भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 150, कुल 811 में से

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११४ आनन्दरामायणे [ सर्गः १२

तामसी राजसी चैव सात्त्विकी या त्रिधा पुरा । जाता रावणघातार्थं सा चाप्येकैव वै तदा ॥११॥ ततो देवैः स्तुतो रामश्चेन्द्रेण समरे मृतान् । वानरादीन् सुधावृष्ट्या जीवयामास सादरम् ॥१२॥ तत्रैकं वानरं रामोऽदृष्ट्वा पप्रच्छ मारुतिम् । राघवं मारुतिः प्राह कुम्भकर्णेन भक्षितः ॥१३॥ यदि किञ्चित्तस्य कर्णनखकेशास्थिलोहितम् । रणेऽभविष्यत्पतितं तर्ह्यद्यामृतवृष्टितः ॥१४॥ अभविष्यज्जीवितः स सर्वं विद्धि रघूत्तम । सुधावृष्ट्या राक्षसांस्ते जीवयिष्यति वै पुनः ॥१५॥ इति भीत्या पुराऽस्माभिः सर्वं त्यक्ता महोदधौ । तन्मारुतेर्वचः श्रुत्वा यमराजं व्यलोकयत् ॥१६॥ यमोऽपि भान्या रामायाऽर्पयच्च प्लवगोत्तमम् । तं दृष्ट्वा राघवस्तुष्टस्त्वाऽऽज्ञां नाकमुत्तमम् ॥१७॥ गर्तुं ददौ मातलिने सोऽपि नत्वा रघूत्तमम् । रथेन वाजियुक्तेन ययौ मघवतः पुरीम् ॥१८॥ रामस्तु मंगलस्नानं कर्तुं संप्राथितोऽपि हि । विभीषणेन भरतं स्मृत्वा नांगीचकार सः ॥१९॥ ततः सर्वैर्वानरैश्च पुष्पकं चारुरोह सः । रथेन दारुकश्चापि गरुडो मकरध्वजः ॥२०॥ विभीषणश्चारुरोह पुष्पकं राघवाज्ञया । ततस्ते निर्जराः सर्वे राममामन्त्र्य खं ययुः ॥२१॥ दृष्ट्वा रामं दशरथो विमानेन ययौ दिवम् । अथ तं राघवं प्राह पुष्पकस्थं विभीषणः ॥२२॥ राम ते प्रष्टुमिच्छामि तत्त्वं मा वक्तुमर्हसि । ऐरावणगृहे राम यदा पातालमुत्तमम् ॥२३॥ पुम गतस्तदा तूष्णीं किमर्थं त्वं स्थितः प्रभो । कथं तौ न हतौ दुष्टौ तदैव क्षणमात्रतः ॥२४॥ तत्तस्य वचनं श्रुत्वा विहस्य राघवोऽब्रवीत् । अमराणां वधः पूर्वं विधिना मारुतेः करात् ॥२५॥ प्रोक्तस्तस्मान्मया तूष्णीं प्रताक्षा मारुतः कृता । अन्यच्चापि व्रगस्त्या हि मारुतेः पौरुषं जनाः ॥२६॥

दिया था। इस समय भगवान् रामचन्द्रने उन्हा जानकीका आलिंगन करक अपनी गोदमे बैठा लिया ॥ ८-१०॥ जिस साताने पूर्वकालमे रावणवधरू लिए तामसा, राजसी तथा सात्त्विकी ये तीन मूर्तिये धारण का थी, वह उस समय पुनः एक ही गयीं । ११॥ पश्चात् सब देवताओने मिलकर रामकी स्तुति की। रामन इन्द्रस कहकर समरम मर हुए वनरांको सुघावृष्टिष जविन करवाया॥ १२॥ उनम एक बानरखा न देखकर रामने मारुतिस पूछा मारुतन उत्तर दिया कि मालूम होता है, उसे कुम्भकर्ण खा गया । १३। हे रघूत्तम! यदि उस बानरका नख, केश अथवा लोहित आदि कुछ भी रणभूमिम शेष होता तो वह अवश्य इस अमृतवृष्टिसे जीवित हो जाता। यदि कहू कि अमृतवृष्टिस राक्षस क्यो नहीं जी गय तो इसका उत्तर यह है कि उनका ता जीवित हो जानके डरसे हम लागाने पहले ही समुद्रम फक दिया था। मारुतिक इस बचनको सुनकर रामने यमराजकी आर देखा उनके देखनेसे ही यमराज डर गये और उस बन्दरको रामके भाग लाकर खड़ा कर दिया। यह देखकर राम प्रसन्न हो गये। बादमें रामने मातलिक स्वर्ग जानेकी आज्ञा दे दा वह भा रामको प्रणामकर तथा अश्वयुक्त रथ लेकर इन्द्रपुरीको चला गया। १४-१८। तदनन्तर विभीषणन रामका विघ्नशान्तिकारक मङ्गलस्नान करनेके लिये कहा। जो किसो विघ्न, आपत्ति तथा राग आदिके बाद किया जाता है, पर रामने भरतका स्मरण करके उसे अंगीकार नहीं किया ॥ १९॥ बादम समस्त बन्दरांक साथ रामजा पुष्पक विमानपर सवार हो गये। रथसहित दारुक, गरुड़ और मकरध्वज भा उसपर चढ़ गये ॥ २० । रामकी आज्ञा पाकर विभीषण भा विमानास्कूढ हो गय। तभी सब देवता राममा आवश पाकर स्वर्गको चले गय ॥ २१। राजा दशरथ जा कि जनकनन्दिनीके अग्निप्रवेशके समय विमानपर बैठकर आये थे, भा रामस पूछकर स्वर्गका चल दिये। इसके उपरान्त पुष्पक विमानपर स्थित विभीषणने रामस कहा-॥ २२ । हे राम ! मै आपसे कुछ पूछना चाहता हूं। कृपा करके आप उसका उत्तर दे। हे राम ! जब आप पातालमे ऐरावणके यहाँ गये थे। २३॥ उस समय हे प्रभा! आप चुप क्यों हो गये थे। उस समय आपने उन दुष्टोंको मर क्यों नहीं डाला ? । २४। यह प्रश्न सुना तो राम कुछ मुस्कुरा-कर बोले कि पूर्वकालमे किसी समय ब्रह्माने 'उन दैत्योंका वध हनुमान्‌के हाथस होगा' ऐसा कह दिया था ॥ २५॥ इसी कारण मैंने चुप होकर वह काम मारुतिपर ही छोड़ दिया था और इसीलिये मैंने मारुतिके