भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 289

सर्गः ५ ] विलासकाण्डम् २७३


हेमतन्तुमपुष्पाढ्यां मुक्ताजाल बगुम्फिताम् । गेहान्तर्वर्त्युपवनशालायां संस्थिताऽभवत् ॥१७॥
सखीभिर्वेष्टिता रम्या धृतऽधौतोत्तरीयेणा ततो दिव्यामलङ्कारामिजदेहे दधार सा ॥१८॥
ये मया कथिता नैव पूर्वन्त्येस्तान् क्रमेणतान्। करोतुं वर्णने शक्तो भवेदत्र नरोत्तमः ।१९।।
चतुर्रास्यः कुण्ठितोऽभूत्पञ्चास्यश्च षडाननः । ऊर्ध्वःश्रवाश्च सम्प्राप्यः सहस्रास्योऽपि वर्णने ॥२०॥
श्रुत्वा सीतामुपवने गतां ते जल्यन्त्रिणः । जल्यन्त्राणि सर्वाणि चतुर्मुक्तानि वेगतः ॥२१॥
रत्नमञ्चकसंस्था सा सीता चामरचीजिता। जल्यन्त्रकौतुकानि ददर्श नगरीरुहः ॥२२॥
एतस्मिन्नन्तरे रामो राजकार्याणि कृत्स्नशः । कृत्वा ययौ समाशः स निजगृहं तु बन्धुभिः ॥२३॥
तदा दुन्दुभिनिर्घोषा नववाद्यस्वना अपि। शङ्खानां गोमुखानां च भेरीणां तुमुलस्वनाः ॥२४॥
बभूवुर्वंश वृन्दाश्च तूरादीनां स्वनाः शुभाः । ननृतुर्नारनायैव तुष्टुवुर्मगधादयः ।।२५।।
तं स्वनं जानकी चापि श्रुन्वा चोपवने स्थिता । सम्भ्रमेण समुत्तीयं मञ्चकाद्यो वरानना ।।२६।।
वामहस्ते समा री तां धूपपात्रं च दक्षिण । धृन्वा करे सा वैदेही रामं प्रत्युज्जगाम वै ॥२७॥
एतस्मिन्नंतरे रामस्त्यक्त्वारूढां शिबिकां बहिः । विसृज्य सकलाँल्लोकान् विवेश बन्धुभिर्गृहं ॥२८॥
एतस्मिन्नन्तरे दास्यः शतशो रत्नभूषिताः । गृध्ररात्रे द्रुतुमुत्ना स्वस्वकर्मसु तत्पराः ॥२९॥
काचित् व्यजनेनैव वीजयामास वेगतः । दधार चामरं काचित्काचिदासनमुत्तमम् ॥३०॥
काचित् फलपात्रं सा काचिन्निष्ठीवन्तस्य च । पात्रं दधार काचित्तु जलकुम्भं मनोरमम् ॥३१॥
काचिद्दधार वस्त्राणां कोशं काचित्तु कार्मुकम् । काचिद्दधार तूणीरं काचिन्खङ्गं दधार सा ॥३२॥
एवमादीन्यनेकानि तदोपकरणानि ताः । जगृहु रामचन्द्रं तं वेष्टयामासुरादरात् ।।३३।।
ततो रामः सुनैःपद्मयां ययौ जनकनन्दिनीम् । स्थितां तत्र प्रतीक्षन्तीं पतिं जलरुहेक्षणम् ॥३४॥


तारोंसे जगह जगह बेल-बूटे बने थे, उसे पहिना और सबके साथ भवनके भीतर ही बने हुए उपवनमें जाकर बैठो ॥ १५-१७ ॥ वहाँ सखियोंने उन्हें चारों ओरसे घेर लिया और सीताने विविध प्रकारके आभूषण पहने ॥ १८ ॥ जिन षोडश संस्कारोंको मैं बडे परिश्रमके साथ लिखकर पहले कह आया हूँ, उन यहाँ पूर्णरूपसे वर्णन करनेमें कौन श्रेष्ठ पुरुष समर्थ होगा ॥ १९ ॥ सीताकी उस अलौकिक शोभाका वर्णन करनेमें चतुरानन ब्रह्मा, पञ्चवक्त्र शिव, षडानन स्वामिकार्त्तिकेय, गान सुखवाले ऊर्ध्वःश्रवा और हजार मुखवाले शेषनागके भी बुद्धि कुण्ठित हो गया ॥ २० ॥ जलयन्त्रके अधिकारियोंने जब सुना कि माताजी उपवनमें आ गयी हैं, तब उन्होने सब फौवारोंको बड़े वेगके साथ छोड़ दिया ॥ २१ ॥ तदनन्तर मणिकी बनी हुई चौकीपर बैठकर सीता फौवारोंके कौतुक तथा वृक्षोंकी शोभा देखने लगीं और दासियाँ मस्तक ऊपर चँवर डुलाने लगीं ॥२२॥ इतनेमें रामचन्द्र भी राज्यसम्बन्धी सब काम करके पाषर्दोंके साथ अपने भवनमें आये ॥ २३ ॥ उस समय दुन्दुभीके शब्द, नवीन बाजोकी ध्वनि और शङ्ख, गोमुख, भेरी आदिका घनघोर शब्द होने लगा ॥ २४ ॥ विविध वाद्ययन्त्रोंके शब्द और तुम्बी आदिकी ध्वनि सुनाई देने लगी, वेश्याएं नाचने लगीं और बन्दीजन महाराजकी स्तुति करने लगे ॥ २५ ॥ उन बाजोंके स्वर सुनकर सीता भी घबड़ाहटके साथ चौकीपरसे उतरकर बांये हाथमें तारी तथा एक अर्घपात्र लेकर रामकी ओर चलीं ॥ २६ ॥ २७ ॥ हेवतक रामचन्द्रजी भी पालकीसे उतरे और सब लोगोंको बिदा करके भ्राताओरु साथ घरके भीतर गये ।। २८ ।। इतनेमें विविध प्रकारके अलङ्कारोंको पहने हुए सैकड़ों दासियाँ अपना अपना काम करनेके लिये दौड़ पड़ीं ॥ २९ ॥ कोई भगवान्को पंखा झलने लगी, किसी ने चमर ले लिया। कोई आसन बिछाने लगी। किंचित् पानदान किसीने उग़ालदान किसीने सुन्दर जलपात्र और किसीने कपड़े रखनेकी पेटी सम्हाल ली । एकों दासीने रामजीका धनुष ले लिया । किसीने तरकस लिया और किसीने तलवार ले ली ॥३०-३२॥ इस तरह रामकी सब वस्तुओंको सब दासियोंने चारों ओरसे घेरकर सम्हाल लिया ॥ ३३ ॥ इसके बाद