भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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१४० आनन्दरामायणे [ सर्गः १२

सर्वरत्नममायुक्तं प्रजगुर्देवगन्धर्वा मणिकांचनभूषितम् । ददौ हारं नरेन्द्राय स्वयं शक्रस्तु भक्तितः ॥११३॥ ननृतुश्चाप्सरोपङ्क्तः । देवदुन्दुभयो नेदुः पुष्पवृष्टिः पपात खात् ॥११४॥ ततोऽकञ्चं स्तुतिमहं भरतेनाभिपूजितः । ११५॥ श्रीशिव उवाच सुग्रीवमित्रं परमं पवित्रं सीताकलत्रं नवमेघगात्रम् । कारुण्यपात्रं शतपत्रनेत्रं श्रीरामचन्द्रं सततं नमामि ॥११६॥ संसारपारं निगमप्रचारं धर्मावतारं हतभूमिभारम् सदाऽविकारं सुखसिन्धुपारं श्रीरामचन्द्रं सततं नमामि ॥११७॥ लक्ष्मीविलासं जगतां निवासं लङ्काविनाशं भुवनप्रकाशम् भूदेववासं शरदन्दुहासं श्रीरामचन्द्रं सततं नमामि ॥११८॥ मंदारमालं वचने ऽमलं गुणैर्विशालं हतसप्ततालम् । क्रव्यादाकालं सुरलोकपालं श्रीरामचन्द्रं सततं नमामि ॥११९॥ वेदांतगानं सकलैः समानं दृप्ताभिमानं त्रिदशप्रधानम् गजेंद्रयानं विगतार्वमानं श्रीरामचन्द्रं सततं नमामि ।१२०। श्यामाभिरामं नयनाभिरामं गुणाभिरामं वचनाभिरामम् । विश्वप्रणामं कृतभक्तकामं श्रीरामचन्द्रं सततं नमामि । १२१। लीलाशरीरं रणरङ्गधीरं विश्वैकसारं रघुकुलहारम् । गंभीरनादं जितसर्ववादं श्रीरामचन्द्रं सततं नमामि । १२२॥ खले कठोरं स्वजने विनीतं गामोपरान्तं मनसा प्रतीतम् ।

गये। औषधि, पर्वत, वृक्ष, समुद्र तथा नदियां भी आ पहुंचीं। इन्द्रके द्वारा भेजे हुए वायुने आकर रामको एक सुन्दर कंचनकी माला पहनायी ॥१११ । ११२॥ पश्चात् स्वयं इन्द्रने भी आकर सब रत्नोंसे युक्त तथा सोनार सुशोभित हार राजा रामको समर्पण किया ॥११३॥ किन्नर और गन्धर्व उनके गुण गाने लगे। सब अप्सराय और चारणगण नाचन लगे। देवताओंके नगाड़े बजने लगे और आकाशसे फूलोंकी वर्षा होने लगी ॥११४॥ बादमें भरतके द्वारा पूजित होकर मैं (शिव) रामकी स्तुति करने लगा ॥११५॥ श्रीशिवजी बोले-सुग्रीवके मित्र, परमपवन, सीताके पति, मेघके समान श्याम अंगवाले, करुणाके सिंधु और कमलके सदृश नेत्रोंवाले श्रीरामचन्द्रको मैं निरन्तर नमस्कार करता हूँ । ११६ । इस संसारसे भक्तोंको पार करनेवाले, वेदोंका प्रचार करनेवाले, धर्मके साक्षात् अवतार, भूभारको हरण करनेवाले, अविकृत स्वरूपवाले और सुखके सर्वोत्तम सागर श्रीरामचन्द्रको मैं सदा नमस्कार करता हूँ ॥११७॥ लक्ष्मीके साथ विलास करनेवाले, जगत्के निवासस्थान, लङ्काका विनाश करनेवाले, भुवनोंको प्रकाशित करनेवाले, ब्राह्मणोंको शरण देनेवाले और शरदीय चन्द्रमाके समान शुद्ध हास्य करनेवाले श्रीरामचन्द्रको मैं सततं नमस्कार करता हूँ ॥११८॥ मन्दारकी माला धारण करनेवाले, गर्व से वचन बोलनेवाले, गुणोंमें महान् सात ताल वृक्षोंका भेदन करनेवाले, राक्षसोंके काल तथा देवलोकोंके पालक रामचन्द्रको में सदा नमस्कार करता हूँ । वेदान्तके गेय, सबके साथ समान बर्ताव करनेवाले, शत्रुके मानका मर्दन करनेवाले, गजेन्द्रकी सवारी करनेवाले तथा अन्तरहित श्रीरामचन्द्रको मैं सततं नमस्कार करता हूँ। ११६ । १२० ॥ श्यामके रूपसे मनोहर नयनोंसे मनोहर, गुणोंसे मनोहर, हृदयग्राही वचन बोलनेवाले, विश्ववन्दनीय और भक्तजनोंकी कामनाओंको पूरी करने- वाले श्रीरामचन्द्रको मैं निरन्तर प्रणाम करता हूँ । १२१॥ लीलामात्रके लिए शरीर धारण करनेवाले, रणस्थली- में वीर, विश्वभरके एकमात्र सारभूत, रघुवंशमें श्रेष्ठ, गंभीर वाणी बोलनेवाले और समस्त वादोंको जीतने वाले श्रीरामचन्द्रको मैं प्रतिक्षण प्रणाम करता हूँ । १२२॥ दुष्टजनोंके लिए कठोर हृदयवाले, अपने भक्तोंके प्रति