श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 161, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १२ ] सारकाण्डम् १४५
शिखाबंधनमोक्षार्थं शबरी भवबंधनात् । कृता मुक्ता तु रामेण जलस्पर्शनहेतवे ॥१८८॥
नेत्रयोर्निहतो वाली दत्तं तद्रुधिरं तदा । काथिलंकार्युरी दग्धा कुंभकर्णस्तथौदनः । १८९॥
पक्वान्नमिंद्रजिज् ज्ञेयः शाकार्थं राक्षसा हताः । वरान्नं सारणो ज्ञेयः प्रहस्तो वटकः स्मृतः ॥१९०॥
निकुंभः पर्पटो ज्ञेयः कुंभस्तु लवणं स्मृतः । पायसार्थं कालनेमिस्त्वतिकायः स शर्करः ॥१९१॥
क्षीरमैरावणो ज्ञेयो घृतं मैरावणः स्मृतः । दध्योदनः समाम्नौ तु आहवे च स रावणः ॥१९२॥
हत्वा निवेदितः पात्रे तस्य कालानलस्य च । उच्छिष्टवलिमत्यागः केशत्वक्थिक्षसादिनाम् ॥१९३॥
संत्यागोऽत्र रणे ज्ञेयस्तदा तृप्तो बभूव सः । ततो रणाध्वरस्यात्र राघवेण विसर्जनम् ॥१९४॥
अयोध्यायां प्रवेशो हि कृतस्तन्मे वदाम्यहम् । अध्वरावभृथस्नानं ज्ञेयं राज्याभिषेचनम् ॥१९५॥
मंगलानि समस्तानि यज्ञांगविहितानि हि । ज्ञातव्यानीति रामेण रणयागो विसर्जितः ॥१९६॥
एवं प्रोक्तो मया देवि रणयागः सविस्तरः । रामोऽथ परमारमापि कार्याध्यक्षोऽतिनिर्मलः॥१९७॥
कर्तृत्वदिविहीनोऽपि निर्विकारोऽपि सर्वदा । स्वाऽनन्देनापि संतुष्टो लोकानामुपदेशकत् । १९८॥
चकार विविधान् धर्मान् गार्हस्थ्यमनुलंघ्य च । न पर्यदेवन् विधवा न च व्यालकृतं भयम् ॥१९९॥
न व्याधिजं भय चासीद्रामे राज्यं प्रशासति । औरसानिव रामोऽपि जुगोप पितृवत् प्रजाः ॥२००॥
सीतया बन्धुभिः सार्द्धं साकेते सुखमाप सः । इदं युद्धचरित्रं ते प्रोक्तं देवि मया तव ॥२०१॥
इति शतकोटिरामचरितांतर्गते श्रीमदानंदरामायणे वाल्मीकीये सारकाण्डे
युद्धचरिते रामराज्याभिषेकवर्णनं नाम द्वादशः सर्गः ॥ १२ ॥
तृप्तियं दी ॥ १८७॥ जिसकी गाँठ खोलनेके जगह रामने शबरीको संसारबन्धनसे छुड़ाकर मुक्त कर दिया । रामने बालीको मारकर उसके रुधिररूपी जलसे नेत्रोंमें स्पर्श किया । लंकाको जलाकर कालानलके लिये दाल तथा कढ़ी बनायी । अर्थात् लंका दाल-कढ़ीके स्थानमे गिनी गयी । कुम्भकर्णरूपी भात, मेघनादरूपो पक्वान और सब राक्षसोंका शाक बना । अन्य उत्तम पदार्थोंके स्थानपर सारण मारा गया । प्रहस्त बड़ा, निकुम्भ पापड़, कुम्भ नमक, कालनेमि खीर, अतिकाय शक्कर, ऐरावणरूपी दूधमे मैरावणरूपी घी तथा दधिभक्तके स्थानपर रावणको मारकर रामने कालानलके पात्रमें परोस दिया । कालानलने इन सबका भोजन करके केश, चर्म तथा अस्थियोंका जूठन रणमे छोड़ दिया । तब वह तृप्त हुआ । उसके पश्चात् रामका अयोध्यामें प्रवेश करना ही रणरूपी यज्ञकी समाप्ति अर्थात् रणयज्ञका विसर्जन हुआ । यहाँ रामका राज्याभिषेक ही यज्ञके अन्तका अवभृथस्नान था ॥ १८८–१९५ ॥ अन्यान्य मांगलिक कार्य उस यज्ञके अंग थे । इस प्रकार रामने सांगोपांग रणयज्ञ पूरा किया ॥ १९६ ॥ हे देवि ! मैने तुमको उपर्युक्त प्रकारसे समस्त रणयाग कह सुनाया । तदनंतर साक्षात् परमात्मा, कार्यसमुदायके अधिष्ठाता, कर्तृत्वादि अभिमानसे रहित, सदा निर्विकार स्वरूप, निज आनन्दसे ही संतुष्ट तथा सब प्राणियोंको सदुपदेश देनेवाले राम भी गृहस्थधर्मका पालन करते हुए अनेक धर्मोका आचरण करने लगे । उनके राज्यकालमें कोई भी स्त्री विधवा होकर रोती नहीं थी । किसोको साँप तथा व्याघ्र आदिका भय नहीं था और न किसीको रोगका ही भय था। रामने भी समस्त प्रजाको, पिता जिस प्रकार अपने सगे लड़कोंका पालन करता है, उसी प्रकार पालन किया । हे देवि ! यह मैंने तुमको रामका युद्धचरित्र कह सुनाया ॥ १९७–२०१ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितांतर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये सारकांडे युद्धचरित्रे रामतेजपाण्डेयकृत'ज्योत्स्ना'भाषाटीकायां रामराज्याभिषेकवर्णनं नाम द्वादशः सर्गः ॥ १२ ॥