भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 153, कुल 811 में से

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सर्गः १२] सारकाण्डम् १३७

माघशुक्लचतुर्थ्यां हि पूर्णे वर्षे चतुर्दशे भारद्वाजोऽपि तपसा स्वर्गं निर्माय भूतले ॥६१॥
पूजयामास श्रीरामं सीतावानरसंवृतम् । रामोऽपि हृदि संमन्त्र्य मारुतिं वाक्यमब्रवीत् ॥६२॥
अयोध्यां गच्छ भरतं मद्वृत्तं कथयस्व तम् । मन्वार्यं शृङ्गवेरे मे शृगं कथय केवटम् ॥६३॥
तथेति गुहकं गत्वा कपिवृत्तं न्यवेदयत् । गुहकोऽपि मुदा युक्तस्तदा रामान्तिकं ययौ ॥६४॥
ततोऽयोध्यां ययौ वेगान्मारुतिः स विधायमा । नन्दिग्रामेऽपि भरतः पूर्णे वर्षे चतुर्दशे ॥६५॥
नागते राघवे वह्निं प्रवेष्टुमुपचक्रमे । शत्रुघ्नं भरतः प्राह गद्गदेन गणांगणे ॥६६॥
श्रीरामलक्ष्मणौ वीरौ हतौ मन्येऽद्य नागतौ । अकारिणा मया सर्वं नृपा ऽने चरैर्वृताः ॥६७॥
लंका गन्वा राघवस्य साहाय्यं कर्तुमिच्छता । सोऽहमद्य विशाम्यग्निं यावत्स्यानाचलं गते ॥६८॥
त्वं गच्छ पार्थिवैर्लंका हन्त्वा युद्धे दशाननम् । मोचयित्वा जनकजां ततो नः पारलौकिकम् ॥६९॥
रामादीनां त्रिबंधूनां कर्तुमर्हसि मादरम् । इति तद्वाक्यमाकर्ण्य पौर जानपदा नृपाः ॥७०॥
शत्रुघ्नो मातरः सर्वा ऊर्मिलाद्या स्त्रियश्च ताः । सुमंत्राद्या मन्त्रिणश्च पौरनार्यश्च सेवकाः ॥७१॥
मरणं वेष्टयामासुः खेदाद्विह्वलमानसाः । भरतं सांत्वयन् सर्वान्नयौ तां रम्यां नदीम् ॥७२॥
चितां कृत्वा ततः स्नात्वा ददौ दानान्यनेकशः । समं प्रदक्षिणाः कृत्वा वह्निं ध्यान्त्वा रघूत्तमम् ॥७३॥
सीतां तां लक्ष्मणं वीरं नत्वा मातृर्गुरू मुनीन् । अगाध्यदेवतां ध्यात्वा यत्नाग्निविमुखः स्थितः ॥७४॥
न्त्वा न्यमनेक्षणः सायं प्रतीक्षन् संस्थितः क्षणम् । महान्कोलाहलश्चासीत्तदा स्त्रीपुरुषैः कृतः ॥७५॥
एतस्मिन्नन्तरे खस्थस्तं दृष्ट्वा वायूनन्दनः । प्रवेष्टुमुद्यतं वेगादुवाच शद्गदस्वनः ॥७६॥
अत्रनामधुरं वाक्यं मुञ्चता मेघवन्निभः । मा विशवानलं वीर राघवौऽद्य समागतः ॥७७॥


॥ ६० ॥ उस रोज चौदहवें वर्षका माघ शुक्ल चतुर्थी थी। भारद्वाजने अपने तपोबलसे पृथ्वोपर स्वर्गकी रचना कर दी ॥ ६१ ॥ समस्त प्रकार पदार्थसे उन्होंने सीता तथा वानरों समेत श्रीरामका यथारीति पूजन तथा सत्कार किया। अनन्तर रामने विचार करके मारुतिसे कहा -॥ ६२ ॥ अयोध्या जाकर भरतको तथा शृंगवेरपुर जाकर मेरे प्रिय मित्र निषादराजको मेरा सब समाचार सुना दो ॥ ६३ ॥ बहुत अच्छा कहकर हनुमान् निषादराजके पास जाकर सब वृत्तान्त निवेदन कर दिया। वह प्रसन्न होकर रामके पास गया ॥ ६४ ॥ वहाँसे मारुति आकाशमार्गसे जाकर अयोध्या गये। वहाँ जाकर देखा कि नंदीगांवमें भरत चौदह वर्ष बीत जानेपर भी रामके न लौटनेके कारण अग्नि जलाकर उसमें प्रवेश करनेकी तैयारी करके शत्रुघ्नसे कह रहे थे-मेरा समझमें तो ऐसा आ रहा है, कि रावणने युद्धमें राम-लक्ष्मणको मार डाला है। इसी कारण वे अबतक नहीं लौटे। इसलिए मैंने सब राजाओंको अपनी-अपनी सेनाके सहित बुला भेजा है कि वे सब लंका जाकर रामका सहायता करें। मैं तो आज सूर्यास्तके समय वह्निमें प्रवेश कर जाऊँगा ॥ ६५-६८ ॥ परन्तु तुम राजाओंके साथ लंका जाकर युद्धमें रावणको मारकर जनकनन्दिनीको छुड़ा लाओ। पश्चात् राम आदि हम तीनों भाइयोंका तुम आदरपूर्वक पारलौकिक क्रिया करना। भरतकी इस बातको सुनकर दशरथ और नगरके लोग राजागण, शत्रुघ्न, सब माताएँ, उर्मिला आदि समस्त स्त्रियाँ, सुमन्त्र आदि मन्त्रिगण पुरकी स्त्रियां तथा सेवकगण आकर चारों ओरसे भरतको घेर लिया और दुःखी होकर रुदन करने लगे। तब भरत सबको समझा-बुझाकर सरयू नदीके किनारे गये ॥ ६९-७२ ॥ वहाँ जाकर चिता रचकर स्नान किया और अनेक दान दिये पश्चात् अग्निका सात प्रदक्षिणा करके उन्होंने रघूत्तम श्रीरामका ध्यान किया ॥ ७३ ॥ तदनन्तर सीता तथा वीर लक्ष्मणको नमस्कार करके माताओं, गुरुजनों तथा मुनियोंको प्रणाम किया और नानाविध देवताका स्मरण करके उत्तराभिमुख होकर खड़े हो गये ॥ ७४ ॥ भरत एकटक दृष्टि लगाये हुए सूर्यास्तकी प्रतीक्षा करने लगे। उस समय सभी स्त्री-पुरुषोंमें महान् हाहाकार मच गया ॥ ७५ ॥ तभी वायुनन्दन हनुमान्ने आकर अग्निप्रवेश करनेका उद्यत भरतसे शान्तिपूर्ण गद्गदस्वर होकर कण्ठके तुल्य यह मधुर वचन कहा - हे वीर, अग्निमें प्रवेश मत करिए। श्रीराम सीता तथा लक्ष्मणके साथ

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