श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 151, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १२] सारकाण्डम् [१३५
यदंतु येन श्रीरामलक्ष्मणौ मोचितौ पुरा । अमूगभ्यां हि पाताले सोऽयं श्रीरामसेवकः ॥२७॥
इति पौरुषदुद्ध्यर्थं मारुतेर्जगतीतले यश श्चास्य बलिनस्तथा तूष्णीं स्थित मया ॥२८॥
नोचेद्हुंकारमात्रेण पथि हर्तुं न किं क्षमः । ईषीकास्त्रेण काकस्य येन नेत्रं विदारितम् ॥२९॥
शतयोजनपर्यन्तं मागीच्चोर्ध्वं पतत्रिणा । पुरा येन मयाऽभ्यक्तः सोऽहं किं कुण्ठितस्तदा ॥३०॥
तयोर्वधे तु पाताले न शस्त्राद्यं प्रतीक्षितम् । मारुतेः पौरुषार्थं हि सत्यं वेत्थ विभीषण ॥३१॥
इति रामवचः श्रुत्वा मारुतिः स विभीषणम् नत्वा प्राह विहस्याथ किं त्वं तद्विस्मृतोऽसि हि ॥३२।
सेतुकाले गघवेश्च गर्वं दृष्ट्वा मयि स्थितम् लांगूलं खंडितं पूर्वं लिंगोत्पाटनहेतुना ॥३३।
तस्य मे राघवाग्रे हि किं बल मन्यसेऽत्र हि। किं विलम्बो राघवाय तयोर्मुग्ध्योर्वधे ॥३४॥
धर्षिता निजदासस्य कीर्तिरेव विभीषण । इति तन्मारुतेर्वाक्यं श्रुत्वा गर्वं विभीषणः ॥३५॥
ननाम परया भक्त्या ततः सम्यगपूजयत् । अथ रामः पुष्पकस्थः सीतया प्रार्थना गुरुः ॥३६॥
तद्वाक्यगौरवात्तुष्टस्त्रिजटायै वरन्ददौ । वस्त्रालङ्कारभूषाभिः पूर्वं तष्टां विधाय च ॥३७।
त्रिजटे वचनं मेऽद्य शृणु मंगलदायकम् कार्तिके माधवे माघे चैत्रे मासचतुष्टये ॥३८॥
स्नात्वाऽग्र त्रिदिनं स्नान न्वत्प्रीत्यर्थं नरोत्तमाः । करिष्यंति हि तेनैव कृतकृत्या भविष्यसि ॥३९॥
यैर्नास्त्रिदिनं स्नानं न कृतं पूर्णिमोर्ध्वतः । तेषां मासकृतं पुण्यं हर त्व वचनान्मम ॥४०।
अन्यच्चापि शृणुष्व त्वं दीयते यो वरो मया । अश्रुचीनि गृहाण्येव तथा श्राद्धहवींषि च ॥४१॥
क्रोधान्विहेन दत्तानि विधिवत्कृतान्यपि । त्रिजटे तानि तुभ्य हि शृण्वन्यच्चं मयोच्यते ॥४२॥
पादशौचमनम्यग् तिलहीन च तर्पणम् । सर्वं तन्त्रिजटे तुभ्यं तथा श्राद्धमदक्षिणम् ॥४३।
यहाँ प्रतीक्षा की। दूसरी इच्छा यह थी कि समग्रम् लोग मारुतिके बलको भी जान जायें कि मारुतिने पातालमें राक्षसोंके हाथसे राम-लक्ष्मणको छुड़ाया था, वही यह रामका सेवक हनुमान् है॥२६॥२७॥ इस प्रकार जगत्में अपने बलवान् सेवक हनुमान्के पुरुषार्थकी प्रसिद्धि करनेके लिए ही मैं वहाँ चुप हो गया था ॥२८॥ नहीं तो क्या मैं उनको रामन्म ही हुंकारमात्रसे नष्ट नहीं कर सकता था? जिसने सीकके अस्त्रसे ही काक जयन्तका नेत्र फोड़ डाला ॥२९॥ जिसने बाणसे मार्गेश्वरको सौ योजनकी दूरीपर समुद्रमें फेंक दिया। वह मैं तब क्या कुण्ठितशक्ति हो गया था कभी नहीं। मैने पातालमें उनकी मारनके लिय किसी शस्त्रकी राह नहीं देखी थी हे विभीषण ! तुम सच जानो कि मैं उस समय केवल हनुमान्के बलकी ख्याति करनेके लिए ही चुप हो गया था ॥३०॥३१॥ रामका यह वचन सुनकर हंसते हुए मारुतिने विभीषणसे कहा-क्या तुम उस बातको भूल गये, जब सेतु बाँधनेके समय मन्मन्त मुझको कुछ गर्वयुक्त देखकर स्थापित शिवलिंग उखाड़नेके बहाने मेरा पूँछ तोड़वा डाली थी ॥३२॥३३॥ ऐस मुझ निर्बलका बल रामचन्द्रके सम्मुख किसी गिनतीमें नहीं है। रामचन्द्रको उन दोनों असुरोंको मारनेमे क्या देर लगती? कदापि नहीं। हे विभीषण ! रामने केवल अपने दासकी (मेरी) कीर्ति बढ़ानेके लिए ही वैसा किया था। मारुतिकी बात सुनकर विभीषणने रामकी परम भक्तिसे प्रणाम करके प्रेमसे अच्छी तरह पूजन किया पश्चात् रामने विमान पर बैठी हुई सीताके कहनेसे उनके वाक्यका आदर करते हुए प्रसन्न होकर त्रिजटाको वरदान दिया। पहले उसको वस्त्र-अलंकार आदिस संतुष्ट करके कहा-हे त्रिजटे ! तुम मेरी मङ्गलमयी वाणी सुनो। कार्तिक, वैशाख, माघ और चैत्र इन चार महीनोंमें पहलेके तीन दिन सभी नरश्रेष्ठ तुमको प्रसन्न करनेके लिए जो स्नान करेंगे। इससे तुम कृतकृत्य हो जाओगी ॥३४-३९॥ जो मनुष्य इन चार महीनोंमें पूर्णिमासे लेकर तीन दिन स्नन न करे, उसका सारे महीनेका किया हुआ पुण्य मेरे कहनेसे तुम हरण कर लेना ॥४०॥ और यह भी वर देता हूँ कि अपवित्र स्थानमें विधिवत्रूप किये हुए श्राद्ध तथा हवन आदि भी यदि क्रोधसे किये गये हों तो वे भी तुम्हारे ही होंगे। और भी सुनो, बिना ढैल मन्त्र पाँव धोने तथा बिना तिलके तर्पण करनेके पुण्य भी तुम्हारे होंगे। हे त्रिजटे ! दक्षिणासे