श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 300, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें२८४ आनन्दरामायणे [ सर्ग ८
ततो गुणवती श्रुत्वा राक्षसा निहतावुभौ । पितृभर्तृजुगुप्साती निललाप भृशातुर ।१२।
सा गृहात्स्फारान्धंनन्विक्रीय शुभकर्मकृत् । व्ययोश्चक्रे यथाशक्ति परलोकक्रियां तदा ।१३।
तस्मिन्नेव पुरे वास चक्रे प्रसूनजीविनी । विष्णुपक्तिरता शान्ता सत्यशौचा जितेन्द्रिया ।१४।
व्रतान्येक नया सम्यगानन्दमरणान्वितम् । एकादशीव्रत सम्यक् सेवन कात्तिकस्य च ।१५।
माघे चत्रे माघवेश्चि स्नानानि प्रतिवत्सरम् । संमार्जन विष्णगेहे स्वस्तिकादिनिवेशनम् ।१६।
नित्यं विष्णो पूजन च भक्त्या तन्परमानसा । इत्थं व्रताष्टक सम्यक सा चकाराविभक्तितः ।१७।
एकदा सा गुणवती पौराणिकमुखेन हि । श्रुत्वा महत्फलं शिष्य साकेते सरयू जले ।१८।
चैत्रस्नानस्य कैवल्यदायक जनसंयुता ययो श्रीरामसगरी रामतीर्थऽवमज्जुमा ॥१९॥
म॑रुदा शयनं द्रष्टुं सरयूसैकतस्थितम् । वासोगेहे रहः पन्त्या ययौ वेशुममनिन्तम् ॥२०॥
पूजापात्राणि हस्ताभ्यां बिभ्रती द्वारमध्यगा । प्रतीहारेण रामाय वेदिता सा विवेश ह ॥२१॥
वासोगेहे ददर्शाय सीतया रघुनायकम्, स्नन्मंचकमलग्रं घृतार्थीकोपवर्धनम् ।२२।
क्रीडन्तं सारिभिः साश्चेः सीतया लक्ष्मणेन च । कैकेयीतनयाभ्यां च सखीभिः परिवारितम् ।२३।
मयूरपिच्छसम्भूतचामरैः परिवारितम् । रत्नचित्रितकमडरे नूपूरे पदयोर्बरे ॥२४॥
विभ्रन्तं रशनां कट्यां रत्नरुम्मविभूषिताम् । रत्नरुक्ममयं दिव्यकङ्कण कायोर्वरे ॥२५॥
विभ्रन्तं भुजयोर्दिव्यकेयूरे रत्नमूर्पिते । कण्ठदेशे हौस्तुभ च हृदि चिन्तामणिं शुभम् । २६॥
विभ्रन्तं विविधान्हारान् रत्नमाणिक्यनिर्मितान् । नयाजल रुष जांश्च मुक्ताहारान् विचित्रितान् २७॥
ये दानो वैकुण्ठभुवनमे रहने लगे उन्हें विमानकी सवारी मिलती थी और सूर्यके समान उनका तेज था। विष्णुके समान उनका रूप था और उनके शरीरमें दिव्य चन्दन लगा रहता था ॥ ११ ॥ इसके पश्चात् जब गुणवतीने सुना कि मेरे पिता और पति दोनों किसी राक्षस द्वारा मार डाले गये हैं। तब उसे अतिशय दुःख हुआ और वह विलाप करने लगी ॥ १२ ॥ फिर घरमें जो कुछ माल-मताह था, सब बेच डाला और अपनी शक्तिके अनुसार उनका पारलौकिकी क्रिया कराया। तवसे वह पुष्प बेंचकर खाती हुई उसी नगरमें रहकर अपना जीवन बिताने लगा। गुणवती विष्णुकी भक्ति करती हुई सत्य-शौच जितेन्द्रियतादि गुणोंसे पूर्ण हो गयी ॥ १३ । १४ ॥ उसने अपने जीवन भरमें केवल आठ व्रत किये थे। वह एकादशी व्रत, कात्तिकका सेवन मार्गशीर्ष, चैत्र तथा माघमें प्रतिवर्ष स्नान किया करता थी। वह विष्णुके मन्दिरमें बुहारी देती तथा स्वस्तिकादि रचती थी ॥ १५ ॥ १६ ॥ भक्तिसे और सावधान हृदयसे वह नित्य विष्णुका पूजन करती थी। इस तरह इन आठों व्रतोंको श्रद्धासमेत करती रही। हे शिष्य ! एक दिन उसने एक पौराणिकसे सुना कि चैत्रमासमें अयोध्याके सरयूजलका बडा माहात्म्य है और चैत्रमासमें तों वहाँ स्नान करनेसे महज ही में मुक्ति मिल जाती है। यह सुनकर बहुतसे आदमियोंको साथ लेकर गुणवती चैत्रस्नानके लिए अयोध्या आयो और उसी पावन नगरोमें टिक गयी । १७-१९ ॥ एक दिन गुणवती जहाँ सरयूकी रेतीमें रामचन्द्रजी डेरा डाले हुए थे, वहाँ जा पहुँचा। उस समय रामचन्द्रजी पटगृहके किसी एकान्त कमरेमें लक्ष्मण और सीताके साथ बैठे थे फाण्कपर पहुंचकर गुणवतीने प्रतीहारी द्वारा सन्देशा भेजा और स्वयं पूजापात्र हाथमें लिये बाहर ही खड़ी रहा। प्रतीहारीके लौटनेपर वह अन्दर गयी ॥ २० ॥ २१ ॥ वहाँ पहुंचकर उसने देखा कि रामचन्द्र सीताके साथ रत्नजटित मञ्चपर बैठे थे और तकिया लगी थी ॥ २२ ॥ भगवान् राम सीता, लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न मारिका और पांसेके साथ खेल रहे थे सखियाँ चारों ओरसे घेरकर खड़ी थीं । २३ । मयूरके पङ्खनांके बने हुए पंखे चल रहे थे। उनके दोनों पाँवोंमें रत्नजटित नूपुर और कमरमें रत्नजटित मेखला पड़ी थी । दोनों हाथोंमें जड़ाऊ कंकण पड़े थे । २४ ॥ २५ ॥ हाथोंमें सुवर्णके रत्नपूरित दिव्य केयूर थे । कंठमे कौस्तुभमणि तथा हृदयमे चिन्तामणि था । राधे विविध रत्नोंके जड़ाऊ हार पहन थे। सुनहले तथा चित्र विचित्र मोतियोंके हार उनके गलेमें पड़े थे ॥ २६ । २७ ॥