श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 160, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें१४४ आनन्दरामायणे [ सर्गः १२
रणांगणं यज्ञकुण्डं तत्र वै ह्यपलायनम् । तच्च वेदविधानं हि ब्रह्मसत्वं प्रकीर्तितम् ॥१७१॥ कवचाश्च घटाटोपो ज्ञेयः सम्भरणस्ततः । संशार्त्रनं शस्त्रमुद्योज्यं राक्षसमर्पणम् ॥१७२॥ शस्त्राणां मलशोधार्थं क्रियते यद्रणांगणे । भूमौ शराणां विस्तारः परिस्तरणमुत्तमम् ॥१७३॥ परिमूहनं ज्ञेयं यत्क्रिकालानलो महान् । मुखेण बाणरूपेण मांसाहूतिममर्षणम् ॥१७४॥ ऋग्भागं वषोर्भागं हाहाकारो भयानकः । म ॐकारवषट्कारघोषो ज्ञेयो रणाध्वरे ॥१७५॥ अग्नेर्ज्वाला शस्त्रतेजोघूग्र्रः स्वेदसमुद्भवो रणे ज्वालानिचयशान्त्यर्थं पृषदाज्यस्य सेचनम् । १७६॥ यच्चात्र तु वीराणामस्त्रावंचतमुत्सनम् । ज्ञानेन सह जीवस्य वलिर्दीपबलिः स्मृतः ॥१७७॥ ये देहलोभिनो वीरा बलिदोषहराः स्मृताः रामहस्तान्मृर्तिन्यक्ता ये कुर्वन्ति पलायनम् ॥१७८। देहबन्धान्न मुक्तास्ते बलिभक्षणदोषतः । पूर्णाहुतिः शिरोभिर्हि ज्ञेयासन्नत्र प्रदक्षिणाः ॥१७९। उच्चाटने हि सव्येन वीराणां जयहेतवे । नैज पदप्रदानं च ज्ञेया मा दक्षिणाऽध्वरे ॥१८०॥ मूर्ध्नि पुष्पवृष्टिब्बृहत्येव विप्राभिषेचनम् जयसम्पादनं युद्धे ज्ञेयं. संपादनं हि तत् ॥१८१। चराचराणांमानन्दो ज्ञेयः स निजगोत्रिणाम् । भूतानां तर्पणं विप्रभोजनं सम्प्रकीर्तितम् ॥१८२ । एवं सुबाहुना युद्धे राघवस्य रणाध्वरः । तथा गाधिजसञ्चारिडो नौ श्ये महैव हि ॥१८३। कृत्वाऽध्वरसमाश्रिप्त विश्वामित्रेण वै पुरा त्रिमर्जितो न रामेण दृष्ट्वाऽध्वं रणाध्वरे । १८४। कालानल मुनस्तस्य तृप्त्यर्थं राऽकरोन्मतिम् । कृत्वा भूमेर्महत्पात्रं विगधरुधिरंण हि । १८५॥ पात्रस्य प्रोक्षणं कृत्वा विश्वाहूत्यर्थमादरात् । रामः शूर्पणखायाश्च घ्राणं कणों विच्छेद यत् ॥१८६॥ प्राणाहूतिभ्वो गमेण त्रिशिराः खाद्दूषणौ । मारीचश्च कबन्धश्च पंच ते निहताः क्षणात् । १८७॥
उस रणरूपी यज्ञका मैं विस्तारसे वर्णन करता हूँ, सुनो ॥ १३०॥ उस रणस्थलमें युद्ध कुण्ड था। समरसे न भागना ही वेदविहित ब्रह्मसत्त्व था ॥ १७१॥ शस्त्राकी भनकार ही कंपंकी सामग्रो थी। रणांगणमें शत्रूोंका मैल छुड़ानेके लिये उनपर जो पत्थर घिसे जाते थे, वही मृत्तिकाका माँजना था। भूमिमें बाणोंका फैला-फैलाकर रखना ही उत्तम कुश आदिका आस्तरण था और बाण ही उनका परिसमूहन (बटोरना) था। महान् कालरूपी अग्नि ही यजकुण्डकी आग थी। उसमें बाणरूपा मुखसे मांसकी आहुतियों समर्पण की जाती थी ॥ १७२-१७४। ऋग्वेदकी ऋचा ही वषट्कार थी। भयानक हाहाकार ही ओंकार तथा वषट्कारका नाद था ॥ १७५। शस्त्रोंकी चमक ही आगकी लपट थी। पसीनेका बहना ही घृतौ था। वीर पुरुषोंका उत्तम शस्त्रमोचन ही अग्निके ज्वालाकी शान्तिका पृषदाज्य सींचनेरूपी उपाय था । ज्ञानपूर्वक जीवोंका शरीर-त्याग ही दीपदान था ॥ १७६ व १७७। जो शरीरमें ममता रखनेवाले थे, वे ही पूजाकी सामग्री तथा दानवों से भागनेवाले माने जाते थे। जो रामके हाथसे न मरकर बहूँत भाग जाते थे वे बलिभक्षण करनेके दोषसे देहरूपी बन्धनमें ही पड़ जाते थे-मुक्त नहीं होते थे। उस युद्धरूपी यज्ञमें सिरोंका कट कटकर गिरना ही नारियलके द्वारा दी जानेवाली पूर्णाहुति थी। विघ्नध्वंसके लिये अपनी दाहिनी ओरसे वीरोंको दूर करना ही प्रदक्षिणा थी। उस यज्ञमें मूल पुरुषकेण विजयपद (ब्रह्मपदका प्राप्ति) हो दक्षिणा थी ॥१७८-१८०॥ देवता-ओंके द्वारा जो पुष्पवृष्टि की जाती थी, वह ब्राह्मणोंका अभिषेचन था युद्धमें विजय प्राप्त करना ही यज्ञका फल था ॥ १८१॥ चर अचरका आनन्दलाभ ही अपने गात्रवालोंका आनन्द समझा जाता था। पशु-पक्षी आदि जीवोंकी तृप्ति ही विप्रभोजन कहा जाता था ॥ १८२। इस प्रकार रामका जो सुबाहुसे युद्धरूपी यज्ञ राक्ष-सोंके साथ आरम्भ हुआ, वह और गाधिपुत्र विश्वामित्रका यज्ञ दोनों साथ ही प्रारम्भ हुए । १८३॥ उनमेंसे विश्वामित्रजीने तो अपना यज्ञ समाप्त कर लिया था परन्तु रामने अपने दशमें कालानलको अतृप्त देखकर अपना युद्धयज्ञ समाप्त नहीं किया था। अतएव उसको तृप्त करनेका इच्छा करके रामने विराधके रुधिर से पृथ्वीरूपी पात्रका प्रोक्षण (शुद्धि करके शूर्पणखाके नाक-कान काटकर प्रेमसे भिन्न-विभिन्न आहुतिये दीं ॥ १८४-१८६॥ रामने त्रिशिरा, खर, दूषण, मारीच तथा कबन्धको क्षणभरमें मारकर पंचप्राणा-