श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 154, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| १३८ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः १२ |
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सीतया लक्ष्मणेनापि भारद्वाजाश्रमं प्रति। बानरैः सहितं रामं श्वस्य पश्यसि निश्चयम् । ७८।
रामोऽप्युत्कण्ठितस्त्वां हि द्रष्टुमस्ति जटाधर। इति तद्वाक्यसुधावृष्टिसेवितो भरतो मुदा ।७९॥
वह्निं नत्वा परावृत्य ननाम वायुनन्दनम्। मारुतिश्चापि तं नत्वाऽऽलिङ्ग्य सविस्तरम् ।८०।
श्रावयामास श्रीरामवृत्तं सन्तोषकारकम्। तच्छ्रुत्वा भरतस्हृष्टः शोभयामास तां पुरीम् ।८१।
अयोध्यां तोरणार्यैश्च पौरैः प्रत्युज्जगाम तम्। मस्तके पादुके बद्ध्वा पुरस्कृत्याथ चाग्रजम् ॥८२॥
माघस्य सितपञ्चम्यां प्राप्ते पञ्चदशेऽब्दके। प्रभाते भरतो याम्ये ददर्श पुष्पकं नभसि ॥८३।
ननाम राघवं दृष्ट्वा साष्टांगं भरतस्तदा। रामोऽप्यालिङ्ग्य भरतं कृत्वा रूपाण्यनेकंशः ८४।
एककाले जनान् सर्वान्पृथक् च परिषस्वजे। आदौ पश्चाच्च रामेण कृतमालिङ्गनं तदा।८५।
रामान् दृष्ट्वा ह्यनेकांस्तान जनाश्चासन्सुविस्मिताः। समाश्वास्याथ भरतं राघवः स'अलोचनः ॥८६॥
ननाम शिरसा मातॄंश्चतुष्ट्वा चाप्यरुन्धतीम्। ततो वाद्यनर्तनैश्चाद्यैर्नन्दीग्रामं ययौ शनैः ।८७
श्मश्रुकर्मोद्वर्तनं च तैलभ्यङ्गं तु बंधुभिः। नादिप्राणैश्चरेन्द्राद्यै नानामंगलवस्तुभिः।८८
नववाद्यसुघोषारवा नेदुः सर्वत्र सुस्वराः नार्यो नीराजयामासु रत्नदीपै रघूत्तमम् ८९।
ततः सीता नमस्कृत्य कौसल्याद्याश्च मातरः। वसिष्ठं ब्राह्मणांश्चैवान्वन्द्यान्यथान्यायक्रमम् ॥९०॥
ततः सीतां समालिङ्ग्य कौसल्याद्याश्च मातरः। स्नापयामासुर्मंगल्यद्रव्यैर्वस्त्राद्यैर्भूषणैः सह ९१।
वस्त्रालङ्कारभूषाभिः शुशुभे जानकी तदा। भरतः पादुके ते तु राघवस्य सुपूजिते ।९२॥
योजयामास रामस्य पादयोर्भक्तितत्परः। ततोऽतिविनयान्याह भरतो रघुनन्दनम् । ९३
राज्यमेतन्मयाऽभृतं मया निर्यापितं तव। कोष्ठागारं बलं कोशं कृतं दशगुणं मया। ९४
आज आ गये हैं। आप वानरों समेत उन्हें कल अवश्य देखोगे॥ ७७ ॥ हे जटाधर ! राम भी आपको देखनेके लिए बड़े ही उत्कण्ठित हो रहे हैं। इस प्रकार हनुमानकी वाक्यरूपी सुधावृष्टिसे सिंचित होकर भरत सहर्ष अग्निके पाससे लौट आये और वायुनन्दनको प्रणाम किया। मारुतिने भी भरतको नमस्कार तथा आलिङ्गन करके श्रीरामका संतोषकारक तथा सविस्तार सब समाचार सुना दिया। यह सुना ही भरतने प्रसन्न होकर अयोध्या नगरीको तोरण पताका आदिसे सुसज्जितकर तथा सब त्रिलोक साथ ले और हाथीको आगे करके रामकी खड़ाऊँको मस्तकपर बांधकर रामकी अगवानी करन गये ॥ ७८-८२॥ पन्द्रहवें वर्षका माघ शुक्ल पञ्चमीका प्रातःकाल आया सुदर्शन भरतने पुष्पकमणि आकाशमें देखा। ८३॥ भरतने रामके दर्शन करनेके साथ ही उनको साष्टांग प्रणाम किया। रामने भरतको आलिंगन करनेके लिए एक साथ अनेक रूप धारण करके एक ही समय सब लोगोंके साथ अलग अलग मिले। किसीके साथ आलिङ्गन आगे या पीछे नहीं होने पाया ॥ ८४, ८५ ॥ बहुतसे रामोंको देखकर यहांके बना लोग विस्मय हुआ। रामने भरतको ऽ दय बैठाया और उनके नेत्रोंमें जल भर आया ॥ ८६ ॥ पश्चात् उन्होंने माताओंको मस्तक झुकाकर प्रणाम करके गुरुपत्नी अरुन्धतीको प्रणाम किया। वादस नाच गाना तथा बाजोंके साथ धीरे-धीरे राम नन्दीग्राम पधारे। ८७॥ वहाँ जाकर रामने क्षौर कराया और शरीरमें चन्दनादि सुगन्धित द्रव्य मल तथा तेल लगाकर अनेक मंगलकारी वस्तुओंसे सब बन्धुओंके साथ मंगळस्नान किया। ८८॥ चारो तरफ नये-नये बाजोंक सुन्दर घोष होने लगे। स्त्रियें रत्नमय दीपकोंसे कौसल्यानन्दन रामकी आरती उतारने लगीं ॥ ८९। सीताने भी अपने सासोंको, अरुन्धतीको, वसिष्ठको, ब्राह्मणोंको तथा और-और वन्दनीय जनोंको यथाक्रम प्रणाम किया ॥ ९० । इसके अनन्तर कौसल्या आदिने सीताको छातीसे लगाकर मांगलिक द्रव्यसे स्नान कराया ॥ ९१ ॥ उस समय जनकनन्दिनी नये नये अलङ्कारोंसे सजकर बड़ा सुन्दर लगने लगीं। भरतने रागवकी पादुकाका पूजन करके रामके पाँवोंमें भक्तिपूर्वक पहिना दी। तदनन्तर अति विनीत भावसे भरत रघुनाथजीसे कहने लगे-॥ ९२।९३। हे प्रभो ! आपका धरोहरस्वरूप राज्य मैंने आजतक चलाया। हे जगन्नाथ ! आपके पुण्य प्रतापसे मैंने यहाँके कोठार, कोश तथा सेनाको बढ़ाकर दसगुना कर दिया है। अब आप अपने इस नगरका, देशका तथा