भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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३०४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ३

अङ्गुष्ठोपरि कैकेय्या यथायोग्यो दशाननः । लिखितः स्वेन हस्तेन रामं द्रष्टुं कुबुद्धितः ॥४२॥ द्वारद्वारं समायातं दृष्ट्वा सा संभ्रमान्विता । भित्तिनिके राघवाय ददावासनमुत्तमम् ॥४३॥ रामोऽपि नत्वा कैकेयीमासने संस्थितोऽभवत् । ददर्श भित्तौ लिखितं विचित्रं तं दशाननम् ॥४४॥ रामः पप्रच्छ केनात्र लिखितोऽयं दशाननः । कैकेयी कथयामास सीतया लिखितस्त्विति ॥४५॥ यत्र यत्र मनो लग्नं स्मर्यते हृदि तत्सदा । स्त्रियाश्चरित्रं को वेत्ति शिवाद्या मोहिताः स्त्रिया ॥४६॥ कैकेयीवचनं चेत्थं श्रुत्वा रामो महामनाः । सीताश्रयं समावृत्तं कैकेयीमाह विस्तरात् ॥४७॥ लक्ष्मणेन त्यजाम्यद्य श्वः सीतां जाह्नवीतटे । सीताभुजं वने छित्त्वा समानयतु मन्दिरात् ॥४८॥ सौमित्रिस्त्वां तथा पौरान्दर्शयिष्यति निश्चयात् सीतया लिखितो यस्मात्स्वभुजेन दशाननः ॥४९॥ स्त्रीहत्याभयमालस्य नहन्मे लक्ष्मणो मया । न चोदितश्च तां हिंस्रा भक्षयिष्यन्ति वै क्षणात् ॥५०॥ इति रामवचः श्रुत्वा कैकेयी मुदिताऽभवत् । सीताया विरहाद्रामो नेदं राज्यं प्रशास्यति ॥५१॥ सेवार्थं रामचन्द्रस्य लक्षमणोऽपि न शाप्स्यति । तदा श्रीरामवाक्येन भरतो मे प्रशास्यति । ५२॥ इति मञ्चिन्त्य हृदये कैकेयी मुदिताऽभवत् । रामोऽपि नत्वा कैकेयीं सुमित्रां स्वां च मातरम् ॥५३॥ समावृत्तं च कैकेयीगेहे यज्ज्ञानमादरात् । श्रावयामास सकलं वृत्तं सीताश्रयं प्रभुः ॥५४॥ नत्वा सुमित्रां कौसल्यां रामः सीतागृहं ययौ । सीतया दत्तपाद्यार्घासनमर्गांचकार सः ॥५५॥ समावृत्तं च कैकेयीगेहे यद्दष्टमादरात् । श्रावयामास तत्कृत्स्नं वृत्तं तं जानकी मुदा ॥५६॥ तच्छ्रुत्वा जानकी प्राह कैकेय्या वचनान्मया । अङ्गुष्ठ एव लिखितस्त्वयोर्ध्वं लिखितो धिया ॥५७॥ अङ्गुष्ठस्यानुरूपेण दशास्यो दुष्टबुद्धितः । तन्मेतावचनं श्रुत्वा जानकीमाह राघवः ॥५८॥


महलोंको चली गयी। सीताके चले जानेपर द्वेषवश कैकेयीने रामको दिखानेके लिए उस अंगूठेके अनुसार रावणके पूरे शरीरका चित्र अपने हाथसे बना दिया ॥ ३९-४२॥ इतनेमें कैकेयीने देखा कि राम इसी ओर आ रहे हैं। तब झटपट उसने उस दीवारके पास ही रामजीको बैठनेके लिए आसन डाल दिया। रामने वहीं पहुँचकर कैकेयीको प्रणाम किया। फिर आसनपर बैठ गये। थोडी देर बाद रामका दृष्टि उस बने हुए रावणके चित्रपर पडी ॥ ४३ ॥ ४४ । रामने पूछा यहांपर रावणका चित्र किसने बनाया है? तदुत्तरमें कैकेयीने कहा कि आपके बहू सीतने यह चित्र लिखा है। जहां जिसका मन लगा रहता है, बार बार उसीकी याद आती रहती है। यह एक साधारण नियम है। और फिर स्त्रियोंके चरित्रको कौन जान सकता है शिवाद्दिक देवता भी तो स्त्रीचरित्रका पार नहीं पा सके और वे भो मोहित हो गये ॥४५॥४६॥ कैकेयीकी बात सुनकर मनस्वी रामचन्द्रजीने कैकेयीको वह बातें भो बतलायीं, जो सभामें विजयके मुंहसे सुनी थीं। इसी सिलसिलामम उन्होंने यह भी कहा - मातः! कल सबेरे लक्ष्मणके साथ मैं सीताको गंगाजीके तटपर भेज रहा हूँ। वह उसे वहीं छोड देगा और आप तथा पुरवासियोंको दिखानेके लिए मेरे कहनेसे सीताका एक हाथ भो काट लायेगा। क्योंकि सीताने उसी हाथसे तो रावणका यह चित्र बनाया होगा। स्त्रीहत्याके भयसे मैं उसे मारनेकी आज्ञा नहीं दूँगा। लेकिन जब उसके हाथ नहीं रहेंगे तो वह जियेगी कैसे ? वनके हिंसक जीव ही उसको खा जायेंगें ॥४७-५०॥ इस प्रकार रामके वचन सुनकर कैकेयी बहुत प्रसन्न हुई और मनही मन सांचन लगी कि सीताके विरहसे दुखी होकर राम राज्यका काम नहीं कर सकते। लक्ष्मण भी रामकी सेवामें लगे रहनेके कारण राज्यका भार अपने ऊपर नहीं लेंगे। उस दशामे विवश होकर राम मेरे बेटे भरतसे राज्यका काम करनेके लिए आग्रह करेंगे। यह सोचकर कैकेयी प्रसन्न हुई । रामजी भी कैकेयीको प्रणाम करके अपने महलोंको चले गये। वहाँ अपनी माता कौसल्या तथा सुमित्राको आदिसे अन्ततक सीतासम्बन्धी सब वृत्तान्त कह सुनाया । फिर कौसल्या और सुमित्राको प्रणाम करक वे सीताके भवनमें जा पहुँचे । सीताने पाद्य-अर्घ्य-आचमनायादिसे उनकी पूजा की और रामजी एक आसनपर बैठ गये। इसके