श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
२८४ आनन्दरामायणे [ सर्ग ८
ततो गुणवती श्रुत्वा राक्षसा निहतावुभौ । पितृभर्तृजुगुप्साती निललाप भृशातुर ।१२।
सा गृहात्स्फारान्धंनन्विक्रीय शुभकर्मकृत् । व्ययोश्चक्रे यथाशक्ति परलोकक्रियां तदा ।१३।
तस्मिन्नेव पुरे वास चक्रे प्रसूनजीविनी । विष्णुपक्तिरता शान्ता सत्यशौचा जितेन्द्रिया ।१४।
व्रतान्येक नया सम्यगानन्दमरणान्वितम् । एकादशीव्रत सम्यक् सेवन कात्तिकस्य च ।१५।
माघे चत्रे माघवेश्चि स्नानानि प्रतिवत्सरम् । संमार्जन विष्णगेहे स्वस्तिकादिनिवेशनम् ।१६।
नित्यं विष्णो पूजन च भक्त्या तन्परमानसा । इत्थं व्रताष्टक सम्यक सा चकाराविभक्तितः ।१७।
एकदा सा गुणवती पौराणिकमुखेन हि । श्रुत्वा महत्फलं शिष्य साकेते सरयू जले ।१८।
चैत्रस्नानस्य कैवल्यदायक जनसंयुता ययो श्रीरामसगरी रामतीर्थऽवमज्जुमा ॥१९॥
म॑रुदा शयनं द्रष्टुं सरयूसैकतस्थितम् । वासोगेहे रहः पन्त्या ययौ वेशुममनिन्तम् ॥२०॥
पूजापात्राणि हस्ताभ्यां बिभ्रती द्वारमध्यगा । प्रतीहारेण रामाय वेदिता सा विवेश ह ॥२१॥
वासोगेहे ददर्शाय सीतया रघुनायकम्, स्नन्मंचकमलग्रं घृतार्थीकोपवर्धनम् ।२२।
क्रीडन्तं सारिभिः साश्चेः सीतया लक्ष्मणेन च । कैकेयीतनयाभ्यां च सखीभिः परिवारितम् ।२३।
मयूरपिच्छसम्भूतचामरैः परिवारितम् । रत्नचित्रितकमडरे नूपूरे पदयोर्बरे ॥२४॥
विभ्रन्तं रशनां कट्यां रत्नरुम्मविभूषिताम् । रत्नरुक्ममयं दिव्यकङ्कण कायोर्वरे ॥२५॥
विभ्रन्तं भुजयोर्दिव्यकेयूरे रत्नमूर्पिते । कण्ठदेशे हौस्तुभ च हृदि चिन्तामणिं शुभम् । २६॥
विभ्रन्तं विविधान्हारान् रत्नमाणिक्यनिर्मितान् । नयाजल रुष जांश्च मुक्ताहारान् विचित्रितान् २७॥
ये दानो वैकुण्ठभुवनमे रहने लगे उन्हें विमानकी सवारी मिलती थी और सूर्यके समान उनका तेज था। विष्णुके समान उनका रूप था और उनके शरीरमें दिव्य चन्दन लगा रहता था ॥ ११ ॥ इसके पश्चात् जब गुणवतीने सुना कि मेरे पिता और पति दोनों किसी राक्षस द्वारा मार डाले गये हैं। तब उसे अतिशय दुःख हुआ और वह विलाप करने लगी ॥ १२ ॥ फिर घरमें जो कुछ माल-मताह था, सब बेच डाला और अपनी शक्तिके अनुसार उनका पारलौकिकी क्रिया कराया। तवसे वह पुष्प बेंचकर खाती हुई उसी नगरमें रहकर अपना जीवन बिताने लगा। गुणवती विष्णुकी भक्ति करती हुई सत्य-शौच जितेन्द्रियतादि गुणोंसे पूर्ण हो गयी ॥ १३ । १४ ॥ उसने अपने जीवन भरमें केवल आठ व्रत किये थे। वह एकादशी व्रत, कात्तिकका सेवन मार्गशीर्ष, चैत्र तथा माघमें प्रतिवर्ष स्नान किया करता थी। वह विष्णुके मन्दिरमें बुहारी देती तथा स्वस्तिकादि रचती थी ॥ १५ ॥ १६ ॥ भक्तिसे और सावधान हृदयसे वह नित्य विष्णुका पूजन करती थी। इस तरह इन आठों व्रतोंको श्रद्धासमेत करती रही। हे शिष्य ! एक दिन उसने एक पौराणिकसे सुना कि चैत्रमासमें अयोध्याके सरयूजलका बडा माहात्म्य है और चैत्रमासमें तों वहाँ स्नान करनेसे महज ही में मुक्ति मिल जाती है। यह सुनकर बहुतसे आदमियोंको साथ लेकर गुणवती चैत्रस्नानके लिए अयोध्या आयो और उसी पावन नगरोमें टिक गयी । १७-१९ ॥ एक दिन गुणवती जहाँ सरयूकी रेतीमें रामचन्द्रजी डेरा डाले हुए थे, वहाँ जा पहुँचा। उस समय रामचन्द्रजी पटगृहके किसी एकान्त कमरेमें लक्ष्मण और सीताके साथ बैठे थे फाण्कपर पहुंचकर गुणवतीने प्रतीहारी द्वारा सन्देशा भेजा और स्वयं पूजापात्र हाथमें लिये बाहर ही खड़ी रहा। प्रतीहारीके लौटनेपर वह अन्दर गयी ॥ २० ॥ २१ ॥ वहाँ पहुंचकर उसने देखा कि रामचन्द्र सीताके साथ रत्नजटित मञ्चपर बैठे थे और तकिया लगी थी ॥ २२ ॥ भगवान् राम सीता, लक्ष्मण, भरत तथा शत्रुघ्न मारिका और पांसेके साथ खेल रहे थे सखियाँ चारों ओरसे घेरकर खड़ी थीं । २३ । मयूरके पङ्खनांके बने हुए पंखे चल रहे थे। उनके दोनों पाँवोंमें रत्नजटित नूपुर और कमरमें रत्नजटित मेखला पड़ी थी । दोनों हाथोंमें जड़ाऊ कंकण पड़े थे । २४ ॥ २५ ॥ हाथोंमें सुवर्णके रत्नपूरित दिव्य केयूर थे । कंठमे कौस्तुभमणि तथा हृदयमे चिन्तामणि था । राधे विविध रत्नोंके जड़ाऊ हार पहन थे। सुनहले तथा चित्र विचित्र मोतियोंके हार उनके गलेमें पड़े थे ॥ २६ । २७ ॥
सर्गः ८ ] विलासकाण्डम् २८५
सर्गः ८ ] विलासकाण्डम् २८५
तुलसीकाष्ठहारैश्च पुष्पहारैरनेकधाः। प्रवालमणिकण्ठाग्रैर्मुक्ताः काञ्चनोद्भवाः ॥२८॥ पदकानि विचित्राणि रत्नमिश्रितयन्त्रितैः। रमाशङ्खात्मदाकारै रत्नरूपविचित्रितान् ॥२९॥ रत्नमाणिक्यसंयुक्तमुकुटैर्निनिषेवितान् । शेषमण्डलमध्यस्थान् प्रतापांश्चेतनावान् च ॥३०॥ अङ्गुलीष्वपि बिभ्रन्तं हस्तयोर्मुद्रिकाः शुभाः। मध्यमण्डलयुक्तांश्च विचित्रा रत्नकैरन्विताः ॥३१॥ रामनामाङ्किताश्चापि पत्रिका उज्ज्वला अपि। सम्मुक्तेहाहेममये कर्णयोः कुण्डले वरे ॥३२॥ बिभ्रन्तं मकुटाग्रस्थानलङ्काराननेकधाः। बिभ्रन्तं मौलिवाऽऽडम्बरं मुकुटं रविविचित्रितम् ॥३३॥ नानामणिममायुक्तं कलशैरपि शोभितम्। मुक्ताप्रवालवैदूर्ययुतं हेममयं वरम् ॥३४॥ एवं गुणवती रामं कोटिसूर्यसमप्रभम्। हेमवर्णं महारम्यं कंजपत्रायतेक्षणम् ॥३५॥ सौमाननं कंजहस्तं दृष्ट्वा तं प्रणनाम सा। तं समुत्थाप्य राघवस्तु सम्यक् सम्पूजितः ॥३६॥ वहुतैरुपहारार्यैः सुप्रीतस्त्वाह राघवः। वरं दत्तं मया तुभ्यं यत्ते मनसि वर्तते ॥३७॥ इति रामवचः श्रुत्वा सा तुष्टा राममब्रवीत्। राम राजीवपत्राक्ष यथेमास्ते सहस्रशः ॥३८॥ दास्यः सन्ति तथा मां त्वमङ्गीकर्तुमर्हसि। इति तद्वचनं श्रुत्वा राघवः प्राह संस्मितः ॥३९॥ कथं त्वं ब्राह्मणी चेत्थं वदस्यद्य शुभानने। मन्मंत्रां कृतमुल्लासात्सन तां नहि वदाम्यहम् ॥४०॥ शृणुष्व त्वं गुणवति कृष्णरूपधरो ह्यहम्। द्वापरे द्वारकायां हि भविष्याम्यन्यजन्मनि ॥४१॥ भजिष्यसि तदा मां त्वं स्त्रीरूपेण न संशयः। सत्राजितो देवशर्मा ते भविष्यति पिता पुनः ॥४२॥ यश्चन्द्रनामा सोऽक्रूरो भविष्यति सखा मम। सत्यभामेति नाम्ना त्वं भविष्यसि प्रिया मम ॥४३॥ तदा कुरुष्व दास्यं मे यत्ते मनसि वर्तते। इति रामवचः श्रुत्वा तुष्टा गुणवती मुहुः ॥४४॥ नत्वा श्रीराघवं सीतां ययौ सा स्वगृहं प्रति। धेरुस्नानानन्तरं सा हरिद्रान्नं ददौ जने ॥४५॥
वे तुलसीके काठकी माला, पुष्पोंकी माला, प्रवाल और मणिकी बनी माला पहने हुए थे। गलेमें विचित्र प्रकारके पदक पड़े थे, जिनमें रत्न और पवित्र... काम किया हुआ था। पद्म, शङ्ख तथा कमलका सा ही उनका आकार था। उनमें जगह जगह रत्न और मणियोंसे जड़े हुए... रामनामपद लिखे हुए थे ॥ २८-३० ॥ दोनों हाथोंकी अँगुलियोंमें सुन्दर अँगूठियाँ पहन व वे भी रत्न तथा माणिक आदिसे जड़े हुए मानों लहलहाते हुए थे ॥ ३१ ॥ उनमें भी रामका नाम लिखा था और वे पत्रिकाओंसे युक्त थीं। रत्न तथा मुक्तासे जड़ित कुण्डल उनके कानोंमें झूल रहे थे। वे मुकुटमें... धारण किये थे ॥ ३२ ॥ ३३ ॥ मुकुटमें विविध प्रकारके जतीक जड़ेहुये होनेसे वह और भी सुन्दर लग रहा था। उसमें भी जगह-जगह मुक्ता-प्रवाल-वैदूर्य आदिका सुन्दर काम बना हुआ था ॥ ३४ ॥ इस तरह करोड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी तथा सुवर्णकी भाँति जिनका वर्ण था, कमलनयन समान जिनके नेत्र थे, चन्द्रमाके समान जिनका मुख था और कमलकी भाँति हाथ थे उन रामको गुणवतीने देखा और प्रणाम किया। रामचन्द्रने उसे उठाया और उसने विविध प्रकारके उपचारोंसे रामकी पूजा की ॥ ३५ । ३६ ॥ और भेंट दिये। जिससे राम अतिशय प्रसन्न होकर कहने लगे कि "तुम्हारी जो इच्छा हो सो वर माँग लो" ॥ ३७ ॥ इस प्रकार रामकी बात सुनकर वह बोली—हे राजीवपत्राक्ष राम ! जैसे आपकी ये हजार दासियाँ हैं, वैसे ही मुझे भी अपनी एक दासी बना लीजिए। इसका ऐसा वचन सुनकर मुस्कुराते हुए राम कहने लगे—॥ ३८ । ३९ ॥ तुम ब्राह्मणी होकर ऐसी अशुभ बात क्यों कह रही हो ? यदि तुम्हें मेरी सेवा करनेकी इच्छा है, तो मैं बताता हूँ ॥ ४० ॥ हे गुणवती ! सुनो, द्वापरयुग में कृष्णरूप धारण करके अवतार लूँगा । तब द्वारिकामें तुम मेरी स्त्री होकर इच्छानुसार मेरा सेवा करोगी। इसमें कुछ भी संशय नहीं है। उस समय देवशर्मा यादवधन् सत्राजित तुम्हारा पिता होगा, चन्द्र अक्रूरनामका मेरा प्रिय होगा और तुम सत्यभामा नामकी मेरी पटरानी होओगी
२८६ आनन्दरामायणे [ सर्गः ८
आयुःशेषं समाप्यैाथ गंगायां कृत्वर निजम् । मज्जन् स्नानसमये न्यञ्चन्त्या नाकं चिरं गता ॥४६॥ ततः कालान्तरेषामीत्सत्राजितनया भुवि । बभूव पत्नी कृष्णस्य द्वापरे द्वारकापुरि ॥४७॥ एकदा पिङ्गलानाम्नी वेश्या रात्रौ विनिद्रितम् । सीतया दिव्यपर्यङ्के ययौ सा राघवं रहः ॥४८॥ विहाय नूपुरादीनि स्वनवंति पदैः शनैः । इतस्ततो निरीक्षन्ती दिव्यवस्त्रैर्विभूषिता ॥४९॥ सीताभयात्प्रकंपन्ती कामबाणप्रपीडिता । मण्डिता पुष्पमालाद्यैर्भूषितातिशोभिता ॥५०॥ अज्ञाता द्वारपालैः सा निद्रितैर्मञ्चकं ययौ । स्वकरेण पदस्पर्शं कृत्वा रामं प्रबोधयत् ॥५१॥ तदा प्रबुद्धः श्रीरामस्तां ददर्श पुरःस्थिताम् । सा धृत्वा तत्पदे गाढं प्रार्थयामास राघवम् ॥५२॥ राम राजीवपत्राक्ष मया तेऽद्यापराधिनम् । त्वं क्षमस्व कृपां कृत्वा मयि चानुग्रहं कुरु ॥५३॥ तस्याश्च वचनं श्रुत्वा ज्ञात्वा तां कामपीडिताम् । तां समाश्वासितुं प्राह राघवः कञ्जलोचनाम् ॥५४॥ एकपत्नीव्रतं मेऽस्मिन्भवे त्वं वेत्सि पिंगले । अतस्त्वत्कामपूर्त्यर्थे वदामि तच्छृणुष्व हि ॥५५॥ यदाऽहं मधुरामध्ये व्रजाच्छ्रीकृष्णरूपधृक् । यास्याम मातुलं कंसं हन्ता स्थास्यामि तत्पुरेम् ॥५६॥ तदा भजिष्यसि त्वं मां कुब्जारूपेण पिंगले । गच्छ दास स्वरूपेण निजायुः क्षपयिष्यसि ॥५७॥ आयुःशेषे स्थिरं देहं विमृज्य बहुसुकरम् । इत्युक्त्वा पिंगलां गेहे ददावाज्ञां भयान्विताम् ॥५८॥ शिक्षयामास द्वारस्थान्दासीन्दासींर्विनिद्रिताः । ततः सीतां प्रबोध्यैाथ वेश्यावृत्तं न्यवेदयत् ॥५९॥ तच्छ्रुत्वा जानकी रुष्टा त्यक्त्वा पर्यङ्कमुत्तमम् । राघव प्राह सक्रोधा कथं नाहं प्रबोधिता ॥६०॥ सर्वदाऽत्र मया ज्ञातमेकपत्नीव्रतं सुधा । भृकुटीं पिंगलां नूनंमीर्ष्याच्छ्रोधिता त्वतः ॥६१॥
॥ ४१-४३। उस समय जैसी तुम्हारी इच्छा होगी वैसा मेरा सेवा कर लेना इस प्रकार रामकी बात सुनकर शूर्पणखा बहुत प्रसन्न हुई। ४४॥ यह रामचन्द्र तथा सीताको प्रणाम करके अपने डेरेपर लौट गयी इस प्रकार वह आठों आश्रम चरितार्थ करके अन्तमें शिवलोक साथ हरिद्वार चली गयी। वहाँपर उसकी जितनी आयु शेष थी, उस समाप्त करके एक दिन स्नान करनेको गङ्गा गयी और वहीं शरीर त्यागकर स्वर्गात्तारोहण चली गयी । ४५ । ४६ ।। जन्मान्तरम गुणवती सत्राजितकी पुत्री होकर जन्मी और कृष्णकी पत्नी बनकर द्वारकामे निवास करन लगी ॥ ४७॥ एक दिन पिङ्गला नामकी एक वेश्या रात्रिके समय रामचन्द्रके पास पहुंची। उस समय राम सीताके साथ एक दिव्य पलंगपर सो रहे थे। वह वहां गयी ॥ ४८ । नूपुरादि बालनेवाले आभूषणोंको पैरोंस उतारकर बहुसुन्दर कपडे पहने भयवश इधर उधर देखती जा रही थी। सीताके भयसे उसके अङ्ग अङ्ग काँप रहे थे और वह कामके बाणसे पीडित थी। उसने सुगन्धित फूलोंका माल्य तथा अनेक आभूषण पहिन रक्खा था जिससे वह बडा सुन्दरी मालूम पडती थी । ४९ ॥ ५० ॥ जिस समय द्वारपालगण निद्रित थे तब चुपकेसे भीतर चली आयी और रामचन्द्रके मंचके पास जा पहुँची। उसने हयत्न रामके पैर छूकर उन्ह जगाया ॥ ५१ । राम जाग गये और सामने उस पिंगला वेश्याको देखा, तब वह जागस रामके पैरोंको पकडकर प्रार्थना करने और कहने लगी—हे राम ! हे राजीवपत्र क्ष ! आज मैंने बडा भारी अपराध किया है। मेर ऊपर कृपा करके आप उसे क्षमा कर दें और मरेपर दया कर ॥ ५२ ॥ ५३ ॥ उसकी यह बात सुनकर रामन समझ लिया कि यह कामपीडित है। तब उस आश्वासन दनके लिए कहने लगे—। ५४ । हे पिंगले ! तुम जानती होगी कि इस जन्ममें मैं एकपत्नीव्रतधारी हूँ। अतएव तुम्हारी कामवासनाको शान्तिका जा उपाय बतलाता हूँ, उसे सावधान होकर सुनो । ५५ ।। जिस समय कृष्णअवतार में ब्रजस मधुरा जाऊँगा और कंसको म रकर उस पुरीमें ठहरूँगा तब हे पिंगले ! तुम कुब्जा के रूपमें मेरा सेवा करोगी। जाओ, मेरे आशीर्वादसे तुम इस शरीरको शेष आयु बिताकर कंसके यहीं दासी हाओगी क्या सीता के भयसे रामने केवल इतना कहकर उसे विदा कर दिया । ५६-५८ । तब उन्होंने द्वारपाला तथा दास दासी आदिकोंको जगाकर डाँटा-फटकारा और सीताको जगाकर उस वेश्याका समस्त वत्तान्त कह सुनाया । ५६ ॥ सो सुना तो काधित होकर जानकी शय्या छोडकर उठ खडी हुई और रामसे कहने लगी कि वह आयी थी, तब तुमने मुझे
सर्गः ८ ] विलासकाण्डम् २८७
त्वां विसृज्य चिरादद्य ज्ञातुं ते चरितं मया। मृषा त्वया प्रतिज्ञातं पुरा व्यासमुनेः पुरः ॥६२॥
एकपत्नीव्रतं मेऽस्ति कौसल्यापदवी सम। अन्याः स्त्रीति मृषा वाक्यं कत्थसे त्वं पुनः पुनः ॥६३॥
क्व गतं तद्वचस्तेऽद्य क्व गतं तद्व्रतं तव। अद्यैव जीवितं स्वीयं त्यजामि सरयूजले ॥६४॥
वेश्यायाः पृष्ठसंलग्नां शय्यां नाथ स्पृशाम्यहम्।
वैश्यासक्त स्वामिन न्यां दृष्ट्वा द्वेषो भवेन्मयि ॥६५॥
मृषायां मयि रुष्टश्च वेश्यासक्तस्य ते मदेन। वेश्यासक्तपवित्रस्य चिरं राज्यं न तिष्ठति। ६६॥
इत्युक्त्वा राघवं नत्वा देहत्यागसमुद्यता। ययौ वेगेन सरयूं वस्त्रगेहाद्विनिर्गता। ६७॥
गच्छन्तीं राघवो दृष्ट्वा मुक्तकच्छः प्रदुद्रुवे। संभ्रमाज्जानकीं धृत्वा भुजाभ्यां सैकतेऽस्थले ॥६८॥
अब्रवीन्मधुरं वाक्यं मा रुष त्वं विदेहजे। शृणुष्व वचनं मे त्वं दिव्यं ते प्रददाम्यहम् ॥६९॥
मयि ते शपथंश्च अन्यथो न भविष्यति। दुष्टं यत्पुनैरपि च तद्दिव्यं प्रददाम्यहम् ॥७०।
वद शीघ्रं जनकजे मा क्रोधं भज भामिनि। इति रामवचः श्रुत्वा जानकी प्राह राघवम् ॥७१॥
जानक्यवाच
राम ब्रूयामहे किं ते येन दिव्यं ददामि ते। अनलस्त्वन्मुखोद्भूतो नयने शशिभास्करौ ७२॥
वामस्ते जलधौ राम पृथ्वीयं विभृता त्वया। शेषस्त्वदल्पसंशाय लक्ष्मणस्त्वद्वपुषो बहिः। ७३।
शास्त्राणि त्वन्मुखाज्जातानि सर्वाण्यत्र न संशयः यद्यत्पश्यामि तन्मयं तव रूपं न संशयः। ७४॥
न दुघंटं ते दिव्यार्थं किंचित्पश्यामि राघव। किं ब्रूयामश्चुना नेद्य येन मे प्रत्ययो भवेत् ॥७५॥
एकमेवास्ति जानेऽहं अनुकुरुष्व पृच्छनम्। इदानीमेव स्वगुरुं समाहूय रघूद्वह ॥७६॥
क्यों नहीं जगाया ? ॥ ६० । आज तुम्हारा एकपत्नीव्रत समाप्त हो गया । त्रिजटा आयी, उसके साथ तुम रस भोग कर लिया और जब वह चली गयी, तब मुझे जगाया ॥ ६१ । बहुत दिनों बाद आज तुम्हारी यह चाल खुला है। उस दिन व्यासमुनिके सामने जो एकपत्नीव्रत धारण करनेकी कसम खायी थी, सो सब दगा था ॥ ६२ ॥ 'कहो न !' राघवने प्रणामपूर्वक कहा—"वास्तवमें मैं एक पत्नीव्रतधारी हूँ। तुम्हारे सिवाय संसारकी समस्त स्त्रियां मेरे लिए कौशल्याके समान है। तुम व्यर्थ मेरे ऊपर रुष्ट हो रही हो'। ६३ । तब सीता और भी तमतमाकर कहने लगी कि तुम्हारी वह प्रतिज्ञावाली बात कहाँ गयी ? वह व्रत कहाँ गया ? आज ही मैं सरयूँके जलमें डूबकर अपना जीवन समाप्त कर दूँगी ॥ ६४॥ मैं ऐसी शय्यापर अब नहीं सोना चाहती, जिसपर कि एक वेश्याको पीठ लग चुकी है। तुम्हारे जैसे वेश्यासक्त राजाकी जो दशा होनी होगी, सो होगी लेकिन यह समझ रखियेगा कि वेश्यासक्त राजाका राज्य ज्यादा दिन नहीं ठहरता ॥६५- ६६॥ इतना कहकर सीताने रामको प्रणाम किया और अपना देह त्याग करनेके लिए पटगृहसे बाहर होकर सरयूके तीरकी ओर चली ॥ ६७ । सीताको जाती देखकर राम भी पीछे-पीछे दौड़ पड़े और जलके पास पहुँचनेसे पहले ही उन्हें रेतामें पकड़ लिया । ६८ ॥ फिर वे मीठी-मीठी बातें कहने लगे—हे विदेहजे ! मेरे ऊपर इतना नाराज मत होओ। मेरी बात सुनो—यदि मेरी बातपर विश्वास न हो तो मैं शपथ खानेको भी तैयार हूँ ॥ ६९- ७० ॥ हे सीते ! बोलो, क्या कहती हो ? हे भामिनि ! इस तरह क्यों क्रोध करती हो ? इस प्रकार रामकी बात सुनकर सीताने कहा—मैं तुम्हें कुछ कहती ही नहीं। फिर तुम कसम किसलिए खानेको तैयार हो ? क्यों दिव्य परीक्षा कराना चाहते हो ? फिर यदि मैं दिव्य परीक्षा लेनाभी चाहूँ, तो कैसे दूँ। अग्नि तुम्हारे मुखसे निकला है, सूर्य-चन्द्रमा तुम्हारे दोनों नेत्र हैं, समुद्र तुम्हारा निवासस्थान है, पृथ्वीको तुमने अपने ऊपर रख छोड़ा है, शेष तुम्हारी शय्या है, सो वे भी लक्ष्मणके रूपमें बाहर बैठे हुए हैं । ७१-७३ ॥ इसमें कोई सन्देह नहीं है कि समस्त शास्त्र तुम्हारे मुखसे जायमान हुए हैं, मैं जिधर देखती हूँ, जो कुछ भी देखती हूँ, सब तुम्हारा ही रूप है ॥ ७४ । मैं कोई भी दुघट दिव्य (कसम) नहीं देखती,
२८८ आनन्दरामायणे [सर्गः ८
पदयोस्तस्य शपथं कृत्वा ने प्रत्ययो मम। भविष्यति न सन्देहस्त्वं कुरुष्व रघूत्तम ॥७७॥ इति सीतावतः श्रुत्वा प्रहस्य रघुनन्दनः। दूत्यं सौमित्रिमाहूय वसिष्ठं प्रेषयत्तदा ॥७८॥ लक्ष्मणः शिबिकारूढः पुरद्वारान्तिकं ययौ । मञ्चकाद्द्वारपं प्राह द्रागुद्घाटय सत्वरम् ॥७९॥ गत्वा पूर्यो लक्ष्मणः स गुरोर्द्वारे स्थितोऽभवत् । वसिष्ठद्वारपो गत्वा वसिष्ठाय न्यवेदयत् ॥८०॥ निशीथे लक्ष्मणं द्राग्मागतं न्यवि सम्भ्रमात् । अरुन्धत्या वसिष्ठोऽपि तच्छ्रुत्वा विह्वलोऽभवत् ८१। निशीथे लक्ष्मणश्चात्र किमर्थं मां समागतः । इति विह्वलचित्तः स गवाहूयाथ लक्ष्मणम् ॥८२ पप्रच्छ रामभद्रस्य कारणं मुनिसत्तमः। तं वन्द्वा लक्ष्मणः प्राह प्रेषितस्त्वरितोऽस्मि हि।८३॥ कारणं न तु जानामि समुत्तिष्ठाधुनैव हि । शिबिकामधिरूढश्च द्वाग्द्वाहिरस्ते मुनिसत्तम ८४ । इति श्रुत्वा गत्वाऽऽश्रममथवाऽऽलिप्रार्थितः । शिबिकामारुह्यान्त्यान्वित्या शीघ्रं ययौ गुरुः । ८५ । तत्पृष्ठे शिबिकामध्ये सौमित्रिस्त्वरितो ययौ । रत्नदीपप्रकाशश्च चेष्टितो वेत्रपाणिभिः ८६ समागतं गुरुं ज्ञात्वा प्रत्युद्गम्य रघूत्तमः । दत्तासनं वेष्टितां भीत्या प्रणनाम सः ॥८७॥ कृत्वा पूजां सविस्तारां वस्त्रैरभरणादिभिः। कथयामास सकलं पिंगलावृत्तमद्भुतम् ८८। कथयामास सीतायाः क्रोधसद्भावमपि प्रभुः । दिव्यं दातुं न किंचिच्च दृष्ट्वाऽन्यत्प्रीतये मम ॥८९॥ निर्धारितं ते पदयोर्दिव्यं तन्मे वदाम्यहम् । मनसाऽपि न भुक्ता सा मया वेश्याऽधुना परा ॥९०॥ इदं चेद्वचनं सत्यं स्पृशामि तर्हि त्वत्पदं । इत्युक्त्वा राघवः शीघ्रं वसिष्ठपदयोः करौ ॥९१॥ स्वीयौ संस्थाप्य शिरसा प्रणनाम गुरुं पुनः । सतुष्टा लज्जिता सीता ज्ञात्वा शुद्धं रघूत्तमम् ॥९२॥
जिससे पर मनम विश्वास हो ॥७५॥ बहुत कुछ सोच विचारकर मैने भी यही निश्चय किया है और आप भी वही करें अभी अपने गुरु (वसिष्ठ) को बुलाकर यदि आप उनके पैरोंकी शपथ खा लें तो मुझे विश्वास हो जायगा। हे रघूत्तम ! ऐसा करनेपर फिर इस पर किसी प्रकारका संशय नहीं रह सकेगा। अतएव आप यही करें ॥७६ । ७७। इस प्रकार सीताका वचन सुनकर प्रसन्न मुखसे दागे द्राग लक्ष्मणको बुलवाया और वसिष्ठजीके पास भेजा । ७८। पालकीपर चढकर लक्ष्मण राजदु आर पहुंचे। वहां पहरदू गाम फाटक खुलवाकर तुरन्त गुरु वसिष्ठके दरबाजेपर जा पहुंचे। द्वारपालने राजा कुमार लक्ष्मणके आनेका सं देश वसिष्ठ- के पास भिजवाया ॥ ७९ । ८० । आधी रातके समय लक्ष्मणको द्वारपर आया सुनकर वसिष्ठ तथा अरु- न्धती दोनों घबराहटम विह्वल हो गये ॥ ८१ ॥ वे सोचने लगे कि आधी रातको लक्ष्मण मेरे पास क्यो आये । इस प्रकार व्याकुलताके साथ उन्होंने लक्ष्मणको अपने पास बुलाया ॥८२, और आनेका कारण पूछा। वसिष्ठका प्रणाम करके लक्ष्मणने कहा कि आपको रामने स्मरण किया है ॥८३॥ आपको बुलाने का कारण मै भी नहीं जानता। हां, यह जानता हूँ कि आप अभी उठकर मेरे साथ चल दें बाहर पालकी तैयार है ॥८४ । इस तरह लक्ष्मण द्वारा रामकी बात सुनकर अरुन्धती के प्रार्थना करनेपर वसिष्ठ उन्हें भी अपने साथ लिये हुए झटपट चल दिये ८५॥ उनके पीछे-पीछे लक्ष्मणकी पालकी चली जिस समय वसिष्ठ राजभवनपर पहुंचे तब चारों ओर रत्नों के दीपकोंका प्रकाश फैल रहा था । अनेक पहरेदार अपनी- अपनी नौकरीपर डट हुए थे और बहुतसे यष्टिधरा धरकर साथ चल रहे थे ॥८६ । अब रामने सुना कि गुरुजी आ गये हैं तो उन्हें तथा थोडा दूर आगे जाकर मिले और संतोके साथ उनको प्रणाम किया । फिर एक दिव्य आसनपर बिठाकर वस्त्रभूषणादि विविधवत् पूजन करनेके पश्चात् उस पिंगला वेश्याका वृत्तान्त कह दिया ॥ ८७ । ८८ ॥ फिर यह बात भी बतायी, जो क्रोधमे सीताने रामको कही थीं । फिर कहने लगे कि सीताको विश्वामके किसी भी प्रकार विश्वास नही है ८९ । अन्तमें आपके चरणोंकी शपथ दिलानापर राजी हुई हैं। मैंने कभी मनसे भी उस वेश्या तथा अन्य किसी स्त्रीके साथ व्यभिचार नहीं किया है ॥९० । यदि मेरा ये बात सच है तो मैं आपके पैर छूकर शपथ खाता हूँ। ऐसा कहकर झटपट रामने वसिष्ठजीके पैर पकड़ लिये ॥ ९१ ॥ फिर अपना मस्तक झुकाकर प्रणाम किया। यह देखकर सीता लज्जित हो
सर्गः ९] विलासकाण्डम् २८९
प्रणम्य मेऽपराधं त्वं क्षमस्वेति प्रमाद्यदत् । ततः सीता गुरोः पत्न्यै ददौ चित्राणि भक्तितः ॥९२॥
भूषणादि वरान्न्यैव दिव्यान्यस्त्राणि सादरम् । रामेण पूजितश्चापि वसिष्ठः पूर्ववत्तया ॥९३॥
सहितः शिबिकामारुह्यतुष्टः स्वौयगृहं ययौ । ततः सीतां समालिङ्ग्य रामो निद्रां चकार सः ॥९४॥
प्रभाते पिंगलां दास्या समाहूयाय जानकी । धिग्विधकृन्त्वा सखीभिस्तां ताडयामास बंधिताम् ॥९६॥
सीतोवाच वदा वेश्यां वस्मान्मंघापराधितम् । भविष्यसि त्रिवक्रा त्वं मथुरायां हि कुत्सिता ॥९७॥
वेश्यया प्रार्थिता प्राह कृष्णान्तेस्युद्भविष्यति ॥९८॥
श्रुत्वा तौ बंधितां वेश्यां मोषयामास राघवः ।
एवं नानाकोतुकानि चकार रघुनंदनः । सीतां सञ्चरामास स्वचरित्रैर्मनोहरैः ॥९९॥
इति श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये विलासकाण्डे सीतालङ्कारवर्णनं नामाष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥
नवमः सर्गः
(सूर्यग्रहणपर रामकी कुरुक्षेत्रयात्रा)
श्रीरामदास उवाच
एकदा सीतया रामः कुरुक्षेत्रं स्वबंधुभिः । ययौ सूर्योपरागे वै स्नातुं पुष्पकसंस्थितः ॥ १ ॥
तत्र देवाः सगन्धर्वाः किन्नराः पन्नगा ययुः । नानाऽऽश्रमेभ्यो मुनयः पार्थिवाश्च सहस्रशः ॥ २ ॥
तत्र स्नात्वा रवौ ग्रस्ते राघवः सीतया सह चकार नानादानानि हस्त्युष्ट्ररथवाजिनाम् ॥ ३ ॥
ततस्ते पार्थिवाः सर्वे नानोपायनपाणयः । ययुस्ते राघवं दृष्टुं राजपत्न्यश्च जानकीम् ॥ ४ ॥
अथ सीता राजपत्नीः समालिङ्ग्य वरामने । सखीभिर्मुनिदारैश्च सुखं चोपाविशत्तदा ॥ ५ ॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र सीतया पूजिता स्थिता । लोपामुद्राऽब्रवीद्वाक्यं जानकीं रंजयन्मुदा ॥ ६ ॥
हे सीते कञ्जनयने धन्याऽसि गजनामिनि । किंचिद्वर्णय रामस्य पौरुषं श्रुतितोषदम् ॥ ७ ॥
गयीं और उन्हें विश्वास हो गया कि रामचन्द्रजी परम पवित्र हैं । ९२ । तब सीताने प्रणाम करके रामसे प्रार्थना की कि मेरी भूल थी, आप मुझे क्षमा करें । इसके अनन्तर सीताने गुरुपत्नी अरुन्धतीको विविध प्रकारके आभूषण वस्त्रादि दिये । रामचन्द्रजीने फिर वसिष्ठजीकी पूजा की । थोड़ी देर बाद गुरुपत्नीके साथ-साथ पाल्कीपर बैठकर वसिष्ठजी अपने घरको चले गये । तदनन्तर राम भी सीताका आलिंगन करके सो रहे ॥ ९३-६५ ॥ सबेरे दासी द्वारा सीताने पिंगला वेश्याको बुलवाया । उसे बार-बार धिक्कार और बांधकर सखियोंके हाथो पिटवाया ॥ ९६ ॥ इसके पश्चात् उस वेश्यासे कहा कि तूने आज बड़ा भारी अपराध किया है । इससे भविष्यमें जब तू जन्म लेगी, तब तेरे शरीरमे तीन कूबड़ होंगे और तुझसे सब घृणा करेंगे ॥ ९७ ॥ तदनन्तर उस वेश्याने अनेक प्रकारसे सीताकी प्रार्थना की । तब सीताने कहा-'अच्छा, जा तेरा उद्धार कृष्णके हाथों होगा' । उधर जब रामने सुना कि पिंगला बँधी पिट रही है, तब उसे छुड़वा दिया ॥ ९८ ॥ इस तरह राम विविध प्रकारके कौतुक करके अपने मनोहर चरित्रोंसे सीताको प्रसन्न करते रहते थे ॥ ९९ ॥ इति श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयावरचित'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासमन्विते विलासकाण्डे अष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥
श्रीरामदासने कहा—एक बार रामचन्द्रजी सीता तथा अपने समस्त भ्राताओंके साथ पुष्पक विमानपर सवार होकर सूर्यग्रहणके समय कुरुक्षेत्र गये । १ ॥ वहाँ समस्त देवता, गन्धर्व, किन्नर, पन्नग तथा कितने ही आश्रमोंके मुनि और हजारों राजे आये हुए थे ॥ २ ॥ जब सूर्यग्रहण लगा, उस समय सीताके साथ रामने स्नान किया तथा हाथी-घोड़े ऊँट और रथ आदि दान दिया ॥ ३ ॥ इसके अनन्तर वहाँ आये हुए राजे अनेक प्रकारके उपहार ले-लेकर रामका दर्शन करने आये और रानियां भी सीताको देखनेके लिए उनके साथ आयीं ॥ ४ ॥ जब रानियां सीताके पास पहुंचीं तो उन्होंने बड़े आदरके साथ उन्हें उनकी सखियों और मुनिपत्नियोंके साथ एक सुन्दर आसनपर बिठलाया ॥ ५ ॥ सीताके विधिवत् पूजन कर लेनेके बाद मुनिपत्नियोंमेंसे अगस्त्यपत्नी लोपामुद्रा सीताको प्रसन्न करती हुई कहने लगीं—॥ ६ ॥ हे कमलनयने
२९० आनन्दरामायणे [ सर्गः ९
तत्तस्या वचनं श्रुत्वा वर्णयामास जानकी। स्वपाणिग्रहणारभ्यः कुरुक्षेत्रावधिं कथाम् ॥ ८ ॥
लोपामुद्राऽपि तच्छ्रुत्वा विहस्य प्राह जानकीम् । सर्वं योग्यं कृतं सीते राघवेण महात्मना ॥ ९ ॥
एक एव वृथा क्लेशः कृतस्तेनेति चेन्मम । महान् श्रमः सेतुबन्धे किमर्थं हि कृतः पुरा ॥ १० ॥
कथं न कथितं कुम्भजन्मने राघवेण हि । सणार्वं चुलुके कृत्वा पीत्वेमं मूत्रमार्गतः ॥ ११ ॥
शुष्कं कृत्वा कपीन्मार्गोऽभविष्यदन एव हि । वृथा ते श्रमिताः सर्वे वानराः सेतुबन्धने ॥ १२ ॥
इति तस्या वचः श्रुत्वा सगर्वं जानकी तदा । लोपामुद्रां विहस्याह लोपामुद्रे पतिव्रते ॥ १३ ॥
सम्यक्कृतं राघवेण यन्सेतोर्बंधनं वरम् । तत्कारणं वदाम्यद्य शृणु त्वं स्वस्थमानसा ॥ १४ ॥
शृण्वन्विमाः समायाता मद्वाक्यं पार्थिवस्त्रियः । बाणेन शोषणीयश्चेन्मार्गो राघवेण हि ॥ १५ ॥
भविष्यति तदा हन्धा बह्वयश्चेति शङ्कितम् । उल्लंघनीयो जलधिर्वेदांशेव विहायसा ॥ १६ ॥
तदा गर्मं मनुष्यं च कदा ज्ञास्यति रावणः । हनुमत्पृष्ठमारुह्य गन्तव्यं चेत्परे तटे ॥ १७ ॥
लङ्कां प्रति तदा रामपौरुषं किं वदन्ति हि । यदि तीर्त्वा प्रगन्तव्यं बाहुभ्यां राघवेण हि ॥ १८ ॥
नोल्लंघनीयं विप्रस्य मूत्रं चेति विशङ्कितम् । चेन्मुनिः कुंभजन्मा वै प्रार्थनीयः पतिस्तव ॥ १९ ॥
रामेण चुलुकं कर्तुं तदा तल्लवणाम्बुधेः । अत्रैव राघवेणापि तदा हृदि विचारितम् ॥ २० ॥
पीतोऽयं जलधिः पूर्वं श्रुतं क्रोधादगस्तिना । मूत्रद्वारेण देवेभ्यो यस्मान्क्षारत्वमागतः ॥ २१ ॥
सर्वथा मूत्रसञ्चारः स कथं पातुमर्हति । स ऋषिर्धम वचनेन चुलुकं तु करिष्यति ॥ २२ ॥
भविष्यति ममाकीर्तिः सर्वत्र जगतीतले । मूत्रपानं ब्राह्मणेन स्वकार्यार्थं निजोक्तिभिः ॥ २३ ॥
कारितं येन रामेण सोऽयं चेनीति शङ्कितः । न मुनिं प्रार्थयामास राघवो धर्मतत्परः ॥ २४ ॥
एवं समन्त्य रामेण स्वकीर्त्यै सेतुबंधनम् । कृतं केनापि न कृतं न कोऽप्यग्रे करिष्यति ॥ २५ ॥
येन रामेण जलधौ शिलाः सत्तारिताः पुरा । सोऽय दाशरथी रामश्चेति ख्यातिं गतो भुवि ॥ २६ ॥
होते ! हे गजगामिनि ! तुम धन्य हो । हमारे कानोंको आनन्द देनेवाले रामजीके किसी पौरुषका तो वर्णन करो ॥ ७ ॥ लोपामुद्राका यह कहनेपर सीताने अपने विवाहसे लेकर कुरुक्षेत्रकी यात्रा पर्यन्तका समस्त वृत्तान्त कह सुनाया ॥ ८ ॥ लोपामुद्राने कथा सुनकर सीतासे कहा—हे सीते ! महात्मा रामचन्द्रने अबहतक जो कुछ किया वह बहुत ठीक किया । केवल एक बातम भूल गये और उन्होंने इतना क्लेश उठाया । मैं नहीं समझ पाया कि समुद्रपर चढ़ाई करते समय रामने समुद्रपर सेतु बनानेका कष्ट क्यों किया ॥ ९, १० ॥ उन्होंने अगस्त्यजीसे क्यों नहीं कह दिया, वे एक अञ्जल में भरकर क्षणभरमें उस सारे समुद्रको पी जाते ॥ ११ । समुद्र सूख जाता और कपियोंको समुद्र जानेके लिए मार्ग मिल जाता। नाहक सेतु बांधनेके लिए उन्होंने उन बानरोंको कष्ट दिया ॥ १२ । इस प्रकार लोपामुद्राकी बात सुनकर सगर्व वाणी से सीताजी कहने लगीं-हे पतिव्रता लोपामुद्रे ! रामने जो सेतु बाँधा, वह बहुत अच्छा किया । मैं उसका कारण भी बतलाती हूँ, भली प्रकार सावधान होकर सुनो ॥ १३ । १४ । यहाँ आयी हुईं ये राजरानियाँ भी सावधानसे मेरी बात सुनें । यदि राम अपने बाणसे समुद्रको सुखाते तो बहुतसे प्राणियोंकी हत्या होनेकी आशङ्का थी । यदि राम आकाशमार्गसे समुद्रको लांघ जाते तो रावण और वानर यह कैसे जानते कि राम मनुष्य हैं यदि हनुमान जीकी पीठपर चढ़कर चले जाते ॥ १५-१७ ॥ तब रामका क्या पराक्रम देख पड़ता ? यदि हाथोंसे तैरते हुए उस पार चले जाते ॥ १८ ॥ तब उन्हें यह ख्याल होता कि ब्राह्मणके मूत्रको कैसे लाँघूं । यदि आपका पति अगस्त्यजीसे पीनेकी प्रार्थना करनेको सोचते तो यह विचार होता कि एक बार अगस्त्य इस समुद्रको पी चुके हैं और मूत्रमार्गसे बाहर निकाला है। इसीसे यह खारा है । १६-२१ । उसी मूत्रके समान खारे समुद्रको अगस्त्यजी कैसे पियेंगे। मान लिया जाय कि रामके कहनेसे अगस्त्यजी समुद्रको पी जाते तो संसारमें रामका बड़ा अपयश होता कि रामने अपना मतलब साधनेके लिए एक ब्राह्मणको मूत्र पिलाया। इन्हीं बातोंको सोचकर धर्मात्मा रामने अगस्त्यसे समुद्र पीनेको नहीं कहा ॥ २२-२४ ॥ इन बातोंका खूब अच्छी तरह सोच विचारकर ही रामचन्द्रजीने अपनी कीर्तिवृद्धिके लिए समुद्रपर सेतु
सर्गः ९ ] विलासकाण्डम् २९१
सर्गः ९ ] विलासकाण्डम् २९१
इति सीतायचोभिः सा लोपामुद्रा जिता तदा । तूष्णीमाप क्षणं नत्रीमध्यायां लज्जिताऽभवत् । २७। ततो विहस्य वैदेही लोपामुद्रां प्रपूजयत् । मुनिपत्नीश्च संपूज्य प्रार्थयामास ता मुहुः ॥२८॥ मयाऽपराधितं वैऽद्य तत्क्षमस्व पतिव्रते । स्नेहात्प्रणयजोत्थोक्तं न्वद्वशे गम्यतेऽहान् । २९ मद्भर्तुश्शिशुता राधे पौरुषं वेति वेद्म्यहम् । इति संप्रार्थ्य ताः सर्वा मुनिपत्नीर्विसर्जयन। ३०॥ पूजिता नृपपत्नीभिर्ययौ सीता गृहंमथ् । ततो रामोऽपि पृथिवी. पूजितो जनक विमिः ।३१॥ ययौ स नगरीं तुष्टः सीतया गरुडे स्थितः । ये ये समागतास्तत्र कुरुक्षेत्रे रविग्रहे ।३२॥ ते सर्वे स्वस्थलं जग्मु रामदर्शनहर्षिताः । रामोऽपि नगरीमध्ये पुरस्त्रीभिर्मुहुः पथि । ३३॥ नीराजितः कुंकुमार्घ्यैर्ययौ निजगृहं मुदा । रेमे जनकनन्दिन्या चिरकालं यथासुखम् ।३४ । एवं रामेण साकेतनृपतिर्मन्दिरुन्मया । नानाक्रोडाकौतुकानि कृतवत्यनिशं०ान्यपि ॥ ३५ । यथा कृतं राघवेण मुदं क्रीडा च सीतया । तथैवोर्मिलया रेमे लक्ष्मणेऽपि यथासुखम् । ३६॥ मांडव्या भरतश्चापि रेमे रामो यथा स्त्रिया । तथैव श्रुतकीर्त्याऽपि शत्रुघ्नः कोडनेऽबधात् ।।३७। एवं ते स्त्रीपपत्नीभिः पौराः क्रू डाः प्रचक्रेिरे । तथैव विविधैर्भोपास्त्रानादेशनिवासिनः । ३८॥ रेमिरे तेऽपि पत्नीभिः स्तीयामर्मुदिताः सुखम् । सीतया राघवो रेमे यथा गौर्या स शङ्करः । ३९॥ रामे शासतिराज्येऽत्र न कोऽपि जगतीतले । परदाररतो वेश्यागामी मादकद्रव्यानुक्रू ॥४०॥ न दरिद्री नैव रोगी चिन्ताग्रस्तो न विह्वलः । न पापिन्मण्डो नाशीन गौरो नापि हिंसकः ।४१।। एवं शिष्य मया प्रोक्त विलासचरितं वरम् सीतया रामचन्द्रस्य साकेने मौख्यदं नृणाम् ॥४२। विलासकाण्डमेतद्धि यः पठिष्यति मानवः प्रातः काले च सन्ध्यक्षे निशायां रामसन्निधौ ॥४३।
बधयाया था। जिस बालक ने तवणका विसाव किया था और न जान कई बार मारा, सो उन्होंने कह दिखाया ॥ २७ । अब सब कोई परस्पर कहते हैं कि जिन रामने मनुष्य शिर काटेंगेग दिया था वे ही यवणान्तक पुत्र राम हैं ॥ २६ ॥ इस प्रकार माताकी बातोमे लोपामुद्रा पराजय हो गयी, थोडा देरके लिए इसपर सभाके नृपबाल बैठी हुई व कुछ लज्जित-सा हो गयीं ॥ २७।। फिर हंसकर व बाल लोपामुद्रा तथा अन्य-अन्य मुनिपत्नियोकी पूजा की ओर बारम्बार प्रार्थना करक कहा- ॥ २८ । मने जो वचन कहा है, उसे आप क्षमा करें। आपके स्नेह तथा प्रेमके आश्रय जानकर मैंने इस प्रकार रामके पौरुषका वर्णन किया है ॥ २९ ॥ हमारे पतिदेव रामके श्रीकुक पराक्रम है, यह सब आपके स्वामी अगस्त्यजीके ही माल ओफिस है। इस प्रकार विनती करक सीताने उन मुनिपत्नियोकी विदा किया ॥ ३० ॥ तदनन्तर र जगनिवा द्वारा पूजित होकर सीता राथक पास चली गयीं । राम जी उन दश-देशान्तरस अ य हुए राजाअ स विनत हो हावा-पादोका उपहार लकार पूजित हुए और प्रसन्नतापूर्वक सीताके साथ गरुडपर सवार होकर अयोध्याका चल पड़े ॥३१॥ ३२ । सूर्यग्रहणके समय कुरुक्षेत्रम जो लोग स्नान करन आयथ व रामके दशनस हर्षित हो-होकर अपने-अपन घरको आपस गये । राम भी अयोध्यामे पहुंचकर नागरिक स्त्रियोके द्वारा नीराजित हुए अपन महलोम गए। इसके बाद फिर बहुत कालपर्यन्त रामचन्द्रजी सीताक साथ विहार करते रहे ॥ ३३ ॥ ३४ ॥ इस तरह रामने सोताक साव अयोध्यामे विचित्र प्रकारक क्रोडा-कौतुक किये ॥ ३५ ॥ जिस तरह राम सीताके साथ आनन्द करत थ, ठीक उसी तरह लक्ष्मण ऊर्मिलाके साथ सुखपूर्वक विलास करते थे ॥ ३६ ॥ उस तरह भरत माडवीके साथ तथा शत्रुघ्न श्रुतकीतिके साथ क्रीडा करते थे ॥ ३७॥ पुरवासी-गण नाना विविध प्रकार और देशके नवासी भी अपनी-आपनी स्त्रियाके साथ प्रसन्नतापूर्वक भोग-विलास करते थे । राम तो सीताके साथ उसी तरह आनन्द करते थे जैसे कैलाशप पर्वतके साथ शंकरजी स्वच्छन्द विहार करते हैं ॥ ३८ ॥ ३९ ॥ रामके शासनकालम कोई भी मनुष्य दूसरंकी स्त्रियोपर आसक्त तथा वेश्यागामी नहीं था । न कोई किसी तरहकी मादक वस्तु ही खाता-पीता था ॥ ४० ॥ रामके राज्यमें कोई दरिद्र, रोगी, चिन्तातुर, विह्वल पापी, मूर्ख चोर अथवा हिंसक नहीं था ॥ ४१ ॥ हे शिष्य ! मैने तुम्हे इस प्रकार रामका सुन्दर दिललसाकाण्ड कह सुनाया। जिसमे राम और सीताका सबके लिए सुखद चरित्र भरा हुआ है ॥४२॥
| २९२ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ९ |
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स ज्ञेयो राघवः साक्षाद् भुवि मानवरूपधृक् । विलासकाण्डपठनाद्धनार्थी धनमाप्नुयात् ॥४४॥
भोगान्याप्नोति भोगार्थी पुत्रार्थी पुत्रमाप्नुयात् । विलासकाण्डमेतद्वै रामभक्त्येह मानवः ॥
यः शृणोति नरः कश्चित्स सुखं प्राप्नुयाद्भुवि ।४५।
विलासकाण्डश्रवणात्पापैः पापात्प्रमुच्यते । विलासकाण्डं परमं रम्यं जनमनोहरम् ॥४६॥
आनन्ददायकं चित्रं श्रुतिसौख्यप्रदं महत् । ये पठन्त्यथ शृण्वन्ति सर्वान्कामान् लभन्ति ते ॥४७॥
धर्मार्थी प्राप्नुयाद्धर्ममर्थार्थी प्राप्नुयान्निधिम् । कामानाप्नोति कामार्थी मोक्षार्थी मोक्षमाप्नुयात् ॥
निशार्धे मंचके स्थित्वा निजपत्न्या पठेत्तु यः । विलासकांडं षण्मासं तस्य पुत्रो भविष्यति ॥४९॥
अथवा मंचके श्यामं सन्निवेश्याथ तत्पुरः । द्वितीये मंचके स्थित्वा स्वयं दयितया सह ।५०॥
यः शृणोति निशार्धा हि विलासाख्यं मनोहरम् । एतत्कांडं पवित्रं च नवमासान् पुनः पुनः ॥५१॥
तस्यापुत्रस्य पुत्रः स्यान्नात्र कार्या विचारणा । पुत्रार्थमेव भोक्तव्यं मञ्चके ह्युपरिष्ट्य च । ५२।
भोक्तव्यं नान्यकामेषु मञ्चकस्थैर्नरैः कदा । विलासकाण्डमेतद्वै स्त्रीकामी यः पठेन्नरः ॥५३॥
स भार्यां प्राप्नुयाद्रूपां नवमासैर्न संशयः । कुमारी शृणुयादेतत्पत्यर्थं काण्डमुत्तमम् ॥५४॥
पुनः पुनस्तु षण्मासं लभिष्यति वरं पतिम् । विलासकांडमेतद्वै यः शृण्वन्ति वराः स्त्रियः ।५५॥
सौभाग्यलक्ष्म्या न कदा हा विहीना भवन्ति हि । भर्तुरायुरभिवृद्ध्यर्थं स्त्रीभिश्च स्नानपूर्वकम् ॥
श्रवणीय विलासाख्यमेतत्काण्ड मनोहरम् ॥५६॥
रंभाविचित्रं मधुरं पवित्र विलासकांडं हि यथैक्षुदण्डम् । पाठादिना पापचयप्रदण्डं धर्मैककुण्डं भवरोगदण्डम् ॥
इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे विलासकाण्डे कुरंगोपाख्यानवर्णनं नाम नवमः सर्गः ॥ ९ ॥
जो मनुष्य इस विलासकाण्डका प्रातःकाल मध्याह्न अथवा रात्रिके समय रामचन्द्रके समीप पाठ करता है, उसे मनुष्यरूप धारण किये हुए साक्षात् राम ही समझना चाहिये । धनका इच्छा रखनेवाला मनुष्य विलास-काण्डका पाठ करनेसे धन पाता है, भोगार्थी भोग पाता है पुत्रार्थी पुत्र पाता है और जो प्राणी इसकी सुनता है, वह संसारमें सुखी रहता है ॥ ४३ ४५। विलासकाण्डका श्रवण करनेसे पापी पापसे छूट जाता है। यह विलासकाण्ड बड़ा सुन्दर और जनोंके मनको चुरानेवाला काण्ड है ॥ ४६ ॥ यह आनन्ददायक एवं विचित्र कथाओंसे भरा हुआ है। इसको सुननेसे कानोंको आनन्द मिलता है, जो लोग इसे सुनते अथवा पाठ करते हैं, उनकी सब कामनाएँ पूर्ण होती हैं । ४७॥ इससे धमार्थी धर्म पाता, धनार्थी धन पाता, कामार्थी काम पाता तथा मोक्षार्थी मोक्ष पाता है ॥ ४८ ॥ रात्रिके समय जो मनुष्य छः महीनेतक अपनी स्त्रीके साथ बैठकर इस विलासकाण्डका पाठ करेगा, उसको पुत्र मिलेगा ॥ ४६ ॥ एक मञ्चपर श्यामको बैठाकर उसके आगे स्वयं अपनी पत्नीके साथ एक दूसरे मंचपर बैठकर रात्रिके समय जो इस मनोहर विलासकाण्डको नौ महीनेतक बार-बार सुनता है, उस अपुत्रके भी पुत्र होता है। इसमें किसी तरहका सन्देह करनेकी आवश्यकता नहीं है। पुत्रकी कामनावालेको मञ्चपर बैठकर इसे सुनना चाहिए । ५०-५२ । किसी दूसरी कामनावालेको मंचपर बैठकर यह कथा न सुनना चाहिए । जो स्त्रीकी इच्छासे इसका पाठ करता है, उसको नौ महीनेमें स्त्री अवश्य मिल जाती है । यदि कुमारी कन्या पतिकी कामनासे इस काण्डको सुने तो उसे सुन्दर पति मिलता है। जो सुवशा स्त्रियाँ इसको सुनेंगी वे कभी भी अपनी सौभाग्यलक्ष्मी से विहीन न होंगी अर्थात् उनका सौभाग्य अटल रहेगा। समस्त नारियोंको अपने पतिकी आयुष्य बढ़ानेके लिए स्नान करके यह विलासकाण्ड सुनना चाहिये ॥ ५३- ५६ ॥ क्योंकि यह विलासकाण्ड ईखके दण्डकी तरह मीठा विचित्र, मधुर तथा पवित्र है। यह पाठादि करनेवालोंके पापोंको मार भगानेवाला और धर्मका एकमात्र कुण्ड तथा भवरोगके लिये दंडके समान है। इस काण्डमें भी सर्वतया १७८ श्लोक हैं ॥ ५७॥ इति शतकोटिरामचरितान्तर्गत श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतनुज पण्डित ज्वालाप्रसाद टीकायां विलासकाण्डे नवमः सर्गः ॥ ९ ॥
* इति श्रीमदानन्दरामायणे विलासकाण्डं समाप्तम् *
श्रीसीतापतये नमः
श्रीवाल्मीकिमहामुनिकृतशतकोटिरामचरितान्तर्गत-
आनन्दरामायणम्
'ज्योत्स्ना'ऽऽह्वया भाषाटीकयाऽऽटीकितम्
जन्मकाण्डम्
प्रथमः सर्गः
( रामका उपवनदर्शन )
श्रीरामदास उवाच
अथ रामः सीतया स साकेते बंधुभिश्शिरम् । क्रीडां चकार विविधां दुर्लभां त्रिदशैरपि ॥ १ ॥
एकदा रघुवीरस्तु सोऽन्तर्वत्नीं विदेहजाम् । ज्ञात्वा धात्रीमुखात्तुष्टो ददौ दानान्यनेकशः ॥ २ ॥
ब्राह्मणान् भोजयामास कोटिशः प्रत्यहं मुदा । चकार नानालंकारान्नवीनान् रत्ननिर्मितान् ॥ ३ ॥
सीतायै दिव्यवासांसि हेमतन्तूद्भवानि च । हरितान्यथ पीतानि रक्तानि चित्रांतान्यपि ॥ ४ ॥
कारयित्वाऽथ कुशलैर्जनैः सूक्ष्माणि राघवः । विस्तीर्णान्यतिदीर्घाणि पुष्पवत्सुलघून्यपि ॥ ५ ॥
महार्घाण्यतिरम्याणि ददौ पत्न्यै मुदान्वितः । अथ मासे द्वितीयेऽह्नि रामो द्विजवरैः सह ॥ ६ ॥
वसिष्ठेन पुंसवनसंस्कारं विधिपूर्वकम् । स चकारोत्सवैर्दिव्यैः सीतायाः परमादरात् ॥ ७ ॥
सुमेधां जनकं चापि समाहूय सविस्तरम् । जनकः परमर्तुष्टः सोऽन्तर्वत्नीं निजां सुताम् । ८ ।
दृष्ट्वा पुंसवनोत्साहे सीतारामौ प्रपूजयत् । नानालंकारवासांसि हेमतन्तूद्भवानि च ॥ ९ ॥
हरितान्यथ पीतानि सूक्ष्मान्यथ लघूनि च । विस्तीर्णान्यथ दीर्घाणि सीतायै स ददौ मुदा ॥ १०॥
श्रीरामदास कहने लगे—श्रीरामचन्द्रजी सीता भरतादिक भ्राताओंके साथ चिरकाल तक देवताओंको भी दुर्लभ क्रीड़ाएं करते रहे ॥ १॥ एक दिन रामचन्द्रजीने किसी धायके मुखसे सीताके गर्भिणी होनेका समाचार सुना तो विविध प्रकारका दान दिया ॥ २ ॥ तबसे लेकर प्रतिदिन करोड़ों ब्राह्मणोंको हर्षपूर्वक रामचन्द्रजी भोजन कराते थे । अनेक प्रकारके रत्नोंसे जटिल नवीन अलंकार, सुवर्णके तारोंके कामदार दिव्य वस्त्र और हरे, लाल तथा छींटके कपड़े बनाकर रामने सीताजीको दिये, जो बड़े लम्बे चौड़े और फूफसे हल्के थे ॥ ३-५ ॥ वे वस्त्र बहुमूल्य और सुन्दर थे जब एक मास व्यतीत हो गया और दूसरे महीनेका दूसरा दिन आया, तब रामचन्द्रजीने गुरु वसिष्ठ तथा बहुतसे ब्राह्मणोंके साथ विधिपूर्वक और सोत्साह सीताका पुंसवनसंस्कार किया ॥ ६ । ७ ॥ उस पुंसवनसंस्कारके उत्सवमें रामचन्द्रजीने सीताके पिता बुद्धिमान् जनकजी तथा माता सुमेधाको भी बुलाया । यह समाचार सुनकर जनकजी बहुत प्रसन्न हुए और सीताको गर्भिणी देखकर पुंसवनसंस्कारके समय ही सीता तथा रामचन्द्रजीकी पूजा की, नाना
२९४ आनन्दरामायणे [ सर्गः १
इन्द्रपुष्ट्यस्तुरङ्गांश्च दासीदासाम्यनोग्मान् । शिबिकाश्चापि वासांसि ददौ रामाय सादरम् ॥११॥ एवं सम्पूज्य श्रीरामं सीतां च जनकः स्त्रियाः । सम्मानिनो राघवश्चाथ ययौ स्वां मिथिलां पुरीम् ॥१२। अथ रामः सीतया स रेमे सन्तुष्टमानसः । गर्भातिभाराक्रान्ता सा सीता मंन्यस्तभूषणा । १३ । पाण्डुवर्णाऽनना दीना कृशाऽपि नितरां बभौ । एकदा मधुरं पाठ्या सूचयामास जानकी । १४ ममञ्चाऽऽगमसच्छाद्यं रतुमास्ति त्वया सह । तथो पवनमध्येऽपि साकेतनगराद्वहिः । १५ । तद्वाक्यास्यात्प्रियाय क्यं श्रुत्वा चाहूय लक्ष्मणम्। रामोऽब्रवील्लक्ष्मणाऽथै वार्यं मधुरं स्मितपूर्वकम् । १६॥ हे सौमित्रेऽद्य सीतया जाताऽऽगमस्पृहास्ति हि। मया तु तन्मत्त्व हि सूचितोऽभि मयाऽधुना । १७ । तथेति रामवाक्यं सोऽप्युरीकृत्य लक्ष्मणः । गन्त्वा सभायामाहूय त्वरयामास सेवकान् ॥१८। चित्रोष्णीषान्क्षेत्राणीनाह वाक्यं स्मिताननः । कथनीयं हट्टमध्ये ह्युगमं याति जानकी ॥१९ । राघवेण नतो व्य वणिग्व्यवहारिभिः । ततः सौमित्रिवचनाच्छ्रुत्वा ते क्षेत्रापालयः । २० । चित्रोष्णीषा रुक्मदण्डा राजमार्ग चतुष्पथे हट्ट वीथ्यामुर्ध्वहस्तास्तदा प्रोचुर्महास्वरैः । २१ । पौराश्च वणिजं भवे तथाऽन्ये व्यवसायिनः । शृण्वंतु हृष्टहृदयाः सीतोद्यानं प्रगच्छति । २२ । राघवेणाभ्यनुज्ञातेर्भविद्भिर्गम्यतां पुरः । एवं प्रेषयित्वाऽथ जग्मुन्ते लक्ष्मणं चराः ॥२३। दूतानाज्ञापयामास पुनः सौमित्रिरादरात्। रामोगेहानि चित्राणि ह्यागमेषु समंततः । २४॥ कम्पनीशनि वेगेन शोधनीया भुवः शुभाः । जलयंत्राणि मदांसि शोधनीयानि सादरम् ॥२५ नानापांगस्कवस्तूनि सुगधीनि महान्ति च । स्थापनीयानि वै तत्र वस्त्राण्यतिलघूनि च । २६ । एवमदीन्यनेकानि कम्पनीशनि सादरम् मृगम्यौयाः प्रासादाः सर्वे ह्यारामसम्भवाः ॥ २७। दिव्यवस्त्रैस्तोरणाद्यैर्मूकापुच्छैर्भगन्विताः । तथेति दूतास्ते सर्वे तदा चक्रुस्त्वरान्विताः ॥ २८॥
प्रकारके सुनहले गहने तथा बहुत जाहरे कंच, लाल रंग रंगे हुए तथा फुन्दकारतूहलुक थे। उन्हें प्रसन्नतापूर्वक माताजीको दिया। साथ ही हाथी घोडे, रथ, ऊँट, सुन्दर दास-दासी तथा पालकी आदि रामचन्द्रजीको दिया । ॥११॥ इस प्रकार राम और सीताकी पूजा करके जनकजी अपनी स्त्रीके साथ मिथिलापुरीको लौट गये ॥ १२ । उधर रामचन्द्रजी प्रसन्नतापूर्वक सीताके साथ विहार करते रहे गर्भके भारसे लदी तथा न्यस्त भूषणाका स्पर्श पीत मुख और दुर्बल अङ्गोवाली भी सीताजी बहुत ही सुन्दर दीखती थी। एक दिन सीताने विश्वासाके द्वारा रामचन्द्रजीके पास यह सन्देश कहला भेजा कि आज आपके साथ बाहिरके बगीचेमें घूमनेकी मेरी इच्छा है ॥ १३-१५ । उस धात्रीके मुखसे यह संवाद सुनकर रामचन्द्रने लक्ष्मणको बुलाया और मुस्कराते हुए कहने लगे हे लक्ष्मण ! आज माता गारे साथ नगरके बाहिरवाले बगीचेमें घूमने जाना चाहती हैं, सो उसका सब प्रबन्ध ठीक कर देना। लक्ष्मणजी 'तथास्तु' कहकर सभामें गये और सेवकोंको बुलाकर जल्दी तैयारी करवाके आज्ञा दी रंग-बिरंगी पगड़ी पहने तथा हाथमें बेंतके दण्ड लिये सिपाहियोंसे लक्ष्मणने कहा कि आज रामचन्द्रजी सीताके साथ बगीचे जायेंगें। तुमलोग जाकर नगरके व्यापारियोंसे कह दो कि वे लोग जल्दसे अपनी दूकान बढ़ाकर मार्ग खाली कर दें। इस प्रकार लक्ष्मणकी बात सुनकर ॥ १६-२० ॥ रंग बिरंगी पगड़ी पहिरे तथा सुनहरे दंड लिये हुए सिपाही चौरास्ते, गली, बाजार और कूँचोंमें हाथ उठाकर जोर जोरसे कहने लगे हे पुरवासियों, व्यापारियो तथा व्यवसायियों ! आप लोग प्रसन्नतापूर्वक हमारी बात सुनते जायें। आज सीताजी बागमें जायेंगी। इसलिए आप सब पहिले ही से वहाँ चलें । इस प्रकार सबको सुनाकर वे दूत लोग फिर अपनी ड्योढ़ीपर अर्थात् लक्ष्मणके पास लौट आये । २१-२३ लक्ष्मणजीने फिर उनको आज्ञा दी कि बगीचेमें तुम लोग जाओ और स्थान स्थानपर नाना प्रकारकी रहनेकी जगहें बनाओ और बगीचेके चारों ओरकी जमीन शुद्ध अस्त्रकी तरह साफ़ करा दो। जलयंत्रोंकी भी परीक्षा करके उन्हें ठीक कर दो ॥ २४ । २५॥ विविध प्रकारकी मांगलिक वस्तुयें और महीन कपड़े आदि लाकर वहाँ रक्खो । जो जो चीजें आवश्यक समझी जायें, वे सब प्रस्तुत रहें। बगीचेके
सर्ग १] जन्मकाण्डम् २९५
लक्ष्मणो राघवं गत्वा नत्वा स प्राह सादरम् । उद्योगसन्न होऽथैव वर्तते रघुनन्दन ॥२९॥
कुर्यां सिद्धं हि कियान् सीतायास्त्वथ वा विभो । उम्मीमित्रेर्वचः श्रुत्वा जानकीं राघवोऽब्रवीत् ॥३०॥
सीते यानं वदाद्य त्वं रुचे मनसि रोचने । तद्रामवचनं श्रुत्वा शिविकां प्राह जानकी ॥३१॥
रामोऽपि रोचयामास शिबिकामेव वै तदा । मल्लक्ष्म्या लक्षमणाद्वारि शिबिके रत्नभूषिते ॥३२॥
हेमन्तन्तूज्ज्वलैर्वस्त्रैः सर्वत्र वेष्टिते शुभे । आनयामास दूतैः सन्मुक्ताजालझणत्कृते ॥३३॥
आरुरोहाथ श्रीरामः शिविकां वरया मुदा । ततः सीता पांडुरंगा परिधेयविभूषिता ॥३४॥
कृतांगयष्टिदार्त्ताभिर्दत्तहस्ता ययौ शनैः । शिविकामारुरोहाय पृष्टलग्नोपवर्हणा ॥३५॥
वामीभिर्वीजिता चापि धृताशोकद्रुववरणा । दधार शिविकामारुरोहाथ पृष्टलग्नोपवर्हणा ॥३६॥
विमुक्तिं च मुक्ताभिः सीता स्वीयकरेण तम् । मुक्ताजालगवाक्षैश्च पश्यन्ती सा मुहुर्मुहुः ॥३७॥
राजमार्गेणयान्येव कौतुकानि समन्ततः । ददृशे नृप वेश्मानां सर्वाणि परितो वृता ॥३८॥
ततस्ते बान्धवाः सर्वे बन्धुपत्न्यश्च मातरः । शिबिकाधूपतविष्टा दिव्यासु च पृथक् पृथक् ॥३९॥
अग्रे ते भ्रातरः सर्वे ततः सर्वाश्च मातरः । सीताद्याः बन्धुपत्न्यश्च सर्वेषां पुरतो गुरुः ॥४०॥
एवं ते प्रययुः सर्वे पश्यन्तो राघवं मुहुः । ननृतुर्वारनार्यश्च नेदुर्वाद्यान्यनेकशः ॥४१॥
तुष्टुवुर्बन्दिनः सर्वे सीतां च रघुनायकम् । एव नानासमुत्साहैरागमन् मयीं मुदा । ४२ ।
राघवः सीतया युक्तः सैन्यैः सर्वत्र वेष्टितः शिविरा बासगेहे म मर्यातो रघुनन्दनः ॥४३॥
वासोरोहेषु सर्वे ते तस्थुः पौराः समन्ततः । दृष्ट्वा समन्ततश्चामत्रनृत्यंवारयोषित. । ४४॥
वासोरोहस्य सीताया भित्तयो वस्त्रनिर्मिताः । पञ्चक्रोशमितायामाश्रामन । स्ताम्बोऽपि च । ४५॥
पञ्चक्रोशमितायमे यत्र रेमे विदेहजा । ददर्श जानकी मम्म्यागम नृपमील्यदम् ॥४६॥
सब भवन अच्छी तरह सजाये जायें । उत्तम कपटकी झालरें, तोरण और माणिक के गुच्छ लटकाये जायें । वहाँ पहुँचकर दूतोंने लक्ष्मणजीके आज्ञानुसार सब कुछ तुरन्त ठीक कर दिया । १६-२८ ॥ तब लक्ष्मण रामचन्द्रजीके पास गये और प्रणाम करके सादर कहने लगे - हे रघुनन्दन ! मैने आपकी आज्ञास पूरी तैयारी कर दी है । अब महा आप और सीताजीके लिए सवारी लानेका भी आज्ञा दे दें ? इस प्रकार लक्ष्मणकी वाणी सुनकर रामचन्द्रजीने सीतासे कहा- सीन वन्याआ, आज तुम्हे कौनसी सवारी चाहिए ? सीताजीने रामजाकी बात सुनकर पालकी पसन्द की और सञ्जीन अपने लिए भी गलकी ही माँगी । रामचन्द्रजीकी आज्ञासे लक्ष्मण रानीतम विभूषित दो पालकियां मंगवायी, जिनका सुनहला कामक ओहार पड थे और चारो ओर मोतियोके झुच्छ लटक रहे थे ॥२६-३३॥ तब प्रसन्नतापूर्वक रामचन्द्रजी पालकीपर सवार हुए और पोरंसे भूषणान्का पहन हुए सीता भी दाभियाक हाटक सहारे शनै शनै जाकर पालकीपर बैठीं । उसमें चारो ओर नकचया लगी हुई थी । शक्कियां पंखे झलने लगी । ओहतर डाल दिया गया और पालकी चल पडी । रस्तेम सीताजी पालकीक दरीवेसे उन दृश्योका देखती जाती थी, जो वहांपर थे। उसक अनन्तर रामचन्द्रजीके और भाई भा तथा उनकी त्रियवें और मातायें अलग-अलग दिव्य पालकियोपर बैठ-बैठकर चलीं । अग्रे आगे भाइयोकी, फिर माताओकी, फिर सीतादिक पत्नियोकी और सबसे आगे गुरु वसिष्टजाका पालकी चली ॥ ३४-४० ॥ इस प्रकार सब लोग रामचन्द्रजीका दर्शन करते हुए चल जा रहे थे । वेश्याये नाच रही थीं और नाना प्रकारके बाजे बज रहे थे । बन्दीगण सीता और रामजीकी वन्दना कर रहे थे । इस प्रकार कितने ही तरहके उत्साहाँके साथ वे सब नगरीमे पहुँचे । रामचन्द्रजी सीताके साथ-साथ सेनाओसे घिरे हुए एक तम्बूमें उतरे । ४१-४३ ॥ इसके बाद और लोग भी तम्बुओंमें टिके । साथ ही समस्त नगरवासी लोग भो बागों और तम्पुओमे ठहर गये । चारों ओर हाट लग गयी और वैश्यायें नाचने लगीं । ४४ । जिस स्थानपर रामचन्द्रजी अपने पुरवासो नागरिकोंके साथ ठहरे थे,
२९६ आनन्दरामायणे [ सर्ग १
रसालयं रसालैस्तैरशोकैः शोकनाशनम् । तालैस्तमालैर्हिन्तालैः शालैः सर्वत्र शोभितम् ॥४७॥
खपूरैः सपूगैश्चापि श्रीफलैः श्रीफलं किल । डुकुलिश्च स्वगुरुभिः कपित्थिमं कपित्यकैः ॥४८॥
स्तन अथः कुब्जकार्लेजुंश्च मनोरमम् । सुधार्कसममारम्भैरम्भोधः परिभाशितम् ॥४९।
सुरंगांश्चापि नारङ्गैरङ्गमण्डपवत्स्थितः । शानीरैश्चापि जंबी रैर्बीजपूरैः प्रपूरितम् ॥५०॥
मन्दान्दोलितपूर्पकदलीललल्लतया । विश्रमाय श्रमापन्नानाह्वयन्निवाध्वगान् ॥५१॥
पुन्नाग इव पुन्नागपल्लवैः करपल्लवैः । कल्पयन्निव्रालोलैर्मल्लिकास्तनकस्तनम् ॥५२॥
विदीर्णदाडिमैः स्वान्तं दर्शयन्ननुरागतत् । माधवीस्वरुपेण श्लिष्यतमिव कानने ॥५३॥
उदुम्बरैर्नरन्तफलशालिभिः । ब्रह्मांडकोटिविप्रन्नमनन्तमिव सर्वतः ॥५४॥
पद्मनामैननासाभिः शुकनामैः पलाशकैः । फलव्याजाद्दिशन्त्या पत्यन्यक्कैविवामृतम् ॥५५॥
कदंबवादिनो वीशान्दृष्ट्वा कंटकितैरिव । समन्ततो भ्राजमानं कदंबककदंबकैः ।५६॥
नमेरुभिश्च मेरोश्च शिखगैरिव राजितम् । राजादनैश्च मदनैः सदनैरिव कामिनाम् ॥५७॥
समंततः पटुपटैरुच्चैः पट्कुटीकृतम् । कुटन्नस्तवकैर्यातमधिग्रिन्नवकैरिव ॥५८॥
करमर्दैः करोरैश्च करजैश्च कदंबकैः । मद्रुककवचनमधिप्रन्युद्धतैः करैः ॥५९।
नीराजिनमिरोहीपै राजचंपककोरकैः । मधुपश्चान्तमलीभिश्च जिनपद्याङ्गश्रियम् ॥६०॥
क्वचिद्वटदलैरुच्चैः कचिन्काञ्चनकेतकैः । कृतमालैर्नक्तमालैः शोभमानं क्वचित् क्वचित् ॥६१॥
कर्कन्धुवन्धुजीवेश्च पुत्रजीवैरिवान्वितम् । मरिंदुकैरूद्दीमिश्च करुणैः करुणालयम् ॥६२॥
उसका विस्तार पांच कोसका था। पांच कोसके अन्दर मोर बगीचेमें जहाँ रामचन्द्रजी ठहरे थे, सीताजी प्रसन्नतापूर्वक विहार करने और उस सुन्दर बगीचेको खूब अच्छी तरह देखने लगीं ॥४५, ४६॥ उसमें रसालक वृक्ष वास्तव्य रसके आलय और अशोकके वृक्ष शोकको दूर करनेवाले थे ताल, तमाल, हिन्ताल और शालक वृक्ष चारो ओर सुशोभित हो रहे थे ॥४७॥ खजूरके वृक्षोंसे वह बगीचा खपूर (स्वर्ग) सदृश लग रहा था और श्रीफलसे श्रीफलके सदृश था। बकुल, न्यग्रोध अर्थात् वट और कैथ तथा कैथके वृक्षोंसे कपित्थ-वर्गका हो रहा था ॥४८॥ वनस्थलीके वृक्षोंके समान लकुच ( बड़हर ) के वृक्ष लगे हुए थे, अमृतफलका नाईं वेलेसे युक्त लग हुए थे ॥४९॥ सुन्दर रङ्गालये नारङ्गीके वृक्षोंसे रङ्गमण्डपकी शोभा हो रही थी। पानीर, जंबीर, बीजपूर आदिके वृक्षभी उस बगीचेमें कुछ कम नहीं थे ॥५०॥ धीरे-धीरे वायुके झोंकेसे झूमता हुआ केलेका पन्ना मानो एक हुए बटोहीयॉको हाथके मतलसे विश्राम करनेके लिए बुला रहा था ॥५१॥ पुन्नागको सदृश पुन्नागके पल्लव करपल्लवके समान थे और मल्लिकाके गुच्छे स्तनके समान दीखते थे ॥५२॥ अनारके फटे हुए फल मानो अपना हृदय फाड़कर हार्दिक प्रेम प्रदर्शित कर रहे थे। सुन्दरता खुद लम्बान्तीहुइ वृक्ष था, जिससे असंख्य फल लग हुए थे। वह करोड़ों ब्रह्माण्डोंको धारण किये हुए साक्षात् अनन्त भगवान्के सदृश मालूम पड़ता था। उपवनकी नासके समान इतरूटके वृक्ष तथा तोतेकी नासके समान पलाशके वृक्ष लगे हुए थे। कण्ट-कित पुष्पवाले कदम्बके वृक्षोंको देखकर रोमांच हो जाता था ॥५३-५६॥ नमेरूके वृक्ष को देखकर सुमेरुशृङ्गकी याद आ जाती थी। राजादनके वृक्ष कामियोंका मदनके भवन सदृश दीखते थे ॥५७॥ चारों ओर लगे हुए पट्टकूटके वृक्ष पट्टहर्टके सदृश दीखते थे । कुटजके गुच्छे से युत बगुलेके सदृश मालुम पड़ते थे ॥५८॥ जहाँ तहाँ करौंद, करीर, कंज, कदम्ब आदिके बड़ी-बड़ी शाखाओंवाले वृक्ष हजारौं हाथ उठाये याचकौके समान मालूम पड़ते थे ॥५९॥ राजचम्पक तथा डाँडेगाके वृक्ष मानों आरती बनकर उस बगीचेकी आरती उतार रहे थे फूलोंसे लदे हुए रेशमके वृक्ष शय्यावस्रकी शोभाको भी पराजित कर रहे थे ॥६०॥ कहीं फड़फड़ाते हुए पत्तोंवाले वटक्के बड़े-बड़े वृक्षोंसे, कहीं सुन्दरसी कनकके छोटे-छोटे पौधोंसे, कहीं कृतमाल और नक्तमालके वृक्षोंसे वह बगीचा सुशोभित हो रहा था ॥६१॥ बेर, बन्धुजीव तथा पुत्रजीवक वृक्ष लग थे । तेंदु, इङ्गुदी, करुण आदि वृक्षोंसे यह बगीचा करुणामय हो रहा था । टपकते हुए महुएके फूलोंको देखकर मालूम होता
सर्गः १ ] जन्मकाण्डम् २९७
गलन्मधूककुसुमैर्धरायापधरं हरम् । स्वहस्तमुक्तमुक्ताभिरर्चयन्तमिवानिशम् ॥६३॥
सर्जार्जुनाम्रैर्बीजैश्च व्यजनैर्वीज्यमानवत् । नारिकेलैः सखर्जूरैर्धृतच्छत्रमिवांबरैः ॥६४॥
अमदैः पिचुमन्दैश्च मंदारैः कोविदारकैः । पाटलार्तिन्तिणीधौटाशाखोटैः करहाटकैः ॥६५॥
उद्दण्डैरपि सेहुण्डैर्गुंडपुष्पैर्विराजितम् । बकुलैस्तिलकैश्चैव तिलकांकितमस्तकम् ॥६६॥
अक्षैः प्लक्षैः सल्लकीभिर्देवदारुहरिद्रुमैः । सदाफलसदापुष्पवृक्षवल्लिविराजितम् ॥६७॥
एलालवंगमरिचकुलंजनवनावृतम् । जम्ब्वाम्रातकभल्लात शेलुश्रीपर्णिपर्णितम् ॥६८॥
शाकशखवनं रम्यं चन्दनै रक्तचन्दनैः । हरीतकीकर्णिकारधात्रीवनविभूषितम् ॥६९॥
द्राक्षावल्लीनागवल्लीकर्णवल्लीशतावृतम् । मल्लिका यूथिकाकुंदमदयन्तीसुगंधितम् ॥७०॥
तुलसीवृक्षषंडैश्च शिवत्यगस्तिद्रुमैर्युतम् । भ्रमद्भ्रमरमालाभिर्मालतीभिरलंकृतम् ॥७१॥
अलिच्छलागतं कृष्णं गोपी रंतुमनेकशः । सुगंधवातं सुखदं कामसञ्जनकं परम् ॥७२॥
नानामृगगणाकीर्ण नानापक्षिनिनादितम् । नानासरित्सरःश्रोतः पल्वलैः परितो वृतम् ॥७३॥
उत्सृजतमिवार्थं वै रत्नपुष्पैस्तितस्ततः । केकि केकारवैर्दूरात्कुर्वन्तं स्वागतं किल ॥७४॥
एतादृशं सुपवनं जानकी तद्ददर्श सा । तुष्टाऽभूद्दर्शनेनैव विचचार स्थितस्ततः ॥७५॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये
जन्मकांडे नाम प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥
था कि मानो शिवजी धरणीका रूप धारण किये हुए हैं और अपने ही हाथसे अपनेपर मोतियोंकी वर्षा कर रहे हैं। ६२ ॥ ६३॥ सर्ज, अर्जुन, बीजपूर आदिके वृक्षोंसे ऐसा मालूम होता था कि वे सब बगीचेको पंखा झल रहे हैं। नारियल तथा खजूरके वृक्ष छत्र धारण करनेवाले सेवक जैसे थे। अमद, पिचुमन्द, मन्दार, कोविदार, पाटल, तिन्तिणी, धोंटा, शाखोट, करहाटक, ऊँचे डण्डेवाले सेहुंड और गुंडहूलक वृक्ष भी उस बगीचेमें यत्र-तत्र लगे हुए थे। बकुल और तिलकके वृक्ष उस बगीचेके मस्तकपर तिलकके समान मालूम पड़ते थे ॥ ६४-६६ ॥ अक्ष, प्लक्ष, सल्लकी, देवदारु, हरिद्रुम, सदाफल, सदापुष्प और वृक्षवल्ली आदिके वृक्ष भी उस बगीचेमे लगे हुए थे ॥ ६७ ॥ इलायची, लौंग, मरिच तथा कुलंजनके वृक्षोंसे वह समस्त बगीचा भरा हुआ था। जामुन, आम्र, भल्लातक, श्रीपर्णी आदि वृक्षोंसे उस बगीचेकी रंगीली शोभा देखते ही बनती थी ॥ ६८। शाक तथा शलवनके वृक्षोंसे रमणीक एवं चन्दन, हरीतकी, कर्णिकार, आंवला आदिके वृक्षोंसे वह विभूषित था ॥ ६९ । जिनमें सैकड़ों अंगूरकी लताएं तथा पानकी बेले रमी हुई थीं। मल्लिका, जूही, कुन्द और मदयन्तीके वृक्षोंसे वह बगीचा सुगन्धित हो रहा था ॥ ७० ॥ उसमें कितने ही तुलसी, सहिजन तथा अगस्तके वृक्ष लगे हुए थे जिनपर भौंराकी श्रेणी चक्कर काट रही थी, ऐसी मालतीके वृक्षोंसे वह अलंकृत था ॥ ७१ ॥ जिस समय मालतीके समीप भौंरा आता था, तब देखनेवालेके हृदयमें यह उत्प्रेक्षा होती थी कि मानो श्रीकृष्ण गोपियोंके साथ विहार करनेके लिए आये हैं ॥ ७२ ॥ उस बगीचेमें बहुतसे मृग चोकड़ियां भरा करते थे, विविध प्रकारके पक्षी बोलते रहते थे, कितनी ही नदियों तालाबों, स्रोतों तथा गडहोंसे वह बगीचा घिरा हुआ था ॥ ७३ । बगीचेके वृक्षोंसे गिरे हुए फूल किसी दानीकी धनराशिके समान लगते थे। मयूरोंकी आवाजसे ऐसा मालूम पडता था कि मानों वह बगीचा अपने यहाँ आनेवालोंका स्वागत कर रहा है ॥ ७४ ॥ इस प्रकारके उस सुन्दर उपवनको सीताने देखा । देखते ही उनका चित्त प्रसन्न हो गया और वे इधर उधर घूमने लगीं ॥ ७५ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये जन्मकाण्डे पं० रामतेजपाण्डेयकृत'ज्योत्स्ना'भाषाटीकायां प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥
२९८ आनन्दरामायणे [ सर्गः २
द्वितीयः सर्गः
( रामसीताका उपवनविहार )
श्रीरामदास उवाच
अथ सीता राघवेण रम्योपवनभूमिषु । क्रीडञ्चकार विविधाश्चिन्त्यैरपि सुरैर्नुताः ॥ १ ॥
कदा वनान्तःप्रागङ्गे कदा वस्त्रगृहेष्वपि । कदाऽऽम्रवृक्षच्छायायां कदा पुष्पवनेषु सा ॥ २ ॥
कदा सा जलप्रश्रावां सर्वयन्त्रवरासने । कदा सरोवरतटे कदा नगान्तरेऽपि च ॥ ३ ॥
नौकास्था मन्दतोये सा रामेणञ्चक्रे कदा । कदा रात्रौ जलक्रीडामथ दिनाऽपि कदा मुदा ॥ ४ ॥
कदा तटाके नौकास्था कदा रम्यावनेषु सा । कदा वृक्षोध्वगेहेषु कदलीगृहेष्वपि ॥ ५ ॥
कदा सा सुरयन्त्राणां निर्मितेषु गृहेषु वा । कदा कृत्रिमगेहेषु पुस्तगेहेषु सा कदा ॥ ६ ॥
कदा सा चित्रशालायां पुष्पके वा कदा मुदा । कदा सा केतकीपत्रैः कृतकञ्चुकमम्बरनि ॥ ७ ॥
कदा नौकोर्ध्वगेहस्था गन्धर्वाः सैकते कदा । एकस्तम्भोर्ध्वगेहेऽपि सखीभिः परिवेष्टिता ॥ ८ ॥
कदा रामेण रहसि कदा दोलकसंस्थिता । पर्यङ्कचक्रमध्यस्था कदा सा दाडिमीवने । ९ ।
सूक्ष्मवस्त्रपर्यङ्कसंस्थिता राघवेण हि । चकार सा कदा क्रीडां षोड़शांगी सुसुन्दरी ॥१०॥
हरिद्वस्त्रयुतस्कन्धयुक्ता जातकौतुका । गोपयित्वा निजं देहं सीता वृक्षदलैर्धनैः ॥११॥
सकार व्याकुलं रामं विनोदेन स्मितानना । ज्ञात्वात्मानं राघवेण दृष्टां मत्वाऽथविध्य च ॥१२।
दुद्राव संभ्रमाद्रामं कण्ठे दोर्लतयोर्बभौ । एवं सीताराघवयोः क्रीडनं परमाद्भुतम् ॥१३॥
विस्तारेणेह को वक्तुं समर्थः पृथिवीतले । एक एव समर्थोऽभूद्वान्मीकिर्मुनिपुंगवः ॥१४॥
शतकोटिमितं येन चरितं वर्णितं तयोः । सारं सारं मया यस्माद्गृह्यते तत्प्रवर्ण्यते ॥१५॥
गन्धर्वीणां कदा नृत्यं सीताऽपश्यद् ददर्श सा । कदा शुश्राव वाद्यानि मङ्गुलानि महोति च ॥१६॥
श्रीरामदासजी कहते हैं इसके बाद सीता रामचन्द्रजीके साथ उस रमणीक उपवनमें देवताओं द्वारा प्रशंसित विविध प्रकारकी क्रीड़ायें करने लगीं ॥ १ ॥ कभी उस बगीचेके बगलेमें, कभी तम्बूके भीतर, कभी शाम्रवृक्षकी छायामें कभी फूलोंकी शय्याओंमें कभी फौव्वारेके समीप बने हुए किसी एक सुन्दर आसनपर, कभा सरोवरके तटपर और कभी नहर के समीप जाकर बिहार करती थीं ॥ २ ॥ ३ ॥ कभी वे नौकापर सवार होकर मन्दगति मन्दम गन्धके साथ बिहार करतीं थीं कभी रात्रिके समय और कभी दिनमें ही जल-क्रीडा करती थीं ॥ ४ ॥ कभी सरोवरमें नौकापर कभी-कभी उत्तम तथा वृक्षके ऊपर बने हुए भवनमें, कभी सुन्दर सुन्दरालय कभी कदली भवन कभी अन्य भवनोंमें, कभी बनावटी मकानोंमें, कभी पुस्तकोंकी कभी चित्रण कभी मण्डप विमानपर कभी मयूरके समूह और कभी एक खम्भेके ऊपर बने भवनमें समय साथ बिहार करती थी । ५-८ । कभी नौका के ऊपर बने बंगलेमें, कभी बालूकी वेदीपर कथा अपनी सखियोंके सहित एक खंभपर ऊपर बनी हुई जगह अंदर जाकर कभी रामके साथ एकान्तमें कभी झूलेपर बैठकर, कभी चक्करदार पलंगपर कभी अनारके बगीचेमें और कभी किसी वृक्षके समान पड़े हुए पलंगपर सुहावने वस्त्रोके दुकाल सीता रामके साथ साठ क्रीड़ा करती थी । ८-१० । वे कभी हरे रङ्गके कपड़े तथा साठ कंचुकी पहनकर रामके साथ क्रीड़ा करती हुई वृक्षोंके घने पत्तोंमें छिपकर रामको व्याकुल कर देतीं और स्वयं सिर्फ हँसी मुखपर रखती थीं । जब वे समझतीं कि रामने लख लिया है तो दौड़ती हुई आतीं और रामके गलेमें गलबहियाँ डालकर उनके हृदयसे लिपट जाती थीं । इस प्रकार सीता तथा रामका अद्भुत कौतूहल हुआ करता था ॥ ११-१३ ॥ इस विस्तारपूर्वक कहनेको सामर्थ्य भला किसीमें है ? हाँ एकमात्र महर्षि वाल्मीकिजी समर्थ हुए थे, जिन्होंने सौ करोड़ श्लोकोंमें उनके चरितोंका वर्णन किया है । उनमेंसे सार-सार लेकर मैं तुमसे कह रहा हूँ । १४ । १५ ॥ कभी सीताजी उस बगीचेमें वेश्याओंके नृत्य देखती थीं
सर्गः २ ] | जन्मकाण्डम् | २९९
| सर्गः २ ] | जन्मकाण्डम् | २९९ |
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कदा चित्रकथा रम्यारवेणूत्थानानि वा कदा । कदा दन्तरुहोत्तादिकौतुकानि ददर्श सा ॥१७॥
कदा सम्मोहनं दिव्यं दृश्यं कौतुक महद् । कदा रम्भास्तम्भशूल्कं वस्त्रग्रंथिविनिर्मितम् ॥१८॥
कदा कृत्रिमहस्त्यादिनाणारूपाणि वै वने । सीता ददर्श कुशलैश्चातुर्यान्मृगतान्पयि ॥१९॥
एवं सीतोऽश्रममध्ये मासमेकं निनाय सा । ययौ रामेण नगरीं नृत्यगीतादिभिः शनैः ॥२०॥
सौधस्थानिः पुरस्त्रीभिर्विना कुसुमादिभिः । नीराजिता कुम्भदीपेर्दीपैदपोदनोद्भवैः ॥२१॥
माषतिलसर्षपार्यैर्नानाबलिभिगदगद् । ययौ निजगृहं सीता राघवेण समन्विता ॥२२॥
एवं नानाकौतुकैश्च नानादोहदपूरणैः । रामपत्नीं रमयामास माऽपि रामं स्वलीलया ॥२३॥
षष्ठे मासे त्वथ प्राप्ते सीतया राघवो मुदा । सीमन्तोन्नयनं चैव वसिष्ठेन चकार सः ॥२४॥
सुमेधां जनकं चापि समाहूयादरेण वि । ददौ दानान्यनेकानि ब्राह्मणेभ्यो रघूत्तमः ॥२५॥
जनकः पूजयामास रामं स्वान्यसुतयुतम् । कौसल्यादांश्च संक्लैन्वामिनो वसनादिभिः ॥२६॥
पौराश्च सुहृदः सर्वे भोजनार्थं विदेहजाम् । स्वस्वगेहं पुत्राऽनिन्युः श्रीरामादिमहोत्सवैः ॥२७॥
नानावाद्यनिनादैश्च वरस्त्रीनृत्यगायनैः । स्त्रीमुखपुष्पवर्षैर्नानाकौतुकदर्शनैः ॥२८॥
नानादेशनिवासिन्यः कोटिशश्चा नृपस्त्रियः । समाययुर्योध्यायां सीतां द्रष्टुं मुदान्विताः ॥२९॥
तया सैन्यैश्च सर्वत्र वेष्टिता नगरी बभौ । ताः सदा नृपपत्न्यश्च सीतायाः परमान् वरान् ॥३०॥
दोहदान् पूरयामासुर्दिव्यवस्त्रादिसादरम् । ददुर्वस्त्राण्यलङ्कारान् दिव्यांश्चित्रविचित्रितान् ॥३१॥
स्वस्वदेशोद्भवोद्देषनानाहस्त्यादिसादगत् । जानकीं पूजयामासुस्ताः सर्वाः पार्थिवस्त्रियः ॥३२॥
स्थिन्त्वा ता मासमेकं तु जग्मुर्दैवं निजं निजम् । अथैकदा तु श्रीरामः सुमेधा जनक तथा ॥३३॥
सीतायाः पुरतः प्राह गुह्यं रहसि हम्स्थितम् । सीतामदृष्ट्वा साभिध्ये क्षणञ्च विरद्वेष ताम् ॥३४॥
कभी मधुर तथा पत्रपोर अथवा बाजाका धुन सुनती थी। कब विविध प्रकारका चित्र देखती थी, कभी बाजीगरो और बाँसपर चढ़कर नटवरन के करतूत खेल देखा करती थी ॥ १७ ॥ ॥ १८ ॥ कभी स्तम्भके सुन्दर कौतूहों तथा मुख्यसभामे वैदा कलात्मक काज तब कला बनावटी हाथ आदिके विविध रूपाको देखा करती थी ॥१९-०१९॥ इस तरह सीताजी उस बग़ीचाम एक महीना बिताया। फिर नृत्य-गीतादिक देखती-सुनती हुई रामचन्द्रके साथ अपनी नगरी अयोध्याको लौट आयीं ॥ २० ॥ जब सीता और रामने नगरमें प्रवेश किया, उस समय नगरके स्त्रियोंने अंटारीपर चढ़कर उन दोनोपर फूलोकी वर्षा की, आरती उतारी और दही, भात, उड़द, तेल तथा सरमों आदिके बलि दिये। तब राम सीताके साथ अपने महलको गये ॥ २१ ॥ २२ ॥
इस तरह विविध प्रकारका अभ्यास रामने माताजी तथा सतान रामको आनन्दित किया ॥ २३ ॥ जब गर्भका छठौं महीना आया तब राघवने अपने कुलगुरु वसिष्ठके द्वारा सीताका सीमन्तोन्नयन संस्कार कराया ॥ २४ ॥ सुमेधा और जनकके पास निमत्रण भेजकर उन्हें अपने यहाँ बुलवाया और ब्राह्मणोंको रामने विविध प्रकारक दान दिये ॥ २५ ॥ जनकने आकर सीता तथा अपने सब भाइयोंके साथ बैठे हुए राम और कौसल्यादि माताओका नाना प्रकारके वस्त्राभूषणों द्वारा सत्कार किया ॥ २६ ॥ अयोध्यावासी नागरिकों तथा मित्रोंने रामचन्द्र और सीताको अपने यहाँ भोजन करनेके लिए बुलाया ॥ २७ ॥ अनेक बाजोके साथ-साथ वराङ्गनाओंके नाच-गान हुए स्त्रियोंके हाथसे फूलोंकी वर्षा हुई और कितने ही तरहके खेल-तमाशे हुए ॥ २८ ॥ उस समय सीताको देखनेके लिए प्रत्येक देशकी राजनारियाँ अयोध्या आयीं। २९ ॥ उनके साथ आयी हुई सेनासे घिरकर वह अयोध्या नगरी और भी सुन्दर लगने लगीं। उन रानियोंने अभादि देकर सीताकी इच्छा पूर्ण की और आनन्दपूर्वक बहुतसा वस्त्र-अलंकार तथा अपने देशके विशिष्ट वस्तुएं देकर सीताकी पूजा की ॥ ३०-३२ ॥ वे रानियां एक महीना अयोध्यामे रहकर अपने अपने देशको लौट गयीं। एक दिन जब कि सुमेधा, जनक, सीता तथा रामचन्द्र एकान्तमें बैठे थे । तब रामने कहा- हे महाराज ! सीताको अपने पास न छल तथा क्षणभर भी उनके वियुक्त होकर मैं नहीं रह सक्ता। जब सीताके पास पहुँच
३०० आनन्दरामायणे [ सर्गः २
मयाऽऽलभ्य तन्मुखेन्दुसुधया स्वास्थ्यमाप्यते । आत्मानं विह्वलं दृष्ट्वा सीतामाश्रित्यमाश्रये । ३५॥ अधुना जानकीं दृष्ट्वा कामो मेऽतीव बाधते । पञ्चमासोर्ध्वतः सङ्गं गर्हयन्ति मुनीश्वराः । ३६॥ प्रसूत्यर्थं पञ्चमासं स्त्री स्वास्थ्यं प्राप्यते पुनः । पञ्चममार्गविनः सङ्गादपत्योः क्षाणतेरिति । ३७। अत्र किं करणीयं हि वद त्वं श्वशुराय माम् । चेत्प्रेषणीया सीतेयं मिथिलां प्रति वै मया । ३८॥ तर्हि तत्रापि मे गन्तुं मविष्यति समुद्यमः । किञ्चित्कालं तु सीताया वियोगो येन मे भवेत् । ३९॥ उपायः संविधातव्यश्चिन्तितोऽस्ति मयाऽपि च । लोकापवादभीत्याऽहं रजकोक्तेश्छलादपि । ४०॥ गङ्गाया दक्षिणे तीरे वाल्मीकेराश्रमे शुभे । त्यजामि जानकीं शुद्धां किञ्चित्कालान्तरात्पुनः॥४१॥ एनां ममानयिष्यामि प्रत्ययं मां प्रदास्यति ।ततोऽनया चिरं कालं नानाभोगान भजाम्यहम् ॥ ४२॥ जनकोऽथ त्वया तत्र निजपत्न्या सुमेधया । वाल्मीकेराश्रमे गत्वा स्थेयं वर्षाणि पञ्च वै ॥४३॥ तथेत्यङ्गीचकाराथ जनकोऽपि सुमेधया । सीताऽप्यङ्गीचकाराथ विहस्य तद्वचः पतेः ॥४४॥ अथ रामो ददावाज्ञां सप्रियं जनकं मुदा । मगन्त्वा मिथिलाराज्ये स्वायं संस्थाप्य मन्त्रिणाम् ॥४५॥ ययौ सुमेधया शीघ्रं वाल्मीकेराश्रमं मुदा । किंचिद्दासीदामनेन्यवाशिवारणवेष्टितः ॥४६॥ नानोपचारानीतार्थे मगृश्च शकटादिभिः । चकार गेहं विपुलं वाल्मीकेश्च सुखावहम् ॥४७॥ सर्वसम्पत्तिमंयुक्तं बहुगोमहिषीयुतम् । पूरितं धान्यसंघैश्च वस्त्रैराभरणादिभिः । ४८। कामारोपवनारामपुष्पवाटिशताङ्गतम् । गवाक्षैश्चन्द्रकान्तानां कपाटैश्च समन्वितम् ॥४९॥ कृष्णागुरुसकर्पूरैःशीतमल्यादिमादिभिर् । कांचनैःशृङ्खलारत्नैरत्नपर्यङ्कमण्डितम् ॥५०॥ हंसापायतपिककेकांशुकनिनादितम् । मुक्तागुच्छवितानाद्यैः शोभिनं चित्रिताश्वितम् । ५१॥
आता हूँ तो इनके मुखचन्द्रकी सुधासे स्वस्थ हो जाता हूँ । जिस समय मुझको कुछ भी घबराहट होती है, उस समय में सीताके ही समीप रहता हूँ ॥ ३३-३५ । इस समय सीताको देखकर मुझ कामपीड़ा हो रही है और मुनियोंकी सलाह यह है कि गर्भ वःह हो जानेपर पाँच महीने बाद स्त्रीप्रसङ्ग करना निन्दित है ॥ ३६ ॥ प्रसव होनेके अनन्तर पाँच महीने बाद ही स्त्री स्वस्थ होती है। बिना पाँच महीने बाद प्रसङ्ग करनेसे दोनोंको हानि ही हानि है। ऐसे असमञ्जसके समय मुझे क्या करना चाहिये, सो आप बतलाइये। यदि मैं सीताको मिथिला भेज देता हूँ तो मुझ को भी वहाँ जाना पड़ेगा। किन्तु मै कुछ दिन तक सीतासे अलग रहना चाहता हूँ। जिस तरह मेरा इच्छा पूर्ण हो, वही इस समय करना चाहिए। मैंने तो यह सोच रक्खा है कि लोकापवादके डरसे अथवा उस धाबीके ख्यालसे गङ्गाके दक्षिण तटपर वाल्मीकिके पवित्र आश्रमम कुछ समयके लिए परम शुद्ध जानकी को छोड़ दूँ। थोड़े दिन बाद शास्त्र ले आऊँगा फिर मैं इनके साथ चिरकालतक नाना प्रकारके भोगांको भोगूंगा ॥ ३७-४२॥ उस समय आपको अपनी सुमेधाके साथ वाल्मीकिके आश्रमपर जाकर पाँच वर्ष पर्यन्त निवास करना होगा ॥ ४३। सुमेधा और जनकने रामकी सलाह स्वीकार की और सीताने भी हँसकर पतिका कहना मान लिया ॥ ४४। इसके अनन्तर रामने जनकको अपन देश जानकी आज्ञा दी। वे अपने देश गये और राज्यका सब भार मन्त्रीपर छोड़कर अपनी स्त्री सुमेधाके साथ वाल्मीकि ऋषिके आश्रमको चल दिये। चलते समय अपने साथ कुछ दास, दासी, सैनिक तथा हाथी-घोड़े भी ले लिये । ४५ ॥ ४६ ॥ सीताके लिए बहुत सी सामग्रियाँ गाड़ियोंपर लदवाकर साथ ले गये। महर्षि वाल्मीकिके आश्रमको जनकने सब सुखांका भण्डार बना दिया । ४७ ॥ जनकजीके वहाँ पहुंचतेही वह आश्रम सब सम्पत्तियों एवं बहुत सी गौओ और भैंसोंसे भर गया । विविध प्रकारके अन्नों और भाँति-भाँतिके वस्त्राभूषणों से वह पूरा हो गया । ४८ ॥ अनेक पास सैकड़ों पसार, उपवन, बगीचे बावड़ी तथा कुएं तैयार हो गये । चन्द्रकान्त मणिके दरवाजों तथा फटकाबाल भव्य भवन बने । ४६ ॥ कृष्णागुरु, कपूर, खस तथा विविध प्रकारके सुगन्धित द्रव्योंसे वह आश्रम सुगन्धमय हो गया जगह-जगह पर सोनेकी जंजीरोंसे सुसज्जित पलङ्ग पड़ हुए थे ॥ ५० ॥ हंस, कबूतर, कोयल, मयूर तथा तोतोंके शब्दोंसे
सर्गः २ ] जन्मकाण्डम् ३०१
एवं मनोहरं गेहं सीताथं जनकोऽकरोत् । श्रीः साक्षाद्..तमुद्युक्ता यस्मिन्वसितुं चिरम् ॥५२॥
किं दुर्लभं हि तत्रास्ति वर्णनीयं मयाऽथ किम् । यस्या नेत्रकटाक्षेण शक्रादीनां विभूतयः ॥५३॥
वाल्मीकये सर्ववृत्तं जनकोऽपि न्यवेदयत् । मुनिधाप्यतिमंतुष्टो मेने स्वसपसः फलम् ॥५४॥
इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये जन्मकाण्डे द्वितीयः सर्गः । २ ।
तृतीयः सर्गः
( राम द्वारा सीताका त्याग )
श्रीरामदास उवाच
अथ रामं तु कौसल्याऽब्रवीद्रहसि संस्थिता । सीतां सीमोल्लङ्घनार्थं शीघ्रं प्रेषय राघव ॥१॥
तन्मातुर्वचनं श्रुत्वा तथेत्युक्त्वा सत्रिस्तरात् । सलक्ष्मणां निजांपत्नीं प्राह सम्मन्त्रिनं पुरः ॥२॥
वाल्मीकेराश्रमं सीतात्यागादि च सकारणम् । अथ मासेऽष्टमे प्राप्ते राधो राजीवलोचनः ॥३॥
एकान्ते जनकीं प्राह रीजयन्ता लक्ष्मणेन हि । कम्पयित्वा मिषा देवि रजकोक्तं त्वदश्रयम् ॥४॥
त्यजामि त्वां वने लोकवादाद्भीता इवापरः । त्रिमान्मार्ध्वञ्चमासाद्वाः सम् मामामुयुदाद्भिः ॥५॥
अन्तर्वत्नी न गच्छेति शास्त्राज्ञां रजकच्छलात् । त्वां त्यक्त्वा पालयिष्यामि निकटे वस्तुमक्षमाः ॥६॥
त्वां दृष्ट्वा संवदन्त्यां कामो मेन्मान बाधते । त्वद्वियागस्तु निर्बन्ध्वानिना मन्त्र कथं भवेत् ॥७॥
तस्मात्कृताऽयं निर्ग्रन्थः सत्यं विद्धि मनोरथं । पञ्चवर्षानन्तरण पुनरागत्य मण्डलेऽकम् ॥८॥
लोकानां प्रत्ययार्थं त्वं शपथं हि करिष्यसि । भूमेर्धिवरमार्गेण स्थित्वा मिहायसोपरि ॥९॥
वह आश्रम शब्दरायमान हो रहा था। यत्र तत्र मोतियोंका झालरवाली चाँदनियाँ टॅगी हुई थीं और बहुत-सी तसवीर भी जहाँ-तहाँ टॅगी थीं ॥ ५१ ॥ जनकजी ने सीताके लिए इस प्रकारका सुन्दर भवन बनाकर तैयार करवाया। यदि ऐसा दिव्य भवन सीताजीके वास्ते बन गया तो इसमें आश्चर्य ही क्या है। जहां निवास करनेके निमित्त साक्षात् लक्ष्माजी जन्मवाला हा, वहाँ कौन वस्तु दुर्लभ हो सकती है। जिसके कटाक्षमात्रसे इन्द्रादि देवनाओंकी भा सम्पत्तियां बनतानबगटता है। उसके विषयमें मैं कहाँ तक वर्णन करूंगा। जनकजीने महर्षि बाल्मीकिको भी वह सब बात बतला दी, जिसे सुनकर वे बहुत प्रसन्न हुए और सीताके उस भावी आगमनको उन्हान अपनी तपस्याका फल समझा ॥ ५२-५४ ॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयात्मजविरचित ज्योत्स्ना भाषाटीकासमन्वित जन्मकाण्ड द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥
श्रीरामदासने कहा—एक दिन एकान्तमे कौसल्याने रामसे कहा कि अब समय हो गया है। शीघ्र सीताको अपनी सीमासे कहीं अलग भेज दो। माताकी बातको रामने स्वीकार किया और वह भी बतलाया, जिसका निर्णय बहुत दिनों पहले कर चुके थे ॥ १ ॥ २ ॥ फिर यह भी कहा कि मेरा इस समय सीताका त्याग करना उचित है। कुछ दिन बाद आठवाँ महीना लगनेपर रामने सीताको एकान्तमें बुलाकर समझाते हुए कहा—देवि ! उस दिन एक धोबीने तुम्हारे विषयमें बड़ा कुत्सित आलोचना की थी उसीके बहाने मैं तुम्हें कुछ दिनोंके लिए वनमें छोड़ दूंगा। इससे दुनिया समझेगी कि मैं लोकापवादसे बहुत डरता हूँ। दूसरी एक बात यह है कि गर्भसे तीसरे, पाँचवे अथवा सातवे महीनेमें स्त्रीका सङ्ग नहीं करना चाहिए। यह शास्त्रोंकी आज्ञा है। इसलिए उस धोबीकी बातके व्याजसे तुम्हें दूर रखकर मैं शास्त्रकी आज्ञाका पालन करूंगा और पास रहनेमें यह न हो सकेगा कि मैं तुमसे न बोलूँ ॥ ३-६ ॥ क्योंकि तुमको देखनेसे मुझे काम सताने लगता है। तुम्हारा वियोग भी बिना किसी बहानेके नहीं हो सकता था। इसलिए मैंने ऐसा प्रबन्ध किया है और इस समय मैं जो कुछ कह रहा हूँ, उसे अक्षरशः सत्य समझो। पाँच वर्षके बीतते ही तुम फिर यहाँ आओगी और संसारको दिखानेके लिए तुम्हें शपथ लेनी होगी ॥ ७ ॥ ८ ॥ ९ ॥
३०२ आनन्दरामायण [ सर्गः ३
यदा गच्छसि पातालं जगन्त्या पूजिता तदा । भुवस्तुन्दा मीषयित्वा त्वामंके स्थापयिष्यहम् ॥१०॥ पुत्राभ्यां च मया सीते ततो भोगानवाप्स्यसि । मत्स्वकः कुश्रो ज्येष्ठस्तव पुत्रो भविष्यति ॥११॥ सुम्भवः प्रभावेण भविष्यत्यपरो लवः । वाल्मीकेराश्रमे चैवं कुमारी द्वौ भविष्यतः ॥१२॥ अग्रे गत्वा त्वन्मात्रिप्रा स्वच्छापं च गृहादिकम् । मसुमेधन सकलं कृतमस्ति ममाज्ञया ॥१३॥ कुरुष्वाद्य मया यच्चोच्यते जनकात्मजे । सात्त्विकी त्वं यथापूर्वं दंडके गौतमीतटे ॥१४॥ अज्ञानाने स्थिता यद्वन्मे वामभागे तथाधुना । वाल्मीकेराश्रमे गन्तुं शुजद्वयविमिश्रिता ॥१५॥ भूत्वा स्वमाश्रमे स्थित्वा मद्धियोगं प्रदर्शय । तत्रापि त्वां कुशोत्पत्तौ दास्यामि दर्शनं रहः ॥१६॥ तथेति रामवचनाज्जानकी सा स्मितानना । रजनमोमयीं स्वर्चा छायां निधाय सादरम् ॥१७॥ अंशाथपस्य वामांगे सत्त्वरूपा लयं ययौ । ततो रामः सभां गत्वा रत्रौ ज्ञानैकविग्रहः ॥१८॥ मविविधर्मयत्त्रासुदेलमुखैर्यथोक्तकैः । समन्ततो वेष्टितः संस्तस्थौ सिंहासनोपरि ॥१९॥ तत्रोपविष्टं राजानं सुहृद पर्युपासिरे । हास्यप्रायकथा भिश्च हासयन्तः स्थिताः सुखम् ॥२०॥ अथ प्रसङ्गात्पप्रच्छ रामो विजयनामकम् । पौरा जानपदा वा म किं वदन्ति शुभाशुभम् ॥२१॥ सीतां तां मातरं वा मे भ्रातृन्वा कैकयीमथ । न भेतव्य त्वया ब्रूहि शापितोऽसि ममापरि ।२२। इत्युक्तः प्राह विजयो देव सर्वे वदंति ते । कृतं सुदुष्करं कर्म रामेणाविदितात्मना ॥२३॥ यद्याप्येवं वदन्ति स्वां जनास्तच्चे वदाम्यहम् । किंतु हन्त्वा दशग्रीवं सीतामाहृत्य राघवः ॥२४॥ अमर्षे पृष्ठतः कृत्वा स्ववेश्म प्रत्यपादयत् । कीदृश हृदयं तस्य र्भतामभागजं सुखम् ॥२५॥
समय तुम अब एक दिव्य सिंहासनपर बैठकर भूमिके विवरमार्गसे पातालको जाने लगोगी । तब मैं भूमिकी प्रार्थना करके या धमकाके तुम्हें वापस ले लूँगा और अपने गोदमें बिठाऊँगा ॥ ९ ॥ १० ॥ उस समय तुम अपने दो बेटोंको लिय हुए मेरे साथ रहकर विविध प्रकारके सुख भोगोगी। मेरे द्वारा मुझसे एक पुत्र होगा, जिसका नाम पडेगा कुश और दूसरा बेटा ऋषि के कृपावरके प्रभावसे उत्पन्न होगा, जिसका नाम होगा लव । इस प्रकार वाल्मीकिके आश्रमपर तुम्हारे दो पुत्र होंगे ॥ ११ ॥ १२ ॥ तुम्हारी माताके साथ जनकजी पहले ही उस आश्रमपर जा चुके हैं और उन्होंने तुम्हारे आगमनकी सब सामग्रियाँ प्रस्तुत कर दी है । १३ ॥ आज मैं तुमको जैसा कह रहा हूँ हे जनकात्मजे ! तुम्हें वही करना पडेगा। जैसे उस समय गौतमीके तट-पर तुमने अपनी दो मूर्तियाँ बनाया थी । उसी प्रकार इस समय भी अपनी दो स्वरूप बनाओ और पहलेकी नाई इस समय भी तुम सात्विक रूपमें मेरे बाम अंगमें निवास करो । १४ ॥ १५ ॥ और दूसरे स्वरूपसे वाल्मीकिके आश्रमपर रहकर संसारको मेरे वियोगका दुःख दिखलाओ। आश्रमपर भी जब कुशका जन्म होगा, उस समय आकर मैं तुम्हें एकान्तमें दर्शन दूंगा । १६ ॥ रामकी बात सुनकर सीताजी मन्द मुस्कराहट के साथ 'तथास्तु' कहा और रजोगुणमयी तथा तमोगुणमयी संता अपनी छाया नामक दक्षिण भागमें बैठ गयी और सत्त्वरूपसे रामके वाम भागमें विलीन हो गयी ॥ १७ ॥ इसके बाद रामचन्द्रजी सभाभवनमें गये । वहाँ मन्त्रणानिपुण मन्त्रियों तथा कितने ही दरबारियोंसे वेष्टित होकर बैठे। मित्रोने उस समय भगवान्की विविध प्रकारसे पूजा की। तत्पश्चात् तरह-तरहकी हँसी-दिल्लगीकी बात कर-करके वे परस्पर मनोविनोद करने लगे । १८-२० ॥ प्रसंगवश रामने विजय नामक एक गुप्तचरसे पूछा कि इस समय अयोध्यावासी लोग मुझ किस दृष्टिसे देखते है। उनकी दृष्टिमं मेरा शासन कैसा है वा खराब ? इसके अतिरिक्त सीता मेरी मात, भा, भाइया अथवा कैकईके प्रति लोगक हृदयमं कमानभाव है। किसी प्रकार डरो मत, जो कुछ मालूम हा साफ़-साफ़ बतला दो । तुम्हे मेरा शपथ है। इस प्रकार रामक पूछनपर विजयने कहा-हे देव ! आपके किये महान् कार्यों की सराहना करते हुए लोग प्रशंसा ही करते है ॥ २१-२३ । फिर भी आपके विषयमे कुछ लोगोका जो दूसरा राय है। उसे भी बतलाता हूँ, वे कह रहे कि रामने रावणको मारकर सीताको उससे छुड़ाया और बिन कुछ सोच-विचार अपन घरमं बिठाल लिया। हम नहीं समझते कि रामका
सर्गः ३] उत्तरकाण्डम् ३०१
सा हृता विजने पूर्वं रावणेन वने तदा। अकस्मादपि दुष्कर्म योषित्स्वमर्षदं भवेत् ॥२६॥
यादृग्भवति वै राजा तादृश्यो नियमाः प्रजाः। इति नानाविधा वाचः प्रवदन्ति पुरेजनाः ॥२७॥
अपरञ्चिन्तयन्पश्यामि सांप्रतं रजकोदितम्। दुर्भागां स्वगृहाद्भार्यां कीदृशेन यः ॥२८॥
रजकः प्राह मोऽङ्गे मोऽहं रामो न मैथिलीम्। शरण्य शुद्धे स्पष्टं स्थित्वामगीचकार यः ॥२९॥
यथेच्छं गच्छ रंडे त्वं नाहं रामवदाचरे। गच्छता च मया मार्गे रजकेन ममोदितम् ॥३०॥
इति राम श्रुतं पूर्वं मया दृष्टं निवेदितम्। यत्पथ्यमि हितं चात्र तत्कुरुष्व रघूत्तम ॥३१॥
श्रुत्वा तद्वचनं रामः स्वजनांश्चाप्यपृच्छत्। तेऽपि तन्माञ्जब्रुवन् राममेवमेतन्न संशयः ॥३२॥
ततो विसृज्य सचिवाग्विजयं सुहृदस्तथा। ग्राहूय लक्ष्मणं रामो वचनं चेदमब्रवीत् ॥३३॥
लोकापवादस्तु महान्संयातामद्यैव मेऽभवत्। सीतां प्रातः समारोप्य वाल्मीकेराश्रमांतिके ॥३४॥
त्यक्त्वा शीघ्रं रथेन त्वं पुनरायाहि लक्ष्मण। वक्ष्यमे यदि वा किंचिदत्र मां हतवानसि ॥३५॥
छित्त्वा सीताभुजं नोऽद्यप्रत्ययार्थं समानय। इत्युक्त्वा लक्ष्मणं रामः कैकेयीं श्रूङ्गुमाययौ ॥३६॥
एतस्मिन्नन्तरे सीतां कैकेयी रहसि स्थिता। पप्रच्छ कौतुकात्सीते भित्तीलिख्य दशाननम् ॥३७॥
मामग्र दर्शयस्वाथ तां प्राह जानकी तदा। मयाऽवलोकितो नैव कदाऽपि स दशाननः ॥३८॥
यदा हर्तुं पंचवट्यां मां भ्रामो गौतम्यतटे। तदा दृष्टस्तदङ्गुष्ठो मया दक्षिणपादजः ॥३९॥
तन्सीतावचनं श्रुत्वा कैकेयी प्राह तां पुनः। यथा दृष्टस्त्वयांगुष्ठस्तथा भित्तौ लिखस्व हि ॥४०॥
तथेति जानकी लेख्य तदंगुष्ठ भयानकम्। कैकेय्यै दर्शयामास तापसंश्च गृहं ययौ ॥४१॥
हृदय कैसा है जो इतना अनर्थ होनेपर भी लोटा हुई माताके साथ विहार करते हुए सुखी हो रहे हैं ॥२४।२५॥ जो सीता उस दुष्टके द्वारा हरी गयी और कई वर्ष तक उसके घरमे रही, उसके लिए रामको कुछ सोच विचारनेकी आवश्यकता क्योंकर नहीं मालूम हुई ? उनका क्या बिगडा वे चाहे एक बार कोई दुष्कर्म भी कर लें तो कोई दृष्टि नहीं उठा सकता लेकिन इसका दुष्प्रभाव तो प्रजाके ऊपर पड़ेगा। यह साधारण नियम है कि जिस देशका जैसा राजा होता है, प्रजा भी वैसी ही हुआ करती है। इस प्रकारकी बातें बहुतोंके मुंहसे सुनी गयी हैं। एक धोबीने भी एक बात आपके बारेमें कही थी सो भी कहता हूँ। उसने कामवश अपनी व्यभिचारिणी स्त्रीको संबोधित करके कहा 'अरी ओ रण्डे ! मैं वह राम नहीं हूँ, जिन्होंने क्यों शरणके वशमें रही हुई सीताको अङ्गीकार कर लिया है। तेरी जहाँ इच्छा हो जा मैं रामकी तरह कर्म नहीं करूँगा और तुझे नहीं रखूँगा ॥२६-३०॥ मैं रास्तेमे चला जा रहा था, तब धोबीकी बात सुनी थी। सो पूछनेपर आपको बतला दी। अब आप जो अच्छा समझें, वह करें। विजयकी बातें सुनकर रामचन्द्रजीने अपने मित्रोंसे भी इस विषयमें पूछ-ताछ की। उन लोगोंने भी वही कहा जो विजयने बतलाया था। इसके बाद रामचन्द्रजीने मंत्रियों तथा विजयको बिदा कर दिया और लक्ष्मणको बुलाया। लक्ष्मणसे रामने कहा— हे लक्ष्मण ! सीताके कारण नगरमें लोग हमारी बड़ी निन्दा कर रहे हैं। इससे भी बढ़कर अपवाद होनेकी आशंका है। इसलिए कल सबेरे तुम सीताको रथम बिठाकर मुनि वाल्मीकिके आश्रमपर छोड़ आओ। इस बातके विपरीत यदि तुम कुछ कहोगे तो तुम्हें हमारी हत्या करनेका पाप लगेगा। हाँ, इतना और करना। उनसे छोटेके समय सीताकी एक भुजा भी काटकर ले आना, जिसे दिखाकर मैं अयोध्यावालोंको विश्वास दिला सकूँ॥। इतना कहकर राम कैकेयीके पास चल दिये। इसी बीच कैकेयीने आँगनमें बैठी बाते करते-करते सीतासे कहा-सीते ! इस दीवारपर रावणका चित्र लिखकर हमें दिखाओ कि वह कितना बड़ा था। इसके उत्तरमे सीताने कहा 'मैंने रावणको कभी देखा ही नहीं ॥३१ ३८ ॥ हाँ, जब वह पंचवटीमें मुझे हरनेके लिए गया था, तब मैंने उसके दाहिने पैरका अंगूठा देखा था। सीताका उत्तर सुनकर कैकेयीने कहा—अच्छा, उसका अंगूठा जैसा रहा हो, वही इस दीवारपर लिख दो। जानकीने कैकेयीके कथनानुसार दीवारपर उसके भयानक अंगूठेका चित्र लिखकर दिखा दिया और थोड़ी देर बाद अपने