भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 318

३०२ आनन्दरामायण [ सर्गः ३

यदा गच्छसि पातालं जगन्त्या पूजिता तदा । भुवस्तुन्दा मीषयित्वा त्वामंके स्थापयिष्यहम् ॥१०॥ पुत्राभ्यां च मया सीते ततो भोगानवाप्स्यसि । मत्स्वकः कुश्रो ज्येष्ठस्तव पुत्रो भविष्यति ॥११॥ सुम्भवः प्रभावेण भविष्यत्यपरो लवः । वाल्मीकेराश्रमे चैवं कुमारी द्वौ भविष्यतः ॥१२॥ अग्रे गत्वा त्वन्मात्रिप्रा स्वच्छापं च गृहादिकम् । मसुमेधन सकलं कृतमस्ति ममाज्ञया ॥१३॥ कुरुष्वाद्य मया यच्चोच्यते जनकात्मजे । सात्त्विकी त्वं यथापूर्वं दंडके गौतमीतटे ॥१४॥ अज्ञानाने स्थिता यद्वन्मे वामभागे तथाधुना । वाल्मीकेराश्रमे गन्तुं शुजद्वयविमिश्रिता ॥१५॥ भूत्वा स्वमाश्रमे स्थित्वा मद्धियोगं प्रदर्शय । तत्रापि त्वां कुशोत्पत्तौ दास्यामि दर्शनं रहः ॥१६॥ तथेति रामवचनाज्जानकी सा स्मितानना । रजनमोमयीं स्वर्चा छायां निधाय सादरम् ॥१७॥ अंशाथपस्य वामांगे सत्त्वरूपा लयं ययौ । ततो रामः सभां गत्वा रत्रौ ज्ञानैकविग्रहः ॥१८॥ मविविधर्मयत्त्रासुदेलमुखैर्यथोक्तकैः । समन्ततो वेष्टितः संस्तस्थौ सिंहासनोपरि ॥१९॥ तत्रोपविष्टं राजानं सुहृद पर्युपासिरे । हास्यप्रायकथा भिश्च हासयन्तः स्थिताः सुखम् ॥२०॥ अथ प्रसङ्गात्पप्रच्छ रामो विजयनामकम् । पौरा जानपदा वा म किं वदन्ति शुभाशुभम् ॥२१॥ सीतां तां मातरं वा मे भ्रातृन्वा कैकयीमथ । न भेतव्य त्वया ब्रूहि शापितोऽसि ममापरि ।२२। इत्युक्तः प्राह विजयो देव सर्वे वदंति ते । कृतं सुदुष्करं कर्म रामेणाविदितात्मना ॥२३॥ यद्याप्येवं वदन्ति स्वां जनास्तच्चे वदाम्यहम् । किंतु हन्त्वा दशग्रीवं सीतामाहृत्य राघवः ॥२४॥ अमर्षे पृष्ठतः कृत्वा स्ववेश्म प्रत्यपादयत् । कीदृश हृदयं तस्य र्भतामभागजं सुखम् ॥२५॥

समय तुम अब एक दिव्य सिंहासनपर बैठकर भूमिके विवरमार्गसे पातालको जाने लगोगी । तब मैं भूमिकी प्रार्थना करके या धमकाके तुम्हें वापस ले लूँगा और अपने गोदमें बिठाऊँगा ॥ ९ ॥ १० ॥ उस समय तुम अपने दो बेटोंको लिय हुए मेरे साथ रहकर विविध प्रकारके सुख भोगोगी। मेरे द्वारा मुझसे एक पुत्र होगा, जिसका नाम पडेगा कुश और दूसरा बेटा ऋषि के कृपावरके प्रभावसे उत्पन्न होगा, जिसका नाम होगा लव । इस प्रकार वाल्मीकिके आश्रमपर तुम्हारे दो पुत्र होंगे ॥ ११ ॥ १२ ॥ तुम्हारी माताके साथ जनकजी पहले ही उस आश्रमपर जा चुके हैं और उन्होंने तुम्हारे आगमनकी सब सामग्रियाँ प्रस्तुत कर दी है । १३ ॥ आज मैं तुमको जैसा कह रहा हूँ हे जनकात्मजे ! तुम्हें वही करना पडेगा। जैसे उस समय गौतमीके तट-पर तुमने अपनी दो मूर्तियाँ बनाया थी । उसी प्रकार इस समय भी अपनी दो स्वरूप बनाओ और पहलेकी नाई इस समय भी तुम सात्विक रूपमें मेरे बाम अंगमें निवास करो । १४ ॥ १५ ॥ और दूसरे स्वरूपसे वाल्मीकिके आश्रमपर रहकर संसारको मेरे वियोगका दुःख दिखलाओ। आश्रमपर भी जब कुशका जन्म होगा, उस समय आकर मैं तुम्हें एकान्तमें दर्शन दूंगा । १६ ॥ रामकी बात सुनकर सीताजी मन्द मुस्कराहट के साथ 'तथास्तु' कहा और रजोगुणमयी तथा तमोगुणमयी संता अपनी छाया नामक दक्षिण भागमें बैठ गयी और सत्त्वरूपसे रामके वाम भागमें विलीन हो गयी ॥ १७ ॥ इसके बाद रामचन्द्रजी सभाभवनमें गये । वहाँ मन्त्रणानिपुण मन्त्रियों तथा कितने ही दरबारियोंसे वेष्टित होकर बैठे। मित्रोने उस समय भगवान्‌की विविध प्रकारसे पूजा की। तत्पश्चात् तरह-तरहकी हँसी-दिल्लगीकी बात कर-करके वे परस्पर मनोविनोद करने लगे । १८-२० ॥ प्रसंगवश रामने विजय नामक एक गुप्तचरसे पूछा कि इस समय अयोध्यावासी लोग मुझ किस दृष्टिसे देखते है। उनकी दृष्टिमं मेरा शासन कैसा है वा खराब ? इसके अतिरिक्त सीता मेरी मात, भा, भाइया अथवा कैकईके प्रति लोगक हृदयमं कमानभाव है। किसी प्रकार डरो मत, जो कुछ मालूम हा साफ़-साफ़ बतला दो । तुम्हे मेरा शपथ है। इस प्रकार रामक पूछनपर विजयने कहा-हे देव ! आपके किये महान् कार्यों की सराहना करते हुए लोग प्रशंसा ही करते है ॥ २१-२३ । फिर भी आपके विषयमे कुछ लोगोका जो दूसरा राय है। उसे भी बतलाता हूँ, वे कह रहे कि रामने रावणको मारकर सीताको उससे छुड़ाया और बिन कुछ सोच-विचार अपन घरमं बिठाल लिया। हम नहीं समझते कि रामका