भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 310, कुल 811 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 310

२९४ आनन्दरामायणे [ सर्गः १


इन्द्रपुष्ट्यस्तुरङ्गांश्च दासीदासाम्यनोग्मान् । शिबिकाश्चापि वासांसि ददौ रामाय सादरम् ॥११॥ एवं सम्पूज्य श्रीरामं सीतां च जनकः स्त्रियाः । सम्मानिनो राघवश्चाथ ययौ स्वां मिथिलां पुरीम् ॥१२। अथ रामः सीतया स रेमे सन्तुष्टमानसः । गर्भातिभाराक्रान्ता सा सीता मंन्यस्तभूषणा । १३ । पाण्डुवर्णाऽनना दीना कृशाऽपि नितरां बभौ । एकदा मधुरं पाठ्या सूचयामास जानकी । १४ ममञ्चाऽऽगमसच्छाद्यं रतुमास्ति त्वया सह । तथो पवनमध्येऽपि साकेतनगराद्वहिः । १५ । तद्वाक्यास्यात्प्रियाय क्यं श्रुत्वा चाहूय लक्ष्मणम्। रामोऽब्रवील्लक्ष्मणाऽथै वार्यं मधुरं स्मितपूर्वकम् । १६॥ हे सौमित्रेऽद्य सीतया जाताऽऽगमस्पृहास्ति हि। मया तु तन्मत्त्व हि सूचितोऽभि मयाऽधुना । १७ । तथेति रामवाक्यं सोऽप्युरीकृत्य लक्ष्मणः । गन्त्वा सभायामाहूय त्वरयामास सेवकान् ॥१८। चित्रोष्णीषान्क्षेत्राणीनाह वाक्यं स्मिताननः । कथनीयं हट्टमध्ये ह्युगमं याति जानकी ॥१९ । राघवेण नतो व्य वणिग्व्यवहारिभिः । ततः सौमित्रिवचनाच्छ्रुत्वा ते क्षेत्रापालयः । २० । चित्रोष्णीषा रुक्मदण्डा राजमार्ग चतुष्पथे हट्ट वीथ्यामुर्ध्वहस्तास्तदा प्रोचुर्महास्वरैः । २१ । पौराश्च वणिजं भवे तथाऽन्ये व्यवसायिनः । शृण्वंतु हृष्टहृदयाः सीतोद्यानं प्रगच्छति । २२ । राघवेणाभ्यनुज्ञातेर्भविद्भिर्गम्यतां पुरः । एवं प्रेषयित्वाऽथ जग्मुन्ते लक्ष्मणं चराः ॥२३। दूतानाज्ञापयामास पुनः सौमित्रिरादरात्। रामोगेहानि चित्राणि ह्यागमेषु समंततः । २४॥ कम्पनीशनि वेगेन शोधनीया भुवः शुभाः । जलयंत्राणि मदांसि शोधनीयानि सादरम् ॥२५ नानापांगस्कवस्तूनि सुगधीनि महान्ति च । स्थापनीयानि वै तत्र वस्त्राण्यतिलघूनि च । २६ । एवमदीन्यनेकानि कम्पनीशनि सादरम् मृगम्यौयाः प्रासादाः सर्वे ह्यारामसम्भवाः ॥ २७। दिव्यवस्त्रैस्तोरणाद्यैर्मूकापुच्छैर्भगन्विताः । तथेति दूतास्ते सर्वे तदा चक्रुस्त्वरान्विताः ॥ २८॥


प्रकारके सुनहले गहने तथा बहुत जाहरे कंच, लाल रंग रंगे हुए तथा फुन्दकारतूहलुक थे। उन्हें प्रसन्नतापूर्वक माताजीको दिया। साथ ही हाथी घोडे, रथ, ऊँट, सुन्दर दास-दासी तथा पालकी आदि रामचन्द्रजीको दिया । ॥११॥ इस प्रकार राम और सीताकी पूजा करके जनकजी अपनी स्त्रीके साथ मिथिलापुरीको लौट गये ॥ १२ । उधर रामचन्द्रजी प्रसन्नतापूर्वक सीताके साथ विहार करते रहे गर्भके भारसे लदी तथा न्यस्त भूषणाका स्पर्श पीत मुख और दुर्बल अङ्गोवाली भी सीताजी बहुत ही सुन्दर दीखती थी। एक दिन सीताने विश्वासाके द्वारा रामचन्द्रजीके पास यह सन्देश कहला भेजा कि आज आपके साथ बाहिरके बगीचेमें घूमनेकी मेरी इच्छा है ॥ १३-१५ । उस धात्रीके मुखसे यह संवाद सुनकर रामचन्द्रने लक्ष्मणको बुलाया और मुस्कराते हुए कहने लगे हे लक्ष्मण ! आज माता गारे साथ नगरके बाहिरवाले बगीचेमें घूमने जाना चाहती हैं, सो उसका सब प्रबन्ध ठीक कर देना। लक्ष्मणजी 'तथास्तु' कहकर सभामें गये और सेवकोंको बुलाकर जल्दी तैयारी करवाके आज्ञा दी रंग-बिरंगी पगड़ी पहने तथा हाथमें बेंतके दण्ड लिये सिपाहियोंसे लक्ष्मणने कहा कि आज रामचन्द्रजी सीताके साथ बगीचे जायेंगें। तुमलोग जाकर नगरके व्यापारियोंसे कह दो कि वे लोग जल्दसे अपनी दूकान बढ़ाकर मार्ग खाली कर दें। इस प्रकार लक्ष्मणकी बात सुनकर ॥ १६-२० ॥ रंग बिरंगी पगड़ी पहिरे तथा सुनहरे दंड लिये हुए सिपाही चौरास्ते, गली, बाजार और कूँचोंमें हाथ उठाकर जोर जोरसे कहने लगे हे पुरवासियों, व्यापारियो तथा व्यवसायियों ! आप लोग प्रसन्नतापूर्वक हमारी बात सुनते जायें। आज सीताजी बागमें जायेंगी। इसलिए आप सब पहिले ही से वहाँ चलें । इस प्रकार सबको सुनाकर वे दूत लोग फिर अपनी ड्योढ़ीपर अर्थात् लक्ष्मणके पास लौट आये । २१-२३ लक्ष्मणजीने फिर उनको आज्ञा दी कि बगीचेमें तुम लोग जाओ और स्थान स्थानपर नाना प्रकारकी रहनेकी जगहें बनाओ और बगीचेके चारों ओरकी जमीन शुद्ध अस्त्रकी तरह साफ़ करा दो। जलयंत्रोंकी भी परीक्षा करके उन्हें ठीक कर दो ॥ २४ । २५॥ विविध प्रकारकी मांगलिक वस्तुयें और महीन कपड़े आदि लाकर वहाँ रक्खो । जो जो चीजें आवश्यक समझी जायें, वे सब प्रस्तुत रहें। बगीचेके