श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 162, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें१४६ आनन्दरामायणे [ सर्गः १३
त्रयोदशः सर्गः ( अगस्त्य-रामसंवाद )
श्रीशिव उवाच
एकदा राघवं द्रष्टुं मुनिभिः कुम्भसम्भवः। ययौ रामेण सन्मानमानितः स उपाविशत् ॥ १ ॥ उपविष्टाः प्रहृष्टाश्च मुनयो रामपूजिताः। संसृष्टकुशलाः सर्वे रामं कुशलमब्रुवन् ॥ २ ॥ कुशलं ते महाबाहो सर्वत्र रघुनंदन। दिष्ट्येदानीं प्रपश्यामो हतशत्रुमरिंदम ॥ ३ ॥ दिष्ट्या त्वया हताः सर्वे मेघनादादयोऽसुराः। हन्वा रक्षोगणान्सर्वान् कृतकृत्योऽद्य जीवसि ॥ ४ ॥ इति तेषां वचः श्रुत्वा रामस्तानाह सुस्मितः। किमर्थमादौ युष्माभिर्मेघनादोऽद्य कीर्तितः ॥ ५ ॥ इति रामवचः श्रुत्वाऽगस्तिस्तैस्त्ववलोकितः। कुंभयोनिस्तदा रामं प्रीत्या वचनमब्रवीत् ॥ ६ ॥ शृणु राम यथा वृत्तं मेघनादस्य चेष्टितम्। जन्मकर्मवरप्राप्तिं संक्षेपादद्वदतो मम ॥ ७ ॥ पुरा कृतयुगे राम पुलस्त्यो ब्रह्मणः सुतः। तृणबिंदुसुतायां स पुत्रं त्रैलोक्यविश्रुतम् ॥ ८ ॥ निर्ममे विश्रवा नामधेयं वेदनिधिं शुभम्। भरद्वाजसुतायां च विश्रवा निर्ममे सुतम् ॥ ९ ॥ श्रेष्ठं वैश्रवणं तस्मै प्रमन्नोऽभूद्विधिश्विरात्। विधिर्वैश्रवणायोध तुष्टस्तन्पमसा ददौ ॥१०॥ मनोज्ञमभिलषितं यानं धनेशत्वमखंडितम्। पुष्पकं चाप्येकदाऽसौ द्रष्टुं विश्रवसं ययौ ॥११॥ पुष्पकेण धनाध्यक्षो ब्रह्मदत्तेन भास्वता। नत्वा तातं तदा प्राह न स्थानं ब्रह्मणा मम ॥१२॥ दत्तं स्थेयं मया कुत्र तद्विचार्य वदस्व माम्। विश्रवा अपि तं प्राह विश्वकर्मविनिर्मिता ॥१३॥ लंकानाम्नी पुरी श्रेष्ठा सागरेऽस्ति सुमंडिता। त्यक्त्वा विष्णुभयाद्दैत्या विविशुस्तं रसातलम् ॥१४॥ सुयं त्वं वस तस्यां हि तथेत्युक्त्वा धनेश्वरः। गत्वा तस्यां चिरं कालमुवास पितृसम्मतः ॥१५॥
श्रीशिवजी बोले- हे प्रिये ! एकदिन बहुतसे मुनियोंके साथ अगस्त्यमुनि श्रीरामका दर्शन करने आये । रामसे सम्मानित होकर वे सब बैठे ॥ १ ॥ अन्यान्य मुनि भी रामसे पूजित होकर प्रसन्नतापूर्वक बैठ गये । रामके पूछनेपर सबने अपना कुशल क्षेम सुनाया ॥ २ ॥ और कहा- हे रघुनन्दन ! बड़े हर्षकी बात है कि शत्रुको मारकर सकुशल आपको हम लोग राज्यसिंहासनपर विराजमान देख रहे हैं। हे अरिन्दम (शत्रुओं-को संता दिखलानेवाले)! आपने बड़े भाग्यसे मेघनाद आदि सब असुरोंको मार गिराया है। उन्हें मार तथा कृतकार्य होकर आप विराजमान हैं ॥ ३ ॥ ४ ॥ उनका ऐसा वचन सुनकर राम कुछ मुसकराते हुए बोले-आपलोगोंने सब राक्षसोंमसे मेघनादका नाम पहले क्यों लिया ? रामका यह प्रश्न सुनकर वे सब मुनि अगस्त्य मुनिका मुख देखने लगे। यह देखकर अगस्त्य बहुत प्रेमपूर्वक रामसे बोले - ॥ ५ ॥ ६ ॥ हे राम ! मैं आपसे मेघनादका चरित्र, जन्म, कर्म तथा वरप्राप्तिका वृत्तान्त संक्षेपमें कहता हूँ, आप सुनें ॥ ७ ॥ हे राम ! सत्ययुगमें पुलस्त्य नामके ब्रह्मपुत्रने तृणबिन्दुकि पुत्रीस तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध वेदवेत्ता विश्रवा नामका पुत्र उत्पन्न किया। विश्रवाने भारद्वाजकी पुत्रीसे वैश्रवण नामक श्रेष्ठ पुत्र उत्पन्न किया कुछ दिनोंके बाद वैश्रवणकी तपस्यासे प्रसन्न होकर ब्रह्माने उसको उसका मनोवांछित पुष्पक विमान, अखण्ड धनेशत्व तथा कुबेरकी पदवी प्रदान की। एक दिन ब्रह्माके दिये हुए उस सुन्दर पुष्पक विमानपर सवार होकर धनाधिप कुबर अपने पिता विश्रवाका दर्शन करने गये। वहाँ जाकर कुबेरने पिताको नमस्कार करके कहा- हे पिताजी ! ब्रह्माने मुझे निवासके लिये कोई स्थान नहीं दिया है। अतः आप विचार करके कोई मेरे रहने योग्य स्थान बताइए। विश्रवाने कहा-विश्वकर्माकी बनायी हुई एक सुन्दर और श्रेष्ठ लंका नामकी नगरी समुद्रके बीचमें विद्यमान है। विष्णुके डरसे दैत्य लोग उसे छोड़कर पातालमें चले गये हैं ॥ ८-१४ ॥ तुम जाकर उसमें सुखपूर्वक निवास करो। 'तथास्तु' कहकर कुबर पिताके कथनानुसार जाकर बहुत काल