भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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(१३२) आनन्दरामायणे [ सर्गः ११

दारुकः सारथिर्यत्र शस्त्राण्यनेकशः । गदा पद्मं तु यत्रास्ति सर्वदा गरुडो ध्वजे ॥२६८॥ यस्मिंञ्छैव्यश्च सुग्रीवस्तथा चैव वलाहकः । मेघपुष्पश्च चत्वारो वायुवेगा हयोत्तमाः ॥२६९॥ यत्र छत्रं वरं दिव्यं हेमदण्डं विराजते । चामरे द्वे शुभे यत्र शार्ङ्गं स्वं धनुरददे ॥२७०॥ ततो रामः शरैस्तीक्ष्णैर्दशास्यस्य रथं क्षणात् । चकार चूर्णं साश्वं तं रावणं चाप्यतर्जयत् ॥२७१॥ तदान्यंरथमारूढो रावणो राघव ययौ । ततो रामः शरैस्तीक्ष्णैर्दशाननशिरांसि सः ॥२७२॥ चिच्छेद तानि गगने मन्वा तोषयुतानि हि । रामहस्तान्मृतिर्जाताऽस्माकं चेति विचिन्त्य च ॥२७३॥ वन्दनं कर्तुकामानि गगनाच्च रणाजिरे । सन्तिष्ठानि पतन्ति स्म राघवस्य पदोपरि ॥२७४॥ रामः शिरांसि दृष्ट्वाऽथ विदीर्णास्यानि स्वान्पुनः । मां हन्तुं प्रद्रवन्तीति मन्वा भीत्याऽप्यनाडयत् ॥२७५॥ शरौघैः शतशः शीघ्रं तदद्भुतमिवाभवत् । शतमेकोत्तरं छिन्नं शिरसां चैकवक्त्रताम् ॥२७६॥ शतसूर्द्धा रावणस्य चैकोत्तरसहस्रकम् । छिन्नं तत्कल्पभेदेन वदन्त्यन्यपि केचन ॥२७७॥ दृष्ट्वा तु रावणस्यान्तं विभीषणमतेन सः । नाभिदेशेऽमृतं भव्यं कुण्डलाकारमस्थितम् ॥२७८॥ पावकास्त्रेण तच्छीघ्रं शोषयामास राघवः । ततः शिरांसि बाहूँश्चिच्छेद रावणस्य सः ॥२७९॥ एकेन मुख्यशिरसा बाहुभ्यां रावणो बभौ । तयोर्युद्धमभूदोग्रं तुमुलं रोमहर्षणम् ॥२८०॥ ततो दारुकवाक्येन मर्मदेशे व्यताडयत् । ब्रह्मास्त्रेण रघूश्रेष्ठः समरे दशकन्धरम् ॥२८१॥ स शरो हृदयं भित्त्वा हत्वा च तु दशाननम् । रामतूणीरमाविश्य मेने स कृतकृत्यताम् ॥२८२॥ रावणस्य च देहोत्थं ज्योतिरादित्यवन्स्फुरत् । प्रविवेश रघुश्रेष्ठं देवानां पश्यतां सताम् ॥२८३॥ तदा देवास्तुष्टुवुस्तं ववर्षुः पुष्पवृष्टिभिः । नेदुः खे देववाद्यानि ननृतुश्चाप्सरोगणाः ॥२८४॥ तदा मंदोदरी भर्त्रा सह देहं विसृज्य सा । ययौ वैकुण्ठभवनं रावणेन मुदान्विता ॥२८५॥

खडा हो गया ॥२७०॥ जिस रथका दारुक सारथी था, जिसपर अनेक शस्त्र थे, जिसपर गदा-पद्म तथा ध्वजापर गरुड विराजमान था । २६८ ॥ जिस रथमं उत्तम वायुवेगवाले शैव्य, सुग्रीव, बलाहक तथा मेघपुष्प ये चार घोड़े जुते थे ॥ २६९ ॥ जिसम दिव्य तथा सुन्दर सुवर्णदण्डवाला छत्र विराजमान था । जिसमे दो मनोहर चमर तथा रमणीय शार्ङ्ग नामका धनुष रक्खा हुआ था। तब रघुनन्दन गम उस रथको देख तथा परि-क्रम करके सानन्द उसपर सवार हो गए और अपन शार्ङ्ग धनुषका हाथमे ले लिया। अब राम अपने तीक्ष्ण बाणोंसे क्षणभरमें बाणके अश्व सहित रथको चूर्ण करके रावणको ललकारने लगे । तब रावण दूसरे रथपर सवार होकर रामके सामने गया। रामने पुनः तीक्ष्ण बाणोंसे रावणके दसों सिरोंको काट दिया। वे सिर गगनमण्डलमें जाकर 'हमारी मृत्यु रामके हाथोंसे हुई है' यह सोचकर हंसते हुए आकाशसे रणक्षेत्रमें रामके पाँवोपर आ गिरे ॥ २७०-२७४ ॥ रामने आकाशसे मुख फाड हुए उन सिरोंको अपनी ओर आते देखकर यह समझा कि ये मुझे खा जानको आ रहे हैं। इस प्रकार रामने डरकर झट सैकड़ों बाण उनपर चला दिये। यह दृश्य बड़ा ही अद्भुत था। इस प्रकार एक सौ एक बार उसके सिरको रामने काटा ॥ २७५ ॥ २७६ ॥ कोई-कोई विद्वान् कल्पभेदसे यह भी कहते हैं कि सौ सिरवाले रावणके सिर रामने एक हज़ार एक बार काटे थे ॥ २७७ ॥ परन्तु तिसपर भी जब रावणकी मृत्यु नहीं हुई, तब विभीषणके कहनेके अनुसार रामने उसके नाभिदेशमें स्थित अमृतकुण्डको अपने अग्निबाणसे सुखा डाला और बादमे उन्होंने रावणके सिरों तथा बाहुओंको काटा ॥ २७८ । २७९ ॥ इस प्रकार जब रावणक एक सिर तथा दो हाथ बाकी रह गये, तब पुनः राम-रावणका रोमाञ्चकारी तुमुल युद्ध हुआ ॥ २८० ॥ तदनन्तर रामने दारुक सारथीके कहनेपर ब्रह्मास्त्रसे समरमे दशकन्धरको नाभिमें मारा । २८१ ॥ उस बाणने उसके हृदयको छेद तथा रामके तरकसमें आकर अपने आपको कृतकृत्य समझा ॥ २८२ ॥ उस समय रावणके मृत शरीरसे सूर्यके समान प्रदीप्त तेज निकल-कर देवताओंके सामने ही रघुनन्दन रामके देहमें प्रवेश कर गया ॥ २८३ ॥ तब देवताओने स्तुति करके