भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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२९६ आनन्दरामायणे [ सर्ग १

रसालयं रसालैस्तैरशोकैः शोकनाशनम् । तालैस्तमालैर्हिन्तालैः शालैः सर्वत्र शोभितम् ॥४७॥
खपूरैः सपूगैश्चापि श्रीफलैः श्रीफलं किल । डुकुलिश्च स्वगुरुभिः कपित्थिमं कपित्यकैः ॥४८॥
स्तन अथः कुब्जकार्लेजुंश्च मनोरमम् । सुधार्कसममारम्भैरम्भोधः परिभाशितम् ॥४९।
सुरंगांश्चापि नारङ्गैरङ्गमण्डपवत्स्थितः । शानीरैश्चापि जंबी रैर्बीजपूरैः प्रपूरितम् ॥५०॥
मन्दान्दोलितपूर्पकदलीललल्लतया । विश्रमाय श्रमापन्नानाह्वयन्निवाध्वगान् ॥५१॥
पुन्नाग इव पुन्नागपल्लवैः करपल्लवैः । कल्पयन्निव्रालोलैर्मल्लिकास्तनकस्तनम् ॥५२॥
विदीर्णदाडिमैः स्वान्तं दर्शयन्ननुरागतत् । माधवीस्वरुपेण श्लिष्यतमिव कानने ॥५३॥
उदुम्बरैर्नरन्तफलशालिभिः । ब्रह्मांडकोटिविप्रन्नमनन्तमिव सर्वतः ॥५४॥
पद्मनामैननासाभिः शुकनामैः पलाशकैः । फलव्याजाद्दिशन्त्या पत्यन्यक्कैविवामृतम् ॥५५॥
कदंबवादिनो वीशान्दृष्ट्वा कंटकितैरिव । समन्ततो भ्राजमानं कदंबककदंबकैः ।५६॥
नमेरुभिश्च मेरोश्च शिखगैरिव राजितम् । राजादनैश्च मदनैः सदनैरिव कामिनाम् ॥५७॥
समंततः पटुपटैरुच्चैः पट्कुटीकृतम् । कुटन्नस्तवकैर्यातमधिग्रिन्नवकैरिव ॥५८॥
करमर्दैः करोरैश्च करजैश्च कदंबकैः । मद्रुककवचनमधिप्रन्युद्धतैः करैः ॥५९।
नीराजिनमिरोहीपै राजचंपककोरकैः । मधुपश्चान्तमलीभिश्च जिनपद्याङ्गश्रियम् ॥६०॥
क्वचिद्वटदलैरुच्चैः कचिन्काञ्चनकेतकैः । कृतमालैर्नक्तमालैः शोभमानं क्वचित् क्वचित् ॥६१॥
कर्कन्धुवन्धुजीवेश्च पुत्रजीवैरिवान्वितम् । मरिंदुकैरूद्दीमिश्च करुणैः करुणालयम् ॥६२॥


उसका विस्तार पांच कोसका था। पांच कोसके अन्दर मोर बगीचेमें जहाँ रामचन्द्रजी ठहरे थे, सीताजी प्रसन्नतापूर्वक विहार करने और उस सुन्दर बगीचेको खूब अच्छी तरह देखने लगीं ॥४५, ४६॥ उसमें रसालक वृक्ष वास्तव्य रसके आलय और अशोकके वृक्ष शोकको दूर करनेवाले थे ताल, तमाल, हिन्ताल और शालक वृक्ष चारो ओर सुशोभित हो रहे थे ॥४७॥ खजूरके वृक्षोंसे वह बगीचा खपूर (स्वर्ग) सदृश लग रहा था और श्रीफलसे श्रीफलके सदृश था। बकुल, न्यग्रोध अर्थात् वट और कैथ तथा कैथके वृक्षोंसे कपित्थ-वर्गका हो रहा था ॥४८॥ वनस्थलीके वृक्षोंके समान लकुच ( बड़हर ) के वृक्ष लगे हुए थे, अमृतफलका नाईं वेलेसे युक्त लग हुए थे ॥४९॥ सुन्दर रङ्गालये नारङ्गीके वृक्षोंसे रङ्गमण्डपकी शोभा हो रही थी। पानीर, जंबीर, बीजपूर आदिके वृक्षभी उस बगीचेमें कुछ कम नहीं थे ॥५०॥ धीरे-धीरे वायुके झोंकेसे झूमता हुआ केलेका पन्ना मानो एक हुए बटोहीयॉको हाथके मतलसे विश्राम करनेके लिए बुला रहा था ॥५१॥ पुन्नागको सदृश पुन्नागके पल्लव करपल्लवके समान थे और मल्लिकाके गुच्छे स्तनके समान दीखते थे ॥५२॥ अनारके फटे हुए फल मानो अपना हृदय फाड़कर हार्दिक प्रेम प्रदर्शित कर रहे थे। सुन्दरता खुद लम्बान्‍तीहुइ वृक्ष था, जिससे असंख्य फल लग हुए थे। वह करोड़ों ब्रह्माण्डोंको धारण किये हुए साक्षात् अनन्त भगवान्‌के सदृश मालूम पड़ता था। उपवनकी नासके समान इतरूटके वृक्ष तथा तोतेकी नासके समान पलाशके वृक्ष लगे हुए थे। कण्ट-कित पुष्पवाले कदम्बके वृक्षोंको देखकर रोमांच हो जाता था ॥५३-५६॥ नमेरूके वृक्ष को देखकर सुमेरुशृङ्गकी याद आ जाती थी। राजादनके वृक्ष कामियोंका मदनके भवन सदृश दीखते थे ॥५७॥ चारों ओर लगे हुए पट्टकूटके वृक्ष पट्टहर्टके सदृश दीखते थे । कुटजके गुच्छे से युत बगुलेके सदृश मालुम पड़ते थे ॥५८॥ जहाँ तहाँ करौंद, करीर, कंज, कदम्ब आदिके बड़ी-बड़ी शाखाओंवाले वृक्ष हजारौं हाथ उठाये याचकौके समान मालूम पड़ते थे ॥५९॥ राजचम्पक तथा डाँडेगाके वृक्ष मानों आरती बनकर उस बगीचेकी आरती उतार रहे थे फूलोंसे लदे हुए रेशमके वृक्ष शय्यावस्रकी शोभाको भी पराजित कर रहे थे ॥६०॥ कहीं फड़फड़ाते हुए पत्तोंवाले वटक्के बड़े-बड़े वृक्षोंसे, कहीं सुन्दरसी कनकके छोटे-छोटे पौधोंसे, कहीं कृतमाल और नक्तमालके वृक्षोंसे वह बगीचा सुशोभित हो रहा था ॥६१॥ बेर, बन्धुजीव तथा पुत्रजीवक वृक्ष लग थे । तेंदु, इङ्गुदी, करुण आदि वृक्षोंसे यह बगीचा करुणामय हो रहा था । टपकते हुए महुएके फूलोंको देखकर मालूम होता