भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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सर्ग १] जन्मकाण्डम् २९५


लक्ष्मणो राघवं गत्वा नत्वा स प्राह सादरम् । उद्योगसन्न होऽथैव वर्तते रघुनन्दन ॥२९॥
कुर्यां सिद्धं हि कियान् सीतायास्त्वथ वा विभो । उम्मीमित्रेर्वचः श्रुत्वा जानकीं राघवोऽब्रवीत् ॥३०॥
सीते यानं वदाद्य त्वं रुचे मनसि रोचने । तद्रामवचनं श्रुत्वा शिविकां प्राह जानकी ॥३१॥
रामोऽपि रोचयामास शिबिकामेव वै तदा । मल्लक्ष्म्या लक्षमणाद्वारि शिबिके रत्नभूषिते ॥३२॥
हेमन्तन्तूज्ज्वलैर्वस्त्रैः सर्वत्र वेष्टिते शुभे । आनयामास दूतैः सन्मुक्ताजालझणत्कृते ॥३३॥
आरुरोहाथ श्रीरामः शिविकां वरया मुदा । ततः सीता पांडुरंगा परिधेयविभूषिता ॥३४॥
कृतांगयष्टिदार्त्ताभिर्दत्तहस्ता ययौ शनैः । शिविकामारुरोहाय पृष्टलग्नोपवर्हणा ॥३५॥
वामीभिर्वीजिता चापि धृताशोकद्रुववरणा । दधार शिविकामारुरोहाथ पृष्टलग्नोपवर्हणा ॥३६॥
विमुक्तिं च मुक्ताभिः सीता स्वीयकरेण तम् । मुक्ताजालगवाक्षैश्च पश्यन्ती सा मुहुर्मुहुः ॥३७॥
राजमार्गेणयान्येव कौतुकानि समन्ततः । ददृशे नृप वेश्मानां सर्वाणि परितो वृता ॥३८॥
ततस्ते बान्धवाः सर्वे बन्धुपत्न्यश्च मातरः । शिबिकाधूपतविष्टा दिव्यासु च पृथक् पृथक् ॥३९॥
अग्रे ते भ्रातरः सर्वे ततः सर्वाश्च मातरः । सीताद्याः बन्धुपत्न्यश्च सर्वेषां पुरतो गुरुः ॥४०॥
एवं ते प्रययुः सर्वे पश्यन्तो राघवं मुहुः । ननृतुर्वारनार्यश्च नेदुर्वाद्यान्यनेकशः ॥४१॥
तुष्टुवुर्बन्दिनः सर्वे सीतां च रघुनायकम् । एव नानासमुत्साहैरागमन् मयीं मुदा । ४२ ।
राघवः सीतया युक्तः सैन्यैः सर्वत्र वेष्टितः शिविरा बासगेहे म मर्यातो रघुनन्दनः ॥४३॥
वासोरोहेषु सर्वे ते तस्थुः पौराः समन्ततः । दृष्ट्वा समन्ततश्चामत्रनृत्यंवारयोषित. । ४४॥
वासोरोहस्य सीताया भित्तयो वस्त्रनिर्मिताः । पञ्चक्रोशमितायामाश्रामन । स्ताम्बोऽपि च । ४५॥
पञ्चक्रोशमितायमे यत्र रेमे विदेहजा । ददर्श जानकी मम्म्यागम नृपमील्यदम् ॥४६॥


सब भवन अच्छी तरह सजाये जायें । उत्तम कपटकी झालरें, तोरण और माणिक के गुच्छ लटकाये जायें । वहाँ पहुँचकर दूतोंने लक्ष्मणजीके आज्ञानुसार सब कुछ तुरन्त ठीक कर दिया । १६-२८ ॥ तब लक्ष्मण रामचन्द्रजीके पास गये और प्रणाम करके सादर कहने लगे - हे रघुनन्दन ! मैने आपकी आज्ञास पूरी तैयारी कर दी है । अब महा आप और सीताजीके लिए सवारी लानेका भी आज्ञा दे दें ? इस प्रकार लक्ष्मणकी वाणी सुनकर रामचन्द्रजीने सीतासे कहा- सीन वन्याआ, आज तुम्हे कौनसी सवारी चाहिए ? सीताजीने रामजाकी बात सुनकर पालकी पसन्द की और सञ्जीन अपने लिए भी गलकी ही माँगी । रामचन्द्रजीकी आज्ञासे लक्ष्मण रानीतम विभूषित दो पालकियां मंगवायी, जिनका सुनहला कामक ओहार पड थे और चारो ओर मोतियोके झुच्छ लटक रहे थे ॥२६-३३॥ तब प्रसन्नतापूर्वक रामचन्द्रजी पालकीपर सवार हुए और पोरंसे भूषणान्का पहन हुए सीता भी दाभियाक हाटक सहारे शनै शनै जाकर पालकीपर बैठीं । उसमें चारो ओर नकचया लगी हुई थी । शक्कियां पंखे झलने लगी । ओहतर डाल दिया गया और पालकी चल पडी । रस्तेम सीताजी पालकीक दरीवेसे उन दृश्योका देखती जाती थी, जो वहांपर थे। उसक अनन्तर रामचन्द्रजीके और भाई भा तथा उनकी त्रियवें और मातायें अलग-अलग दिव्य पालकियोपर बैठ-बैठकर चलीं । अग्रे आगे भाइयोकी, फिर माताओकी, फिर सीतादिक पत्नियोकी और सबसे आगे गुरु वसिष्टजाका पालकी चली ॥ ३४-४० ॥ इस प्रकार सब लोग रामचन्द्रजीका दर्शन करते हुए चल जा रहे थे । वेश्याये नाच रही थीं और नाना प्रकारके बाजे बज रहे थे । बन्दीगण सीता और रामजीकी वन्दना कर रहे थे । इस प्रकार कितने ही तरहके उत्साहाँके साथ वे सब नगरीमे पहुँचे । रामचन्द्रजी सीताके साथ-साथ सेनाओसे घिरे हुए एक तम्बूमें उतरे । ४१-४३ ॥ इसके बाद और लोग भी तम्बुओंमें टिके । साथ ही समस्त नगरवासी लोग भो बागों और तम्पुओमे ठहर गये । चारों ओर हाट लग गयी और वैश्यायें नाचने लगीं । ४४ । जिस स्थानपर रामचन्द्रजी अपने पुरवासो नागरिकोंके साथ ठहरे थे,