श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 305, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ९] विलासकाण्डम् २८९
प्रणम्य मेऽपराधं त्वं क्षमस्वेति प्रमाद्यदत् । ततः सीता गुरोः पत्न्यै ददौ चित्राणि भक्तितः ॥९२॥
भूषणादि वरान्न्यैव दिव्यान्यस्त्राणि सादरम् । रामेण पूजितश्चापि वसिष्ठः पूर्ववत्तया ॥९३॥
सहितः शिबिकामारुह्यतुष्टः स्वौयगृहं ययौ । ततः सीतां समालिङ्ग्य रामो निद्रां चकार सः ॥९४॥
प्रभाते पिंगलां दास्या समाहूयाय जानकी । धिग्विधकृन्त्वा सखीभिस्तां ताडयामास बंधिताम् ॥९६॥
सीतोवाच वदा वेश्यां वस्मान्मंघापराधितम् । भविष्यसि त्रिवक्रा त्वं मथुरायां हि कुत्सिता ॥९७॥
वेश्यया प्रार्थिता प्राह कृष्णान्तेस्युद्भविष्यति ॥९८॥
श्रुत्वा तौ बंधितां वेश्यां मोषयामास राघवः ।
एवं नानाकोतुकानि चकार रघुनंदनः । सीतां सञ्चरामास स्वचरित्रैर्मनोहरैः ॥९९॥
इति श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये विलासकाण्डे सीतालङ्कारवर्णनं नामाष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥
नवमः सर्गः
(सूर्यग्रहणपर रामकी कुरुक्षेत्रयात्रा)
श्रीरामदास उवाच
एकदा सीतया रामः कुरुक्षेत्रं स्वबंधुभिः । ययौ सूर्योपरागे वै स्नातुं पुष्पकसंस्थितः ॥ १ ॥
तत्र देवाः सगन्धर्वाः किन्नराः पन्नगा ययुः । नानाऽऽश्रमेभ्यो मुनयः पार्थिवाश्च सहस्रशः ॥ २ ॥
तत्र स्नात्वा रवौ ग्रस्ते राघवः सीतया सह चकार नानादानानि हस्त्युष्ट्ररथवाजिनाम् ॥ ३ ॥
ततस्ते पार्थिवाः सर्वे नानोपायनपाणयः । ययुस्ते राघवं दृष्टुं राजपत्न्यश्च जानकीम् ॥ ४ ॥
अथ सीता राजपत्नीः समालिङ्ग्य वरामने । सखीभिर्मुनिदारैश्च सुखं चोपाविशत्तदा ॥ ५ ॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र सीतया पूजिता स्थिता । लोपामुद्राऽब्रवीद्वाक्यं जानकीं रंजयन्मुदा ॥ ६ ॥
हे सीते कञ्जनयने धन्याऽसि गजनामिनि । किंचिद्वर्णय रामस्य पौरुषं श्रुतितोषदम् ॥ ७ ॥
गयीं और उन्हें विश्वास हो गया कि रामचन्द्रजी परम पवित्र हैं । ९२ । तब सीताने प्रणाम करके रामसे प्रार्थना की कि मेरी भूल थी, आप मुझे क्षमा करें । इसके अनन्तर सीताने गुरुपत्नी अरुन्धतीको विविध प्रकारके आभूषण वस्त्रादि दिये । रामचन्द्रजीने फिर वसिष्ठजीकी पूजा की । थोड़ी देर बाद गुरुपत्नीके साथ-साथ पाल्कीपर बैठकर वसिष्ठजी अपने घरको चले गये । तदनन्तर राम भी सीताका आलिंगन करके सो रहे ॥ ९३-६५ ॥ सबेरे दासी द्वारा सीताने पिंगला वेश्याको बुलवाया । उसे बार-बार धिक्कार और बांधकर सखियोंके हाथो पिटवाया ॥ ९६ ॥ इसके पश्चात् उस वेश्यासे कहा कि तूने आज बड़ा भारी अपराध किया है । इससे भविष्यमें जब तू जन्म लेगी, तब तेरे शरीरमे तीन कूबड़ होंगे और तुझसे सब घृणा करेंगे ॥ ९७ ॥ तदनन्तर उस वेश्याने अनेक प्रकारसे सीताकी प्रार्थना की । तब सीताने कहा-'अच्छा, जा तेरा उद्धार कृष्णके हाथों होगा' । उधर जब रामने सुना कि पिंगला बँधी पिट रही है, तब उसे छुड़वा दिया ॥ ९८ ॥ इस तरह राम विविध प्रकारके कौतुक करके अपने मनोहर चरित्रोंसे सीताको प्रसन्न करते रहते थे ॥ ९९ ॥ इति श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयावरचित'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासमन्विते विलासकाण्डे अष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥
श्रीरामदासने कहा—एक बार रामचन्द्रजी सीता तथा अपने समस्त भ्राताओंके साथ पुष्पक विमानपर सवार होकर सूर्यग्रहणके समय कुरुक्षेत्र गये । १ ॥ वहाँ समस्त देवता, गन्धर्व, किन्नर, पन्नग तथा कितने ही आश्रमोंके मुनि और हजारों राजे आये हुए थे ॥ २ ॥ जब सूर्यग्रहण लगा, उस समय सीताके साथ रामने स्नान किया तथा हाथी-घोड़े ऊँट और रथ आदि दान दिया ॥ ३ ॥ इसके अनन्तर वहाँ आये हुए राजे अनेक प्रकारके उपहार ले-लेकर रामका दर्शन करने आये और रानियां भी सीताको देखनेके लिए उनके साथ आयीं ॥ ४ ॥ जब रानियां सीताके पास पहुंचीं तो उन्होंने बड़े आदरके साथ उन्हें उनकी सखियों और मुनिपत्नियोंके साथ एक सुन्दर आसनपर बिठलाया ॥ ५ ॥ सीताके विधिवत् पूजन कर लेनेके बाद मुनिपत्नियोंमेंसे अगस्त्यपत्नी लोपामुद्रा सीताको प्रसन्न करती हुई कहने लगीं—॥ ६ ॥ हे कमलनयने