भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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सर्गः १११] सारकाण्डम् १३१

तदा स मातलिः शीघ्रं देवेन्द्ररचनाद्रथम् । शस्त्रास्त्राजिमहत्तमैर्ध्वजविप्रजशोभितम् ॥२५२। वरच्छत्रप्रमायुक्तं राघवाय न्यवेदयत् तमारुह्य तदा रामश्चकार कदनं महत् । २५३। आग्नेयेन तदाग्नेयं दैवं दैवेन राघवः । अस्त्रं राक्षसराजस्य जघान परमास्त्रवित् ॥२५४। ततस्तु ससुजे घोरं राक्षसो मारुतास्त्रवित् । रामः सर्पास्ततो दृष्ट्वा सौपर्णास्त्रं मुमोच सः ॥२५५ अस्त्रैः प्रतिहते युद्धे रामेण दशकंधरः । पातयं समुद्रे घोरं वायव्यास्त्रेण राघवः ॥२५६ तदस्त्रं विनिवार्यामो बहुशस्त्रं वमूर्जे पुनः । पर्जन्यास्त्रेण पौलस्त्यश्चकार विफलं तदा । २५७। नागानामयुतं तुरङ्गनियुतं सार्द्धं रथानां शतं पत्तीनां शतकोटिनाशनसमये त्वेका कबन्धा नृतिः । एवं कोटिकबन्धनर्तनविधावेका ध्वनिः किंकिणेर्विक्रोताः प्रहरार्धतो रघुपतेः कोदण्डघण्टागणे ॥२५८। तदा खे कौतुकं द्रष्टुं समाजग्मुः सुग मुदा । गंधर्वाः किन्नरा यक्षा विमानशतसंस्थिताः । २५९। तदाऽशनिध्वजं रम्यं बाणैश्चिच्छेद रावणः । तं दृष्ट्वा रामचंद्रोऽपि ध्वजहीनं रथं निजम् ॥२६० मारुतिं प्राह वेगेन क्षण तिष्ठ ध्वजोपरि । तथेत्युक्त्वा मारुतिः स तालमुत्पाट्य वेगतः ॥२६१ धृत्वा रामरथे दिव्य वस्मिन्संस्थौ स्वयं मुदा । तं मारुतिध्वजं दृष्ट्वा रावणः समरांगणे । २६२ तले छत्रं मातलिनं तुरंगान्वायुनंदनम् । ऐन्द्रं धनुष्प्रचिच्छेद नवबाणैर्नवगांन्वितः ॥२६३ वातात्मजमातलिनी मूच्छितौ पतितौ भुवि । क्षणमात्रेण स्वस्थोऽभूत्तदा स वायुनंदनः ॥२६४ तदा रामो वायुपुत्रस्कन्धे स्थित्वा रणाजिरे । चकार तुमुलं युद्धं रावणेन भयावहम् । २६५। रावणः परिघेणैव मंतव्य मारुतिं हृदि । चकार मूच्छितं वक्षात्पपात स पुनर्भुवि ॥२६६ तदा सस्मार रामोऽपि स्वरथं समरांगणे । तावद्रथः खगादायायथा सादग्रतः स्थितः । २६७


स सज्ज होकर युद्ध करनक' निकल पड २६१॥ इसा समय इन्द्रक आज्ञानुसार उनका सारथा मात अस्त्र शस्त्रास भर नया उत्तमपुर द्रुत गवहा वक समक पास आया भार वनस रयार सवार होकर करनक लिए कहा तब रामन उस रथपर सवार होकर महान् युद्ध किया । २५२ ।। २५३ ॥ वस्त्राका जा- वालाम परमधन रामन राक्षसक राज. गवणका आग्नेय अस्त्र अपन आग्नेय अस्त्रस तथा देवास्त्र दवार शान्त किया । २५४ ॥ तव म्पर्वास्त्र रावणन यार गवालप छाड़ा । रामन सर्पोंका देखकर गरुडास्त्र छ ॥ २५५ ॥ इस प्रकार जब रामन युद्धका अस्त्र अस्त्र म प्रतिहत कर दिया, तव रावणने एक दूसरग भय. मघान्त्र फंका । रामन उसका उत्तर वायुअस्त्रम कर दिया । २५६ । उस अस्त्रका निवारण करके रामने उस.. माग्याराज वरपाया । तब रावणन उस वर्षा अस्त्ररू विफल कर दिया । २५७। दस हजार हाथी, दस लाख घाड डेढ सौ रथ तथा एक करोड़ पैदलस जवान नष्ट होनपर एक कबन्धका नृत्य होता है। इस प्रकारक कराड़ कबन्धा हानेपर एक किकणि, घटाका का श्व'न होता है, परन्तु रघुपति रामक केवल आधे प्रहरनक धनुषका घंटारव करनम हा बाबा किक्किणियाका दर्शन हुई ॥२५८ ।। उस समय इस कौतुकका दखनेक लिए श्रीक गभ सहस विमानोंपर माहरु देवता, गन्धर्व, किन्नर तथा यक्षलाग इकट्ठे हो गय ॥ २५६ ॥ तभा रावणन अपन बाणस रामक वृक्ष तथा ध्वजाल। काट दिया। रामचन्द्र अपन रथक ध्वजासे हीन देखकर मारुतसे बाल कि तुम क्षणभरक लिए मन्द से मर रवका ध्वजाक पास बैठ जाओ । 'तथास्तु' कहकर मारूति झट एक त डका वृक्ष उखाड़कर रामक दिव्य रथपर रख दिया और आनन्दसे उसीपर जा बैठे। मारुतिकी ध्वजाका देखकर रावणन रणांगनम बड़ा फुर्तक साथ तालवृक्षका, छत्रको, मातलि सारथीका, अवोंका, वायुनन्दन हनुमान्‌क तथा एन्द्र धनुषको नौ बाणस काट डाला । २६०-२६३ । तब वातात्मज हनुमान् तथा मातलि मूर्च्छित होकर जमीनपर गिर पड़े, परन्तु क्षण हा भरमे वायुनन्दन सचेत हो गये ।। २६४ । तब राम हनुमान्‌क कन्धेपर सवार होकर रावणक साथ रणांगणमे भयानक युद्ध करने लगे ॥ २६५ ॥ एकाएक रावणन मारुतिको छातीपर गदा मारकर मूच्छित कर दिया और हनुमान् उसी समय फिर पृथ्वीपर गिरपड़े ।।२६६॥ तब श्रीरामने अपन रथका स्मरण किया । अनन्तरम आकाशस आकर वह रथ युद्धभूमिमें उनके सामने