्थं चकार हवनं गृहुः । उत्थितं धूममालोक्य रामं प्राह विभीषणः ॥१३३॥
यदि होमसमाप्तिः स्यात्तदाऽजेयो भवेदद्यम् । ततो रामो हरीन्सर्वान्प्रेषयामास सादरम् ॥१३४॥
गलेपर रखकर जोड़ दिया। २१६। पश्चात् त्रिकाय पतिको देहसे उसे मिलाकर यथाविधि पतिके शरीरके साथ अग्निमें जलकर सती हो गयी ॥ १२७ ॥ तदनन्तर सुलोचना दिव्य देह धारण करके पतिके साथ वैकुण्ठ चली गयी। उधर रावण पुनः बन्धुओं तथा मित्रोंको साथ लेकर रणभूमिमें युद्ध करने लगा। १२८ ॥ वहाँ रामने सब राक्षसोंको मारकर रावणको बाणसे उठाकर लंकाम फेंक दिया ॥ २१९ ॥ तदनन्तर रावण मयदानवके हाथसे रामका नकली मस्तक बनवाकर सीताको दिखलानेके लिए अशोकवनमें गया । २२० ॥ यहाँ इसी बीच ब्रह्माने सीताको पहले ही बता दिया था कि रावण रामका नकली सिर तुम्हें दिखायेगा । यह कहकर वे अन्तर्धान हो गये । इसके बाद रावण उनके पास पहुँचा और रामका मस्तक दिखलाते हुए कहा— हे सीते ! देखो, मैंने रामका शिर काटा है। अब तुम मेरी सेवा करनेके लिए तैयार हो जाओ ॥ १२१-१२३ ॥ यह सुनकर सीताजीने वे मुख करके कहा— मैं तो रामके बाणसे कटकर रणस्थलीमें गिरे हुए सब ही सिरोंको देखना चाहती हूँ ॥ १२४ । सीताके इस वाक्यरूपी बाणसे ताड़ित होकर दशानन लज्जित हो और मुँह नीचा करके चुपचाप अपने महलमें चला गया ॥ १२५ ॥ तभी रामकी आज्ञासे करोड़ों वानर शत्रुके घासके पूले ले-लेकर प्रासादों ( हवेलियों ) से भूषित लंका नगरीमें घुस पड़े ॥ १२६ । उन्होंने क्षणभरमे चारों ओरसे आग लगा दी। उस समय लंकामे प्रथम लंकादहनकी ही तरह महान् कोलाहल तथा हाहाकार मचने लगा ॥ १२७ ॥ रावणने नगर तथा अपने मकानोंको जलने देखकर मेद्यास्त्र छोड़ा ॥ १२८ ॥ उससे आगको शान्त देखकर कपिसमूह भाग गया। पश्चात् रावण दैत्यगुरु शुक्राचार्यके कथनानुसार एकान्तकी एक गुहामें गया और मौन धारण करके होम करने लगा। उसने यत्नपूर्वक लंकाके दरवाजे अच्छी तरह बंद कर लिये ॥ १२९ ॥ १३० ॥ पहले मैंने जो-जो हवनके द्रव्य कहे हैं, वे सब इकट्ठे कर लिये । उसने अपने सब शरीरमें लोहू लपेट लिया । गलेम मुण्डोंकी माला पहिन ली। मृत पुरुषके शरीरको आसन बनाया ॥१३१॥ होमकुण्डके चारों ओर शस्त्र रख लिये और दस दिनमे प्रथम उत्पन्न बालकोंके सिर तथा मांस और रुधिर से एकान्तमे शत्रुओंके नाशके लिये हवन आरम्भ कर दिया। ऊपर उठ होमके धुएँको देखकर विभीषणने रामसे कहा—॥ १३२ ॥ १३३ ॥ हे राम ! यदि होम निर्विघ्न समाप्त हो गया तो रावण सर्वथा अजेय हो
१३० आनन्दरामायणे [ सर्गः ११
प्राकारं लङ्घयित्वा ते गत्वा रावणमन्दिरम् । हत्वा राक्षसबृन्दं तद्गुहारक्षणतत्परम् ॥ २३५ ॥ न ददृशुर्गुहाद्वारं यत्र होमं चकार सः । ततश्च मज्जमानानां प्रभाते कर्मसङ्गया ॥ २३६ ॥ विभीषणस्य भार्या तान् होमस्थानमसूचयत् । गुहापिधानपाषाणान्गढैः पदघट्टनैः ॥ २३७ ॥ चूर्णयित्वा रावणञ्च ताडयामासु मुष्टिना । वानरास्तेऽपि तं भृशंस्ताडयामासुराद्रुताः ॥ २३८ ॥ तद्वृत्ते वानरा दृष्ट्वा तूष्णींभावं स्थितं रिपुम् । ममानयन्केशपाशे धृत्वा मन्दोदरीं शुभाम् ॥ २३९ ॥ विलपन्तीं मुक्तनीवीं विह्वलां हतकञ्चुकीम् । दृष्ट्वा त्यक्त्वा तदा होममुदतिष्ठत्त्वरान्वितः ॥ २४० ॥ ततस्ते वानराः सर्वे ययुः श्रीराघवान्तिकम् । ततो मन्दोदरी प्राह कुरु त्वं वचनं मम ॥ २४१ ॥ दत्त्वा सीतां राघवाय राज्ये कृत्वा विभीषणम् । तपश्चर्यां मयाऽऽरण्यं कर्तुमर्हसि वै सुखम् ॥ २४२ ॥ तदस्या वचनं श्रुत्वा तां प्र प्राह दशाननः । रामो विष्णुश्च मां सीता जानासि प्राणवल्लभे ॥ २४३ ॥ रामहस्तादहं लब्धुं हता सीता पुरा मया । रामहस्तान्मरणञ्चैवाहो गच्छामि परमं पदम् ॥ २४४ ॥ त्वया कार्या क्रिया मे हि प्रविश्याग्निं ततः । ततः सुखं मया मुक्ता गमिष्यसि परं पदम् ॥ २४५ ॥ इत्युक्त्वा प्रययौ योद्धुं रथे स्थित्वा त्वरान्वितः । गजद्वाराद्विनिर्गच्छन्नग्रे मुण्डी विलोकितः ॥ २४६ ॥ मुकुटः पतिताश्चित्रः मणिरौ गवणो हृदि । ततो ययौ रणक्षोणीं यदग्र निर्गतैः शरैः ॥ २४७ ॥ विधाय कृत्रिमां सीतां मयेन स दशाननः । पश्यतां वानराणां स स्वहस्ते तां जघान वै ॥ २४८ ॥ दिव्येन शितशस्त्रेण दृष्ट्वा ते तु प्लवङ्गमाः । हा हन्त्युक्त्वा दुःखितास्ते ययु रामं निवेदितुम् ॥ २४९ ॥ तावद्ब्रह्मा समागत्य रामादीन् प्राह सादरम् । कृत्रिमेयं हता सीता मा खेदं भजताद्य हि ॥ २५० ॥ ततोऽन्तर्धानमगमद्विधिस्तेऽपि प्लवङ्गमाः । रामाद्या मघवद्वाक्येन तुष्टा युद्धाय निर्ययुः ॥ २५१ ॥
अथवा। तब रामने सब वानरोंको सादर बुलाकर युद्धके लिये भेजा ॥ २३४ ॥ वे सब प्राकारको लांघकर रावणके मन्दिरमें चले गये। उन्होंने वहाँ उस गुफाकी रक्षा करनेवाले राक्षसोंको मार डाला ॥ २३५ ॥ परन्तु जहाँ रावण हवन करता था, उस गुफाका दरवाजा किसीको नहीं मालूम था। तब प्रातःकालके समय विभीषणकी स्त्री भगवान् हाथके संकेतसे उन सबोंको होमस्थानका दरवाजा बता दिया। द्वारपर लगे हुए पाषाणको लात मारकर उन्होंने तोड़ दिया और भीतर जाकर रावणको मुक्कोंसे मारने लगे। अन्यान्य वानर भी उसे भृशोंसे पीटने लगे, २३६-२३८ ॥ फिर भी रावणको चुपचाप बैठा देखकर वानर उसकी स्त्री मन्दोदरीको केश पकड़कर वहीं खींच लाये । २३९ ॥ अपनी सुन्दरी स्त्रीको रोका हुई, मुक्तकच्छ वानरर्दलित तथा विह्वल देखकर रावण होमको छोड़ तुरन्त उठ खड़ा हुआ ॥ २४० ॥ इस प्रकार उसके होमका भङ्ग करके सब वानर रामके पास भाग गये। तब मन्दोदरीने कहा— हे नाथ! तुम अब भी मेरी बात मान लो । २४१ ॥ सीता रामको देकर विभीषणको लंकाका राज्य दे दो और मेरे साथ चलकर वनमें तप करो, तुमको धर्म में सुख प्राप्त होगा। स्त्रीकी बात सुनकर दशाननने कहा— हे प्राणवल्लभे ! मैं जानता हूँ कि राम साक्षात् विष्णु तथा सीता साक्षात् लक्ष्मी हैं ॥ २४२ । २४३ ॥ यह जानकर ही मैं रामके हाथसे मरनेके लिए सीताको यहाँ ले आया हूँ । रामके हाथसे मरकर मैं परम पद प्राप्त करूँगा ॥ २४४ । बादम तुम भी मेरी क्रिया करके तथा अग्निमें सती होकर सुखपूर्वक मेरे साथ परम धाम प्राप्त करोगी ॥ २४५ । इतना कह तथा रथपर सवार होकर वह लड़ाईके लिए चल पड़ा। राजमहलसे निकलते ही उसका सिर मुंडाये हुए एक मुण्डी दिखायी दिया ॥ २४६ ॥ उसका चित्र विचित्र मुकुट भी गिर पड़ा। यह देखकर रावण मनमें घबड़ाया। फिर भी उसने समरभूमिमें जाकर बहुत तेजीसे वाणोंकी वर्षा की ॥ २४७ ॥ तदनन्तर मयदानवसे एक नकली सीता बनवाकर उसने वहाँ वानरोंके सामने अपने रथपर रखकर काट डाला, २४८ । उस धारवाला तलवारसे सीताको कटती देख हाहाकार करते हुए सब वानर यह समाचार रामके पास निवेदन करने गये, २४९ ॥ इतनेमें ब्रह्माने आकर राम आदिको बड़े आदरसे समझाकर कहा कि यह कृत्रिम सीता मारी गयी है। तुम लोग दुःखी मत होना ॥ २५० ॥ इतना कहकर ब्रह्माजी अन्तर्धान हो गये और वे सब वानर और राम आदि वीर ब्रह्माक्यु-
सर्गः १११] सारकाण्डम् १३१
तदा स मातलिः शीघ्रं देवेन्द्ररचनाद्रथम् । शस्त्रास्त्राजिमहत्तमैर्ध्वजविप्रजशोभितम् ॥२५२। वरच्छत्रप्रमायुक्तं राघवाय न्यवेदयत् तमारुह्य तदा रामश्चकार कदनं महत् । २५३। आग्नेयेन तदाग्नेयं दैवं दैवेन राघवः । अस्त्रं राक्षसराजस्य जघान परमास्त्रवित् ॥२५४। ततस्तु ससुजे घोरं राक्षसो मारुतास्त्रवित् । रामः सर्पास्ततो दृष्ट्वा सौपर्णास्त्रं मुमोच सः ॥२५५ अस्त्रैः प्रतिहते युद्धे रामेण दशकंधरः । पातयं समुद्रे घोरं वायव्यास्त्रेण राघवः ॥२५६ तदस्त्रं विनिवार्यामो बहुशस्त्रं वमूर्जे पुनः । पर्जन्यास्त्रेण पौलस्त्यश्चकार विफलं तदा । २५७। नागानामयुतं तुरङ्गनियुतं सार्द्धं रथानां शतं पत्तीनां शतकोटिनाशनसमये त्वेका कबन्धा नृतिः । एवं कोटिकबन्धनर्तनविधावेका ध्वनिः किंकिणेर्विक्रोताः प्रहरार्धतो रघुपतेः कोदण्डघण्टागणे ॥२५८। तदा खे कौतुकं द्रष्टुं समाजग्मुः सुग मुदा । गंधर्वाः किन्नरा यक्षा विमानशतसंस्थिताः । २५९। तदाऽशनिध्वजं रम्यं बाणैश्चिच्छेद रावणः । तं दृष्ट्वा रामचंद्रोऽपि ध्वजहीनं रथं निजम् ॥२६० मारुतिं प्राह वेगेन क्षण तिष्ठ ध्वजोपरि । तथेत्युक्त्वा मारुतिः स तालमुत्पाट्य वेगतः ॥२६१ धृत्वा रामरथे दिव्य वस्मिन्संस्थौ स्वयं मुदा । तं मारुतिध्वजं दृष्ट्वा रावणः समरांगणे । २६२ तले छत्रं मातलिनं तुरंगान्वायुनंदनम् । ऐन्द्रं धनुष्प्रचिच्छेद नवबाणैर्नवगांन्वितः ॥२६३ वातात्मजमातलिनी मूच्छितौ पतितौ भुवि । क्षणमात्रेण स्वस्थोऽभूत्तदा स वायुनंदनः ॥२६४ तदा रामो वायुपुत्रस्कन्धे स्थित्वा रणाजिरे । चकार तुमुलं युद्धं रावणेन भयावहम् । २६५। रावणः परिघेणैव मंतव्य मारुतिं हृदि । चकार मूच्छितं वक्षात्पपात स पुनर्भुवि ॥२६६ तदा सस्मार रामोऽपि स्वरथं समरांगणे । तावद्रथः खगादायायथा सादग्रतः स्थितः । २६७
स सज्ज होकर युद्ध करनक' निकल पड २६१॥ इसा समय इन्द्रक आज्ञानुसार उनका सारथा मात अस्त्र शस्त्रास भर नया उत्तमपुर द्रुत गवहा वक समक पास आया भार वनस रयार सवार होकर करनक लिए कहा तब रामन उस रथपर सवार होकर महान् युद्ध किया । २५२ ।। २५३ ॥ वस्त्राका जा- वालाम परमधन रामन राक्षसक राज. गवणका आग्नेय अस्त्र अपन आग्नेय अस्त्रस तथा देवास्त्र दवार शान्त किया । २५४ ॥ तव म्पर्वास्त्र रावणन यार गवालप छाड़ा । रामन सर्पोंका देखकर गरुडास्त्र छ ॥ २५५ ॥ इस प्रकार जब रामन युद्धका अस्त्र अस्त्र म प्रतिहत कर दिया, तव रावणने एक दूसरग भय. मघान्त्र फंका । रामन उसका उत्तर वायुअस्त्रम कर दिया । २५६ । उस अस्त्रका निवारण करके रामने उस.. माग्याराज वरपाया । तब रावणन उस वर्षा अस्त्ररू विफल कर दिया । २५७। दस हजार हाथी, दस लाख घाड डेढ सौ रथ तथा एक करोड़ पैदलस जवान नष्ट होनपर एक कबन्धका नृत्य होता है। इस प्रकारक कराड़ कबन्धा हानेपर एक किकणि, घटाका का श्व'न होता है, परन्तु रघुपति रामक केवल आधे प्रहरनक धनुषका घंटारव करनम हा बाबा किक्किणियाका दर्शन हुई ॥२५८ ।। उस समय इस कौतुकका दखनेक लिए श्रीक गभ सहस विमानोंपर माहरु देवता, गन्धर्व, किन्नर तथा यक्षलाग इकट्ठे हो गय ॥ २५६ ॥ तभा रावणन अपन बाणस रामक वृक्ष तथा ध्वजाल। काट दिया। रामचन्द्र अपन रथक ध्वजासे हीन देखकर मारुतसे बाल कि तुम क्षणभरक लिए मन्द से मर रवका ध्वजाक पास बैठ जाओ । 'तथास्तु' कहकर मारूति झट एक त डका वृक्ष उखाड़कर रामक दिव्य रथपर रख दिया और आनन्दसे उसीपर जा बैठे। मारुतिकी ध्वजाका देखकर रावणन रणांगनम बड़ा फुर्तक साथ तालवृक्षका, छत्रको, मातलि सारथीका, अवोंका, वायुनन्दन हनुमान्क तथा एन्द्र धनुषको नौ बाणस काट डाला । २६०-२६३ । तब वातात्मज हनुमान् तथा मातलि मूर्च्छित होकर जमीनपर गिर पड़े, परन्तु क्षण हा भरमे वायुनन्दन सचेत हो गये ।। २६४ । तब राम हनुमान्क कन्धेपर सवार होकर रावणक साथ रणांगणमे भयानक युद्ध करने लगे ॥ २६५ ॥ एकाएक रावणन मारुतिको छातीपर गदा मारकर मूच्छित कर दिया और हनुमान् उसी समय फिर पृथ्वीपर गिरपड़े ।।२६६॥ तब श्रीरामने अपन रथका स्मरण किया । अनन्तरम आकाशस आकर वह रथ युद्धभूमिमें उनके सामने
(१३२) आनन्दरामायणे [ सर्गः ११
दारुकः सारथिर्यत्र शस्त्राण्यनेकशः । गदा पद्मं तु यत्रास्ति सर्वदा गरुडो ध्वजे ॥२६८॥ यस्मिंञ्छैव्यश्च सुग्रीवस्तथा चैव वलाहकः । मेघपुष्पश्च चत्वारो वायुवेगा हयोत्तमाः ॥२६९॥ यत्र छत्रं वरं दिव्यं हेमदण्डं विराजते । चामरे द्वे शुभे यत्र शार्ङ्गं स्वं धनुरददे ॥२७०॥ ततो रामः शरैस्तीक्ष्णैर्दशास्यस्य रथं क्षणात् । चकार चूर्णं साश्वं तं रावणं चाप्यतर्जयत् ॥२७१॥ तदान्यंरथमारूढो रावणो राघव ययौ । ततो रामः शरैस्तीक्ष्णैर्दशाननशिरांसि सः ॥२७२॥ चिच्छेद तानि गगने मन्वा तोषयुतानि हि । रामहस्तान्मृतिर्जाताऽस्माकं चेति विचिन्त्य च ॥२७३॥ वन्दनं कर्तुकामानि गगनाच्च रणाजिरे । सन्तिष्ठानि पतन्ति स्म राघवस्य पदोपरि ॥२७४॥ रामः शिरांसि दृष्ट्वाऽथ विदीर्णास्यानि स्वान्पुनः । मां हन्तुं प्रद्रवन्तीति मन्वा भीत्याऽप्यनाडयत् ॥२७५॥ शरौघैः शतशः शीघ्रं तदद्भुतमिवाभवत् । शतमेकोत्तरं छिन्नं शिरसां चैकवक्त्रताम् ॥२७६॥ शतसूर्द्धा रावणस्य चैकोत्तरसहस्रकम् । छिन्नं तत्कल्पभेदेन वदन्त्यन्यपि केचन ॥२७७॥ दृष्ट्वा तु रावणस्यान्तं विभीषणमतेन सः । नाभिदेशेऽमृतं भव्यं कुण्डलाकारमस्थितम् ॥२७८॥ पावकास्त्रेण तच्छीघ्रं शोषयामास राघवः । ततः शिरांसि बाहूँश्चिच्छेद रावणस्य सः ॥२७९॥ एकेन मुख्यशिरसा बाहुभ्यां रावणो बभौ । तयोर्युद्धमभूदोग्रं तुमुलं रोमहर्षणम् ॥२८०॥ ततो दारुकवाक्येन मर्मदेशे व्यताडयत् । ब्रह्मास्त्रेण रघूश्रेष्ठः समरे दशकन्धरम् ॥२८१॥ स शरो हृदयं भित्त्वा हत्वा च तु दशाननम् । रामतूणीरमाविश्य मेने स कृतकृत्यताम् ॥२८२॥ रावणस्य च देहोत्थं ज्योतिरादित्यवन्स्फुरत् । प्रविवेश रघुश्रेष्ठं देवानां पश्यतां सताम् ॥२८३॥ तदा देवास्तुष्टुवुस्तं ववर्षुः पुष्पवृष्टिभिः । नेदुः खे देववाद्यानि ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥२८४॥ तदा मंदोदरी भर्त्रा सह देहं विसृज्य सा । ययौ वैकुण्ठभवनं रावणेन मुदान्विता ॥२८५॥
खडा हो गया ॥२७०॥ जिस रथका दारुक सारथी था, जिसपर अनेक शस्त्र थे, जिसपर गदा-पद्म तथा ध्वजापर गरुड विराजमान था । २६८ ॥ जिस रथमं उत्तम वायुवेगवाले शैव्य, सुग्रीव, बलाहक तथा मेघपुष्प ये चार घोड़े जुते थे ॥ २६९ ॥ जिसम दिव्य तथा सुन्दर सुवर्णदण्डवाला छत्र विराजमान था । जिसमे दो मनोहर चमर तथा रमणीय शार्ङ्ग नामका धनुष रक्खा हुआ था। तब रघुनन्दन गम उस रथको देख तथा परि-क्रम करके सानन्द उसपर सवार हो गए और अपन शार्ङ्ग धनुषका हाथमे ले लिया। अब राम अपने तीक्ष्ण बाणोंसे क्षणभरमें बाणके अश्व सहित रथको चूर्ण करके रावणको ललकारने लगे । तब रावण दूसरे रथपर सवार होकर रामके सामने गया। रामने पुनः तीक्ष्ण बाणोंसे रावणके दसों सिरोंको काट दिया। वे सिर गगनमण्डलमें जाकर 'हमारी मृत्यु रामके हाथोंसे हुई है' यह सोचकर हंसते हुए आकाशसे रणक्षेत्रमें रामके पाँवोपर आ गिरे ॥ २७०-२७४ ॥ रामने आकाशसे मुख फाड हुए उन सिरोंको अपनी ओर आते देखकर यह समझा कि ये मुझे खा जानको आ रहे हैं। इस प्रकार रामने डरकर झट सैकड़ों बाण उनपर चला दिये। यह दृश्य बड़ा ही अद्भुत था। इस प्रकार एक सौ एक बार उसके सिरको रामने काटा ॥ २७५ ॥ २७६ ॥ कोई-कोई विद्वान् कल्पभेदसे यह भी कहते हैं कि सौ सिरवाले रावणके सिर रामने एक हज़ार एक बार काटे थे ॥ २७७ ॥ परन्तु तिसपर भी जब रावणकी मृत्यु नहीं हुई, तब विभीषणके कहनेके अनुसार रामने उसके नाभिदेशमें स्थित अमृतकुण्डको अपने अग्निबाणसे सुखा डाला और बादमे उन्होंने रावणके सिरों तथा बाहुओंको काटा ॥ २७८ । २७९ ॥ इस प्रकार जब रावणक एक सिर तथा दो हाथ बाकी रह गये, तब पुनः राम-रावणका रोमाञ्चकारी तुमुल युद्ध हुआ ॥ २८० ॥ तदनन्तर रामने दारुक सारथीके कहनेपर ब्रह्मास्त्रसे समरमे दशकन्धरको नाभिमें मारा । २८१ ॥ उस बाणने उसके हृदयको छेद तथा रामके तरकसमें आकर अपने आपको कृतकृत्य समझा ॥ २८२ ॥ उस समय रावणके मृत शरीरसे सूर्यके समान प्रदीप्त तेज निकल-कर देवताओंके सामने ही रघुनन्दन रामके देहमें प्रवेश कर गया ॥ २८३ ॥ तब देवताओने स्तुति करके
सर्गः १२] सारकाण्डम् १३३
ततो विभीषणेनैव रामो रावणसत्क्रियाम् । कारयित्वा लक्ष्मणेन लङ्कायां तं विभीषणम् ॥ २८६॥
नीत्वाऽभिषेचयित्वाऽथ न्यासभूतां तदन्तिके । वायुपुत्रकृतां लङ्कां मोचयामास रक्षसात् ॥ २८७॥
विभीषणादिभिः शीघ्रमशोकं प्रेष्य मारुतिम् । सीतार्थे सकलं वृत्तं श्रावयामास राघवः ॥२८८॥
इति श्रीमत्कोटिरत्नचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये सारकाण्डे
युद्धचरित्रे रावणवधो नामैकादशः सर्गः ॥ ११ ॥
द्वादशः सर्गः
( रामस्य राज्याभिषेक )
श्रीशिव उवाच
अथ तां दिव्यवस्त्रैश्च भूषयित्वा विदेहजाम् । सुस्नातां शिविकामस्थां वेष्टितां वेत्रपाणिभिः ॥ १ ॥
निन्युः श्रीरामसान्निध्यं सुग्रीवाद्यास्त्वरान्विताः । नानारायसमुत्थाहैर्नेत्रैरार्यापिकामिव ॥ २ ॥
ततोऽवरुह्य यानात्सा पद्धशं गत्वा शनैः पतिम् । ननाम सीता श्रीरामं लज्जिताऽऽवास्यतः पुरः ॥ ३ ॥
रामोऽपि दृष्ट्वा तां सीतां शुद्धां ज्ञात्वापि तां पुनः। सर्वषां प्रत्ययार्थे हि तदा वचनमब्रवीत् ॥ ४ ॥
यथेच्छं गच्छ वैदेहि रिपुगेहनिवासिना । न त्वामङ्गीकरिष्येऽद्य ब्रह्मणो प्रार्थतोऽप्यहम् ॥ ५ ॥
तद्रापवचनं श्रुत्वा कारयित्वा चितां शुभाम् । लक्ष्मणेनाथ सुस्नाता सीता वचनमब्रवीत् ॥ ६ ॥
रामादन्यं चेतसाऽपि नाहं जानामि पावक । यद्येदम वचः सत्यं तार्ह त्वं शीतलो भव ॥ ७ ॥
इति सा शपथं कृत्वा विवेशानलमुत्तमम् । ततः स देववाक्येश्च तथा दशरथस्य च ॥ ८॥
वचनाज्जानकीं शुद्धां ज्ञात्वा तामग्रहान्प्रभुः । सुपूजितां वानरेश्च स्वाङ्के संस्थाप्यतां शुभाम् ॥ ९ ॥
पञ्चवट्यां स्वयं यत्र पुरा न्यस्तां च पावक । आलिङ्ग्य जानकीं रामा निजके सन्यवेशयत् ॥१०॥
पुष्प बरसाये, गगनमण्डलमे दिव्य बाजे बजने लगे तथा अप्सराएं नृत्य करने लगीं ॥ २८४ ॥ उधर मन्दोदरी के नन्दके पातक साथ अपना यक्ष्मातीत देह छोड़कर वैकुण्ठधामको प्रस्थान कर गया । २८५ ॥ इसके पश्चात् रामने लक्ष्मणको भेजा और विभीषणसे रावणका क्रिया करवाया और लङ्कामे विभीषणका अभिषेक करवाकर उसके पास वायुपुत्रको न्यास ( धरोहर ) रक्खा हुई लङ्काको राक्षससे छुड़वा दिया ॥ २८६ । २८७॥ तदनन्तर रामने विभीषणादिके साथ हनुमान्को सीताके पास भेजकर सब समाचार कहलाया । २८८॥
इति श्रीमत्कोटिरत्नचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये सारकाण्डे युद्धचरित्रे 'ज्वालारत्ना' भाषाटीकायां रावणवधो नामैकादशः सर्गः ॥ ११ ॥
श्रीशिवजी बोले— हे प्रिये ! तदनन्तर सुग्रीव आदि वानर सुमनाहर वस्त्रों तथा भूषणोंसे भूषित, स्नान कर-के पालकीपर सवार, बेत हाथमे लिय हुए सिपाहियोंसे घिरा हुई वैदेहीको अनेक बाजेारु सुन्दर शब्दांक सहित तथा नेपथ्यालोक मुख्यके साथ श्रीच रामके पास ले आये ॥ १ ॥ २ ॥ सीता कुछ दूर ही सवारीपरसे उतरकर धीरे-धीरे अपने पति रामके पास गया तथा उन्हें प्रणाम करके कुछ लज्जित होती हुई उनके सामने खड़ी हो गयीं ॥ ३ ॥ राम सीताको शुद्ध चरित्रवाला समझकर भी सर्वसाधारणका विश्वास दिलानेके लिए कहने लगे—॥ ४ ॥ हे शत्रुके घरमे निवास करनेवाली वैदेही ! तुम जहाँ चाहो, वहाँ चली जाओ। साक्षात् ब्रह्मा कहें तो भी मैं तुम्हे अपने पास नहीं रख सकता । ५ ॥ रामका ऐसा वाक्य सुनकर सीताने स्नान किया और लक्ष्मणसे सुन्दर चिता रचवाकर अग्निदेवकी प्रार्थना करती हुई बोलीं—॥ ६ ॥ हे पावक ! यदि मैने रामके सिवाय अन्य पुरुषका चित्तसे भी चिन्तन न किया हो तो तू शीतल हो जा ॥ ७ ॥ सती ऐसा कहकर अग्निमें प्रवेश कर गयीं । तब प्रभु रामने अग्निदेव तथा राजा दशरथके कहनेसे जानकीको पवित्र तथा पतिव्रता जानकर स्वीकार कर लिया, यह बात सीता जानती थीं जिनको कि रामने पञ्चवटीमें स्वयं अग्निको सौंप
११४ आनन्दरामायणे [ सर्गः १२
तामसी राजसी चैव सात्त्विकी या त्रिधा पुरा । जाता रावणघातार्थं सा चाप्येकैव वै तदा ॥११॥ ततो देवैः स्तुतो रामश्चेन्द्रेण समरे मृतान् । वानरादीन् सुधावृष्ट्या जीवयामास सादरम् ॥१२॥ तत्रैकं वानरं रामोऽदृष्ट्वा पप्रच्छ मारुतिम् । राघवं मारुतिः प्राह कुम्भकर्णेन भक्षितः ॥१३॥ यदि किञ्चित्तस्य कर्णनखकेशास्थिलोहितम् । रणेऽभविष्यत्पतितं तर्ह्यद्यामृतवृष्टितः ॥१४॥ अभविष्यज्जीवितः स सर्वं विद्धि रघूत्तम । सुधावृष्ट्या राक्षसांस्ते जीवयिष्यति वै पुनः ॥१५॥ इति भीत्या पुराऽस्माभिः सर्वं त्यक्ता महोदधौ । तन्मारुतेर्वचः श्रुत्वा यमराजं व्यलोकयत् ॥१६॥ यमोऽपि भान्या रामायाऽर्पयच्च प्लवगोत्तमम् । तं दृष्ट्वा राघवस्तुष्टस्त्वाऽऽज्ञां नाकमुत्तमम् ॥१७॥ गर्तुं ददौ मातलिने सोऽपि नत्वा रघूत्तमम् । रथेन वाजियुक्तेन ययौ मघवतः पुरीम् ॥१८॥ रामस्तु मंगलस्नानं कर्तुं संप्राथितोऽपि हि । विभीषणेन भरतं स्मृत्वा नांगीचकार सः ॥१९॥ ततः सर्वैर्वानरैश्च पुष्पकं चारुरोह सः । रथेन दारुकश्चापि गरुडो मकरध्वजः ॥२०॥ विभीषणश्चारुरोह पुष्पकं राघवाज्ञया । ततस्ते निर्जराः सर्वे राममामन्त्र्य खं ययुः ॥२१॥ दृष्ट्वा रामं दशरथो विमानेन ययौ दिवम् । अथ तं राघवं प्राह पुष्पकस्थं विभीषणः ॥२२॥ राम ते प्रष्टुमिच्छामि तत्त्वं मा वक्तुमर्हसि । ऐरावणगृहे राम यदा पातालमुत्तमम् ॥२३॥ पुम गतस्तदा तूष्णीं किमर्थं त्वं स्थितः प्रभो । कथं तौ न हतौ दुष्टौ तदैव क्षणमात्रतः ॥२४॥ तत्तस्य वचनं श्रुत्वा विहस्य राघवोऽब्रवीत् । अमराणां वधः पूर्वं विधिना मारुतेः करात् ॥२५॥ प्रोक्तस्तस्मान्मया तूष्णीं प्रताक्षा मारुतः कृता । अन्यच्चापि व्रगस्त्या हि मारुतेः पौरुषं जनाः ॥२६॥
दिया था। इस समय भगवान् रामचन्द्रने उन्हा जानकीका आलिंगन करक अपनी गोदमे बैठा लिया ॥ ८-१०॥ जिस साताने पूर्वकालमे रावणवधरू लिए तामसा, राजसी तथा सात्त्विकी ये तीन मूर्तिये धारण का थी, वह उस समय पुनः एक ही गयीं । ११॥ पश्चात् सब देवताओने मिलकर रामकी स्तुति की। रामन इन्द्रस कहकर समरम मर हुए वनरांको सुघावृष्टिष जविन करवाया॥ १२॥ उनम एक बानरखा न देखकर रामने मारुतिस पूछा मारुतन उत्तर दिया कि मालूम होता है, उसे कुम्भकर्ण खा गया । १३। हे रघूत्तम! यदि उस बानरका नख, केश अथवा लोहित आदि कुछ भी रणभूमिम शेष होता तो वह अवश्य इस अमृतवृष्टिसे जीवित हो जाता। यदि कहू कि अमृतवृष्टिस राक्षस क्यो नहीं जी गय तो इसका उत्तर यह है कि उनका ता जीवित हो जानके डरसे हम लागाने पहले ही समुद्रम फक दिया था। मारुतिक इस बचनको सुनकर रामने यमराजकी आर देखा उनके देखनेसे ही यमराज डर गये और उस बन्दरको रामके भाग लाकर खड़ा कर दिया। यह देखकर राम प्रसन्न हो गये। बादमें रामने मातलिक स्वर्ग जानेकी आज्ञा दे दा वह भा रामको प्रणामकर तथा अश्वयुक्त रथ लेकर इन्द्रपुरीको चला गया। १४-१८। तदनन्तर विभीषणन रामका विघ्नशान्तिकारक मङ्गलस्नान करनेके लिये कहा। जो किसो विघ्न, आपत्ति तथा राग आदिके बाद किया जाता है, पर रामने भरतका स्मरण करके उसे अंगीकार नहीं किया ॥ १९॥ बादम समस्त बन्दरांक साथ रामजा पुष्पक विमानपर सवार हो गये। रथसहित दारुक, गरुड़ और मकरध्वज भा उसपर चढ़ गये ॥ २० । रामकी आज्ञा पाकर विभीषण भा विमानास्कूढ हो गय। तभी सब देवता राममा आवश पाकर स्वर्गको चले गय ॥ २१। राजा दशरथ जा कि जनकनन्दिनीके अग्निप्रवेशके समय विमानपर बैठकर आये थे, भा रामस पूछकर स्वर्गका चल दिये। इसके उपरान्त पुष्पक विमानपर स्थित विभीषणने रामस कहा-॥ २२ । हे राम ! मै आपसे कुछ पूछना चाहता हूं। कृपा करके आप उसका उत्तर दे। हे राम ! जब आप पातालमे ऐरावणके यहाँ गये थे। २३॥ उस समय हे प्रभा! आप चुप क्यों हो गये थे। उस समय आपने उन दुष्टोंको मर क्यों नहीं डाला ? । २४। यह प्रश्न सुना तो राम कुछ मुस्कुरा-कर बोले कि पूर्वकालमे किसी समय ब्रह्माने 'उन दैत्योंका वध हनुमान्के हाथस होगा' ऐसा कह दिया था ॥ २५॥ इसी कारण मैंने चुप होकर वह काम मारुतिपर ही छोड़ दिया था और इसीलिये मैंने मारुतिके
सर्गः १२] सारकाण्डम् [१३५
यदंतु येन श्रीरामलक्ष्मणौ मोचितौ पुरा । अमूगभ्यां हि पाताले सोऽयं श्रीरामसेवकः ॥२७॥
इति पौरुषदुद्ध्यर्थं मारुतेर्जगतीतले यश श्चास्य बलिनस्तथा तूष्णीं स्थित मया ॥२८॥
नोचेद्हुंकारमात्रेण पथि हर्तुं न किं क्षमः । ईषीकास्त्रेण काकस्य येन नेत्रं विदारितम् ॥२९॥
शतयोजनपर्यन्तं मागीच्चोर्ध्वं पतत्रिणा । पुरा येन मयाऽभ्यक्तः सोऽहं किं कुण्ठितस्तदा ॥३०॥
तयोर्वधे तु पाताले न शस्त्राद्यं प्रतीक्षितम् । मारुतेः पौरुषार्थं हि सत्यं वेत्थ विभीषण ॥३१॥
इति रामवचः श्रुत्वा मारुतिः स विभीषणम् नत्वा प्राह विहस्याथ किं त्वं तद्विस्मृतोऽसि हि ॥३२।
सेतुकाले गघवेश्च गर्वं दृष्ट्वा मयि स्थितम् लांगूलं खंडितं पूर्वं लिंगोत्पाटनहेतुना ॥३३।
तस्य मे राघवाग्रे हि किं बल मन्यसेऽत्र हि। किं विलम्बो राघवाय तयोर्मुग्ध्योर्वधे ॥३४॥
धर्षिता निजदासस्य कीर्तिरेव विभीषण । इति तन्मारुतेर्वाक्यं श्रुत्वा गर्वं विभीषणः ॥३५॥
ननाम परया भक्त्या ततः सम्यगपूजयत् । अथ रामः पुष्पकस्थः सीतया प्रार्थना गुरुः ॥३६॥
तद्वाक्यगौरवात्तुष्टस्त्रिजटायै वरन्ददौ । वस्त्रालङ्कारभूषाभिः पूर्वं तष्टां विधाय च ॥३७।
त्रिजटे वचनं मेऽद्य शृणु मंगलदायकम् कार्तिके माधवे माघे चैत्रे मासचतुष्टये ॥३८॥
स्नात्वाऽग्र त्रिदिनं स्नान न्वत्प्रीत्यर्थं नरोत्तमाः । करिष्यंति हि तेनैव कृतकृत्या भविष्यसि ॥३९॥
यैर्नास्त्रिदिनं स्नानं न कृतं पूर्णिमोर्ध्वतः । तेषां मासकृतं पुण्यं हर त्व वचनान्मम ॥४०।
अन्यच्चापि शृणुष्व त्वं दीयते यो वरो मया । अश्रुचीनि गृहाण्येव तथा श्राद्धहवींषि च ॥४१॥
क्रोधान्विहेन दत्तानि विधिवत्कृतान्यपि । त्रिजटे तानि तुभ्य हि शृण्वन्यच्चं मयोच्यते ॥४२॥
पादशौचमनम्यग् तिलहीन च तर्पणम् । सर्वं तन्त्रिजटे तुभ्यं तथा श्राद्धमदक्षिणम् ॥४३।
यहाँ प्रतीक्षा की। दूसरी इच्छा यह थी कि समग्रम् लोग मारुतिके बलको भी जान जायें कि मारुतिने पातालमें राक्षसोंके हाथसे राम-लक्ष्मणको छुड़ाया था, वही यह रामका सेवक हनुमान् है॥२६॥२७॥ इस प्रकार जगत्में अपने बलवान् सेवक हनुमान्के पुरुषार्थकी प्रसिद्धि करनेके लिए ही मैं वहाँ चुप हो गया था ॥२८॥ नहीं तो क्या मैं उनको रामन्म ही हुंकारमात्रसे नष्ट नहीं कर सकता था? जिसने सीकके अस्त्रसे ही काक जयन्तका नेत्र फोड़ डाला ॥२९॥ जिसने बाणसे मार्गेश्वरको सौ योजनकी दूरीपर समुद्रमें फेंक दिया। वह मैं तब क्या कुण्ठितशक्ति हो गया था कभी नहीं। मैने पातालमें उनकी मारनके लिय किसी शस्त्रकी राह नहीं देखी थी हे विभीषण ! तुम सच जानो कि मैं उस समय केवल हनुमान्के बलकी ख्याति करनेके लिए ही चुप हो गया था ॥३०॥३१॥ रामका यह वचन सुनकर हंसते हुए मारुतिने विभीषणसे कहा-क्या तुम उस बातको भूल गये, जब सेतु बाँधनेके समय मन्मन्त मुझको कुछ गर्वयुक्त देखकर स्थापित शिवलिंग उखाड़नेके बहाने मेरा पूँछ तोड़वा डाली थी ॥३२॥३३॥ ऐस मुझ निर्बलका बल रामचन्द्रके सम्मुख किसी गिनतीमें नहीं है। रामचन्द्रको उन दोनों असुरोंको मारनेमे क्या देर लगती? कदापि नहीं। हे विभीषण ! रामने केवल अपने दासकी (मेरी) कीर्ति बढ़ानेके लिए ही वैसा किया था। मारुतिकी बात सुनकर विभीषणने रामकी परम भक्तिसे प्रणाम करके प्रेमसे अच्छी तरह पूजन किया पश्चात् रामने विमान पर बैठी हुई सीताके कहनेसे उनके वाक्यका आदर करते हुए प्रसन्न होकर त्रिजटाको वरदान दिया। पहले उसको वस्त्र-अलंकार आदिस संतुष्ट करके कहा-हे त्रिजटे ! तुम मेरी मङ्गलमयी वाणी सुनो। कार्तिक, वैशाख, माघ और चैत्र इन चार महीनोंमें पहलेके तीन दिन सभी नरश्रेष्ठ तुमको प्रसन्न करनेके लिए जो स्नान करेंगे। इससे तुम कृतकृत्य हो जाओगी ॥३४-३९॥ जो मनुष्य इन चार महीनोंमें पूर्णिमासे लेकर तीन दिन स्नन न करे, उसका सारे महीनेका किया हुआ पुण्य मेरे कहनेसे तुम हरण कर लेना ॥४०॥ और यह भी वर देता हूँ कि अपवित्र स्थानमें विधिवत्रूप किये हुए श्राद्ध तथा हवन आदि भी यदि क्रोधसे किये गये हों तो वे भी तुम्हारे ही होंगे। और भी सुनो, बिना ढैल मन्त्र पाँव धोने तथा बिना तिलके तर्पण करनेके पुण्य भी तुम्हारे होंगे। हे त्रिजटे ! दक्षिणासे
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इति दत्त्वा वरान् रामस्त्रिजटामरमान्दिनः । स विभीषणसुग्रीवमकरध्वजवानरैः ॥४४॥ ययौ विहायसा सीतां दर्शयन्कौतुकानि सः पश्य सीते पुरीं लङ्कां तथा रणभुवं शुभाम् ॥४५॥ पश्य सेतुं मया बद्धं शिलाभिर्लवणार्णवे एतच्च दृश्यते तीर्थं सेतुबन्धमिति स्मृतम् ॥४६॥ इत्युक्त्वा रघुवर्यस्तन् राक्षसेन्द्रस्य वाक्यतः । पुष्पक। द्भुवि चोत्तीर्य धृत्वा कोदंडमुत्तमम् ॥४७॥ बभंज सेतुं तन्कोट्या धनुःकोटिरितीर्यते अतएव हि तत्तीर्थं स्नानात्कैवल्यदायकम् । ४८॥ कोदंडपाणिर्नामाऽऽसीद्राममूर्तिश्च तत्र हि । एतस्मिन्नन्तरे तत्र संपातिः स ययौ तदा ॥४९॥ तमालिङ्ग्य रामचन्द्रम प्राह स्मिन्पूर्वकम् । बधोर्मात्राऽऽत्र तीर्थं त्वं कुरु सेतौ महनमम् ॥५०॥ तथेति रामवचनाद्भातुः मनोपकाम्यया । तीर्थं चकार सम्पातिर्जटायुमिति विश्रुतम् ॥५१॥ ततो रामाज्ञया याने संपातिश्चारुरोह सः ततो यानेन तां सीतां दर्शयन् कौतुकानि हि ॥५२ । ययौ रामेश्वरं पूज्य तथा श्रीरघुनंदनः सीतेऽत्र पश्य मंत्रार्थमेकांते संस्थितं पुरा । ५३॥ अत्र दर्भेषु शयनं कृतं पश्य विदेहजे नवग्रहार्थं प्रक्षिप्तान्याषाणानपश्य सागरे ॥५४॥ तूष्णीमेव स्थितं पश्य सागरं मम वाक्यतः एव तां दर्शयन् रामः किष्किंधां प्रययौ क्षणात् ॥५५॥ वानराणां स्त्रियः सर्वा विमाने स्थाप्य राघवः । ययौ तां दर्शयन सीतां कौतुकानि समंततः ॥५६॥ प्रवर्षणगिरिं पश्य ऋष्यमूकाचलं तथा पंपामरोवरं पश्य कृष्णां भीमरथीं शुभाम् ॥५७॥ पश्य पंचवटीं रम्यां गोदावरीविराजिताम् । अगस्त्योग्रश्रमं पश्य मुनीक्ष्णस्याश्रमं तथा ॥५८॥ पश्यात्र्याश्रमं सीते चित्रकूटं समीक्ष्य कालिंदी जाह्नवीं पश्य भारद्वाजाश्रमं तथा । ५९॥ इत्युक्त्वा जानकीं रामो भारद्वाजार्थिनस्तदा तस्थौ तस्याश्रमे यानादवरुह्य यथासुखम् ॥६०॥
इत्य सब श्राद्ध भी तुम्हींको प्राप्त होंगे ।४१।। ४२ । इस तरह बहुत वर देकर राम त्रिजटा सरमा, विभीषण सुग्रीव, मकरध्वज तथा वानरोंके साथ आकाशमार्गसे सीताको मार्गके कौतुक दिखाते हुए चल दिये । राहमें राम बोले हे सीते ! इस लंका नगरीको तथा इस सुन्दर रणभूमिको देखो ।। ४३ ४५ ।। यह क्षारसमुद्रमें मेरा बाँधा हुआ शिलाओंका विशाल सेतु है। यह साम्ने सेतुबन्ध नामका प्रसिद्ध तीर्थ दिखाई दे रहा है । ४६ ॥ इतना कहके बाद रामचन्द्रजी राक्षसेन्द्र विभीषणके कथनानुसार विमानसे नीचे उतरे और अपना उत्तम धनुष लेकर उसकी नोकसे सेतुको तोड दिया वहाँपर स्नान करनेसे मोक्षपद देनेवाला धनुषकोटि नामका तीर्थ बन गया ।। ४७। ४८ ।। दण्डपाणि नामको रामकी मूर्ति भी वहाँ स्थापित हो गयी । इतनेमें वहाँ संपाती आ पहुंचा । ४६ रामने उसका आलिंगन करके प्रसन्न मनसे कहा कि तुम यहाँ सेतुपर अपने भाईके नामका एक महान् तीर्थ स्थापित करो । ५० । तब संतु कहकर रामकी आज्ञाके अनुसार सम्पातीने अपने भाईकी आत्माकी प्रसन्न करनेकी इच्छासे वहाँ जटायु नामका प्रसिद्ध तीर्थ बनाया ।। ५१ ।। बादमें रामकी आज्ञासे संपातीको भी पुष्पक विमानपर चढ़ा लिया गया । श्रीरघुनन्दन राम सीताके साथ रामेश्वरकी पूजा करके विमानपर सवार होकर माताका मन्त्र द्वारा विचारण हुए बोले-देखो सीते इस एकान्त जगहपर मैं मन्त्रणा करनेके लिए बैठता था । ५२ ॥ ५३ ॥ हे विदेहजे ! इन कुशाओंपर मैं सोया था । देखो, ये नौ पाषाण मैने समुद्रमें नवग्रहों की पूजाके लिए डाले थे । ५४ । देखो, मेरे कहनेसे यह समुद्र अब भी चुप है। इस प्रकार वर्णन करते हुए रघुनन्दन राम क्षणभरमें किष्किन्धा आ पहुंचे । ५५ ॥ वहाँसे सुग्रीव आदि वानरोंकी स्त्रियोंको विमानपर बैठाकर पुनः सब स्थल सीताको दिखाते हुए वे आगे बढ़े ।। ५६ । रामने सीतासे कहा देखो यह प्रवर्षग गिरि है, यह ऋष्यमूक पर्वत है, यह पंपासरोवर है यह पवित्र कृष्णा तथा भीमरथी नदी है, ५७। गोदावरीके तटपर विराजमान यह रमणीक पंचवटी है। उधर अगस्त्य तथा मुनीक्ष्ण मुनिके आश्रमको देखो । ५८ ।। हे सीते ! अत्रि मुनिके इस आश्रमको तथा चित्रकूट पर्वतकी शोभाको देखो । यमुना गंगा तथा भारद्वाज ऋषिके आश्रमको देखो । ५९ ।। जानकीसे यह कहकर राम विमानसे नीचे उतरे और भारद्वाज ऋषिके प्रार्थना करनेपर उनके आश्रममें सुखसे
सर्गः १२] सारकाण्डम् १३७
माघशुक्लचतुर्थ्यां हि पूर्णे वर्षे चतुर्दशे भारद्वाजोऽपि तपसा स्वर्गं निर्माय भूतले ॥६१॥
पूजयामास श्रीरामं सीतावानरसंवृतम् । रामोऽपि हृदि संमन्त्र्य मारुतिं वाक्यमब्रवीत् ॥६२॥
अयोध्यां गच्छ भरतं मद्वृत्तं कथयस्व तम् । मन्वार्यं शृङ्गवेरे मे शृगं कथय केवटम् ॥६३॥
तथेति गुहकं गत्वा कपिवृत्तं न्यवेदयत् । गुहकोऽपि मुदा युक्तस्तदा रामान्तिकं ययौ ॥६४॥
ततोऽयोध्यां ययौ वेगान्मारुतिः स विधायमा । नन्दिग्रामेऽपि भरतः पूर्णे वर्षे चतुर्दशे ॥६५॥
नागते राघवे वह्निं प्रवेष्टुमुपचक्रमे । शत्रुघ्नं भरतः प्राह गद्गदेन गणांगणे ॥६६॥
श्रीरामलक्ष्मणौ वीरौ हतौ मन्येऽद्य नागतौ । अकारिणा मया सर्वं नृपा ऽने चरैर्वृताः ॥६७॥
लंका गन्वा राघवस्य साहाय्यं कर्तुमिच्छता । सोऽहमद्य विशाम्यग्निं यावत्स्यानाचलं गते ॥६८॥
त्वं गच्छ पार्थिवैर्लंका हन्त्वा युद्धे दशाननम् । मोचयित्वा जनकजां ततो नः पारलौकिकम् ॥६९॥
रामादीनां त्रिबंधूनां कर्तुमर्हसि मादरम् । इति तद्वाक्यमाकर्ण्य पौर जानपदा नृपाः ॥७०॥
शत्रुघ्नो मातरः सर्वा ऊर्मिलाद्या स्त्रियश्च ताः । सुमंत्राद्या मन्त्रिणश्च पौरनार्यश्च सेवकाः ॥७१॥
मरणं वेष्टयामासुः खेदाद्विह्वलमानसाः । भरतं सांत्वयन् सर्वान्नयौ तां रम्यां नदीम् ॥७२॥
चितां कृत्वा ततः स्नात्वा ददौ दानान्यनेकशः । समं प्रदक्षिणाः कृत्वा वह्निं ध्यान्त्वा रघूत्तमम् ॥७३॥
सीतां तां लक्ष्मणं वीरं नत्वा मातृर्गुरू मुनीन् । अगाध्यदेवतां ध्यात्वा यत्नाग्निविमुखः स्थितः ॥७४॥
न्त्वा न्यमनेक्षणः सायं प्रतीक्षन् संस्थितः क्षणम् । महान्कोलाहलश्चासीत्तदा स्त्रीपुरुषैः कृतः ॥७५॥
एतस्मिन्नन्तरे खस्थस्तं दृष्ट्वा वायूनन्दनः । प्रवेष्टुमुद्यतं वेगादुवाच शद्गदस्वनः ॥७६॥
अत्रनामधुरं वाक्यं मुञ्चता मेघवन्निभः । मा विशवानलं वीर राघवौऽद्य समागतः ॥७७॥
॥ ६० ॥ उस रोज चौदहवें वर्षका माघ शुक्ल चतुर्थी थी। भारद्वाजने अपने तपोबलसे पृथ्वोपर स्वर्गकी रचना कर दी ॥ ६१ ॥ समस्त प्रकार पदार्थसे उन्होंने सीता तथा वानरों समेत श्रीरामका यथारीति पूजन तथा सत्कार किया। अनन्तर रामने विचार करके मारुतिसे कहा -॥ ६२ ॥ अयोध्या जाकर भरतको तथा शृंगवेरपुर जाकर मेरे प्रिय मित्र निषादराजको मेरा सब समाचार सुना दो ॥ ६३ ॥ बहुत अच्छा कहकर हनुमान् निषादराजके पास जाकर सब वृत्तान्त निवेदन कर दिया। वह प्रसन्न होकर रामके पास गया ॥ ६४ ॥ वहाँसे मारुति आकाशमार्गसे जाकर अयोध्या गये। वहाँ जाकर देखा कि नंदीगांवमें भरत चौदह वर्ष बीत जानेपर भी रामके न लौटनेके कारण अग्नि जलाकर उसमें प्रवेश करनेकी तैयारी करके शत्रुघ्नसे कह रहे थे-मेरा समझमें तो ऐसा आ रहा है, कि रावणने युद्धमें राम-लक्ष्मणको मार डाला है। इसी कारण वे अबतक नहीं लौटे। इसलिए मैंने सब राजाओंको अपनी-अपनी सेनाके सहित बुला भेजा है कि वे सब लंका जाकर रामका सहायता करें। मैं तो आज सूर्यास्तके समय वह्निमें प्रवेश कर जाऊँगा ॥ ६५-६८ ॥ परन्तु तुम राजाओंके साथ लंका जाकर युद्धमें रावणको मारकर जनकनन्दिनीको छुड़ा लाओ। पश्चात् राम आदि हम तीनों भाइयोंका तुम आदरपूर्वक पारलौकिक क्रिया करना। भरतकी इस बातको सुनकर दशरथ और नगरके लोग राजागण, शत्रुघ्न, सब माताएँ, उर्मिला आदि समस्त स्त्रियाँ, सुमन्त्र आदि मन्त्रिगण पुरकी स्त्रियां तथा सेवकगण आकर चारों ओरसे भरतको घेर लिया और दुःखी होकर रुदन करने लगे। तब भरत सबको समझा-बुझाकर सरयू नदीके किनारे गये ॥ ६९-७२ ॥ वहाँ जाकर चिता रचकर स्नान किया और अनेक दान दिये पश्चात् अग्निका सात प्रदक्षिणा करके उन्होंने रघूत्तम श्रीरामका ध्यान किया ॥ ७३ ॥ तदनन्तर सीता तथा वीर लक्ष्मणको नमस्कार करके माताओं, गुरुजनों तथा मुनियोंको प्रणाम किया और नानाविध देवताका स्मरण करके उत्तराभिमुख होकर खड़े हो गये ॥ ७४ ॥ भरत एकटक दृष्टि लगाये हुए सूर्यास्तकी प्रतीक्षा करने लगे। उस समय सभी स्त्री-पुरुषोंमें महान् हाहाकार मच गया ॥ ७५ ॥ तभी वायुनन्दन हनुमान्ने आकर अग्निप्रवेश करनेका उद्यत भरतसे शान्तिपूर्ण गद्गदस्वर होकर कण्ठके तुल्य यह मधुर वचन कहा - हे वीर, अग्निमें प्रवेश मत करिए। श्रीराम सीता तथा लक्ष्मणके साथ
| १३८ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १२ |
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सीतया लक्ष्मणेनापि भारद्वाजाश्रमं प्रति। बानरैः सहितं रामं श्वस्य पश्यसि निश्चयम् । ७८।
रामोऽप्युत्कण्ठितस्त्वां हि द्रष्टुमस्ति जटाधर। इति तद्वाक्यसुधावृष्टिसेवितो भरतो मुदा ।७९॥
वह्निं नत्वा परावृत्य ननाम वायुनन्दनम्। मारुतिश्चापि तं नत्वाऽऽलिङ्ग्य सविस्तरम् ।८०।
श्रावयामास श्रीरामवृत्तं सन्तोषकारकम्। तच्छ्रुत्वा भरतस्हृष्टः शोभयामास तां पुरीम् ।८१।
अयोध्यां तोरणार्यैश्च पौरैः प्रत्युज्जगाम तम्। मस्तके पादुके बद्ध्वा पुरस्कृत्याथ चाग्रजम् ॥८२॥
माघस्य सितपञ्चम्यां प्राप्ते पञ्चदशेऽब्दके। प्रभाते भरतो याम्ये ददर्श पुष्पकं नभसि ॥८३।
ननाम राघवं दृष्ट्वा साष्टांगं भरतस्तदा। रामोऽप्यालिङ्ग्य भरतं कृत्वा रूपाण्यनेकंशः ८४।
एककाले जनान् सर्वान्पृथक् च परिषस्वजे। आदौ पश्चाच्च रामेण कृतमालिङ्गनं तदा।८५।
रामान् दृष्ट्वा ह्यनेकांस्तान जनाश्चासन्सुविस्मिताः। समाश्वास्याथ भरतं राघवः स'अलोचनः ॥८६॥
ननाम शिरसा मातॄंश्चतुष्ट्वा चाप्यरुन्धतीम्। ततो वाद्यनर्तनैश्चाद्यैर्नन्दीग्रामं ययौ शनैः ।८७
श्मश्रुकर्मोद्वर्तनं च तैलभ्यङ्गं तु बंधुभिः। नादिप्राणैश्चरेन्द्राद्यै नानामंगलवस्तुभिः।८८
नववाद्यसुघोषारवा नेदुः सर्वत्र सुस्वराः नार्यो नीराजयामासु रत्नदीपै रघूत्तमम् ८९।
ततः सीता नमस्कृत्य कौसल्याद्याश्च मातरः। वसिष्ठं ब्राह्मणांश्चैवान्वन्द्यान्यथान्यायक्रमम् ॥९०॥
ततः सीतां समालिङ्ग्य कौसल्याद्याश्च मातरः। स्नापयामासुर्मंगल्यद्रव्यैर्वस्त्राद्यैर्भूषणैः सह ९१।
वस्त्रालङ्कारभूषाभिः शुशुभे जानकी तदा। भरतः पादुके ते तु राघवस्य सुपूजिते ।९२॥
योजयामास रामस्य पादयोर्भक्तितत्परः। ततोऽतिविनयान्याह भरतो रघुनन्दनम् । ९३
राज्यमेतन्मयाऽभृतं मया निर्यापितं तव। कोष्ठागारं बलं कोशं कृतं दशगुणं मया। ९४
आज आ गये हैं। आप वानरों समेत उन्हें कल अवश्य देखोगे॥ ७७ ॥ हे जटाधर ! राम भी आपको देखनेके लिए बड़े ही उत्कण्ठित हो रहे हैं। इस प्रकार हनुमानकी वाक्यरूपी सुधावृष्टिसे सिंचित होकर भरत सहर्ष अग्निके पाससे लौट आये और वायुनन्दनको प्रणाम किया। मारुतिने भी भरतको नमस्कार तथा आलिङ्गन करके श्रीरामका संतोषकारक तथा सविस्तार सब समाचार सुना दिया। यह सुना ही भरतने प्रसन्न होकर अयोध्या नगरीको तोरण पताका आदिसे सुसज्जितकर तथा सब त्रिलोक साथ ले और हाथीको आगे करके रामकी खड़ाऊँको मस्तकपर बांधकर रामकी अगवानी करन गये ॥ ७८-८२॥ पन्द्रहवें वर्षका माघ शुक्ल पञ्चमीका प्रातःकाल आया सुदर्शन भरतने पुष्पकमणि आकाशमें देखा। ८३॥ भरतने रामके दर्शन करनेके साथ ही उनको साष्टांग प्रणाम किया। रामने भरतको आलिंगन करनेके लिए एक साथ अनेक रूप धारण करके एक ही समय सब लोगोंके साथ अलग अलग मिले। किसीके साथ आलिङ्गन आगे या पीछे नहीं होने पाया ॥ ८४, ८५ ॥ बहुतसे रामोंको देखकर यहांके बना लोग विस्मय हुआ। रामने भरतको ऽ दय बैठाया और उनके नेत्रोंमें जल भर आया ॥ ८६ ॥ पश्चात् उन्होंने माताओंको मस्तक झुकाकर प्रणाम करके गुरुपत्नी अरुन्धतीको प्रणाम किया। वादस नाच गाना तथा बाजोंके साथ धीरे-धीरे राम नन्दीग्राम पधारे। ८७॥ वहाँ जाकर रामने क्षौर कराया और शरीरमें चन्दनादि सुगन्धित द्रव्य मल तथा तेल लगाकर अनेक मंगलकारी वस्तुओंसे सब बन्धुओंके साथ मंगळस्नान किया। ८८॥ चारो तरफ नये-नये बाजोंक सुन्दर घोष होने लगे। स्त्रियें रत्नमय दीपकोंसे कौसल्यानन्दन रामकी आरती उतारने लगीं ॥ ८९। सीताने भी अपने सासोंको, अरुन्धतीको, वसिष्ठको, ब्राह्मणोंको तथा और-और वन्दनीय जनोंको यथाक्रम प्रणाम किया ॥ ९० । इसके अनन्तर कौसल्या आदिने सीताको छातीसे लगाकर मांगलिक द्रव्यसे स्नान कराया ॥ ९१ ॥ उस समय जनकनन्दिनी नये नये अलङ्कारोंसे सजकर बड़ा सुन्दर लगने लगीं। भरतने रागवकी पादुकाका पूजन करके रामके पाँवोंमें भक्तिपूर्वक पहिना दी। तदनन्तर अति विनीत भावसे भरत रघुनाथजीसे कहने लगे-॥ ९२।९३। हे प्रभो ! आपका धरोहरस्वरूप राज्य मैंने आजतक चलाया। हे जगन्नाथ ! आपके पुण्य प्रतापसे मैंने यहाँके कोठार, कोश तथा सेनाको बढ़ाकर दसगुना कर दिया है। अब आप अपने इस नगरका, देशका तथा
सर्गः १२] उत्तरकाण्डम् १३९
सर्गः १२] उत्तरकाण्डम् १३९
त्वत्तेजसा जगन्नाथ पालयस्व पुरं स्वकम् । तथेति राघवोक्त्वा भरतं संन्यवेशयत् ॥९५॥ ततः स दिव्यवस्त्राणि परिधाय रघूत्तमः । सीतया रथमारुह्य शब्दैर्घोषैर्जयस्वनैः ॥९६॥ वरांगनानुत्यगीतैर्ग्रयौ निजपुरीं प्रति । पौरजनैश्च सौधस्था ववर्षुः पुष्पवृष्टिभिः ॥९७॥ चक्रुर्नीराजनं मार्गे नानारत्नौघपूरगम्। रामो रथादवतार्य सीतां प्रप्रेष्य वै गृहम् ॥९८॥ पुष्पकं प्राह गच्छ त्वं कुबेरं वह सर्वदा तथेति रामवचनाज्जगाम पुष्पकं तु तत् ॥९९॥ अथ रामः सभामध्ये विवेश कपिभिः सह । ददौ कपिभ्यो गेहानि वस्तुं रम्याणि सादरम्॥१००॥ अथ रामस्य राज्यार्थमभिषेकं गुरुस्तदा । चकार सुमुहूर्ते वै महामंगलपूर्वकम् १०१॥ हनुमत्प्रमुखांश्चैव चतुःसिंधुजलं शुभम् । समानाय नृपैः सर्वैर्महावाद्यपुरःसरम् । १०२॥ छत्रं च तस्य जग्राह पृष्ठस्थः स लक्ष्मणः । दधार मन्दपाश्र्वस्थश्चामरं भरतस्तदा ॥१०३॥ शत्रुघ्नो चामराभंस्थो दधार व्यजनं शुभम् । हनुमान्पादुके दिव्ये दधार पुरतः स्थितः ॥१०४॥ वायव्यादिचतुष्कोणमभितस्ते महौजसः । सुग्रीवाद्यास्तदा चत्वारश्चत्वारो राघवक्षणाः ॥१०५॥ सुग्रीवो जलपात्रं च वरादर्शं विभीषणः । दधार हस्ते तांबूलपात्रं स बालिनन्दनः ॥१०६॥ रत्नकोशं जांबवांश्च दधार वेगवत्तरः । तस्थौ सिंहासने रामः स्पृष्टांगोपवर्हणः । १०७॥ सौमित्रेर्वामपाश्र्वैऽथ संपातिः संस्थितोऽभवत् वामपार्श्वे भरतस्य गुहकः संस्थितोऽभवत् । १०८॥ शत्रुघ्नवामपाश्र्वैऽथ संस्थितो मकरध्वजः । हनुमद्वामपार्श्वे च गरुडः संस्थितोऽभवत् । १०९॥ सुग्रीवादिचतुर्णां ते वामपाश्र्वेषु संस्थिताः । भ्रांश्चित्ररथविजयसुमन्त्रतरुकास्तथा ॥११०॥ नानांगोपकरणहस्तहस्ता महौजसः । ययुर्देवासुराः सर्वे यक्षगन्धर्वकिन्नराः ॥१११॥ ओषध्यः पर्वता वृक्षाः सागराश्चाथ निम्नगाः । मालाञ्च कांचनीं वायुर्ददौ वासवचोदितः ॥११२॥
राज्यका पालन स्वयं करें। यह सुन और 'तथास्तु' कहकर रामने भरतको अपने पास बैठा लिया ॥९४॥ ९५॥ तदनन्तर राम और सीता दिव्य वस्त्र धारण करके रथपर सवार होकर जय-जयकार तथा वाद्य गानेके साथ वारांगनाओका नाच-गान देखते हुए अपनी प्रिय अयोध्यापुरीको चले । नगरमे प्रवेश करनेपर नगरकी नारियोंने छतों तथा बारों पर चढ़कर अनेक प्रकारके पुष्पोंकी वर्षा की ॥ ९६ । ९७। वे रत्नमय विविध पूजाकी सामग्रीसे रामकी आरती उतारने लगीं। रामने विमानसे उतरकर सीताको महलमे भेज दिया और पुष्पक विमानसे कहा कि तुम कुबेरके पास जाकर सदा उन्हींकी सेवा करो 'रामकः आज्ञाका स्वीकार करक पुष्पक विमान कुबेरके पास चला गया ॥ ९८ ॥ ९९ ॥ अथ राम सब कपियोंको साथ लेकर सभाभवनमे गये । पश्चात् कपियोंके निवास करनेके लिए उत्तम-उत्तम मकान दिये गये ॥ १०० ॥ तदनन्तर गुरु वसिष्ठने शुभ मुहूर्त्तमे बड़े धूमधामसे रामका राज्याभिषेक ठाना ॥ १०१ ॥ हनुमान् आदिको भेजकर चारों समुद्रोका शुभ जल मँगवाया । देश-देशान्तरके राज-महाराजे बुलाये गये । नाना प्रकारके वाद्य बज लक्ष्मणन पीछे खड होकर रामके ऊपर छत्र लगाय। रामकी पादुका हाथमे लेकर हनुमान् उनके सामने खड़े हो गये। धर्मी और सुन्दर पंखा लेकर शत्रुघ्न खड़े हुए और रामकी दाहिनी ओर चमर लेकर भरत खड़े हुए गये ॥ १०२-१०४ ॥ रामके नेत्रसदृश प्रिय तथा ओजस्वी सुग्रीव आदि मित्र वायव्य आदि चार कोनामे विराजमान हो गये ॥ १०५ ॥ सुग्रीवने जलपात्र, विभीषणने सुन्दर दर्पण, वालिनन्दन अंगदने पानदान तथा वेगवान् जांबवान्ने अपने हाथमे श्रीरामके वस्त्रोंकी पिटारी ले ली। तब श्री राम जाकर गद्दा-तकिया लगे हुए बहुमूल्य सिंहासनपर विराजमान हो गये । लक्ष्मणके वामभागम संपाती, भरतके वामभागमें निषादराज, शत्रुघ्नके वामभागमें मकरध्वज तथा हनुमान्के वामभागमें गरुड खड हुए । सुग्रीव आदि चारों मित्रोके बाये चित्ररथ, विजय सुमन्त्र तथा दारुक खडे हुए । १०६-११० । बड़े-बड़े तेजस्वी सब हाथामे अनेक प्रकारकी भेंटें लेकर आये। सब देवता, असुर, यक्ष, गन्धर्व तथा किन्नरगण वहाँ आकर उपस्थित हो
१४० आनन्दरामायणे [ सर्गः १२
सर्वरत्नममायुक्तं प्रजगुर्देवगन्धर्वा मणिकांचनभूषितम् । ददौ हारं नरेन्द्राय स्वयं शक्रस्तु भक्तितः ॥११३॥ ननृतुश्चाप्सरोपङ्क्तः । देवदुन्दुभयो नेदुः पुष्पवृष्टिः पपात खात् ॥११४॥ ततोऽकञ्चं स्तुतिमहं भरतेनाभिपूजितः । ११५॥ श्रीशिव उवाच सुग्रीवमित्रं परमं पवित्रं सीताकलत्रं नवमेघगात्रम् । कारुण्यपात्रं शतपत्रनेत्रं श्रीरामचन्द्रं सततं नमामि ॥११६॥ संसारपारं निगमप्रचारं धर्मावतारं हतभूमिभारम् सदाऽविकारं सुखसिन्धुपारं श्रीरामचन्द्रं सततं नमामि ॥११७॥ लक्ष्मीविलासं जगतां निवासं लङ्काविनाशं भुवनप्रकाशम् भूदेववासं शरदन्दुहासं श्रीरामचन्द्रं सततं नमामि ॥११८॥ मंदारमालं वचने ऽमलं गुणैर्विशालं हतसप्ततालम् । क्रव्यादाकालं सुरलोकपालं श्रीरामचन्द्रं सततं नमामि ॥११९॥ वेदांतगानं सकलैः समानं दृप्ताभिमानं त्रिदशप्रधानम् गजेंद्रयानं विगतार्वमानं श्रीरामचन्द्रं सततं नमामि ।१२०। श्यामाभिरामं नयनाभिरामं गुणाभिरामं वचनाभिरामम् । विश्वप्रणामं कृतभक्तकामं श्रीरामचन्द्रं सततं नमामि । १२१। लीलाशरीरं रणरङ्गधीरं विश्वैकसारं रघुकुलहारम् । गंभीरनादं जितसर्ववादं श्रीरामचन्द्रं सततं नमामि । १२२॥ खले कठोरं स्वजने विनीतं गामोपरान्तं मनसा प्रतीतम् ।
गये। औषधि, पर्वत, वृक्ष, समुद्र तथा नदियां भी आ पहुंचीं। इन्द्रके द्वारा भेजे हुए वायुने आकर रामको एक सुन्दर कंचनकी माला पहनायी ॥१११ । ११२॥ पश्चात् स्वयं इन्द्रने भी आकर सब रत्नोंसे युक्त तथा सोनार सुशोभित हार राजा रामको समर्पण किया ॥११३॥ किन्नर और गन्धर्व उनके गुण गाने लगे। सब अप्सराय और चारणगण नाचन लगे। देवताओंके नगाड़े बजने लगे और आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी ॥११४॥ बादमें भरतके द्वारा पूजित होकर मैं (शिव) रामकी स्तुति करने लगा ॥११५॥ श्रीशिवजी बोले-सुग्रीवके मित्र, परमपवन, सीताके पति, मेघके समान श्याम अंगवाले, करुणाके सिंधु और कमलके सदृश नेत्रोंवाले श्रीरामचन्द्रको मैं निरन्तर नमस्कार करता हूँ । ११६ । इस संसारसे भक्तोंको पार करनेवाले, वेदोंका प्रचार करनेवाले, धर्मके साक्षात् अवतार, भूभारको हरण करनेवाले, अविकृत स्वरूपवाले और सुखके सर्वोत्तम सागर श्रीरामचन्द्रको मैं सदा नमस्कार करता हूँ ॥११७॥ लक्ष्मीके साथ विलास करनेवाले, जगत्के निवासस्थान, लङ्काका विनाश करनेवाले, भुवनोंको प्रकाशित करनेवाले, ब्राह्मणोंको शरण देनेवाले और शरदीय चन्द्रमाके समान शुद्ध हास्य करनेवाले श्रीरामचन्द्रको मैं सततं नमस्कार करता हूँ ॥११८॥ मन्दारकी माला धारण करनेवाले, गर्व से वचन बोलनेवाले, गुणोंमें महान् सात ताल वृक्षोंका भेदन करनेवाले, राक्षसोंके काल तथा देवलोकोंके पालक रामचन्द्रको में सदा नमस्कार करता हूँ । वेदान्तके गेय, सबके साथ समान बर्ताव करनेवाले, शत्रुके मानका मर्दन करनेवाले, गजेन्द्रकी सवारी करनेवाले तथा अन्तरहित श्रीरामचन्द्रको मैं सततं नमस्कार करता हूँ। ११६ । १२० ॥ श्यामके रूपसे मनोहर नयनोंसे मनोहर, गुणोंसे मनोहर, हृदयग्राही वचन बोलनेवाले, विश्ववन्दनीय और भक्तजनोंकी कामनाओंको पूरी करने- वाले श्रीरामचन्द्रको मैं निरन्तर प्रणाम करता हूँ । १२१॥ लीलामात्रके लिए शरीर धारण करनेवाले, रणस्थली- में वीर, विश्वभरके एकमात्र सारभूत, रघुवंशमें श्रेष्ठ, गंभीर वाणी बोलनेवाले और समस्त वादोंको जीतने वाले श्रीरामचन्द्रको मैं प्रतिक्षण प्रणाम करता हूँ । १२२॥ दुष्टजनोंके लिए कठोर हृदयवाले, अपने भक्तोंके प्रति
सर्गः १२ ] उत्तरकाण्डम् १४१
सर्गः १२ ] उत्तरकाण्डम् १४१
गद्यैः गीतैः वचनातीतं श्रीरामचन्द्रं मनुतं नमामि ॥१२३॥ श्रीमच्चन्द्रस्य दशाष्टकं मया प्रयोक्तं देवि मनोहरं ये । पठन्ति शृण्वन्ति गृणन्ति भक्त्या ते सर्वकामान्प्रलभन्ति नित्यम् ॥१२४॥ इति स्तुत्वा रामचन्द्रं समाधौ परिनिष्ठितोऽहम् । एतस्मिन्नन्तरे तत्र राजा दशरथो महान् ॥१२५॥ दृष्ट्वा रामं समांत च विमानस्थोऽर्कसन्निभः । स्तुत्वा रामं परात्मानं राज्यस्थं बन्धुवेष्टितम् ॥१२६॥ उवाच रामं संतुष्टः सुगभीराक्षराजितः । दशरथ उवाच धन्योऽहं कृतकृत्योऽहं धन्यौ तौ पितरौ मम ॥१२७॥ धन्यो देशः कुलं धन्यं यस्त्वां राज्याभिषेचितम्। पश्याम्पद्य महाबाहो धन्या सा जननी तव ॥१२८॥ या कौसल्या समुत्साहं नेत्राभ्यां तेऽद्य पश्यति । इत्युक्तवन्तं राजानं ननाम स रघूत्तमः ॥१२९॥ कौसल्याद्या राजदाराः सर्वे ते पौरवासिनः । लक्ष्मणो भरतश्चैव शत्रुघ्नस्तेऽथ मन्त्रिणः ॥१३०॥ नमस्कारानुरूपं चक्रुर्विमानस्थं मुदान्विताः । तान् गजाऽपि पृथक् पृष्ट्वा सर्वैर्देवगणैर्युतः ॥१३१॥ पूजितो रामचन्द्रेण मया सह न्यवर्त्तत । ययुः स्वं स्वं पदं सर्वे मया राज्ञा सुरास्तदा ॥१३२॥ रामेऽभिषिक्ते राजेन्द्र सर्वलोकसुखावहे। वसुधा सस्यसम्पन्ना फलवन्तो महीरुहाः ॥१३३॥ गन्धीनानि पुष्पाणि गन्धवन्ति चकाशिरे । मद्दन्न शतमध्यानां धेनूनां रघुनन्दनः ॥१३४॥ ददौ शत वृषाणां च द्विजेभ्यो वसु कोटिशः । सूर्यकान्तिसमप्रख्यां सर्वरत्नमयीं स्रजम् ॥१३५॥ सुग्रीवाय ददौ प्रीत्या राघवो हर्षसंयुतः । अङ्गतं ददौ श्रेष्ठं राक्षसेन्द्राय राघवः ॥१३६॥ अङ्गदाय ददौ दिव्ये राघवो बाहुभूषणे । चन्द्रकोटिप्रतीकाशं मणिरत्नविभूषितम् ॥१३७॥ मातायै प्रददौ हारं प्राप्या रघुकुलोत्तमः । सा तं हारं ददौ वायुपुत्राय सा मनस्विनी ॥१३८॥
विभ्रमभाववाले सामवेद जिनका गुणगान करता है, मनमात्रके विषय, प्रेमसे गान करन योग्य तथा वचनोंसे ग्रहण करन लायक श्रीरामचन्द्रका मैं सदास नमस्कार करता हूँ ॥१२३॥ हे देवि ! तुम्हारे प्रति कहे हुए श्रीरामके इस सुन्दर अष्टकको जो मनुष्य भक्तिसे पढ़ेगा अथवा सुने-सुनायेगा, वह अपनी अभिलषित कामनाओंको नित्य प्राप्त करेगा । १२४ । रामचन्द्रकी इतनी स्तुति करके ज्यों ही मैं उस समाधि बैठा, त्यों ही सूर्यके समान तेजस्वी राजा दशरथ विमानपर सवार होकर सुवत्सयुगके साथ वहाँ आकर सबीक सहित बन्धुओंसे वेष्टित तथा राजसिंहासनपर स्थित मुझस्वरूप राम परमात्माको देखकर स्तुति करन लगे ॥ १२५ ॥ १२६ ॥ देवनाओंके समूहसे परिवेष्टित राजा दशरथ प्रसन्न होकर बोले। उन्होंने कहा-मैं धन्य हूँ, मैं कृतकृत्य हूँ मेरे माता-पिता धन्य हैं । १२७ ॥ मेरा देश तथा कुल भी धन्य है कि जो मैं आज तुम्हें राजासनपर अभिषिक्तित देख रहा हूँ । हे महाबाहो ! तुम्हारी माता कौसल्या भी धन्य हैं, जो तुम्हें उत्साहपूर्वक अपने नेत्रांसे देख रही हैं। तदनन्तर रामने उन राजा दशरथको प्रणाम किया । १२८ । १२९ ॥ तब कौमल्या आदि राजाकी स्त्रियांने पुरवासियोने, भरत शत्रुघ्नने तथा मन्त्रियोने प्रमुदित होकर विमानमें स्थित राजा दशरथको प्रणाम किया । राजाने भी एक-एक करके उन सबसे कुशल पूछा। फिर देवताओ तथा मुझे साथ ले और रामचन्द्रसे पूजित होकर उन्होंने वहाँसे प्रस्थान कर दिया। भर तथा राजाके सहित के सब देवता अपने अपने धाम सिधारे । १३०-१३२ ॥ सब लोगोंको सुख देनेवाले राजाओंमें श्रेष्ठ राजा रामका अभिषेक हो जानेपर पृथ्वा धन-धान्यपूर्ण हो गयी और नहीं फलनेवाले भी वृक्ष फलने लगे ॥ १३३ ॥ सुगन्धरहित पुष्प भी सुगन्धित होकर सुगन्धित हान लगे। रघुनन्दन रामने सैकड़ों बैल, हजारों पांडे तथा करोड़ों रत्न ब्राह्मणाको दान दिये । उन रामने प्रसन्न होकर सूर्यके समान चमकनेवाली तथा अनेक प्रकारके रत्नोंसे निर्मित एक माला प्रीतिपूर्वक सुग्रीवको दी और एक सिरपेंच राक्षसेन्द्र विभीषणको दिया । १३४-१३६ ॥ उन्होंने अंगदको दिव्य बाजूबन्द दिये । रघुकुलमणि रामने सीताको करोड़ों चन्द्रमाके समान चमकने वाले मणियों तथा
| १४२ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १२ |
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नेन हारेण शुशुभे मारुतिर्गौरवेण च । तदा दृष्ट्वा हनूमन्तं रामो वचनमब्रवीत् ॥ १३९ ॥ मारुते त्वां प्रसन्नोऽस्मि वरं वृणु कांक्षितम् । हनुमानपि तं प्राह नत्वा रामं प्रहृष्टधीः ॥ १४० ॥ त्वन्नाम स्मरतो राम मनस्तृप्यति नो मम । अतस्त्वन्नाम सततं स्मरिष्यामि भूतले ॥ १४१ ॥ यावत्स्थास्यति ते नाम लोके तावत्कलेवरम् । मम तिष्ठतु राजेंद्र वरोऽयं मेऽभिकांक्षितः ॥ १४२ ॥ यत्र यत्र कथा लोके प्रचरिष्यति ते शुभा । तत्र तत्र गतिर्मेऽस्तु श्रवणार्थं सदैव हि ॥ १४३ ॥ देवालयान्नदीतीरात्तीर्थाद्वापि जलाशयात् । विनाऽन्यत्र स्थले नेस्तु कथा षड्घटिकोर्ध्वतः ॥ १४४ ॥ रामस्तथेति तं प्राह मुक्तस्तिष्ठ यथासुखम् । कल्पान्ते मम सायुज्यं प्राप्स्यसे नात्र संशयः ॥ १४५ ॥ तमाह जानकी प्रीता यत्र कुत्रापि मारुते । स्थितं त्वामनुयास्यन्ति भोगाः सर्व ममाज्ञया ॥ १४६ ॥ ग्रामागमपनेषु व्रजखेटकपादसु । वनदुर्गपर्वतेषु सर्वदेवालयेषु च ॥ १४७ ॥ नदीषु क्षेत्रतीर्थेषु जलाशयपुरेषु च । वाटिकोपवनाश्वत्थवटवृंदावनादिषु ॥ १४८ ॥ त्वन्मूर्तिं पूजयिष्यन्ति मानवा विघ्नशांतये । भूतप्रेतपिशाचाद्या नश्यंति स्मरणात्तव ॥ १४९ ॥ ये चान्ये वानराश्चाश्च ह्ययोध्यां समुपागताः । अमूल्याभरणैर्वस्त्रैः पूजिता राघवेण ते ॥ १५० ॥ सुग्रीवप्रमुखाः सर्वे वानराः सविभीषणाः । मकरध्वजसंपातिगुहकाः पृथ्विवादयः । यथार्हं पूजितास्तेन रामेण गमनादिभिः ॥ १५१ ॥ ततः सर्वैर्भोजनार्थं राघवः संस्थितोऽभवत् । रामेण प्राणाहुतयो गृहीताश्चेति मरुत्सुतः ॥ १५२ ॥ निर्गत्योड्डीय वेगेन रामाग्रे भोजनस्य च । त्रिपदायां स्थितं पात्रं हेमं पक्वान्नपूरितम् ॥ १५३ ॥ निनाय वामहस्तेन धृत्वा च विहसन्मुदा । स्वयं भुक्त्वा रामशेषं प्राक्षिपद्वानरानपि ॥ १५४ ॥
रत्नोंसे विभूषित हार सप्रेम समर्पण किया। उससमय सीताजीने श्री रामका दिया हुआ वह हार वायुपुत्र हनुमानको दे दिया ॥ १३७ ॥ १३८ ॥ उस हारके गौरवस हनुमान् बड़े ही प्रभासित होने लगे। यह देखकर रामने हनुमान्से कहा— ॥ १३९ ॥ हे मारुते ! मैं तुम्हारे ऊपर प्रसन्न हूँ जो चाहो सो वर माँगो। तब प्रसन्न हनुमान्ने रामको नमस्कार करके कहा— ॥ १४० ॥ हे प्रभो ! आपके नामस्मरणसे मेरा मन अब भी तृप्त नहीं हुआ है। अतएव जबतक आपका नाम भूतलमे विद्यमान रहे तबतक मैं आपके नामका स्मरण करता हुआ इस लोकमें जीवित रहूँ हे राजेन्द्र ! यहो मेरा अभिलषित वर आप मुझे दे दें । १४१ ॥ १४२ ॥ लोकमे जहाँ कहीं भी आपकी पवित्र कथा होती हो, वहाँ वह कथा सुननेके लिये जानेमे मेरी अप्रतिहत गति हो ॥ १४३ ॥ देवालय, नदीतीर, तीर्थस्थान तथा बावली आदि जलाशयोंको छोड़कर अन्य स्थानोंम छः घडीके बाद नित्य आपकी कथा हुआ करे । १४४ । रामने कहा अच्छा, तुम मुक्त होकर सुखसे भूमण्डलपर निवास करो कल्पान्तके समय तुम मेरी सायुज्य मुक्तिको प्राप्त होओगे, इसमें सन्देह नही है ॥ १४५ ॥ इसके पश्चात् जानकीजी प्रसन्न होकर बोली हे मारुत ! तुम जहाँ कही रहोगे, वहीपर मेरे आशीर्वादसे तुमको सब भोग्य पदार्थ प्राप्त हो जाया करेंगे ॥ १४६ ॥ ग्राम बाग, नगर, गोशाला, रास्ता, छोटा गाँव, घर, वन, जिला पर्वत, सर्व देवालय, नदी, तीर्थक्षेत्र, जलाशय, पुर, वाटिका, उपवन, पीपल, वट तथा वृन्दावन आदि स्थानोमे मनुष्य अपने विघ्नोंकी शान्ति करनेके लिये तुम्हारी मूर्तिकी पूजा करेंगे। तुम्हारे नाम स्मरण करनेसे ही भूत-प्रेत तथा पिशाच आदि दूर भाग जायेंगे ॥ १४७-१४९ । इसके बाद रामने अयोध्यामे जो अन्य वानर आये थे, उन सबका भी बहुमूल्य भूषण तथा वस्त्रोंसे सत्कार किया । १५० ॥ श्रीरामने वस्त्रादिसे सुग्रीव आदि वानरो विभीषण, मकरध्वज, संपाती तथा निषादराज आदि राजाओका भी यथायोग्य पूजा की ॥ १५१ ॥ उसके पश्चात् सबको साथ लेकर रामचन्द्रजी भोजन करने बैठे। रामके पाँच ग्रास ग्रहण करके तृप्त हो जानेके साथ ही हनुमान् झट उठकर रामके पास आ पहुँचे और उनके सामने पाडपर रक्खा हुआ पक्वान्नोंसे परिपूर्ण सुवर्णका थाल बाएँ हाथसे उठाकर आकाशमें चले गये और रामके उस भोजनशेषका स्वयं आनन्दसे
सर्गः १२ ] सारकाण्डम् १४३
तदा विभीषणाद्याश्च स्वकीयपात्राणि वेगतः । विसृज्य मर्कटे मूर्ध्नि न्युप्ता न्यथा सम्यक्कृतं त्विति ॥ १५५॥
तन्निशाम्यं रामशोच्छिष्टं बुभुजुः सप्रमान्विताः । महान् कोलाहलश्चासीद्रामोच्छिष्टार्थमादरात् ॥ १५६॥
सीतारामौ सन्निरीक्ष्य मुदा जहसतुस्तदा । एवं नानाकौतुकानि कुर्वन्तौ राघवांतिके । १५७॥
सुग्रीवाद्याः सुखं तस्थुस्तोपयन्तः कियदिनेम् । एतस्मिन्नन्तरे तत्र पुष्पकं च समाययौ पुनः ॥ १५८॥
प्राह देव कुवेरेण प्रेषितं त्वामह पुनः । मामाह यत्कुवेरस्तच्छृणुष्व त्वं रघूत्तम ॥ १५९॥
जितस्त्वं रावणेनादौ पश्चाद्रामेण निर्जितः । अतस्त्वं राघव नित्यं वह यावद्भवेद्भुवि ॥ १६०॥
यदा गच्छेद्रघुश्रेष्ठो वैकुण्ठं याहि मां तदा । तच्छ्रुत्वा राघवः प्राह सुग्रीवादीन्स्वथास्थले ॥ १६१॥
स्थाप्य श्रीरामयोध्यायां राजद्वारबहिर्विम तथेति रामवचनाद्वानराद्यान्यथास्थले । १६२॥
स्थाप्य श्रीरामयोध्यायां राजद्वारबहिः स्थितम् । चकार राज्य धर्मेण लङ्कायां म विभीषणः ॥ १६३॥
शशास राज्यं पाताले धर्मेण मकरध्वजः । चकार तार्क्ष्यः मणिनियोगराजस्यदे निने । १६४॥
शशास राज्यं कपिभिः किष्किन्धायां कपीश्वरः । शृङ्गवेरपुरे राज्यं गुहश्चाकरोन्मुदा १६५॥
नत्वा रामं वायुपुत्रो ययौ तप्तुं हिमालयम् । सर्वे विभीषणाद्याश्च पंचमे सप्तमेऽहनि । १६६ ।
दर्शनार्थं राघवस्य साकेतं प्रययुः सदा । पञ्च सप्त दिनान्यत्र स्थित्वा भोगान्धवांतिकेम् १६७॥
यातायातं सदा चक्रुः स्वस्वराज्याद्रघूत्तमम् । रामोऽपि राज्यमखिलं शशासाखिलवत्सलः । १६८॥
अनिच्छतं हि सौमित्रि यौवराज्येऽभ्यषेचयत् । लक्ष्मणः परया भक्त्या रामसेवापरोऽभवत् । १६९॥
विश्वामित्रोऽध्वरे पूर्व रणयागस्य पूर्णता ।
न कृता या राघवेण सा कृता स्वपदे तदा । रणयागः सविस्ताराद्वर्ण्यते शृणु पार्वति ॥ १७०॥
स्ताने तथा नीचे वानरोंके आगे फेंकने लगे ॥ १५२-१५४ ॥ यह देखकर विभीषण आदि भक्त भी शीघ्र अपने-अपने थालोंको छोड़कर हनुमान्की प्रशंसा करके कहने लगे कि तुमने बहुत उत्तम काम किया ॥ १५५ ॥ यह कहकर वे स्वयं भी बड़े आदरसे मारुतिके केश हुआ रामका उच्छिष्ट प्रसाद पाने लगे । उस समय रामकी जूठनके लिये बड़ा भारी कोलाहल मच गया ॥ १५६ ॥ राम और सीताने यह देखा तो प्रसन्न होकर हँसने लगे इस प्रकार विविध क्रीड़ायें करके सीता और रामको प्रसन्न करते हुए सुग्रीव आदि मित्र कुछ दिन वहाँ रहे । इतनेमें पुष्पक विमान पुनः वहाँ आया ॥ १५७, १५८ ॥ वह र म न कहने लगा - हे देव ! कुबेरने मुझको आपके पास वापस भेज दिया है । हे रघुनन्दन ! कुबेरने जो कुछ मुझसे कहा है, वह सुनिये ॥ १५९ । उन्होंने कहा है कि पहले तो रावणने तुमको मुझसे जीता था और बादमें रामने तुमको रावणसे जीता है । इस कारण तुम आकर तबतक राम ही की सवारी देनेका काम करो, जबतक कि भूमण्डलपर रहे ॥ १६० ॥ जब रघुश्रेष्ठ राम वैकुण्ठ धाम चले जावें, तब तुम मेरे पास चले आना । यह सुनकर रामने विमानको आज्ञा दी कि सुग्रीव आदि मेरे मित्रोंको उनके स्थानपर पहुँचाकर शीघ्र ही अयोध्या लौट आओ और राजमहलके दरवाजेके बाहर खड़े रहो । तदनन्तर विभीषण जाकर लङ्कामें धर्मपूर्वक राज्य करने लगे । १६१-१६३ ॥ मकरध्वज पातालमें धर्मपूर्वक राज्य-शासन करने लगे । गरुड़ने युवराजनगरपर अंगदजीका अभिषेक किया ॥ १६४ ॥ किष्किन्धामे कपीश्वर सुग्रीव राज्य करने लगे । शृङ्गवेरपुरमे निषादराज आनन्दसे राज्य करने लगा ॥ १६५ ॥ वायुपुत्र हनुमान् रामको नमस्कार करके तप करनेको हिमालय चले गये । फिर भी विभीषण-सुग्रीव आदि मित्र पाँचवें अथवा सातवें दिन अयोध्यामे श्रीरामका दर्शन करनेके लिए आया करते थे और वे श्रीरामके पास पाँच-सात दिन निवास करके चले जाते थे । इस प्रकार उन लोगोंका अपने-अपने राज्यसे श्रीरामके पास आना जाना लगा रहता था । सभी लोगोंके प्रिय राम भी सम्पूर्ण राज्यका पालन करने लगे ॥ १६६-१६८ ॥ न चाहनेपर भी रामने लक्ष्मणका युवराजके पदपर अभिषेक कर दिया और वे भी रामकी सेवामे तत्पर हो गये ॥ १६९ ॥ रामने पूर्व समयमे विश्वामित्रके यज्ञके समय जिस युद्धरूपी यज्ञकी समाप्ति नहीं की थी, उस रणयज्ञको इस समय अपने राज्यपदपर स्थित हो जानेपर पूर्णाहूति की । हे पार्वती !
१४४ आनन्दरामायणे [ सर्गः १२
रणांगणं यज्ञकुण्डं तत्र वै ह्यपलायनम् । तच्च वेदविधानं हि ब्रह्मसत्वं प्रकीर्तितम् ॥१७१॥ कवचाश्च घटाटोपो ज्ञेयः सम्भरणस्ततः । संशार्त्रनं शस्त्रमुद्योज्यं राक्षसमर्पणम् ॥१७२॥ शस्त्राणां मलशोधार्थं क्रियते यद्रणांगणे । भूमौ शराणां विस्तारः परिस्तरणमुत्तमम् ॥१७३॥ परिमूहनं ज्ञेयं यत्क्रिकालानलो महान् । मुखेण बाणरूपेण मांसाहूतिममर्षणम् ॥१७४॥ ऋग्भागं वषोर्भागं हाहाकारो भयानकः । म ॐकारवषट्कारघोषो ज्ञेयो रणाध्वरे ॥१७५॥ अग्नेर्ज्वाला शस्त्रतेजोघूग्र्रः स्वेदसमुद्भवो रणे ज्वालानिचयशान्त्यर्थं पृषदाज्यस्य सेचनम् । १७६॥ यच्चात्र तु वीराणामस्त्रावंचतमुत्सनम् । ज्ञानेन सह जीवस्य वलिर्दीपबलिः स्मृतः ॥१७७॥ ये देहलोभिनो वीरा बलिदोषहराः स्मृताः रामहस्तान्मृर्तिन्यक्ता ये कुर्वन्ति पलायनम् ॥१७८। देहबन्धान्न मुक्तास्ते बलिभक्षणदोषतः । पूर्णाहुतिः शिरोभिर्हि ज्ञेयासन्नत्र प्रदक्षिणाः ॥१७९। उच्चाटने हि सव्येन वीराणां जयहेतवे । नैज पदप्रदानं च ज्ञेया मा दक्षिणाऽध्वरे ॥१८०॥ मूर्ध्नि पुष्पवृष्टिब्बृहत्येव विप्राभिषेचनम् जयसम्पादनं युद्धे ज्ञेयं. संपादनं हि तत् ॥१८१। चराचराणांमानन्दो ज्ञेयः स निजगोत्रिणाम् । भूतानां तर्पणं विप्रभोजनं सम्प्रकीर्तितम् ॥१८२ । एवं सुबाहुना युद्धे राघवस्य रणाध्वरः । तथा गाधिजसञ्चारिडो नौ श्ये महैव हि ॥१८३। कृत्वाऽध्वरसमाश्रिप्त विश्वामित्रेण वै पुरा त्रिमर्जितो न रामेण दृष्ट्वाऽध्वं रणाध्वरे । १८४। कालानल मुनस्तस्य तृप्त्यर्थं राऽकरोन्मतिम् । कृत्वा भूमेर्महत्पात्रं विगधरुधिरंण हि । १८५॥ पात्रस्य प्रोक्षणं कृत्वा विश्वाहूत्यर्थमादरात् । रामः शूर्पणखायाश्च घ्राणं कणों विच्छेद यत् ॥१८६॥ प्राणाहूतिभ्वो गमेण त्रिशिराः खाद्दूषणौ । मारीचश्च कबन्धश्च पंच ते निहताः क्षणात् । १८७॥
उस रणरूपी यज्ञका मैं विस्तारसे वर्णन करता हूँ, सुनो ॥ १३०॥ उस रणस्थलमें युद्ध कुण्ड था। समरसे न भागना ही वेदविहित ब्रह्मसत्त्व था ॥ १७१॥ शस्त्राकी भनकार ही कंपंकी सामग्रो थी। रणांगणमें शत्रूोंका मैल छुड़ानेके लिये उनपर जो पत्थर घिसे जाते थे, वही मृत्तिकाका माँजना था। भूमिमें बाणोंका फैला-फैलाकर रखना ही उत्तम कुश आदिका आस्तरण था और बाण ही उनका परिसमूहन (बटोरना) था। महान् कालरूपी अग्नि ही यजकुण्डकी आग थी। उसमें बाणरूपा मुखसे मांसकी आहुतियों समर्पण की जाती थी ॥ १७२-१७४। ऋग्वेदकी ऋचा ही वषट्कार थी। भयानक हाहाकार ही ओंकार तथा वषट्कारका नाद था ॥ १७५। शस्त्रोंकी चमक ही आगकी लपट थी। पसीनेका बहना ही घृतौ था। वीर पुरुषोंका उत्तम शस्त्रमोचन ही अग्निके ज्वालाकी शान्तिका पृषदाज्य सींचनेरूपी उपाय था । ज्ञानपूर्वक जीवोंका शरीर-त्याग ही दीपदान था ॥ १७६ व १७७। जो शरीरमें ममता रखनेवाले थे, वे ही पूजाकी सामग्री तथा दानवों से भागनेवाले माने जाते थे। जो रामके हाथसे न मरकर बहूँत भाग जाते थे वे बलिभक्षण करनेके दोषसे देहरूपी बन्धनमें ही पड़ जाते थे-मुक्त नहीं होते थे। उस युद्धरूपी यज्ञमें सिरोंका कट कटकर गिरना ही नारियलके द्वारा दी जानेवाली पूर्णाहुति थी। विघ्नध्वंसके लिये अपनी दाहिनी ओरसे वीरोंको दूर करना ही प्रदक्षिणा थी। उस यज्ञमें मूल पुरुषकेण विजयपद (ब्रह्मपदका प्राप्ति) हो दक्षिणा थी ॥१७८-१८०॥ देवता-ओंके द्वारा जो पुष्पवृष्टि की जाती थी, वह ब्राह्मणोंका अभिषेचन था युद्धमें विजय प्राप्त करना ही यज्ञका फल था ॥ १८१॥ चर अचरका आनन्दलाभ ही अपने गात्रवालोंका आनन्द समझा जाता था। पशु-पक्षी आदि जीवोंकी तृप्ति ही विप्रभोजन कहा जाता था ॥ १८२। इस प्रकार रामका जो सुबाहुसे युद्धरूपी यज्ञ राक्ष-सोंके साथ आरम्भ हुआ, वह और गाधिपुत्र विश्वामित्रका यज्ञ दोनों साथ ही प्रारम्भ हुए । १८३॥ उनमेंसे विश्वामित्रजीने तो अपना यज्ञ समाप्त कर लिया था परन्तु रामने अपने दशमें कालानलको अतृप्त देखकर अपना युद्धयज्ञ समाप्त नहीं किया था। अतएव उसको तृप्त करनेका इच्छा करके रामने विराधके रुधिर से पृथ्वीरूपी पात्रका प्रोक्षण (शुद्धि करके शूर्पणखाके नाक-कान काटकर प्रेमसे भिन्न-विभिन्न आहुतिये दीं ॥ १८४-१८६॥ रामने त्रिशिरा, खर, दूषण, मारीच तथा कबन्धको क्षणभरमें मारकर पंचप्राणा-
सर्गः १२ ] सारकाण्डम् १४५
सर्गः १२ ] सारकाण्डम् १४५
शिखाबंधनमोक्षार्थं शबरी भवबंधनात् । कृता मुक्ता तु रामेण जलस्पर्शनहेतवे ॥१८८॥
नेत्रयोर्निहतो वाली दत्तं तद्रुधिरं तदा । काथिलंकार्युरी दग्धा कुंभकर्णस्तथौदनः । १८९॥
पक्वान्नमिंद्रजिज् ज्ञेयः शाकार्थं राक्षसा हताः । वरान्नं सारणो ज्ञेयः प्रहस्तो वटकः स्मृतः ॥१९०॥
निकुंभः पर्पटो ज्ञेयः कुंभस्तु लवणं स्मृतः । पायसार्थं कालनेमिस्त्वतिकायः स शर्करः ॥१९१॥
क्षीरमैरावणो ज्ञेयो घृतं मैरावणः स्मृतः । दध्योदनः समाम्नौ तु आहवे च स रावणः ॥१९२॥
हत्वा निवेदितः पात्रे तस्य कालानलस्य च । उच्छिष्टवलिमत्यागः केशत्वक्थिक्षसादिनाम् ॥१९३॥
संत्यागोऽत्र रणे ज्ञेयस्तदा तृप्तो बभूव सः । ततो रणाध्वरस्यात्र राघवेण विसर्जनम् ॥१९४॥
अयोध्यायां प्रवेशो हि कृतस्तन्मे वदाम्यहम् । अध्वरावभृथस्नानं ज्ञेयं राज्याभिषेचनम् ॥१९५॥
मंगलानि समस्तानि यज्ञांगविहितानि हि । ज्ञातव्यानीति रामेण रणयागो विसर्जितः ॥१९६॥
एवं प्रोक्तो मया देवि रणयागः सविस्तरः । रामोऽथ परमारमापि कार्याध्यक्षोऽतिनिर्मलः॥१९७॥
कर्तृत्वदिविहीनोऽपि निर्विकारोऽपि सर्वदा । स्वाऽनन्देनापि संतुष्टो लोकानामुपदेशकत् । १९८॥
चकार विविधान् धर्मान् गार्हस्थ्यमनुलंघ्य च । न पर्यदेवन् विधवा न च व्यालकृतं भयम् ॥१९९॥
न व्याधिजं भय चासीद्रामे राज्यं प्रशासति । औरसानिव रामोऽपि जुगोप पितृवत् प्रजाः ॥२००॥
सीतया बन्धुभिः सार्द्धं साकेते सुखमाप सः । इदं युद्धचरित्रं ते प्रोक्तं देवि मया तव ॥२०१॥
इति शतकोटिरामचरितांतर्गते श्रीमदानंदरामायणे वाल्मीकीये सारकाण्डे
युद्धचरिते रामराज्याभिषेकवर्णनं नाम द्वादशः सर्गः ॥ १२ ॥
तृप्तियं दी ॥ १८७॥ जिसकी गाँठ खोलनेके जगह रामने शबरीको संसारबन्धनसे छुड़ाकर मुक्त कर दिया । रामने बालीको मारकर उसके रुधिररूपी जलसे नेत्रोंमें स्पर्श किया । लंकाको जलाकर कालानलके लिये दाल तथा कढ़ी बनायी । अर्थात् लंका दाल-कढ़ीके स्थानमे गिनी गयी । कुम्भकर्णरूपी भात, मेघनादरूपो पक्वान और सब राक्षसोंका शाक बना । अन्य उत्तम पदार्थोंके स्थानपर सारण मारा गया । प्रहस्त बड़ा, निकुम्भ पापड़, कुम्भ नमक, कालनेमि खीर, अतिकाय शक्कर, ऐरावणरूपी दूधमे मैरावणरूपी घी तथा दधिभक्तके स्थानपर रावणको मारकर रामने कालानलके पात्रमें परोस दिया । कालानलने इन सबका भोजन करके केश, चर्म तथा अस्थियोंका जूठन रणमे छोड़ दिया । तब वह तृप्त हुआ । उसके पश्चात् रामका अयोध्यामें प्रवेश करना ही रणरूपी यज्ञकी समाप्ति अर्थात् रणयज्ञका विसर्जन हुआ । यहाँ रामका राज्याभिषेक ही यज्ञके अन्तका अवभृथस्नान था ॥ १८८–१९५ ॥ अन्यान्य मांगलिक कार्य उस यज्ञके अंग थे । इस प्रकार रामने सांगोपांग रणयज्ञ पूरा किया ॥ १९६ ॥ हे देवि ! मैने तुमको उपर्युक्त प्रकारसे समस्त रणयाग कह सुनाया । तदनंतर साक्षात् परमात्मा, कार्यसमुदायके अधिष्ठाता, कर्तृत्वादि अभिमानसे रहित, सदा निर्विकार स्वरूप, निज आनन्दसे ही संतुष्ट तथा सब प्राणियोंको सदुपदेश देनेवाले राम भी गृहस्थधर्मका पालन करते हुए अनेक धर्मोका आचरण करने लगे । उनके राज्यकालमें कोई भी स्त्री विधवा होकर रोती नहीं थी । किसोको साँप तथा व्याघ्र आदिका भय नहीं था और न किसीको रोगका ही भय था। रामने भी समस्त प्रजाको, पिता जिस प्रकार अपने सगे लड़कोंका पालन करता है, उसी प्रकार पालन किया । हे देवि ! यह मैंने तुमको रामका युद्धचरित्र कह सुनाया ॥ १९७–२०१ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितांतर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये सारकांडे युद्धचरित्रे रामतेजपाण्डेयकृत'ज्योत्स्ना'भाषाटीकायां रामराज्याभिषेकवर्णनं नाम द्वादशः सर्गः ॥ १२ ॥
१४६ आनन्दरामायणे [ सर्गः १३
त्रयोदशः सर्गः ( अगस्त्य-रामसंवाद )
श्रीशिव उवाच
एकदा राघवं द्रष्टुं मुनिभिः कुम्भसम्भवः। ययौ रामेण सन्मानमानितः स उपाविशत् ॥ १ ॥ उपविष्टाः प्रहृष्टाश्च मुनयो रामपूजिताः। संसृष्टकुशलाः सर्वे रामं कुशलमब्रुवन् ॥ २ ॥ कुशलं ते महाबाहो सर्वत्र रघुनंदन। दिष्ट्येदानीं प्रपश्यामो हतशत्रुमरिंदम ॥ ३ ॥ दिष्ट्या त्वया हताः सर्वे मेघनादादयोऽसुराः। हन्वा रक्षोगणान्सर्वान् कृतकृत्योऽद्य जीवसि ॥ ४ ॥ इति तेषां वचः श्रुत्वा रामस्तानाह सुस्मितः। किमर्थमादौ युष्माभिर्मेघनादोऽद्य कीर्तितः ॥ ५ ॥ इति रामवचः श्रुत्वाऽगस्तिस्तैस्त्ववलोकितः। कुंभयोनिस्तदा रामं प्रीत्या वचनमब्रवीत् ॥ ६ ॥ शृणु राम यथा वृत्तं मेघनादस्य चेष्टितम्। जन्मकर्मवरप्राप्तिं संक्षेपादद्वदतो मम ॥ ७ ॥ पुरा कृतयुगे राम पुलस्त्यो ब्रह्मणः सुतः। तृणबिंदुसुतायां स पुत्रं त्रैलोक्यविश्रुतम् ॥ ८ ॥ निर्ममे विश्रवा नामधेयं वेदनिधिं शुभम्। भरद्वाजसुतायां च विश्रवा निर्ममे सुतम् ॥ ९ ॥ श्रेष्ठं वैश्रवणं तस्मै प्रमन्नोऽभूद्विधिश्विरात्। विधिर्वैश्रवणायोध तुष्टस्तन्पमसा ददौ ॥१०॥ मनोज्ञमभिलषितं यानं धनेशत्वमखंडितम्। पुष्पकं चाप्येकदाऽसौ द्रष्टुं विश्रवसं ययौ ॥११॥ पुष्पकेण धनाध्यक्षो ब्रह्मदत्तेन भास्वता। नत्वा तातं तदा प्राह न स्थानं ब्रह्मणा मम ॥१२॥ दत्तं स्थेयं मया कुत्र तद्विचार्य वदस्व माम्। विश्रवा अपि तं प्राह विश्वकर्मविनिर्मिता ॥१३॥ लंकानाम्नी पुरी श्रेष्ठा सागरेऽस्ति सुमंडिता। त्यक्त्वा विष्णुभयाद्दैत्या विविशुस्तं रसातलम् ॥१४॥ सुयं त्वं वस तस्यां हि तथेत्युक्त्वा धनेश्वरः। गत्वा तस्यां चिरं कालमुवास पितृसम्मतः ॥१५॥
श्रीशिवजी बोले- हे प्रिये ! एकदिन बहुतसे मुनियोंके साथ अगस्त्यमुनि श्रीरामका दर्शन करने आये । रामसे सम्मानित होकर वे सब बैठे ॥ १ ॥ अन्यान्य मुनि भी रामसे पूजित होकर प्रसन्नतापूर्वक बैठ गये । रामके पूछनेपर सबने अपना कुशल क्षेम सुनाया ॥ २ ॥ और कहा- हे रघुनन्दन ! बड़े हर्षकी बात है कि शत्रुको मारकर सकुशल आपको हम लोग राज्यसिंहासनपर विराजमान देख रहे हैं। हे अरिन्दम (शत्रुओं-को संता दिखलानेवाले)! आपने बड़े भाग्यसे मेघनाद आदि सब असुरोंको मार गिराया है। उन्हें मार तथा कृतकार्य होकर आप विराजमान हैं ॥ ३ ॥ ४ ॥ उनका ऐसा वचन सुनकर राम कुछ मुसकराते हुए बोले-आपलोगोंने सब राक्षसोंमसे मेघनादका नाम पहले क्यों लिया ? रामका यह प्रश्न सुनकर वे सब मुनि अगस्त्य मुनिका मुख देखने लगे। यह देखकर अगस्त्य बहुत प्रेमपूर्वक रामसे बोले - ॥ ५ ॥ ६ ॥ हे राम ! मैं आपसे मेघनादका चरित्र, जन्म, कर्म तथा वरप्राप्तिका वृत्तान्त संक्षेपमें कहता हूँ, आप सुनें ॥ ७ ॥ हे राम ! सत्ययुगमें पुलस्त्य नामके ब्रह्मपुत्रने तृणबिन्दुकि पुत्रीस तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध वेदवेत्ता विश्रवा नामका पुत्र उत्पन्न किया। विश्रवाने भारद्वाजकी पुत्रीसे वैश्रवण नामक श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न किया कुछ दिनोंके बाद वैश्रवणकी तपस्यासे प्रसन्न होकर ब्रह्माने उसको उसका मनोवांछित पुष्पक विमान, अखण्ड धनेशत्व तथा कुबेरकी पदवी प्रदान की। एक दिन ब्रह्माके दिये हुए उस सुन्दर पुष्पक विमानपर सवार होकर धनाधिप कुबर अपने पिता विश्रवाका दर्शन करने गये। वहाँ जाकर कुबेरने पिताको नमस्कार करके कहा- हे पिताजी ! ब्रह्माने मुझे निवासके लिये कोई स्थान नहीं दिया है। अतः आप विचार करके कोई मेरे रहने योग्य स्थान बताइए। विश्रवाने कहा-विश्वकर्माकी बनायी हुई एक सुन्दर और श्रेष्ठ लंका नामकी नगरी समुद्रके बीचमें विद्यमान है। विष्णुके डरसे दैत्य लोग उसे छोड़कर पातालमें चले गये हैं ॥ ८-१४ ॥ तुम जाकर उसमें सुखपूर्वक निवास करो। 'तथास्तु' कहकर कुबर पिताके कथनानुसार जाकर बहुत काल
सर्गः १३] सारकाण्डम् १४७
कस्मिश्चिच्च काले हि सुमालीनाम राक्षसः । दुहित्रा व्यचरद्भूमा पुण्यकेतुं ददर्श सः ॥१६॥
हिताय चिन्तयामास राक्षसानां महामनाः । कैकसीं तनयामाह गच्छ विश्रवसं मुनिम् ॥१७॥
वरयस्व मुनेस्तेजःप्रतापात्ते सुताः शुभाः । भविष्यन्ति धनाध्यक्षतुल्या नो हितकारिणः ॥१८॥
सा संध्यायां ययौ शीघ्रं मुनेरग्रे व्यवस्थिता । लिखन्ती भुवि पादाङ्गुष्ठेन चाधोमुखी स्थिता ॥१९॥
तामपृच्छन्मुनिः का त्वं साऽऽह त्वं वेत्तुमर्हसि । ततो ध्यात्वा मुनिः सर्वं ज्ञात्वा तां प्रत्यभाषत ॥२०॥
ज्ञातं तवाभिलषितं मत्तः पुत्रानभीप्ससि । दारुणायां तु वेलायामागताऽसि सुमध्यमे ॥२१॥
अतस्ते दारुणौ पुत्रौ राक्षसौ संभविष्यतः । साऽब्रवीन्मुनिशार्दूलं त्वत्तोऽप्येवंविधौ सुतौ ॥२२॥
तामाहान्तिमजो यस्ते भविष्यति महामतिः । ततः सा सुषुवे पुत्रान् यथाकाले सुमध्यमा ॥२३॥
रावणं कुम्भकर्णं च क्रौंचीं शूर्पणखां शुभाम् । कुंभीनसीं कनीयांसं तृतीयं न विभीषणम् ॥२४॥
रावणः कुम्भकर्णश्च त्रयो दुहितरस्तथा । दुर्वृत्ताः प्राणिघ्नाश्चैव बभूवुर्मुनिहिंसकाः ॥२५॥
एकदा रावणो मात्रा लिङ्गार्थे प्रेषितः शिवम् । कर्तुं प्रसन्नमगमत् कैलासं कर्म दुष्करम् ॥२६॥
किञ्चित्स्वीयं शिरश्छित्त्वा वीणां षड्जस्वरैर्मुहुः । कृत्वा पीठं हि देहस्य तन्मूलं शिरसस्तथा ॥२७॥
तदग्रं पादयोः कृत्वा शंकूनांगुलिमस्तथा । तन्त्रीः कृत्वाऽन्त्रमालाभिः क्षतशोध्य सहस्रशः ॥२८॥
एवं कृत्वा स्वदेहस्य वीणां षड्जस्वरैर्मुहुः । चकार स्वमुखेनैव गांधर्वं गायन शुभम् ॥२९॥
तदा नंदीश्वरं प्राह शङ्करो लोकशङ्करः । शिरः संधाय हस्तेन त्वया वाच्योऽयं रावणः ॥३०॥
आत्मलिंगं राक्षसं त्वां शङ्करो न प्रदास्यति । हृद्गतं हि मया ज्ञातं शंभोस्त्वं याहि स्वस्थलम् ॥३१॥
इत्युक्त्वा प्रेषणीयोऽयं स रावणः स्वस्थलं यथा । इति शंभोर्वचः श्रुत्वा ययौ नंदी स रावणम् ॥३२॥
तक वहाँ रहे ॥ १५॥ पश्चात् किसी समय सुमाली राक्षसने अपनी पुत्रीको साथ लेकर पृथ्वीपर भ्रमण करते समय पुण्यकेतुको देखा । १६ । तब महात्मा सुमालीने राक्षसोंका हित सोचकर अपनी लड़की कैकसीसे कहा कि तुम विश्रवा मुनिके पास जाकर मुनिके तेज-प्रतापसे सुन्दर पुत्रोंकी प्राप्तिके लिये वर माँगो । वे पुत्र कुबेरके समान प्रतापी तथा हमलोगोंके हितकारी होंगे । १७॥ १८॥ तदनुसार सायंकालके समय मुनिके पास जाकर पाँवके अङ्गुठेसे धरतीको कुरेदती हुई वह नीचा मुख करके खड़ी हो गयी ॥ १९ ॥ मुनिने उससे पूछा—तुम कौन हो ? उसने कहा कि आप स्वयं इस बातको समझ सकते हैं। तब मुनिने ध्यान करके सब कुछ जान लिया और उससे बोले— ॥ २० ॥ मुझे मालूम हो गया कि मुझसे तू पुत्र पाना चाहती है, परन्तु हे सुमध्यमे ! तू इस भयानक समयमें यहाँ आयी है। इसलिये तुझसे दो भयानक राक्षस पुत्र उत्पन्न होंगे। तब वह मुनिशार्दूलसे बोली—हे महाराज ! क्या आपसे भी मुझे ऐसे ही पुत्र प्राप्त होंगे ? ॥ २१ ॥ २२ ॥ तब मुनि बोले—अच्छा जा, तेरा आखिरी पुत्र बड़ा बुद्धिमान होगा। पश्चात् उस सुन्दर कमरवाली कैकसीने यथासमय तीन पुत्र उत्पन्न किये ॥ २३ ॥ रावण कुम्भकर्ण, क्रौंची, शूर्पणखा, कुम्भीनसी और सबसे छोटा तीसरा पुत्र विभीषण उससे उत्पन्न हुआ ॥ २४ ॥ उनमेंसे रावण, कुम्भकर्ण और तीन लड़कियें बड़ी दुराचारिणी, जीवघातिनी तथा मुनिहिंसक हुई । २५ ॥ एक दिन रावणको माता कैकसीने रावणको शिवजीके पास लिङ्ग लेने भेजा । कैलासपर जाकर रावणने शिवजीको प्रसन्न करनेके लिये बड़ा दुष्कर काम किया । २६ । उसने अपने सिरका कुछ भाग काटकर वीणा बनायी । सिरसे वीणाका मूलभाग बनाकर अपनी देहसे उसका पृष्ठभाग तैयार किया पाँवोंसे उस वीणाका अग्रभाग बनाया और अँगुलियोंसे वीणाकी खूँटियें तैयार कीं। अपने पेटके भीतरकी आँतोंसे सैकड़ों एवं हजारों तार बनाकर अपने शरीरसे ही वीणा रची । पश्चात् षड्ज आदि स्वरोंसे रावणने अपने मुखसे ही गंधर्वके समान सुन्दर गायन आरम्भ किया ॥ २७-२९॥ तब लोगोंका कल्याण करनेवाले भगवान् शंकर नन्दीश्वरसे बोले कि तुम अपने हाथसे रावणका सिर संधान करके उससे कहो कि शंकरजी तुम जैसे राक्षसको आत्मलिङ्ग कभी न देंगे । मैं शिवजीके हृदयकी बात जानता हूँ।
| १६८ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १३ |
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शिरः संयोज्य हस्तेन शिवोक्तं तं न्यवेदयत् । तच्छ्रुत्वा रावणश्चापि समतिक्रम्य तां निशाम् ॥३३॥ चकार पूर्ववद्गानं द्वितीयदिवसे पुनः । नन्दिना शंकरश्चापि पूर्ववत्तं न्यवेदयत् ॥३४॥ इत्थं दश दिनान्येव गतानि रावणस्य च । अथ तत्कर्मणा तुष्टः शङ्करो गायनेन च ॥३५॥ भूत्वा प्रसन्नस्तं प्राह वरं वरय चेति वै । दृष्ट्वा शंभुं रावणोऽपि शिरासा तेन संधितः ॥३६॥ वरयामास मन्मात्रे ह्यात्मलिंगं तथा मम । पत्न्यर्थं पार्वतीं देहि तथेत्युक्त्वा ददौ शिवः ॥३७॥ गृहीत्वा गंतुकामं तं पुनः प्राह हरस्तदा । मतोपार्थं त्वया वीर दशवारं निजं शिरः ॥३८॥ खङ्गेन छेदितं यस्मात्तस्मात्तेऽद्य शिरांसि हि । दश विंशद्भुजाश्चापि भविष्यन्ति गिरो मम ॥३९॥ ततः स रावणस्तुष्टो गिरिर्जालिंगमभ्युतः । विंशद्भुजो दशग्रीवः सम्प्रत्थ गन्तुमुद्यतः ॥४०॥ कल्पभेदाच्छतशिराः शतवारं प्रमादितैः । स प्रोक्तः स्वशिरोभिर्हि शतद्वयभुजः कचित् ॥४१॥ तस्माद्धि हृतवान् विष्णुस्त्वं तं मार्ग प्रतार्य च । तयोश्चाधस्तटे लिंगं गोकर्णं रावणात्तथा ॥४२॥ गृहीत्वा स्थापितं पूर्वं रावणोऽपि गृहं ययौ । मंदोदरीं हरैर्वोक्त्यल्लभ्वा मयसुतां शुभाम् ॥४३॥ मातुः कार्यमसंपाद्य तूष्णीमेवातिलज्जितः । मन्दोदर्याऽभवन्स्वीयं विवाहं चोपपूरितः ॥४४॥ दृष्ट्वोदा धनाध्यक्षं पुष्पकस्थं तु कैकसी । पुत्रान् धिक्कारयामास यूयं पढा मृतोपमाः ॥४५॥ मापत्न्याश्चैषु ये दृष्ट्वा जायते नात्र लज्जिताः । ते मातृवचनं श्रुत्वा ययुर्गोकर्णमुत्तमम् ॥४६॥ दशवर्षसहस्राणि कुम्भकर्णोऽकरोत्तपः । विभीषणोऽपि धर्मात्मा सत्यधर्मपरायणः ॥४७॥
'भलिए तुम अपने स्थानको वापस चले जाओ' ॥ ३०, ३१ ॥ ऐसा कहकर उसको उनके स्थानपर भेज दा, नन्दीश्वर शिवका यह बचन सुनकर रावणके पास गये । ३२ ॥ उन्होंने अपने हाथसे उसका सिर धड़से जोड़कर शिवका वचन उसको कह सुनाया। रावण यह सुनकर भी उस रातको वहीं रहा और दूसरे दिन फिर उसी विधिसे शिवजीका गुणगान करने लगा । शिवजीने उस दिन भी अपना संदेश नन्दीके द्वारा रावण का कहल भेजा । परन्तु रावणने फिर भी अपना गायन उसी प्रकार दस दिनतक जारी रक्खा । तब शंकरजी उस उम्र भयानक कर्म तथा मनोहर गायनसे प्रसन्न हो गये और उससे कहा-वर मांगो । ऐसा कहकर शिवजी ने उसका वह सिर भी धड़से जोड दिया, तब उसने शंभुसे वर माँगा कि आप मेरा माताके लिए आत्म- लिंग तथा पत्नी बनानेके लिए मुझे पार्वती जीको दे दें जिये । 'तथाऽस्तु' कहकर शिवजीने उसको वे दोनों चीजें दे दीं । ३३-३७ ॥ जब उनकों लेकर रावण चलने लगा, उस समय शिवजी कहने लगे-हे वीर ! तुमने मुझको प्रसन्न करनेके लिये अपना सिर दस बार तलवारसे काटा है। इसलिए मेरे कथनानुसार तुम्हारे दस मिर तथा बीस भुजायें हो जायेंगी ॥ ३८ ॥ ३९ ॥ तब रावण प्रसन्नतापूर्वक दस सिर और बीस हाथवाला बनकर पार्वती तथा शिवलिंग लेकर अपने स्थानकी ओर चला ॥ ४० ॥ कहीं-कहीं कल्पभेदसे रावण सौ बार मस्तक काटनेसे सौ सिर तथा दो सौ हाथोंवाला भी कहा गया है । ४१ ॥ बादमें रास्तेसे ही विष्णुभगवान् रावणके हाथसे तुमको (पार्वतीको) छीन ले गये । तब तुम (पार्वती) भी श्रीहरिको धोखा देकर उनसे अदृश्य हो गयीं । विष्णुकी तरह तुमने रावणके हाथसे शिवलिंग भी छीन लिया और उस लिंगको समुद्रके किनारेपर ही गोकर्ण नामसे स्थापित कर दिया। तब रावण खाली हाथ लौट गया और विष्णुके कथनानुसार मय राक्षसकी सुन्दरी पुत्री मन्दोदरी उसको प्राप्त हुई ॥४२॥४३॥ माताके कार्यका सम्पादन न कर सकनेके कारण वह बहुत लज्जित हुआ और कुछ भी नहीं कह सका । पश्चात् मन्दोदरीके साथ विवाह करके वह सन्तुष्ट हुआ ॥ ४४ ॥ एक समय उसकी माता कैकसी धनपति कुबेरको पुष्पक विमानपर बैठा देखकर अपने पुत्रोको धिक्कार- कर कहने लगी कि तुम लोग नपुंसक तथा मृतक सदृश हो ॥ ४५ ॥ अपने सोतेले भाईका उत्कर्ष देखकर तुम लोगोंको लज्जा नहीं आती' माताके इस कटु वचनको सुनकर वे तीनो भाई पूजनीय गोकर्ण महादेवके पास गये ॥ ४६ ॥ वहाँ कुम्भकर्णने दस हजार वर्ष तपस्या की। धर्मात्मा विभीषणने भी सत्यधर्मपरायण होकर