भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 163

सर्गः १३] सारकाण्डम् १४७


कस्मिश्चिच्च काले हि सुमालीनाम राक्षसः । दुहित्रा व्यचरद्भूमा पुण्यकेतुं ददर्श सः ॥१६॥
हिताय चिन्तयामास राक्षसानां महामनाः । कैकसीं तनयामाह गच्छ विश्रवसं मुनिम् ॥१७॥
वरयस्व मुनेस्तेजःप्रतापात्ते सुताः शुभाः । भविष्यन्ति धनाध्यक्षतुल्या नो हितकारिणः ॥१८॥
सा संध्यायां ययौ शीघ्रं मुनेरग्रे व्यवस्थिता । लिखन्ती भुवि पादाङ्गुष्ठेन चाधोमुखी स्थिता ॥१९॥
तामपृच्छन्मुनिः का त्वं साऽऽह त्वं वेत्तुमर्हसि । ततो ध्यात्वा मुनिः सर्वं ज्ञात्वा तां प्रत्यभाषत ॥२०॥
ज्ञातं तवाभिलषितं मत्तः पुत्रानभीप्ससि । दारुणायां तु वेलायामागताऽसि सुमध्यमे ॥२१॥
अतस्ते दारुणौ पुत्रौ राक्षसौ संभविष्यतः । साऽब्रवीन्मुनिशार्दूलं त्वत्तोऽप्येवंविधौ सुतौ ॥२२॥
तामाहान्तिमजो यस्ते भविष्यति महामतिः । ततः सा सुषुवे पुत्रान् यथाकाले सुमध्यमा ॥२३॥
रावणं कुम्भकर्णं च क्रौंचीं शूर्पणखां शुभाम् । कुंभीनसीं कनीयांसं तृतीयं न विभीषणम् ॥२४॥
रावणः कुम्भकर्णश्च त्रयो दुहितरस्तथा । दुर्वृत्ताः प्राणिघ्नाश्चैव बभूवुर्मुनिहिंसकाः ॥२५॥
एकदा रावणो मात्रा लिङ्गार्थे प्रेषितः शिवम् । कर्तुं प्रसन्नमगमत् कैलासं कर्म दुष्करम् ॥२६॥
किञ्चित्स्वीयं शिरश्छित्त्वा वीणां षड्जस्वरैर्मुहुः । कृत्वा पीठं हि देहस्य तन्मूलं शिरसस्तथा ॥२७॥
तदग्रं पादयोः कृत्वा शंकूनांगुलिमस्तथा । तन्त्रीः कृत्वाऽन्त्रमालाभिः क्षतशोध्य सहस्रशः ॥२८॥
एवं कृत्वा स्वदेहस्य वीणां षड्जस्वरैर्मुहुः । चकार स्वमुखेनैव गांधर्वं गायन शुभम् ॥२९॥
तदा नंदीश्वरं प्राह शङ्करो लोकशङ्करः । शिरः संधाय हस्तेन त्वया वाच्योऽयं रावणः ॥३०॥
आत्मलिंगं राक्षसं त्वां शङ्करो न प्रदास्यति । हृद्गतं हि मया ज्ञातं शंभोस्त्वं याहि स्वस्थलम् ॥३१॥
इत्युक्त्वा प्रेषणीयोऽयं स रावणः स्वस्थलं यथा । इति शंभोर्वचः श्रुत्वा ययौ नंदी स रावणम् ॥३२॥


तक वहाँ रहे ॥ १५॥ पश्चात् किसी समय सुमाली राक्षसने अपनी पुत्रीको साथ लेकर पृथ्वीपर भ्रमण करते समय पुण्यकेतुको देखा । १६ । तब महात्मा सुमालीने राक्षसोंका हित सोचकर अपनी लड़की कैकसीसे कहा कि तुम विश्रवा मुनिके पास जाकर मुनिके तेज-प्रतापसे सुन्दर पुत्रोंकी प्राप्तिके लिये वर माँगो । वे पुत्र कुबेरके समान प्रतापी तथा हमलोगोंके हितकारी होंगे । १७॥ १८॥ तदनुसार सायंकालके समय मुनिके पास जाकर पाँवके अङ्गुठेसे धरतीको कुरेदती हुई वह नीचा मुख करके खड़ी हो गयी ॥ १९ ॥ मुनिने उससे पूछा—तुम कौन हो ? उसने कहा कि आप स्वयं इस बातको समझ सकते हैं। तब मुनिने ध्यान करके सब कुछ जान लिया और उससे बोले— ॥ २० ॥ मुझे मालूम हो गया कि मुझसे तू पुत्र पाना चाहती है, परन्तु हे सुमध्यमे ! तू इस भयानक समयमें यहाँ आयी है। इसलिये तुझसे दो भयानक राक्षस पुत्र उत्पन्न होंगे। तब वह मुनिशार्दूलसे बोली—हे महाराज ! क्या आपसे भी मुझे ऐसे ही पुत्र प्राप्त होंगे ? ॥ २१ ॥ २२ ॥ तब मुनि बोले—अच्छा जा, तेरा आखिरी पुत्र बड़ा बुद्धिमान होगा। पश्चात् उस सुन्दर कमरवाली कैकसीने यथासमय तीन पुत्र उत्पन्न किये ॥ २३ ॥ रावण कुम्भकर्ण, क्रौंची, शूर्पणखा, कुम्भीनसी और सबसे छोटा तीसरा पुत्र विभीषण उससे उत्पन्न हुआ ॥ २४ ॥ उनमेंसे रावण, कुम्भकर्ण और तीन लड़कियें बड़ी दुराचारिणी, जीवघातिनी तथा मुनिहिंसक हुई । २५ ॥ एक दिन रावणको माता कैकसीने रावणको शिवजीके पास लिङ्ग लेने भेजा । कैलासपर जाकर रावणने शिवजीको प्रसन्न करनेके लिये बड़ा दुष्कर काम किया । २६ । उसने अपने सिरका कुछ भाग काटकर वीणा बनायी । सिरसे वीणाका मूलभाग बनाकर अपनी देहसे उसका पृष्ठभाग तैयार किया पाँवोंसे उस वीणाका अग्रभाग बनाया और अँगुलियोंसे वीणाकी खूँटियें तैयार कीं। अपने पेटके भीतरकी आँतोंसे सैकड़ों एवं हजारों तार बनाकर अपने शरीरसे ही वीणा रची । पश्चात् षड्ज आदि स्वरोंसे रावणने अपने मुखसे ही गंधर्वके समान सुन्दर गायन आरम्भ किया ॥ २७-२९॥ तब लोगोंका कल्याण करनेवाले भगवान् शंकर नन्दीश्वरसे बोले कि तुम अपने हाथसे रावणका सिर संधान करके उससे कहो कि शंकरजी तुम जैसे राक्षसको आत्मलिङ्ग कभी न देंगे । मैं शिवजीके हृदयकी बात जानता हूँ।