भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 306

२९० आनन्दरामायणे [ सर्गः ९

तत्तस्या वचनं श्रुत्वा वर्णयामास जानकी। स्वपाणिग्रहणारभ्यः कुरुक्षेत्रावधिं कथाम् ॥ ८ ॥
लोपामुद्राऽपि तच्छ्रुत्वा विहस्य प्राह जानकीम् । सर्वं योग्यं कृतं सीते राघवेण महात्मना ॥ ९ ॥
एक एव वृथा क्लेशः कृतस्तेनेति चेन्मम । महान् श्रमः सेतुबन्धे किमर्थं हि कृतः पुरा ॥ १० ॥
कथं न कथितं कुम्भजन्मने राघवेण हि । सणार्वं चुलुके कृत्वा पीत्वेमं मूत्रमार्गतः ॥ ११ ॥
शुष्कं कृत्वा कपीन्मार्गोऽभविष्यदन एव हि । वृथा ते श्रमिताः सर्वे वानराः सेतुबन्धने ॥ १२ ॥
इति तस्या वचः श्रुत्वा सगर्वं जानकी तदा । लोपामुद्रां विहस्याह लोपामुद्रे पतिव्रते ॥ १३ ॥
सम्यक्कृतं राघवेण यन्सेतोर्बंधनं वरम् । तत्कारणं वदाम्यद्य शृणु त्वं स्वस्थमानसा ॥ १४ ॥
शृण्वन्विमाः समायाता मद्वाक्यं पार्थिवस्त्रियः । बाणेन शोषणीयश्चेन्मार्गो राघवेण हि ॥ १५ ॥
भविष्यति तदा हन्धा बह्वयश्चेति शङ्कितम् । उल्लंघनीयो जलधिर्वेदांशेव विहायसा ॥ १६ ॥
तदा गर्मं मनुष्यं च कदा ज्ञास्यति रावणः । हनुमत्पृष्ठमारुह्य गन्तव्यं चेत्परे तटे ॥ १७ ॥
लङ्कां प्रति तदा रामपौरुषं किं वदन्ति हि । यदि तीर्त्वा प्रगन्तव्यं बाहुभ्यां राघवेण हि ॥ १८ ॥
नोल्लंघनीयं विप्रस्य मूत्रं चेति विशङ्कितम् । चेन्मुनिः कुंभजन्मा वै प्रार्थनीयः पतिस्तव ॥ १९ ॥
रामेण चुलुकं कर्तुं तदा तल्लवणाम्बुधेः । अत्रैव राघवेणापि तदा हृदि विचारितम् ॥ २० ॥
पीतोऽयं जलधिः पूर्वं श्रुतं क्रोधादगस्तिना । मूत्रद्वारेण देवेभ्यो यस्मान्क्षारत्वमागतः ॥ २१ ॥
सर्वथा मूत्रसञ्चारः स कथं पातुमर्हति । स ऋषिर्धम वचनेन चुलुकं तु करिष्यति ॥ २२ ॥
भविष्यति ममाकीर्तिः सर्वत्र जगतीतले । मूत्रपानं ब्राह्मणेन स्वकार्यार्थं निजोक्तिभिः ॥ २३ ॥
कारितं येन रामेण सोऽयं चेनीति शङ्कितः । न मुनिं प्रार्थयामास राघवो धर्मतत्परः ॥ २४ ॥
एवं समन्त्य रामेण स्वकीर्त्यै सेतुबंधनम् । कृतं केनापि न कृतं न कोऽप्यग्रे करिष्यति ॥ २५ ॥
येन रामेण जलधौ शिलाः सत्तारिताः पुरा । सोऽय दाशरथी रामश्चेति ख्यातिं गतो भुवि ॥ २६ ॥

होते ! हे गजगामिनि ! तुम धन्य हो । हमारे कानोंको आनन्द देनेवाले रामजीके किसी पौरुषका तो वर्णन करो ॥ ७ ॥ लोपामुद्राका यह कहनेपर सीताने अपने विवाहसे लेकर कुरुक्षेत्रकी यात्रा पर्यन्तका समस्त वृत्तान्त कह सुनाया ॥ ८ ॥ लोपामुद्राने कथा सुनकर सीतासे कहा—हे सीते ! महात्मा रामचन्द्रने अबहतक जो कुछ किया वह बहुत ठीक किया । केवल एक बातम भूल गये और उन्होंने इतना क्लेश उठाया । मैं नहीं समझ पाया कि समुद्रपर चढ़ाई करते समय रामने समुद्रपर सेतु बनानेका कष्ट क्यों किया ॥ ९, १० ॥ उन्होंने अगस्त्यजीसे क्यों नहीं कह दिया, वे एक अञ्जल में भरकर क्षणभरमें उस सारे समुद्रको पी जाते ॥ ११ । समुद्र सूख जाता और कपियोंको समुद्र जानेके लिए मार्ग मिल जाता। नाहक सेतु बांधनेके लिए उन्होंने उन बानरोंको कष्ट दिया ॥ १२ । इस प्रकार लोपामुद्राकी बात सुनकर सगर्व वाणी से सीताजी कहने लगीं-हे पतिव्रता लोपामुद्रे ! रामने जो सेतु बाँधा, वह बहुत अच्छा किया । मैं उसका कारण भी बतलाती हूँ, भली प्रकार सावधान होकर सुनो ॥ १३ । १४ । यहाँ आयी हुईं ये राजरानियाँ भी सावधानसे मेरी बात सुनें । यदि राम अपने बाणसे समुद्रको सुखाते तो बहुतसे प्राणियोंकी हत्या होनेकी आशङ्का थी । यदि राम आकाशमार्गसे समुद्रको लांघ जाते तो रावण और वानर यह कैसे जानते कि राम मनुष्य हैं यदि हनुमान जीकी पीठपर चढ़कर चले जाते ॥ १५-१७ ॥ तब रामका क्या पराक्रम देख पड़ता ? यदि हाथोंसे तैरते हुए उस पार चले जाते ॥ १८ ॥ तब उन्हें यह ख्याल होता कि ब्राह्मणके मूत्रको कैसे लाँघूं । यदि आपका पति अगस्त्यजीसे पीनेकी प्रार्थना करनेको सोचते तो यह विचार होता कि एक बार अगस्त्य इस समुद्रको पी चुके हैं और मूत्रमार्गसे बाहर निकाला है। इसीसे यह खारा है । १६-२१ । उसी मूत्रके समान खारे समुद्रको अगस्त्यजी कैसे पियेंगे। मान लिया जाय कि रामके कहनेसे अगस्त्यजी समुद्रको पी जाते तो संसारमें रामका बड़ा अपयश होता कि रामने अपना मतलब साधनेके लिए एक ब्राह्मणको मूत्र पिलाया। इन्हीं बातोंको सोचकर धर्मात्मा रामने अगस्त्यसे समुद्र पीनेको नहीं कहा ॥ २२-२४ ॥ इन बातोंका खूब अच्छी तरह सोच विचारकर ही रामचन्द्रजीने अपनी कीर्तिवृद्धिके लिए समुद्रपर सेतु