श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 146, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें१३० आनन्दरामायणे [ सर्गः ११
प्राकारं लङ्घयित्वा ते गत्वा रावणमन्दिरम् । हत्वा राक्षसबृन्दं तद्गुहारक्षणतत्परम् ॥ २३५ ॥ न ददृशुर्गुहाद्वारं यत्र होमं चकार सः । ततश्च मज्जमानानां प्रभाते कर्मसङ्गया ॥ २३६ ॥ विभीषणस्य भार्या तान् होमस्थानमसूचयत् । गुहापिधानपाषाणान्गढैः पदघट्टनैः ॥ २३७ ॥ चूर्णयित्वा रावणञ्च ताडयामासु मुष्टिना । वानरास्तेऽपि तं भृशंस्ताडयामासुराद्रुताः ॥ २३८ ॥ तद्वृत्ते वानरा दृष्ट्वा तूष्णींभावं स्थितं रिपुम् । ममानयन्केशपाशे धृत्वा मन्दोदरीं शुभाम् ॥ २३९ ॥ विलपन्तीं मुक्तनीवीं विह्वलां हतकञ्चुकीम् । दृष्ट्वा त्यक्त्वा तदा होममुदतिष्ठत्त्वरान्वितः ॥ २४० ॥ ततस्ते वानराः सर्वे ययुः श्रीराघवान्तिकम् । ततो मन्दोदरी प्राह कुरु त्वं वचनं मम ॥ २४१ ॥ दत्त्वा सीतां राघवाय राज्ये कृत्वा विभीषणम् । तपश्चर्यां मयाऽऽरण्यं कर्तुमर्हसि वै सुखम् ॥ २४२ ॥ तदस्या वचनं श्रुत्वा तां प्र प्राह दशाननः । रामो विष्णुश्च मां सीता जानासि प्राणवल्लभे ॥ २४३ ॥ रामहस्तादहं लब्धुं हता सीता पुरा मया । रामहस्तान्मरणञ्चैवाहो गच्छामि परमं पदम् ॥ २४४ ॥ त्वया कार्या क्रिया मे हि प्रविश्याग्निं ततः । ततः सुखं मया मुक्ता गमिष्यसि परं पदम् ॥ २४५ ॥ इत्युक्त्वा प्रययौ योद्धुं रथे स्थित्वा त्वरान्वितः । गजद्वाराद्विनिर्गच्छन्नग्रे मुण्डी विलोकितः ॥ २४६ ॥ मुकुटः पतिताश्चित्रः मणिरौ गवणो हृदि । ततो ययौ रणक्षोणीं यदग्र निर्गतैः शरैः ॥ २४७ ॥ विधाय कृत्रिमां सीतां मयेन स दशाननः । पश्यतां वानराणां स स्वहस्ते तां जघान वै ॥ २४८ ॥ दिव्येन शितशस्त्रेण दृष्ट्वा ते तु प्लवङ्गमाः । हा हन्त्युक्त्वा दुःखितास्ते ययु रामं निवेदितुम् ॥ २४९ ॥ तावद्ब्रह्मा समागत्य रामादीन् प्राह सादरम् । कृत्रिमेयं हता सीता मा खेदं भजताद्य हि ॥ २५० ॥ ततोऽन्तर्धानमगमद्विधिस्तेऽपि प्लवङ्गमाः । रामाद्या मघवद्वाक्येन तुष्टा युद्धाय निर्ययुः ॥ २५१ ॥
अथवा। तब रामने सब वानरोंको सादर बुलाकर युद्धके लिये भेजा ॥ २३४ ॥ वे सब प्राकारको लांघकर रावणके मन्दिरमें चले गये। उन्होंने वहाँ उस गुफाकी रक्षा करनेवाले राक्षसोंको मार डाला ॥ २३५ ॥ परन्तु जहाँ रावण हवन करता था, उस गुफाका दरवाजा किसीको नहीं मालूम था। तब प्रातःकालके समय विभीषणकी स्त्री भगवान् हाथके संकेतसे उन सबोंको होमस्थानका दरवाजा बता दिया। द्वारपर लगे हुए पाषाणको लात मारकर उन्होंने तोड़ दिया और भीतर जाकर रावणको मुक्कोंसे मारने लगे। अन्यान्य वानर भी उसे भृशोंसे पीटने लगे, २३६-२३८ ॥ फिर भी रावणको चुपचाप बैठा देखकर वानर उसकी स्त्री मन्दोदरीको केश पकड़कर वहीं खींच लाये । २३९ ॥ अपनी सुन्दरी स्त्रीको रोका हुई, मुक्तकच्छ वानरर्दलित तथा विह्वल देखकर रावण होमको छोड़ तुरन्त उठ खड़ा हुआ ॥ २४० ॥ इस प्रकार उसके होमका भङ्ग करके सब वानर रामके पास भाग गये। तब मन्दोदरीने कहा— हे नाथ! तुम अब भी मेरी बात मान लो । २४१ ॥ सीता रामको देकर विभीषणको लंकाका राज्य दे दो और मेरे साथ चलकर वनमें तप करो, तुमको धर्म में सुख प्राप्त होगा। स्त्रीकी बात सुनकर दशाननने कहा— हे प्राणवल्लभे ! मैं जानता हूँ कि राम साक्षात् विष्णु तथा सीता साक्षात् लक्ष्मी हैं ॥ २४२ । २४३ ॥ यह जानकर ही मैं रामके हाथसे मरनेके लिए सीताको यहाँ ले आया हूँ । रामके हाथसे मरकर मैं परम पद प्राप्त करूँगा ॥ २४४ । बादम तुम भी मेरी क्रिया करके तथा अग्निमें सती होकर सुखपूर्वक मेरे साथ परम धाम प्राप्त करोगी ॥ २४५ । इतना कह तथा रथपर सवार होकर वह लड़ाईके लिए चल पड़ा। राजमहलसे निकलते ही उसका सिर मुंडाये हुए एक मुण्डी दिखायी दिया ॥ २४६ ॥ उसका चित्र विचित्र मुकुट भी गिर पड़ा। यह देखकर रावण मनमें घबड़ाया। फिर भी उसने समरभूमिमें जाकर बहुत तेजीसे वाणोंकी वर्षा की ॥ २४७ ॥ तदनन्तर मयदानवसे एक नकली सीता बनवाकर उसने वहाँ वानरोंके सामने अपने रथपर रखकर काट डाला, २४८ । उस धारवाला तलवारसे सीताको कटती देख हाहाकार करते हुए सब वानर यह समाचार रामके पास निवेदन करने गये, २४९ ॥ इतनेमें ब्रह्माने आकर राम आदिको बड़े आदरसे समझाकर कहा कि यह कृत्रिम सीता मारी गयी है। तुम लोग दुःखी मत होना ॥ २५० ॥ इतना कहकर ब्रह्माजी अन्तर्धान हो गये और वे सब वानर और राम आदि वीर ब्रह्माक्यु-