भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 158, कुल 811 में से

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पृष्ठ 158
१४२आनन्दरामायणे[ सर्गः १२

नेन हारेण शुशुभे मारुतिर्गौरवेण च । तदा दृष्ट्वा हनूमन्तं रामो वचनमब्रवीत् ॥ १३९ ॥ मारुते त्वां प्रसन्नोऽस्मि वरं वृणु कांक्षितम् । हनुमानपि तं प्राह नत्वा रामं प्रहृष्टधीः ॥ १४० ॥ त्वन्नाम स्मरतो राम मनस्तृप्यति नो मम । अतस्त्वन्नाम सततं स्मरिष्यामि भूतले ॥ १४१ ॥ यावत्स्थास्यति ते नाम लोके तावत्कलेवरम् । मम तिष्ठतु राजेंद्र वरोऽयं मेऽभिकांक्षितः ॥ १४२ ॥ यत्र यत्र कथा लोके प्रचरिष्यति ते शुभा । तत्र तत्र गतिर्मेऽस्तु श्रवणार्थं सदैव हि ॥ १४३ ॥ देवालयान्नदीतीरात्तीर्थाद्वापि जलाशयात् । विनाऽन्यत्र स्थले नेस्तु कथा षड्घटिकोर्ध्वतः ॥ १४४ ॥ रामस्तथेति तं प्राह मुक्तस्तिष्ठ यथासुखम् । कल्पान्ते मम सायुज्यं प्राप्स्यसे नात्र संशयः ॥ १४५ ॥ तमाह जानकी प्रीता यत्र कुत्रापि मारुते । स्थितं त्वामनुयास्यन्ति भोगाः सर्व ममाज्ञया ॥ १४६ ॥ ग्रामागमपनेषु व्रजखेटकपादसु । वनदुर्गपर्वतेषु सर्वदेवालयेषु च ॥ १४७ ॥ नदीषु क्षेत्रतीर्थेषु जलाशयपुरेषु च । वाटिकोपवनाश्वत्थवटवृंदावनादिषु ॥ १४८ ॥ त्वन्मूर्तिं पूजयिष्यन्ति मानवा विघ्नशांतये । भूतप्रेतपिशाचाद्या नश्यंति स्मरणात्तव ॥ १४९ ॥ ये चान्ये वानराश्चाश्च ह्ययोध्यां समुपागताः । अमूल्याभरणैर्वस्त्रैः पूजिता राघवेण ते ॥ १५० ॥ सुग्रीवप्रमुखाः सर्वे वानराः सविभीषणाः । मकरध्वजसंपातिगुहकाः पृथ्विवादयः । यथार्हं पूजितास्तेन रामेण गमनादिभिः ॥ १५१ ॥ ततः सर्वैर्भोजनार्थं राघवः संस्थितोऽभवत् । रामेण प्राणाहुतयो गृहीताश्चेति मरुत्सुतः ॥ १५२ ॥ निर्गत्योड्डीय वेगेन रामाग्रे भोजनस्य च । त्रिपदायां स्थितं पात्रं हेमं पक्वान्नपूरितम् ॥ १५३ ॥ निनाय वामहस्तेन धृत्वा च विहसन्मुदा । स्वयं भुक्त्वा रामशेषं प्राक्षिपद्वानरानपि ॥ १५४ ॥

रत्नोंसे विभूषित हार सप्रेम समर्पण किया। उससमय सीताजीने श्री रामका दिया हुआ वह हार वायुपुत्र हनुमानको दे दिया ॥ १३७ ॥ १३८ ॥ उस हारके गौरवस हनुमान् बड़े ही प्रभासित होने लगे। यह देखकर रामने हनुमान्से कहा— ॥ १३९ ॥ हे मारुते ! मैं तुम्हारे ऊपर प्रसन्न हूँ जो चाहो सो वर माँगो। तब प्रसन्न हनुमान्ने रामको नमस्कार करके कहा— ॥ १४० ॥ हे प्रभो ! आपके नामस्मरणसे मेरा मन अब भी तृप्त नहीं हुआ है। अतएव जबतक आपका नाम भूतलमे विद्यमान रहे तबतक मैं आपके नामका स्मरण करता हुआ इस लोकमें जीवित रहूँ हे राजेन्द्र ! यहो मेरा अभिलषित वर आप मुझे दे दें । १४१ ॥ १४२ ॥ लोकमे जहाँ कहीं भी आपकी पवित्र कथा होती हो, वहाँ वह कथा सुननेके लिये जानेमे मेरी अप्रतिहत गति हो ॥ १४३ ॥ देवालय, नदीतीर, तीर्थस्थान तथा बावली आदि जलाशयोंको छोड़कर अन्य स्थानोंम छः घडीके बाद नित्य आपकी कथा हुआ करे । १४४ । रामने कहा अच्छा, तुम मुक्त होकर सुखसे भूमण्डलपर निवास करो कल्पान्तके समय तुम मेरी सायुज्य मुक्तिको प्राप्त होओगे, इसमें सन्देह नही है ॥ १४५ ॥ इसके पश्चात् जानकीजी प्रसन्न होकर बोली हे मारुत ! तुम जहाँ कही रहोगे, वहीपर मेरे आशीर्वादसे तुमको सब भोग्य पदार्थ प्राप्त हो जाया करेंगे ॥ १४६ ॥ ग्राम बाग, नगर, गोशाला, रास्ता, छोटा गाँव, घर, वन, जिला पर्वत, सर्व देवालय, नदी, तीर्थक्षेत्र, जलाशय, पुर, वाटिका, उपवन, पीपल, वट तथा वृन्दावन आदि स्थानोमे मनुष्य अपने विघ्नोंकी शान्ति करनेके लिये तुम्हारी मूर्तिकी पूजा करेंगे। तुम्हारे नाम स्मरण करनेसे ही भूत-प्रेत तथा पिशाच आदि दूर भाग जायेंगे ॥ १४७-१४९ । इसके बाद रामने अयोध्यामे जो अन्य वानर आये थे, उन सबका भी बहुमूल्य भूषण तथा वस्त्रोंसे सत्कार किया । १५० ॥ श्रीरामने वस्त्रादिसे सुग्रीव आदि वानरो विभीषण, मकरध्वज, संपाती तथा निषादराज आदि राजाओका भी यथायोग्य पूजा की ॥ १५१ ॥ उसके पश्चात् सबको साथ लेकर रामचन्द्रजी भोजन करने बैठे। रामके पाँच ग्रास ग्रहण करके तृप्त हो जानेके साथ ही हनुमान् झट उठकर रामके पास आ पहुँचे और उनके सामने पाडपर रक्खा हुआ पक्वान्नोंसे परिपूर्ण सुवर्णका थाल बाएँ हाथसे उठाकर आकाशमें चले गये और रामके उस भोजनशेषका स्वयं आनन्दसे

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