श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 157, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः १२ ] उत्तरकाण्डम् १४१
गद्यैः गीतैः वचनातीतं श्रीरामचन्द्रं मनुतं नमामि ॥१२३॥ श्रीमच्चन्द्रस्य दशाष्टकं मया प्रयोक्तं देवि मनोहरं ये । पठन्ति शृण्वन्ति गृणन्ति भक्त्या ते सर्वकामान्प्रलभन्ति नित्यम् ॥१२४॥ इति स्तुत्वा रामचन्द्रं समाधौ परिनिष्ठितोऽहम् । एतस्मिन्नन्तरे तत्र राजा दशरथो महान् ॥१२५॥ दृष्ट्वा रामं समांत च विमानस्थोऽर्कसन्निभः । स्तुत्वा रामं परात्मानं राज्यस्थं बन्धुवेष्टितम् ॥१२६॥ उवाच रामं संतुष्टः सुगभीराक्षराजितः । दशरथ उवाच धन्योऽहं कृतकृत्योऽहं धन्यौ तौ पितरौ मम ॥१२७॥ धन्यो देशः कुलं धन्यं यस्त्वां राज्याभिषेचितम्। पश्याम्पद्य महाबाहो धन्या सा जननी तव ॥१२८॥ या कौसल्या समुत्साहं नेत्राभ्यां तेऽद्य पश्यति । इत्युक्तवन्तं राजानं ननाम स रघूत्तमः ॥१२९॥ कौसल्याद्या राजदाराः सर्वे ते पौरवासिनः । लक्ष्मणो भरतश्चैव शत्रुघ्नस्तेऽथ मन्त्रिणः ॥१३०॥ नमस्कारानुरूपं चक्रुर्विमानस्थं मुदान्विताः । तान् गजाऽपि पृथक् पृष्ट्वा सर्वैर्देवगणैर्युतः ॥१३१॥ पूजितो रामचन्द्रेण मया सह न्यवर्त्तत । ययुः स्वं स्वं पदं सर्वे मया राज्ञा सुरास्तदा ॥१३२॥ रामेऽभिषिक्ते राजेन्द्र सर्वलोकसुखावहे। वसुधा सस्यसम्पन्ना फलवन्तो महीरुहाः ॥१३३॥ गन्धीनानि पुष्पाणि गन्धवन्ति चकाशिरे । मद्दन्न शतमध्यानां धेनूनां रघुनन्दनः ॥१३४॥ ददौ शत वृषाणां च द्विजेभ्यो वसु कोटिशः । सूर्यकान्तिसमप्रख्यां सर्वरत्नमयीं स्रजम् ॥१३५॥ सुग्रीवाय ददौ प्रीत्या राघवो हर्षसंयुतः । अङ्गतं ददौ श्रेष्ठं राक्षसेन्द्राय राघवः ॥१३६॥ अङ्गदाय ददौ दिव्ये राघवो बाहुभूषणे । चन्द्रकोटिप्रतीकाशं मणिरत्नविभूषितम् ॥१३७॥ मातायै प्रददौ हारं प्राप्या रघुकुलोत्तमः । सा तं हारं ददौ वायुपुत्राय सा मनस्विनी ॥१३८॥
विभ्रमभाववाले सामवेद जिनका गुणगान करता है, मनमात्रके विषय, प्रेमसे गान करन योग्य तथा वचनोंसे ग्रहण करन लायक श्रीरामचन्द्रका मैं सदास नमस्कार करता हूँ ॥१२३॥ हे देवि ! तुम्हारे प्रति कहे हुए श्रीरामके इस सुन्दर अष्टकको जो मनुष्य भक्तिसे पढ़ेगा अथवा सुने-सुनायेगा, वह अपनी अभिलषित कामनाओंको नित्य प्राप्त करेगा । १२४ । रामचन्द्रकी इतनी स्तुति करके ज्यों ही मैं उस समाधि बैठा, त्यों ही सूर्यके समान तेजस्वी राजा दशरथ विमानपर सवार होकर सुवत्सयुगके साथ वहाँ आकर सबीक सहित बन्धुओंसे वेष्टित तथा राजसिंहासनपर स्थित मुझस्वरूप राम परमात्माको देखकर स्तुति करन लगे ॥ १२५ ॥ १२६ ॥ देवनाओंके समूहसे परिवेष्टित राजा दशरथ प्रसन्न होकर बोले। उन्होंने कहा-मैं धन्य हूँ, मैं कृतकृत्य हूँ मेरे माता-पिता धन्य हैं । १२७ ॥ मेरा देश तथा कुल भी धन्य है कि जो मैं आज तुम्हें राजासनपर अभिषिक्तित देख रहा हूँ । हे महाबाहो ! तुम्हारी माता कौसल्या भी धन्य हैं, जो तुम्हें उत्साहपूर्वक अपने नेत्रांसे देख रही हैं। तदनन्तर रामने उन राजा दशरथको प्रणाम किया । १२८ । १२९ ॥ तब कौमल्या आदि राजाकी स्त्रियांने पुरवासियोने, भरत शत्रुघ्नने तथा मन्त्रियोने प्रमुदित होकर विमानमें स्थित राजा दशरथको प्रणाम किया । राजाने भी एक-एक करके उन सबसे कुशल पूछा। फिर देवताओ तथा मुझे साथ ले और रामचन्द्रसे पूजित होकर उन्होंने वहाँसे प्रस्थान कर दिया। भर तथा राजाके सहित के सब देवता अपने अपने धाम सिधारे । १३०-१३२ ॥ सब लोगोंको सुख देनेवाले राजाओंमें श्रेष्ठ राजा रामका अभिषेक हो जानेपर पृथ्वा धन-धान्यपूर्ण हो गयी और नहीं फलनेवाले भी वृक्ष फलने लगे ॥ १३३ ॥ सुगन्धरहित पुष्प भी सुगन्धित होकर सुगन्धित हान लगे। रघुनन्दन रामने सैकड़ों बैल, हजारों पांडे तथा करोड़ों रत्न ब्राह्मणाको दान दिये । उन रामने प्रसन्न होकर सूर्यके समान चमकनेवाली तथा अनेक प्रकारके रत्नोंसे निर्मित एक माला प्रीतिपूर्वक सुग्रीवको दी और एक सिरपेंच राक्षसेन्द्र विभीषणको दिया । १३४-१३६ ॥ उन्होंने अंगदको दिव्य बाजूबन्द दिये । रघुकुलमणि रामने सीताको करोड़ों चन्द्रमाके समान चमकने वाले मणियों तथा