भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 152, कुल 811 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 152
१३६आनन्दरामायणे[ सर्गः १२

इति दत्त्वा वरान् रामस्त्रिजटामरमान्दिनः । स विभीषणसुग्रीवमकरध्वजवानरैः ॥४४॥ ययौ विहायसा सीतां दर्शयन्कौतुकानि सः पश्य सीते पुरीं लङ्कां तथा रणभुवं शुभाम् ॥४५॥ पश्य सेतुं मया बद्धं शिलाभिर्लवणार्णवे एतच्च दृश्यते तीर्थं सेतुबन्धमिति स्मृतम् ॥४६॥ इत्युक्त्वा रघुवर्यस्तन् राक्षसेन्द्रस्य वाक्यतः । पुष्पक। द्भुवि चोत्तीर्य धृत्वा कोदंडमुत्तमम् ॥४७॥ बभंज सेतुं तन्कोट्या धनुःकोटिरितीर्यते अतएव हि तत्तीर्थं स्नानात्कैवल्यदायकम् । ४८॥ कोदंडपाणिर्नामाऽऽसीद्राममूर्तिश्च तत्र हि । एतस्मिन्नन्तरे तत्र संपातिः स ययौ तदा ॥४९॥ तमालिङ्ग्य रामचन्द्रम प्राह स्मिन्पूर्वकम् । बधोर्मात्राऽऽत्र तीर्थं त्वं कुरु सेतौ महनमम् ॥५०॥ तथेति रामवचनाद्भातुः मनोपकाम्यया । तीर्थं चकार सम्पातिर्जटायुमिति विश्रुतम् ॥५१॥ ततो रामाज्ञया याने संपातिश्चारुरोह सः ततो यानेन तां सीतां दर्शयन् कौतुकानि हि ॥५२ । ययौ रामेश्वरं पूज्य तथा श्रीरघुनंदनः सीतेऽत्र पश्य मंत्रार्थमेकांते संस्थितं पुरा । ५३॥ अत्र दर्भेषु शयनं कृतं पश्य विदेहजे नवग्रहार्थं प्रक्षिप्तान्याषाणानपश्य सागरे ॥५४॥ तूष्णीमेव स्थितं पश्य सागरं मम वाक्यतः एव तां दर्शयन् रामः किष्किंधां प्रययौ क्षणात् ॥५५॥ वानराणां स्त्रियः सर्वा विमाने स्थाप्य राघवः । ययौ तां दर्शयन सीतां कौतुकानि समंततः ॥५६॥ प्रवर्षणगिरिं पश्य ऋष्यमूकाचलं तथा पंपामरोवरं पश्य कृष्णां भीमरथीं शुभाम् ॥५७॥ पश्य पंचवटीं रम्यां गोदावरीविराजिताम् । अगस्त्योग्रश्रमं पश्य मुनीक्ष्णस्याश्रमं तथा ॥५८॥ पश्यात्र्याश्रमं सीते चित्रकूटं समीक्ष्य कालिंदी जाह्नवीं पश्य भारद्वाजाश्रमं तथा । ५९॥ इत्युक्त्वा जानकीं रामो भारद्वाजार्थिनस्तदा तस्थौ तस्याश्रमे यानादवरुह्य यथासुखम् ॥६०॥


इत्य सब श्राद्ध भी तुम्हींको प्राप्त होंगे ।४१।। ४२ । इस तरह बहुत वर देकर राम त्रिजटा सरमा, विभीषण सुग्रीव, मकरध्वज तथा वानरोंके साथ आकाशमार्गसे सीताको मार्गके कौतुक दिखाते हुए चल दिये । राहमें राम बोले हे सीते ! इस लंका नगरीको तथा इस सुन्दर रणभूमिको देखो ।। ४३ ४५ ।। यह क्षारसमुद्रमें मेरा बाँधा हुआ शिलाओंका विशाल सेतु है। यह साम्ने सेतुबन्ध नामका प्रसिद्ध तीर्थ दिखाई दे रहा है । ४६ ॥ इतना कहके बाद रामचन्द्रजी राक्षसेन्द्र विभीषणके कथनानुसार विमानसे नीचे उतरे और अपना उत्तम धनुष लेकर उसकी नोकसे सेतुको तोड दिया वहाँपर स्नान करनेसे मोक्षपद देनेवाला धनुषकोटि नामका तीर्थ बन गया ।। ४७। ४८ ।। दण्डपाणि नामको रामकी मूर्ति भी वहाँ स्थापित हो गयी । इतनेमें वहाँ संपाती आ पहुंचा । ४६ रामने उसका आलिंगन करके प्रसन्न मनसे कहा कि तुम यहाँ सेतुपर अपने भाईके नामका एक महान् तीर्थ स्थापित करो । ५० । तब संतु कहकर रामकी आज्ञाके अनुसार सम्पातीने अपने भाईकी आत्माकी प्रसन्न करनेकी इच्छासे वहाँ जटायु नामका प्रसिद्ध तीर्थ बनाया ।। ५१ ।। बादमें रामकी आज्ञासे संपातीको भी पुष्पक विमानपर चढ़ा लिया गया । श्रीरघुनन्दन राम सीताके साथ रामेश्वरकी पूजा करके विमानपर सवार होकर माताका मन्त्र द्वारा विचारण हुए बोले-देखो सीते इस एकान्त जगहपर मैं मन्त्रणा करनेके लिए बैठता था । ५२ ॥ ५३ ॥ हे विदेहजे ! इन कुशाओंपर मैं सोया था । देखो, ये नौ पाषाण मैने समुद्रमें नवग्रहों की पूजाके लिए डाले थे । ५४ । देखो, मेरे कहनेसे यह समुद्र अब भी चुप है। इस प्रकार वर्णन करते हुए रघुनन्दन राम क्षणभरमें किष्किन्धा आ पहुंचे । ५५ ॥ वहाँसे सुग्रीव आदि वानरोंकी स्त्रियोंको विमानपर बैठाकर पुनः सब स्थल सीताको दिखाते हुए वे आगे बढ़े ।। ५६ । रामने सीतासे कहा देखो यह प्रवर्षग गिरि है, यह ऋष्यमूक पर्वत है, यह पंपासरोवर है यह पवित्र कृष्णा तथा भीमरथी नदी है, ५७। गोदावरीके तटपर विराजमान यह रमणीक पंचवटी है। उधर अगस्त्य तथा मुनीक्ष्ण मुनिके आश्रमको देखो । ५८ ।। हे सीते ! अत्रि मुनिके इस आश्रमको तथा चित्रकूट पर्वतकी शोभाको देखो । यमुना गंगा तथा भारद्वाज ऋषिके आश्रमको देखो । ५९ ।। जानकीसे यह कहकर राम विमानसे नीचे उतरे और भारद्वाज ऋषिके प्रार्थना करनेपर उनके आश्रममें सुखसे