भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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२७४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ५

गृहांगणागममध्ये संस्थितां सस्मिताननाम् । दृष्ट्वात्मानं विसृजन्तीं सुतं मां चारुलोचनाम् । ३५। कटाक्षांश्च पडयन्तीं सखीभिः परिवेष्टिताम् । तां दृष्ट्वा गण्डवस्त्रापि किञ्चित् कृत्वा स्मिताननम् । ३६॥ चक्राताचमनं सम्यक् सीतापर्पितजलेन सः । ततः स्निग्धाऽऽसने पीत्वा जलमने ययौ पुनः । ३७ । जलपन्त्रगृहं पश्या झालां संख्यासमन्वितः । तस्यां सिंहासने स्थित्वा लक्ष्मणं प्राह राघवः ॥३८॥ गच्छ भोजनशालां त्वं सर्वानह्वय वेगतः । ब्राह्मणादीन्नृपँश्चित्रवर्गीयां स्वयमत्र हि ॥३९॥ सर्वं कृत्वा यथायोग्यं ततो मां कुरु मूरनाम् । तथेति राघवेनाज्ञास्तेन स शत्रुहा । ४०॥ लक्ष्मणस्त्वरितो गत्वा सर्वनाहूय वेगतः । वसिष्ठ दिनमुनीन्मित्रमंत्रिणः सुहृदस्तथा ॥ ४१॥ त्वय्यामासोर्मिलां च मांडवीं भरतप्रियाम् । श्रुतकीर्ति च सौमित्रि श्रीरामवचनात्तदा । ४२॥ एतस्मिन्नन्तरे रामः केसरादिर्विनांमतेः । चित्ररंगैः पूरितानि जलयन्त्रान्यनेकशः ॥४३॥ कारयित्वा तेषु सीतां बाहुपार्श्वदृढं मुदा । धृत्वाऽक्षिपत्तृपङ्कवत्यादिषु पदन्मुवैमुहुः ॥४४॥ ततः स्वयं पपातोर्ध्वर्जलगेषु वै पृथक् । जलक्रीडां स मैथिल्या चकार रघुनन्दनः ॥ ४५॥ भुजाभ्यां म ममालिग्य तां मुहुः प्राक्षिपन्मुदा । रञ्जवाद्यम वैदर्दी सुगन्धाञ्जलिसञ्चनैः ॥४६॥ ततः सुगन्धतैलानि तथा परिमलानि हि । नानामुगन्धद्रव्याणि मङ्गल्यानि बहूनि च ॥४७॥ दासीभिः प्रोद्यमानीय तानुभौ हि परस्परम् । वर्पयतुः सुगंधैश्च काह्लाद्यैर्व्यमनोरमैः ॥४८॥ कराभ्यां जलपंत्राणि मिथस्तो मधुमानतुः । रामाऽक्षिमत्तया दास्यः संतास्तलयोऽपि सूचिताः । ४९॥ बस्त्रमिश्रिवहिदूरं गत्वा तस्थुर्बिलज्जिताः । काश्चिदुद्दारैषु तस्थुस्ताम्बूलीं प्रमुदिताननाः ॥५०॥ अदृष्ट्वाऽथ नराः सीताराभौ रहसि सादरम् । जलपन्त्रेषु तौ क्रीडां चक्रतुः सुचिरं मुदा ॥५१॥ मुष्टिभ्यां जानकी राम ताडयामास कौतुकात् साश्चेप तां ताडयामास मुष्ट्या पुष्पमयात्तथा । ५२॥

रामजी धीरे धीरे सीताजी की ओर चले, जा पहले ही से उस गरुड़ा रामचन्द्रजक बालको प्रशक्षा कर रही थी। जिसका मस्तक रामको देखकर लज्जा से झुक चुका था, वे सीता गृहाङ्गणके बने उस खंभे बैठी थीं। मुसकराता हुआ उनका मुख था। रामचन्द्रजीने देखा कि, इन दासीओ और सुडौल नामिवाळ की सीम हम देखकर लज्जा रही है। उनके चारों ओर सखीयां घेरा खड़ा है और यह रहकर माता अपना कटाक्षावाण हमपर दबाती आता है। इस प्रकारकी चालाकी देखकर रामचन्द्रजी मुसकाने हुए उनके पास पहुचे और सीता के हाथसे प्राप्त जलको लेकर आचमन किया। फिर आसनपर बैठ, उस दिशा ओर सखीके साथ उस बंगलाकी तरफ चले, जो फोवराक बीचम बना हुआ था। वहाँ पहुंचकर राम एक दिव्य सिहासनपर बैठे ओर लक्ष्मणसे कहने लगे-, ३४-३७ ॥ हे लक्ष्मण तुम भोजनशाला जाओ ओर सत्र ब्राह्मण तथा सितादिक क्षत्रियोंसे कहो कि जल्दी भोजन तैय्यार करे जैसा मैने बतलाया है, वैसा कराकर बाद फिर हम सूचना दा । 'बहुत अच्छा' कह-कर लक्ष्मण शत्रुघ्न तथा भरतका साथ लेकर भोजनशाला पहुचे, वह वशिष्ठादि मुनियों, मन्त्रियों तथा मित्राको बुलाकर शीघ्र तैयार होनेको कहा ॥ ३८-४१ ॥ तदनन्तर लक्ष्मण मांडवी, श्रुतकीर्ति, उर्मिला आदिको रामचन्द्रजीके अनुसार वहापर दिया कि तुम शीघ्र ही भोजनका तथ्यारा कराओ ॥४२॥ इसके अनन्तर रामचन्द्रजीने कमसर आदि नानाप्रकारके जलसे भरे हुए अनेक कूपोंके भीतर सुन्दरीको गोदमे लेकर फक दिया सखी जिसको फुहारे के पानी से मुँह धोया था ॥ ४३,४४ ॥ इसके अनन्तर वे ऊपरका रास्ता ढूढ़कर और सीताके साथ जलक्रीड़ा करने लगे। सीताजीके शरीर पर बार बार जल उड़ा उड़ाकर जलमे फेंकते, फिर स्वयं फूल और सीता-पर जल उछालते थे। तदनन्तर सुगन्धित तेल, सुगन्धित तैल तथा विविध प्रकारके परिमल मँगाकर जलममं एक दूसरेपर डालते लगे। वे हाथमें पिचकारी लेकर एक दूसरेका मजा ले रहे थे मिले हुए जलकी वर्षा करते थे। ४५-४८॥ रामचन्द्रजीके संकेतसे सखियां लज्जाके मारे बहाँसे हट गयी और दूसरी जगह जा बैठी उनमें से कुछ स्त्रियां प्रसन्नतापूर्वक ताम्बूल धरे हुए उनके फाटकपर जा बैठी इस प्रकार एकान्तम सीताके साथ राम-चन्द्रजी बहुत देरतक क्रीड़ा करन रहे ॥५०। ५१ । कभी खेल खेलमे सीताजी रामचन्द्रक। मुक्का मार देती थीं,