श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 159, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १२ ] सारकाण्डम् १४३
तदा विभीषणाद्याश्च स्वकीयपात्राणि वेगतः । विसृज्य मर्कटे मूर्ध्नि न्युप्ता न्यथा सम्यक्कृतं त्विति ॥ १५५॥
तन्निशाम्यं रामशोच्छिष्टं बुभुजुः सप्रमान्विताः । महान् कोलाहलश्चासीद्रामोच्छिष्टार्थमादरात् ॥ १५६॥
सीतारामौ सन्निरीक्ष्य मुदा जहसतुस्तदा । एवं नानाकौतुकानि कुर्वन्तौ राघवांतिके । १५७॥
सुग्रीवाद्याः सुखं तस्थुस्तोपयन्तः कियदिनेम् । एतस्मिन्नन्तरे तत्र पुष्पकं च समाययौ पुनः ॥ १५८॥
प्राह देव कुवेरेण प्रेषितं त्वामह पुनः । मामाह यत्कुवेरस्तच्छृणुष्व त्वं रघूत्तम ॥ १५९॥
जितस्त्वं रावणेनादौ पश्चाद्रामेण निर्जितः । अतस्त्वं राघव नित्यं वह यावद्भवेद्भुवि ॥ १६०॥
यदा गच्छेद्रघुश्रेष्ठो वैकुण्ठं याहि मां तदा । तच्छ्रुत्वा राघवः प्राह सुग्रीवादीन्स्वथास्थले ॥ १६१॥
स्थाप्य श्रीरामयोध्यायां राजद्वारबहिर्विम तथेति रामवचनाद्वानराद्यान्यथास्थले । १६२॥
स्थाप्य श्रीरामयोध्यायां राजद्वारबहिः स्थितम् । चकार राज्य धर्मेण लङ्कायां म विभीषणः ॥ १६३॥
शशास राज्यं पाताले धर्मेण मकरध्वजः । चकार तार्क्ष्यः मणिनियोगराजस्यदे निने । १६४॥
शशास राज्यं कपिभिः किष्किन्धायां कपीश्वरः । शृङ्गवेरपुरे राज्यं गुहश्चाकरोन्मुदा १६५॥
नत्वा रामं वायुपुत्रो ययौ तप्तुं हिमालयम् । सर्वे विभीषणाद्याश्च पंचमे सप्तमेऽहनि । १६६ ।
दर्शनार्थं राघवस्य साकेतं प्रययुः सदा । पञ्च सप्त दिनान्यत्र स्थित्वा भोगान्धवांतिकेम् १६७॥
यातायातं सदा चक्रुः स्वस्वराज्याद्रघूत्तमम् । रामोऽपि राज्यमखिलं शशासाखिलवत्सलः । १६८॥
अनिच्छतं हि सौमित्रि यौवराज्येऽभ्यषेचयत् । लक्ष्मणः परया भक्त्या रामसेवापरोऽभवत् । १६९॥
विश्वामित्रोऽध्वरे पूर्व रणयागस्य पूर्णता ।
न कृता या राघवेण सा कृता स्वपदे तदा । रणयागः सविस्ताराद्वर्ण्यते शृणु पार्वति ॥ १७०॥
स्ताने तथा नीचे वानरोंके आगे फेंकने लगे ॥ १५२-१५४ ॥ यह देखकर विभीषण आदि भक्त भी शीघ्र अपने-अपने थालोंको छोड़कर हनुमान्की प्रशंसा करके कहने लगे कि तुमने बहुत उत्तम काम किया ॥ १५५ ॥ यह कहकर वे स्वयं भी बड़े आदरसे मारुतिके केश हुआ रामका उच्छिष्ट प्रसाद पाने लगे । उस समय रामकी जूठनके लिये बड़ा भारी कोलाहल मच गया ॥ १५६ ॥ राम और सीताने यह देखा तो प्रसन्न होकर हँसने लगे इस प्रकार विविध क्रीड़ायें करके सीता और रामको प्रसन्न करते हुए सुग्रीव आदि मित्र कुछ दिन वहाँ रहे । इतनेमें पुष्पक विमान पुनः वहाँ आया ॥ १५७, १५८ ॥ वह र म न कहने लगा - हे देव ! कुबेरने मुझको आपके पास वापस भेज दिया है । हे रघुनन्दन ! कुबेरने जो कुछ मुझसे कहा है, वह सुनिये ॥ १५९ । उन्होंने कहा है कि पहले तो रावणने तुमको मुझसे जीता था और बादमें रामने तुमको रावणसे जीता है । इस कारण तुम आकर तबतक राम ही की सवारी देनेका काम करो, जबतक कि भूमण्डलपर रहे ॥ १६० ॥ जब रघुश्रेष्ठ राम वैकुण्ठ धाम चले जावें, तब तुम मेरे पास चले आना । यह सुनकर रामने विमानको आज्ञा दी कि सुग्रीव आदि मेरे मित्रोंको उनके स्थानपर पहुँचाकर शीघ्र ही अयोध्या लौट आओ और राजमहलके दरवाजेके बाहर खड़े रहो । तदनन्तर विभीषण जाकर लङ्कामें धर्मपूर्वक राज्य करने लगे । १६१-१६३ ॥ मकरध्वज पातालमें धर्मपूर्वक राज्य-शासन करने लगे । गरुड़ने युवराजनगरपर अंगदजीका अभिषेक किया ॥ १६४ ॥ किष्किन्धामे कपीश्वर सुग्रीव राज्य करने लगे । शृङ्गवेरपुरमे निषादराज आनन्दसे राज्य करने लगा ॥ १६५ ॥ वायुपुत्र हनुमान् रामको नमस्कार करके तप करनेको हिमालय चले गये । फिर भी विभीषण-सुग्रीव आदि मित्र पाँचवें अथवा सातवें दिन अयोध्यामे श्रीरामका दर्शन करनेके लिए आया करते थे और वे श्रीरामके पास पाँच-सात दिन निवास करके चले जाते थे । इस प्रकार उन लोगोंका अपने-अपने राज्यसे श्रीरामके पास आना जाना लगा रहता था । सभी लोगोंके प्रिय राम भी सम्पूर्ण राज्यका पालन करने लगे ॥ १६६-१६८ ॥ न चाहनेपर भी रामने लक्ष्मणका युवराजके पदपर अभिषेक कर दिया और वे भी रामकी सेवामे तत्पर हो गये ॥ १६९ ॥ रामने पूर्व समयमे विश्वामित्रके यज्ञके समय जिस युद्धरूपी यज्ञकी समाप्ति नहीं की थी, उस रणयज्ञको इस समय अपने राज्यपदपर स्थित हो जानेपर पूर्णाहूति की । हे पार्वती !