श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 291, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ५ ] विलासकाण्डम् २७५
चुचुम्ब ताञ्च द्वित्रीन् पूर्णयामास तन्मुखे । मुखान्तो तन्मखंलग्नमाश्लिष्य हृदयेन ताम् ॥५३॥ मुमोच कञ्चुकं श्रीरामः सीतायाः स्वकरेण सः । दृष्ट्वैव तन्मुखं स्तनौ तन्त्रभोक्त्रं ददर्श सः ॥५४॥ ततः करेण सर्वाङ्गे रामश्चाकंपयन्मुदा । मानापशक्यैधुग्भावात्तन्वी स्मितमुखी ॥५५॥ एवं पम्पारू क्रीडां चक्रतुर्दम्पती मुदा । कः समर्थस्तयोः क्रीडामविस्तारं निवेदिंतुम् ॥५६॥ एतस्मिन्नन्तरे रामं भोजनार्थं तु सूचकः । कर्तुं ययौ स सौमित्रिः समाहूय सुहृज्जनान् ॥५७॥ निषेधितः स दासीभिर्नावकाशोऽहिः स्थितः । नावबुद्धः समयो नायं रामं गन्तुं च न क्षणम् ॥५८॥ स्थिरो भवार्थ सौमित्रे रामो ऽहसि सीतया । करोति जलरन्ध्रेषु जलक्रीडां यथामुखम् ॥५९॥ पुनस्ताः प्राह सौमित्रियुष्माभिर्वचनेन मे । निवेद्यतांयं रामार्थ भोजनार्थं हि लक्ष्मणः ॥६०॥ समागतश्चाग्रतःस्थितो यास्याम्यहं गृहम् । ततस्तासु तदा त्वेका दासी गत्वा रघूत्तमम् ॥६१॥ वस्त्रमितैर्बहिः स्थित्वा भर्त्राज्ञानेनविज्ञिता । छद्मवाक्यैः सौमित्रिर्हि द्वारमत्र मुनेः ॥६२॥ तद्दामीवचनं श्रुत्वा जनयन्मत् जनकीम् । वहिःकृत्वा निर्गत्य मयमुद्धन्तः स्वयम् ॥६३॥ जलैरुष्णैः प्रभुः स्नात्वा देहमुद्वर्तनादिभिः । सुगन्धद्रव्यगन्धादीन् कृत्वा दूर विपाडितः ॥६४॥ पीतकौशेयवासांसि परिधायाथ दम्पती । ददुश्चाग्रेऽपरान् वस्त्रान् हेमन्तव्यतितानि च ॥६५॥ दासीभ्यश्चाथ दासेभ्यो गगार्दैश्चित्रितानि हि । तौ जग्मतुः सुपर्णग्रमगाणाञ्चाशनगृहम् ॥६६॥ तत्र शूर्पोत्तरस्रैर्नानावणैकरैः । उर्मिलादामसर्वे पञ्चामृतैदुग्धसुद्रवम् ॥६७॥ देवीभिः स्वर्णकम्बिषे षड्रेषु परिवेषितम् । मुनीश्वराथ गुरुणा सहनिग्रयमन्वितः ॥६८॥ मन्त्रिभिर्मित्रेणोभ्यादि रामोऽशन्स्तोषदाप यः । तत्पात्रे वीजयन्त्याम आनक्षी चामरेण सा ॥६९॥ प्रविनोदैर्शाद्रुकदेवी शुश्रूषादाम राघवम् । एवं कृत्वा भोजनं तु कृत्वा तांबूलचर्वणम् ॥७०॥
तब राम भी हँसते हुए फुत्कार समान शब्द मुखसे सीताको मार देते थे ॥५२॥ सीता के विम्बसदृश लाल ओठोंको रघुनन्दन ने कई बार चूमा, और मुखका फेर दिया और बाँहोंका बन्द खोलकर अपनी छातीसे निपटाया ॥५३॥ रामने सीताकी चोली को अपने हाथोंसे हटा दिया जिससे कन्दुकके सम्मुख समान उनकी काञ्चन कान्ति दिखाई पड़ने लगी ॥५४॥ तब सीताजी लज्जावश रामका छातीपर हाथ डाल दी। इस तरह राम और सीताजी विविध प्रकारका जलकेलि कर रहे थे। सीता और रामकी क्रीड़ाके सविस्तार वर्णन करनेको सामर्थ्य भला किसमें है ? द्विज ... बृहत् संकलनमें ऐसा वर्णन किया गया है ॥५५॥ ५६ ॥ इसके अनन्तर भोजन के लिए हाथकी सूचना देनेके लिए तब लक्ष्मणजी रामचन्द्र के लिए ऋषियोंको बुलवा लिया ॥५७॥ लक्ष्मण रामको बुलानेके लिए केंचुलीके मण्डल के निकट पहुंचे, तैसे ही सखियोंने उन्हें रोका और कहा कि अभी रामचन्द्रजीके पास जानेका आज्ञा नहीं है। क्योंकि वे इस समय जलक्रीडा कर रहे हैं ॥५८॥५९॥ उनसे लक्ष्मणने कहा-अच्छा, तुम्हीं जाकर उनसे कहो कि द्वारपर लक्ष्मण भोजनकी सूचना देनेके लिए खड़े हैं ॥६०॥ तुम्हारे ऐसा कह देनेपर मैं अन्दर चला जाऊँगा, उससबके वाक्यानुसार उनमें से एक दासी रामके समीप गयी और लजाती हुई परदेकी ओटमें धीरे-धीरे उनसे लक्ष्मणके आनेकी खबर सुनायी ॥६१॥६२॥ दासीकी बात सुनकर राघव प्रसङ्गवश सीताको जलयन्त्रके बाहर निकाला और स्वयं भी निकल आये ॥६३॥ तब गरम जलसे सीता और रामने शरीरमें लगे हुए सुगन्धित उबटन आदिको धोया ॥६४॥ उसके बाद रेशमके पीले कपड़े पहने। उस बहुमूल्य वस्त्र कपड़ोंको दास-दासियोंको दे दिया। फिर पुष्पोंसे सुशोभित मार्गसे चलकर दोनों भोजनगृहमें जा पहुंचे ॥६५॥६६॥ वहाँ पूर्वोक्त भोजन-सामग्रीके व्यञ्जन कामधेनुके दुग्ध तथा ऊर्मिला आदिके द्वारा सुवर्ण-पात्रोंमें सुरुचिसे ही सबपरोसे परोसते हुए वसिष्ठजीके अनेक मुनियों, मित्रों, मन्त्रियों एवं बन्धु-बान्धवोंके साथ खाते हुए रामचन्द्रजी बहुत प्रसन्न हुए। भोजन करते समय सीताजी पंखा झलती हुई द्रौपदीजल बिन प्रसन्न करनेवाली कितनी