भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 319, कुल 811 में से

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पृष्ठ 319

सर्गः ३] उत्तरकाण्डम् ३०१


सा हृता विजने पूर्वं रावणेन वने तदा। अकस्मादपि दुष्कर्म योषित्स्वमर्षदं भवेत् ॥२६॥
यादृग्भवति वै राजा तादृश्यो नियमाः प्रजाः। इति नानाविधा वाचः प्रवदन्ति पुरेजनाः ॥२७॥
अपरञ्चिन्तयन्पश्यामि सांप्रतं रजकोदितम्। दुर्भागां स्वगृहाद्भार्यां कीदृशेन यः ॥२८॥
रजकः प्राह मोऽङ्गे मोऽहं रामो न मैथिलीम्। शरण्य शुद्धे स्पष्टं स्थित्वामगीचकार यः ॥२९॥
यथेच्छं गच्छ रंडे त्वं नाहं रामवदाचरे। गच्छता च मया मार्गे रजकेन ममोदितम् ॥३०॥
इति राम श्रुतं पूर्वं मया दृष्टं निवेदितम्। यत्पथ्यमि हितं चात्र तत्कुरुष्व रघूत्तम ॥३१॥
श्रुत्वा तद्वचनं रामः स्वजनांश्चाप्यपृच्छत्। तेऽपि तन्माञ्जब्रुवन् राममेवमेतन्न संशयः ॥३२॥
ततो विसृज्य सचिवाग्विजयं सुहृदस्तथा। ग्राहूय लक्ष्मणं रामो वचनं चेदमब्रवीत् ॥३३॥
लोकापवादस्तु महान्संयातामद्यैव मेऽभवत्। सीतां प्रातः समारोप्य वाल्मीकेराश्रमांतिके ॥३४॥
त्यक्त्वा शीघ्रं रथेन त्वं पुनरायाहि लक्ष्मण। वक्ष्यमे यदि वा किंचिदत्र मां हतवानसि ॥३५॥
छित्त्वा सीताभुजं नोऽद्यप्रत्ययार्थं समानय। इत्युक्त्वा लक्ष्मणं रामः कैकेयीं श्रूङ्गुमाययौ ॥३६॥
एतस्मिन्नन्तरे सीतां कैकेयी रहसि स्थिता। पप्रच्छ कौतुकात्सीते भित्तीलिख्य दशाननम् ॥३७॥
मामग्र दर्शयस्वाथ तां प्राह जानकी तदा। मयाऽवलोकितो नैव कदाऽपि स दशाननः ॥३८॥
यदा हर्तुं पंचवट्यां मां भ्रामो गौतम्यतटे। तदा दृष्टस्तदङ्गुष्ठो मया दक्षिणपादजः ॥३९॥
तन्सीतावचनं श्रुत्वा कैकेयी प्राह तां पुनः। यथा दृष्टस्त्वयांगुष्ठस्तथा भित्तौ लिखस्व हि ॥४०॥
तथेति जानकी लेख्य तदंगुष्ठ भयानकम्। कैकेय्यै दर्शयामास तापसंश्च गृहं ययौ ॥४१॥


हृदय कैसा है जो इतना अनर्थ होनेपर भी लोटा हुई माताके साथ विहार करते हुए सुखी हो रहे हैं ॥२४।२५॥ जो सीता उस दुष्टके द्वारा हरी गयी और कई वर्ष तक उसके घरमे रही, उसके लिए रामको कुछ सोच विचारनेकी आवश्यकता क्योंकर नहीं मालूम हुई ? उनका क्या बिगडा वे चाहे एक बार कोई दुष्कर्म भी कर लें तो कोई दृष्टि नहीं उठा सकता लेकिन इसका दुष्प्रभाव तो प्रजाके ऊपर पड़ेगा। यह साधारण नियम है कि जिस देशका जैसा राजा होता है, प्रजा भी वैसी ही हुआ करती है। इस प्रकारकी बातें बहुतोंके मुंहसे सुनी गयी हैं। एक धोबीने भी एक बात आपके बारेमें कही थी सो भी कहता हूँ। उसने कामवश अपनी व्यभिचारिणी स्त्रीको संबोधित करके कहा 'अरी ओ रण्डे ! मैं वह राम नहीं हूँ, जिन्होंने क्यों शरणके वशमें रही हुई सीताको अङ्गीकार कर लिया है। तेरी जहाँ इच्छा हो जा मैं रामकी तरह कर्म नहीं करूँगा और तुझे नहीं रखूँगा ॥२६-३०॥ मैं रास्तेमे चला जा रहा था, तब धोबीकी बात सुनी थी। सो पूछनेपर आपको बतला दी। अब आप जो अच्छा समझें, वह करें। विजयकी बातें सुनकर रामचन्द्रजीने अपने मित्रोंसे भी इस विषयमें पूछ-ताछ की। उन लोगोंने भी वही कहा जो विजयने बतलाया था। इसके बाद रामचन्द्रजीने मंत्रियों तथा विजयको बिदा कर दिया और लक्ष्मणको बुलाया। लक्ष्मणसे रामने कहा— हे लक्ष्मण ! सीताके कारण नगरमें लोग हमारी बड़ी निन्दा कर रहे हैं। इससे भी बढ़कर अपवाद होनेकी आशंका है। इसलिए कल सबेरे तुम सीताको रथम बिठाकर मुनि वाल्मीकिके आश्रमपर छोड़ आओ। इस बातके विपरीत यदि तुम कुछ कहोगे तो तुम्हें हमारी हत्या करनेका पाप लगेगा। हाँ, इतना और करना। उनसे छोटेके समय सीताकी एक भुजा भी काटकर ले आना, जिसे दिखाकर मैं अयोध्यावालोंको विश्वास दिला सकूँ॥। इतना कहकर राम कैकेयीके पास चल दिये। इसी बीच कैकेयीने आँगनमें बैठी बाते करते-करते सीतासे कहा-सीते ! इस दीवारपर रावणका चित्र लिखकर हमें दिखाओ कि वह कितना बड़ा था। इसके उत्तरमे सीताने कहा 'मैंने रावणको कभी देखा ही नहीं ॥३१ ३८ ॥ हाँ, जब वह पंचवटीमें मुझे हरनेके लिए गया था, तब मैंने उसके दाहिने पैरका अंगूठा देखा था। सीताका उत्तर सुनकर कैकेयीने कहा—अच्छा, उसका अंगूठा जैसा रहा हो, वही इस दीवारपर लिख दो। जानकीने कैकेयीके कथनानुसार दीवारपर उसके भयानक अंगूठेका चित्र लिखकर दिखा दिया और थोड़ी देर बाद अपने