भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 304

२८८ आनन्दरामायणे [सर्गः ८

पदयोस्तस्य शपथं कृत्वा ने प्रत्ययो मम। भविष्यति न सन्देहस्त्वं कुरुष्व रघूत्तम ॥७७॥ इति सीतावतः श्रुत्वा प्रहस्य रघुनन्दनः। दूत्यं सौमित्रिमाहूय वसिष्ठं प्रेषयत्तदा ॥७८॥ लक्ष्मणः शिबिकारूढः पुरद्वारान्तिकं ययौ । मञ्चकाद्द्वारपं प्राह द्रागुद्घाटय सत्वरम् ॥७९॥ गत्वा पूर्यो लक्ष्मणः स गुरोर्द्वारे स्थितोऽभवत् । वसिष्ठद्वारपो गत्वा वसिष्ठाय न्यवेदयत् ॥८०॥ निशीथे लक्ष्मणं द्राग्मागतं न्यवि सम्भ्रमात् । अरुन्धत्या वसिष्ठोऽपि तच्छ्रुत्वा विह्वलोऽभवत् ८१। निशीथे लक्ष्मणश्चात्र किमर्थं मां समागतः । इति विह्वलचित्तः स गवाहूयाथ लक्ष्मणम् ॥८२ पप्रच्छ रामभद्रस्य कारणं मुनिसत्तमः। तं वन्द्वा लक्ष्मणः प्राह प्रेषितस्त्वरितोऽस्मि हि।८३॥ कारणं न तु जानामि समुत्तिष्ठाधुनैव हि । शिबिकामधिरूढश्च द्वाग्द्वाहिरस्ते मुनिसत्तम ८४ । इति श्रुत्वा गत्वाऽऽश्रममथवाऽऽलिप्रार्थितः । शिबिकामारुह्यान्त्यान्वित्या शीघ्रं ययौ गुरुः । ८५ । तत्पृष्ठे शिबिकामध्ये सौमित्रिस्त्वरितो ययौ । रत्नदीपप्रकाशश्च चेष्टितो वेत्रपाणिभिः ८६ समागतं गुरुं ज्ञात्वा प्रत्युद्गम्य रघूत्तमः । दत्तासनं वेष्टितां भीत्या प्रणनाम सः ॥८७॥ कृत्वा पूजां सविस्तारां वस्त्रैरभरणादिभिः। कथयामास सकलं पिंगलावृत्तमद्भुतम् ८८। कथयामास सीतायाः क्रोधसद्भावमपि प्रभुः । दिव्यं दातुं न किंचिच्च दृष्ट्वाऽन्यत्प्रीतये मम ॥८९॥ निर्धारितं ते पदयोर्दिव्यं तन्मे वदाम्यहम् । मनसाऽपि न भुक्ता सा मया वेश्याऽधुना परा ॥९०॥ इदं चेद्वचनं सत्यं स्पृशामि तर्हि त्वत्पदं । इत्युक्त्वा राघवः शीघ्रं वसिष्ठपदयोः करौ ॥९१॥ स्वीयौ संस्थाप्य शिरसा प्रणनाम गुरुं पुनः । सतुष्टा लज्जिता सीता ज्ञात्वा शुद्धं रघूत्तमम् ॥९२॥

जिससे पर मनम विश्वास हो ॥७५॥ बहुत कुछ सोच विचारकर मैने भी यही निश्चय किया है और आप भी वही करें अभी अपने गुरु (वसिष्ठ) को बुलाकर यदि आप उनके पैरोंकी शपथ खा लें तो मुझे विश्वास हो जायगा। हे रघूत्तम ! ऐसा करनेपर फिर इस पर किसी प्रकारका संशय नहीं रह सकेगा। अतएव आप यही करें ॥७६ । ७७। इस प्रकार सीताका वचन सुनकर प्रसन्न मुखसे दागे द्राग लक्ष्मणको बुलवाया और वसिष्ठजीके पास भेजा । ७८। पालकीपर चढकर लक्ष्मण राजदु आर पहुंचे। वहां पहरदू गाम फाटक खुलवाकर तुरन्त गुरु वसिष्ठके दरबाजेपर जा पहुंचे। द्वारपालने राजा कुमार लक्ष्मणके आनेका सं देश वसिष्ठ- के पास भिजवाया ॥ ७९ । ८० । आधी रातके समय लक्ष्मणको द्वारपर आया सुनकर वसिष्ठ तथा अरु- न्धती दोनों घबराहटम विह्वल हो गये ॥ ८१ ॥ वे सोचने लगे कि आधी रातको लक्ष्मण मेरे पास क्यो आये । इस प्रकार व्याकुलताके साथ उन्होंने लक्ष्मणको अपने पास बुलाया ॥८२, और आनेका कारण पूछा। वसिष्ठका प्रणाम करके लक्ष्मणने कहा कि आपको रामने स्मरण किया है ॥८३॥ आपको बुलाने का कारण मै भी नहीं जानता। हां, यह जानता हूँ कि आप अभी उठकर मेरे साथ चल दें बाहर पालकी तैयार है ॥८४ । इस तरह लक्ष्मण द्वारा रामकी बात सुनकर अरुन्धती के प्रार्थना करनेपर वसिष्ठ उन्हें भी अपने साथ लिये हुए झटपट चल दिये ८५॥ उनके पीछे-पीछे लक्ष्मणकी पालकी चली जिस समय वसिष्ठ राजभवनपर पहुंचे तब चारों ओर रत्नों के दीपकोंका प्रकाश फैल रहा था । अनेक पहरेदार अपनी- अपनी नौकरीपर डट हुए थे और बहुतसे यष्टिधरा धरकर साथ चल रहे थे ॥८६ । अब रामने सुना कि गुरुजी आ गये हैं तो उन्हें तथा थोडा दूर आगे जाकर मिले और संतोके साथ उनको प्रणाम किया । फिर एक दिव्य आसनपर बिठाकर वस्त्रभूषणादि विविधवत् पूजन करनेके पश्चात् उस पिंगला वेश्याका वृत्तान्त कह दिया ॥ ८७ । ८८ ॥ फिर यह बात भी बतायी, जो क्रोधमे सीताने रामको कही थीं । फिर कहने लगे कि सीताको विश्वामके किसी भी प्रकार विश्वास नही है ८९ । अन्तमें आपके चरणोंकी शपथ दिलानापर राजी हुई हैं। मैंने कभी मनसे भी उस वेश्या तथा अन्य किसी स्त्रीके साथ व्यभिचार नहीं किया है ॥९० । यदि मेरा ये बात सच है तो मैं आपके पैर छूकर शपथ खाता हूँ। ऐसा कहकर झटपट रामने वसिष्ठजीके पैर पकड़ लिये ॥ ९१ ॥ फिर अपना मस्तक झुकाकर प्रणाम किया। यह देखकर सीता लज्जित हो