भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 288

२७२ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ५

पञ्चमः सर्गः

( रामसीताका जलविहार )

श्रीरामदास उवाच

अथ सीता क्षणेनैव चकार परिवेषणम् । हेमपात्रेषु सर्वेषां पक्वान्नैर्विविधैर्मुदा ॥ १ ॥
कामधेनुदुग्धैश्च मण्डकान् पूर्णपूरितान् । वटकान्फेनिकांश्चापि पायसान्युज्ज्वलानि च ॥ २ ॥
पर्पटकान् लड्डुकांश्च कूष्माण्डवटकांस्तथा । घृष्टपर्पटदुग्धान्नं दधिक्षीरं घृतं मधु ॥ ३ ॥
पृथक्कांञ्चनद्रोण्यां जानकी पर्यवेषयत् । शर्कराः श्वेतवर्णाश्च तथैव गुडशर्कराः ॥ ४ ॥
मरिचायुपनागैश्च संस्कृतं तक्रमुत्तमम् । घृतपक्वविविधशाकांश्च सुस्वादूंश्च क्वचित्कदाः ॥ ५ ॥
तिलसम्मिश्रवटकानाद्रकं बीजपूरकम् । आम्रादीनां रसांश्चापि रम्भादीनि फलान्यपि ॥ ६ ॥
एवमादीन्यनेकानि चोष्याणि विविधानि च । तथा लेह्यानि पेयानि जानकी पर्यवेषयत् ॥ ७ ॥
ततो रामः सहमित्रैः कथां कुर्वन् सुखेन सः । अकरोदुपहारं च करशुद्धिं विधाय सः ॥ ८ ॥
सर्वेषां निजहस्तेन ददौ तांबूलमुत्तमम् । स्वयं भुक्त्वाऽथ ताम्बूलं वाससि परिधाय सः ॥ ९ ॥
बध्वा शस्त्राणि सर्वाणि दृष्ट्वाऽऽदर्शं निजं मुखम् । आरुह्य शिविकां दिव्यां मुक्तागुच्छविराजिताम् ॥ १० ॥
हैमीं रत्नादिमिश्रितां ययौ निजगृहाद्वहिः । वन्धुभिः सचिवैर्हस्त्यश्वैस्तैः सर्वत्र वेष्टितः ॥ ११ ॥
स्तुतो वन्दिजनैः सर्वैर्ययौ स जानकीगृहम् । तत्र नत्वाऽथ कौसल्यां तथा मान्यार्यथाक्रमम् ॥ १२ ॥
आशीर्भिरभिनन्दितास्ताभिर्ययौ रामः सभां वरम् । तत्र सिंहासने स्थित्वा मन्त्रिभिर्लक्ष्मणादिभिः ॥ १३ ॥
राजकार्याणि सर्वाणि चकार नीतिमान्नरः । शशास राज्यं धर्मेण बुद्धिमांश्चारुलोचनः ॥ १४ ॥
चारैर्ज्ञात्वा स्थितिं सर्वो स्वगणस्य च सर्वथा । शशास राज्यं धर्मेण राघवो दीर्घलोचनः ॥ १५ ॥
अथ सीतोपहारं स्वसखीभिश्चोर्मिलादिभिः । देवरणां कामिनीभिः स्वसृभिश्चाकरोत्सुखम् ॥ १६ ॥
करशुद्धिं विधायाथ भुक्त्वा ताम्बूलमुत्तमम् । परिधाय हरिद्वस्त्रं तथा रक्तं तु कञ्चुकम् ॥ १७ ॥


श्री रामदासने कहा—हे शिष्य ! इसके अनन्तर सीताने क्षण भरमें सबोंके अर्थ रक्खे हुए सुवर्णके पात्रोंमें विविध प्रकारके पक्वान्न परोसे । वे पक्वान्न कामधेनुके दुग्ध उत्पन्न किये हुए थे। उत्तम मण्डक, पूरनपूरी, वटक फेन, टम्पुका दनी खीर आदि, पापड़, लट्टू, कूष्माण्डाप, निम्बूड़ा, दही, दूध घी, शहद आदिकोंको जानकीजीने अलग-अलग स्वर्णनिर्मित पात्रोंमें परोसा ॥ १-३ ॥ सफेद शक्कर, लाल शक्कर, जीरा मिर्चे आदि मसाला डालकर बना हुआ रायता, घृत छोड़ हुए नाना प्रकारके शाक, चटनी तिलकी बना हुई टिकिया, मूला बात्रापूरक, अमरक रस, कन्द आदिक फल, इसी प्रकार चूसने लायक तरह-तरहके अचार, चाटने लायक कितनी ही तरहकी चटनी और पीने लायक तन्मई आदि वस्त्रभोजोंको माताजीने परोसा ॥ ४-७ ॥ इसके बाद रामचन्द्रजीने मित्रोंके साथ बातचीत करते हुए भोजन किया और हाथ धोकर सबका अपने हाथसे पान दिया। फिर स्वयं भी पान खाया और कपड़े बदले ॥ ८-९ ॥ इसके बाद सब प्रकारके अस्त्र-शस्त्र बाँधकर आदर्शमे मुख देखा और मणियोंके गुच्छामें सजाई हुई पालकीपर सवार होकर घरसे बाहर निकले । बान्धव, मन्त्री मित्र तथा दूत, वे सब चारों ओरसे रामचन्द्रजीको घेरे हुए थे ॥ १०-११ ॥ वंदीजन गच्छी भावावली स्तुति करते चलत थे। इस तरह सबको अपने साथ लिये हुए वे माताके भवनमें न पहुंचे, वहाँ माता कौसल्या तथा अन्य माताओंको प्रणाम करके उनसे आशीर्वाद लिय और उन माताओं का भी साथ लिये हुए सभामवन पहुंचे । वही मन्त्रियों तथा लक्ष्मणादिक भ्राताओंके साथ सिंहासनपर बैठे ॥ १२ ॥ १३ ॥ वहाँपर राज्यसम्बन्धी समस्त कार्योंको खूब अच्छी तरह सोच-विचारकर किया । रामचन्द्रजी गुप्तचरों द्वारा आने राज्यके सब समाचार मालूम करके धर्मपूर्वक शासन करते थे ॥ १४ ॥ उधर सीताजीने भी अपनी देवरानियो बहिनों तथा सखियोंके साथ भोजन किया, हाथ धोया और ताम्बूलका उत्तम बीड़ा खाया । हरे रंगकी साड़ी तथा लाल रङ्गकी चाली जिसमें सुवर्णके