श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
२९६ आनन्दरामायणे [ सर्ग १
रसालयं रसालैस्तैरशोकैः शोकनाशनम् । तालैस्तमालैर्हिन्तालैः शालैः सर्वत्र शोभितम् ॥४७॥
खपूरैः सपूगैश्चापि श्रीफलैः श्रीफलं किल । डुकुलिश्च स्वगुरुभिः कपित्थिमं कपित्यकैः ॥४८॥
स्तन अथः कुब्जकार्लेजुंश्च मनोरमम् । सुधार्कसममारम्भैरम्भोधः परिभाशितम् ॥४९।
सुरंगांश्चापि नारङ्गैरङ्गमण्डपवत्स्थितः । शानीरैश्चापि जंबी रैर्बीजपूरैः प्रपूरितम् ॥५०॥
मन्दान्दोलितपूर्पकदलीललल्लतया । विश्रमाय श्रमापन्नानाह्वयन्निवाध्वगान् ॥५१॥
पुन्नाग इव पुन्नागपल्लवैः करपल्लवैः । कल्पयन्निव्रालोलैर्मल्लिकास्तनकस्तनम् ॥५२॥
विदीर्णदाडिमैः स्वान्तं दर्शयन्ननुरागतत् । माधवीस्वरुपेण श्लिष्यतमिव कानने ॥५३॥
उदुम्बरैर्नरन्तफलशालिभिः । ब्रह्मांडकोटिविप्रन्नमनन्तमिव सर्वतः ॥५४॥
पद्मनामैननासाभिः शुकनामैः पलाशकैः । फलव्याजाद्दिशन्त्या पत्यन्यक्कैविवामृतम् ॥५५॥
कदंबवादिनो वीशान्दृष्ट्वा कंटकितैरिव । समन्ततो भ्राजमानं कदंबककदंबकैः ।५६॥
नमेरुभिश्च मेरोश्च शिखगैरिव राजितम् । राजादनैश्च मदनैः सदनैरिव कामिनाम् ॥५७॥
समंततः पटुपटैरुच्चैः पट्कुटीकृतम् । कुटन्नस्तवकैर्यातमधिग्रिन्नवकैरिव ॥५८॥
करमर्दैः करोरैश्च करजैश्च कदंबकैः । मद्रुककवचनमधिप्रन्युद्धतैः करैः ॥५९।
नीराजिनमिरोहीपै राजचंपककोरकैः । मधुपश्चान्तमलीभिश्च जिनपद्याङ्गश्रियम् ॥६०॥
क्वचिद्वटदलैरुच्चैः कचिन्काञ्चनकेतकैः । कृतमालैर्नक्तमालैः शोभमानं क्वचित् क्वचित् ॥६१॥
कर्कन्धुवन्धुजीवेश्च पुत्रजीवैरिवान्वितम् । मरिंदुकैरूद्दीमिश्च करुणैः करुणालयम् ॥६२॥
उसका विस्तार पांच कोसका था। पांच कोसके अन्दर मोर बगीचेमें जहाँ रामचन्द्रजी ठहरे थे, सीताजी प्रसन्नतापूर्वक विहार करने और उस सुन्दर बगीचेको खूब अच्छी तरह देखने लगीं ॥४५, ४६॥ उसमें रसालक वृक्ष वास्तव्य रसके आलय और अशोकके वृक्ष शोकको दूर करनेवाले थे ताल, तमाल, हिन्ताल और शालक वृक्ष चारो ओर सुशोभित हो रहे थे ॥४७॥ खजूरके वृक्षोंसे वह बगीचा खपूर (स्वर्ग) सदृश लग रहा था और श्रीफलसे श्रीफलके सदृश था। बकुल, न्यग्रोध अर्थात् वट और कैथ तथा कैथके वृक्षोंसे कपित्थ-वर्गका हो रहा था ॥४८॥ वनस्थलीके वृक्षोंके समान लकुच ( बड़हर ) के वृक्ष लगे हुए थे, अमृतफलका नाईं वेलेसे युक्त लग हुए थे ॥४९॥ सुन्दर रङ्गालये नारङ्गीके वृक्षोंसे रङ्गमण्डपकी शोभा हो रही थी। पानीर, जंबीर, बीजपूर आदिके वृक्षभी उस बगीचेमें कुछ कम नहीं थे ॥५०॥ धीरे-धीरे वायुके झोंकेसे झूमता हुआ केलेका पन्ना मानो एक हुए बटोहीयॉको हाथके मतलसे विश्राम करनेके लिए बुला रहा था ॥५१॥ पुन्नागको सदृश पुन्नागके पल्लव करपल्लवके समान थे और मल्लिकाके गुच्छे स्तनके समान दीखते थे ॥५२॥ अनारके फटे हुए फल मानो अपना हृदय फाड़कर हार्दिक प्रेम प्रदर्शित कर रहे थे। सुन्दरता खुद लम्बान्तीहुइ वृक्ष था, जिससे असंख्य फल लग हुए थे। वह करोड़ों ब्रह्माण्डोंको धारण किये हुए साक्षात् अनन्त भगवान्के सदृश मालूम पड़ता था। उपवनकी नासके समान इतरूटके वृक्ष तथा तोतेकी नासके समान पलाशके वृक्ष लगे हुए थे। कण्ट-कित पुष्पवाले कदम्बके वृक्षोंको देखकर रोमांच हो जाता था ॥५३-५६॥ नमेरूके वृक्ष को देखकर सुमेरुशृङ्गकी याद आ जाती थी। राजादनके वृक्ष कामियोंका मदनके भवन सदृश दीखते थे ॥५७॥ चारों ओर लगे हुए पट्टकूटके वृक्ष पट्टहर्टके सदृश दीखते थे । कुटजके गुच्छे से युत बगुलेके सदृश मालुम पड़ते थे ॥५८॥ जहाँ तहाँ करौंद, करीर, कंज, कदम्ब आदिके बड़ी-बड़ी शाखाओंवाले वृक्ष हजारौं हाथ उठाये याचकौके समान मालूम पड़ते थे ॥५९॥ राजचम्पक तथा डाँडेगाके वृक्ष मानों आरती बनकर उस बगीचेकी आरती उतार रहे थे फूलोंसे लदे हुए रेशमके वृक्ष शय्यावस्रकी शोभाको भी पराजित कर रहे थे ॥६०॥ कहीं फड़फड़ाते हुए पत्तोंवाले वटक्के बड़े-बड़े वृक्षोंसे, कहीं सुन्दरसी कनकके छोटे-छोटे पौधोंसे, कहीं कृतमाल और नक्तमालके वृक्षोंसे वह बगीचा सुशोभित हो रहा था ॥६१॥ बेर, बन्धुजीव तथा पुत्रजीवक वृक्ष लग थे । तेंदु, इङ्गुदी, करुण आदि वृक्षोंसे यह बगीचा करुणामय हो रहा था । टपकते हुए महुएके फूलोंको देखकर मालूम होता
सर्गः १ ] जन्मकाण्डम् २९७
गलन्मधूककुसुमैर्धरायापधरं हरम् । स्वहस्तमुक्तमुक्ताभिरर्चयन्तमिवानिशम् ॥६३॥
सर्जार्जुनाम्रैर्बीजैश्च व्यजनैर्वीज्यमानवत् । नारिकेलैः सखर्जूरैर्धृतच्छत्रमिवांबरैः ॥६४॥
अमदैः पिचुमन्दैश्च मंदारैः कोविदारकैः । पाटलार्तिन्तिणीधौटाशाखोटैः करहाटकैः ॥६५॥
उद्दण्डैरपि सेहुण्डैर्गुंडपुष्पैर्विराजितम् । बकुलैस्तिलकैश्चैव तिलकांकितमस्तकम् ॥६६॥
अक्षैः प्लक्षैः सल्लकीभिर्देवदारुहरिद्रुमैः । सदाफलसदापुष्पवृक्षवल्लिविराजितम् ॥६७॥
एलालवंगमरिचकुलंजनवनावृतम् । जम्ब्वाम्रातकभल्लात शेलुश्रीपर्णिपर्णितम् ॥६८॥
शाकशखवनं रम्यं चन्दनै रक्तचन्दनैः । हरीतकीकर्णिकारधात्रीवनविभूषितम् ॥६९॥
द्राक्षावल्लीनागवल्लीकर्णवल्लीशतावृतम् । मल्लिका यूथिकाकुंदमदयन्तीसुगंधितम् ॥७०॥
तुलसीवृक्षषंडैश्च शिवत्यगस्तिद्रुमैर्युतम् । भ्रमद्भ्रमरमालाभिर्मालतीभिरलंकृतम् ॥७१॥
अलिच्छलागतं कृष्णं गोपी रंतुमनेकशः । सुगंधवातं सुखदं कामसञ्जनकं परम् ॥७२॥
नानामृगगणाकीर्ण नानापक्षिनिनादितम् । नानासरित्सरःश्रोतः पल्वलैः परितो वृतम् ॥७३॥
उत्सृजतमिवार्थं वै रत्नपुष्पैस्तितस्ततः । केकि केकारवैर्दूरात्कुर्वन्तं स्वागतं किल ॥७४॥
एतादृशं सुपवनं जानकी तद्ददर्श सा । तुष्टाऽभूद्दर्शनेनैव विचचार स्थितस्ततः ॥७५॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये
जन्मकांडे नाम प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥
था कि मानो शिवजी धरणीका रूप धारण किये हुए हैं और अपने ही हाथसे अपनेपर मोतियोंकी वर्षा कर रहे हैं। ६२ ॥ ६३॥ सर्ज, अर्जुन, बीजपूर आदिके वृक्षोंसे ऐसा मालूम होता था कि वे सब बगीचेको पंखा झल रहे हैं। नारियल तथा खजूरके वृक्ष छत्र धारण करनेवाले सेवक जैसे थे। अमद, पिचुमन्द, मन्दार, कोविदार, पाटल, तिन्तिणी, धोंटा, शाखोट, करहाटक, ऊँचे डण्डेवाले सेहुंड और गुंडहूलक वृक्ष भी उस बगीचेमें यत्र-तत्र लगे हुए थे। बकुल और तिलकके वृक्ष उस बगीचेके मस्तकपर तिलकके समान मालूम पड़ते थे ॥ ६४-६६ ॥ अक्ष, प्लक्ष, सल्लकी, देवदारु, हरिद्रुम, सदाफल, सदापुष्प और वृक्षवल्ली आदिके वृक्ष भी उस बगीचेमे लगे हुए थे ॥ ६७ ॥ इलायची, लौंग, मरिच तथा कुलंजनके वृक्षोंसे वह समस्त बगीचा भरा हुआ था। जामुन, आम्र, भल्लातक, श्रीपर्णी आदि वृक्षोंसे उस बगीचेकी रंगीली शोभा देखते ही बनती थी ॥ ६८। शाक तथा शलवनके वृक्षोंसे रमणीक एवं चन्दन, हरीतकी, कर्णिकार, आंवला आदिके वृक्षोंसे वह विभूषित था ॥ ६९ । जिनमें सैकड़ों अंगूरकी लताएं तथा पानकी बेले रमी हुई थीं। मल्लिका, जूही, कुन्द और मदयन्तीके वृक्षोंसे वह बगीचा सुगन्धित हो रहा था ॥ ७० ॥ उसमें कितने ही तुलसी, सहिजन तथा अगस्तके वृक्ष लगे हुए थे जिनपर भौंराकी श्रेणी चक्कर काट रही थी, ऐसी मालतीके वृक्षोंसे वह अलंकृत था ॥ ७१ ॥ जिस समय मालतीके समीप भौंरा आता था, तब देखनेवालेके हृदयमें यह उत्प्रेक्षा होती थी कि मानो श्रीकृष्ण गोपियोंके साथ विहार करनेके लिए आये हैं ॥ ७२ ॥ उस बगीचेमें बहुतसे मृग चोकड़ियां भरा करते थे, विविध प्रकारके पक्षी बोलते रहते थे, कितनी ही नदियों तालाबों, स्रोतों तथा गडहोंसे वह बगीचा घिरा हुआ था ॥ ७३ । बगीचेके वृक्षोंसे गिरे हुए फूल किसी दानीकी धनराशिके समान लगते थे। मयूरोंकी आवाजसे ऐसा मालूम पडता था कि मानों वह बगीचा अपने यहाँ आनेवालोंका स्वागत कर रहा है ॥ ७४ ॥ इस प्रकारके उस सुन्दर उपवनको सीताने देखा । देखते ही उनका चित्त प्रसन्न हो गया और वे इधर उधर घूमने लगीं ॥ ७५ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये जन्मकाण्डे पं० रामतेजपाण्डेयकृत'ज्योत्स्ना'भाषाटीकायां प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥
२९८ आनन्दरामायणे [ सर्गः २
द्वितीयः सर्गः
( रामसीताका उपवनविहार )
श्रीरामदास उवाच
अथ सीता राघवेण रम्योपवनभूमिषु । क्रीडञ्चकार विविधाश्चिन्त्यैरपि सुरैर्नुताः ॥ १ ॥
कदा वनान्तःप्रागङ्गे कदा वस्त्रगृहेष्वपि । कदाऽऽम्रवृक्षच्छायायां कदा पुष्पवनेषु सा ॥ २ ॥
कदा सा जलप्रश्रावां सर्वयन्त्रवरासने । कदा सरोवरतटे कदा नगान्तरेऽपि च ॥ ३ ॥
नौकास्था मन्दतोये सा रामेणञ्चक्रे कदा । कदा रात्रौ जलक्रीडामथ दिनाऽपि कदा मुदा ॥ ४ ॥
कदा तटाके नौकास्था कदा रम्यावनेषु सा । कदा वृक्षोध्वगेहेषु कदलीगृहेष्वपि ॥ ५ ॥
कदा सा सुरयन्त्राणां निर्मितेषु गृहेषु वा । कदा कृत्रिमगेहेषु पुस्तगेहेषु सा कदा ॥ ६ ॥
कदा सा चित्रशालायां पुष्पके वा कदा मुदा । कदा सा केतकीपत्रैः कृतकञ्चुकमम्बरनि ॥ ७ ॥
कदा नौकोर्ध्वगेहस्था गन्धर्वाः सैकते कदा । एकस्तम्भोर्ध्वगेहेऽपि सखीभिः परिवेष्टिता ॥ ८ ॥
कदा रामेण रहसि कदा दोलकसंस्थिता । पर्यङ्कचक्रमध्यस्था कदा सा दाडिमीवने । ९ ।
सूक्ष्मवस्त्रपर्यङ्कसंस्थिता राघवेण हि । चकार सा कदा क्रीडां षोड़शांगी सुसुन्दरी ॥१०॥
हरिद्वस्त्रयुतस्कन्धयुक्ता जातकौतुका । गोपयित्वा निजं देहं सीता वृक्षदलैर्धनैः ॥११॥
सकार व्याकुलं रामं विनोदेन स्मितानना । ज्ञात्वात्मानं राघवेण दृष्टां मत्वाऽथविध्य च ॥१२।
दुद्राव संभ्रमाद्रामं कण्ठे दोर्लतयोर्बभौ । एवं सीताराघवयोः क्रीडनं परमाद्भुतम् ॥१३॥
विस्तारेणेह को वक्तुं समर्थः पृथिवीतले । एक एव समर्थोऽभूद्वान्मीकिर्मुनिपुंगवः ॥१४॥
शतकोटिमितं येन चरितं वर्णितं तयोः । सारं सारं मया यस्माद्गृह्यते तत्प्रवर्ण्यते ॥१५॥
गन्धर्वीणां कदा नृत्यं सीताऽपश्यद् ददर्श सा । कदा शुश्राव वाद्यानि मङ्गुलानि महोति च ॥१६॥
श्रीरामदासजी कहते हैं इसके बाद सीता रामचन्द्रजीके साथ उस रमणीक उपवनमें देवताओं द्वारा प्रशंसित विविध प्रकारकी क्रीड़ायें करने लगीं ॥ १ ॥ कभी उस बगीचेके बगलेमें, कभी तम्बूके भीतर, कभी शाम्रवृक्षकी छायामें कभी फूलोंकी शय्याओंमें कभी फौव्वारेके समीप बने हुए किसी एक सुन्दर आसनपर, कभा सरोवरके तटपर और कभी नहर के समीप जाकर बिहार करती थीं ॥ २ ॥ ३ ॥ कभी वे नौकापर सवार होकर मन्दगति मन्दम गन्धके साथ बिहार करतीं थीं कभी रात्रिके समय और कभी दिनमें ही जल-क्रीडा करती थीं ॥ ४ ॥ कभी सरोवरमें नौकापर कभी-कभी उत्तम तथा वृक्षके ऊपर बने हुए भवनमें, कभी सुन्दर सुन्दरालय कभी कदली भवन कभी अन्य भवनोंमें, कभी बनावटी मकानोंमें, कभी पुस्तकोंकी कभी चित्रण कभी मण्डप विमानपर कभी मयूरके समूह और कभी एक खम्भेके ऊपर बने भवनमें समय साथ बिहार करती थी । ५-८ । कभी नौका के ऊपर बने बंगलेमें, कभी बालूकी वेदीपर कथा अपनी सखियोंके सहित एक खंभपर ऊपर बनी हुई जगह अंदर जाकर कभी रामके साथ एकान्तमें कभी झूलेपर बैठकर, कभी चक्करदार पलंगपर कभी अनारके बगीचेमें और कभी किसी वृक्षके समान पड़े हुए पलंगपर सुहावने वस्त्रोके दुकाल सीता रामके साथ साठ क्रीड़ा करती थी । ८-१० । वे कभी हरे रङ्गके कपड़े तथा साठ कंचुकी पहनकर रामके साथ क्रीड़ा करती हुई वृक्षोंके घने पत्तोंमें छिपकर रामको व्याकुल कर देतीं और स्वयं सिर्फ हँसी मुखपर रखती थीं । जब वे समझतीं कि रामने लख लिया है तो दौड़ती हुई आतीं और रामके गलेमें गलबहियाँ डालकर उनके हृदयसे लिपट जाती थीं । इस प्रकार सीता तथा रामका अद्भुत कौतूहल हुआ करता था ॥ ११-१३ ॥ इस विस्तारपूर्वक कहनेको सामर्थ्य भला किसीमें है ? हाँ एकमात्र महर्षि वाल्मीकिजी समर्थ हुए थे, जिन्होंने सौ करोड़ श्लोकोंमें उनके चरितोंका वर्णन किया है । उनमेंसे सार-सार लेकर मैं तुमसे कह रहा हूँ । १४ । १५ ॥ कभी सीताजी उस बगीचेमें वेश्याओंके नृत्य देखती थीं
सर्गः २ ] | जन्मकाण्डम् | २९९
| सर्गः २ ] | जन्मकाण्डम् | २९९ |
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कदा चित्रकथा रम्यारवेणूत्थानानि वा कदा । कदा दन्तरुहोत्तादिकौतुकानि ददर्श सा ॥१७॥
कदा सम्मोहनं दिव्यं दृश्यं कौतुक महद् । कदा रम्भास्तम्भशूल्कं वस्त्रग्रंथिविनिर्मितम् ॥१८॥
कदा कृत्रिमहस्त्यादिनाणारूपाणि वै वने । सीता ददर्श कुशलैश्चातुर्यान्मृगतान्पयि ॥१९॥
एवं सीतोऽश्रममध्ये मासमेकं निनाय सा । ययौ रामेण नगरीं नृत्यगीतादिभिः शनैः ॥२०॥
सौधस्थानिः पुरस्त्रीभिर्विना कुसुमादिभिः । नीराजिता कुम्भदीपेर्दीपैदपोदनोद्भवैः ॥२१॥
माषतिलसर्षपार्यैर्नानाबलिभिगदगद् । ययौ निजगृहं सीता राघवेण समन्विता ॥२२॥
एवं नानाकौतुकैश्च नानादोहदपूरणैः । रामपत्नीं रमयामास माऽपि रामं स्वलीलया ॥२३॥
षष्ठे मासे त्वथ प्राप्ते सीतया राघवो मुदा । सीमन्तोन्नयनं चैव वसिष्ठेन चकार सः ॥२४॥
सुमेधां जनकं चापि समाहूयादरेण वि । ददौ दानान्यनेकानि ब्राह्मणेभ्यो रघूत्तमः ॥२५॥
जनकः पूजयामास रामं स्वान्यसुतयुतम् । कौसल्यादांश्च संक्लैन्वामिनो वसनादिभिः ॥२६॥
पौराश्च सुहृदः सर्वे भोजनार्थं विदेहजाम् । स्वस्वगेहं पुत्राऽनिन्युः श्रीरामादिमहोत्सवैः ॥२७॥
नानावाद्यनिनादैश्च वरस्त्रीनृत्यगायनैः । स्त्रीमुखपुष्पवर्षैर्नानाकौतुकदर्शनैः ॥२८॥
नानादेशनिवासिन्यः कोटिशश्चा नृपस्त्रियः । समाययुर्योध्यायां सीतां द्रष्टुं मुदान्विताः ॥२९॥
तया सैन्यैश्च सर्वत्र वेष्टिता नगरी बभौ । ताः सदा नृपपत्न्यश्च सीतायाः परमान् वरान् ॥३०॥
दोहदान् पूरयामासुर्दिव्यवस्त्रादिसादरम् । ददुर्वस्त्राण्यलङ्कारान् दिव्यांश्चित्रविचित्रितान् ॥३१॥
स्वस्वदेशोद्भवोद्देषनानाहस्त्यादिसादगत् । जानकीं पूजयामासुस्ताः सर्वाः पार्थिवस्त्रियः ॥३२॥
स्थिन्त्वा ता मासमेकं तु जग्मुर्दैवं निजं निजम् । अथैकदा तु श्रीरामः सुमेधा जनक तथा ॥३३॥
सीतायाः पुरतः प्राह गुह्यं रहसि हम्स्थितम् । सीतामदृष्ट्वा साभिध्ये क्षणञ्च विरद्वेष ताम् ॥३४॥
कभी मधुर तथा पत्रपोर अथवा बाजाका धुन सुनती थी। कब विविध प्रकारका चित्र देखती थी, कभी बाजीगरो और बाँसपर चढ़कर नटवरन के करतूत खेल देखा करती थी ॥ १७ ॥ ॥ १८ ॥ कभी स्तम्भके सुन्दर कौतूहों तथा मुख्यसभामे वैदा कलात्मक काज तब कला बनावटी हाथ आदिके विविध रूपाको देखा करती थी ॥१९-०१९॥ इस तरह सीताजी उस बग़ीचाम एक महीना बिताया। फिर नृत्य-गीतादिक देखती-सुनती हुई रामचन्द्रके साथ अपनी नगरी अयोध्याको लौट आयीं ॥ २० ॥ जब सीता और रामने नगरमें प्रवेश किया, उस समय नगरके स्त्रियोंने अंटारीपर चढ़कर उन दोनोपर फूलोकी वर्षा की, आरती उतारी और दही, भात, उड़द, तेल तथा सरमों आदिके बलि दिये। तब राम सीताके साथ अपने महलको गये ॥ २१ ॥ २२ ॥
इस तरह विविध प्रकारका अभ्यास रामने माताजी तथा सतान रामको आनन्दित किया ॥ २३ ॥ जब गर्भका छठौं महीना आया तब राघवने अपने कुलगुरु वसिष्ठके द्वारा सीताका सीमन्तोन्नयन संस्कार कराया ॥ २४ ॥ सुमेधा और जनकके पास निमत्रण भेजकर उन्हें अपने यहाँ बुलवाया और ब्राह्मणोंको रामने विविध प्रकारक दान दिये ॥ २५ ॥ जनकने आकर सीता तथा अपने सब भाइयोंके साथ बैठे हुए राम और कौसल्यादि माताओका नाना प्रकारके वस्त्राभूषणों द्वारा सत्कार किया ॥ २६ ॥ अयोध्यावासी नागरिकों तथा मित्रोंने रामचन्द्र और सीताको अपने यहाँ भोजन करनेके लिए बुलाया ॥ २७ ॥ अनेक बाजोके साथ-साथ वराङ्गनाओंके नाच-गान हुए स्त्रियोंके हाथसे फूलोंकी वर्षा हुई और कितने ही तरहके खेल-तमाशे हुए ॥ २८ ॥ उस समय सीताको देखनेके लिए प्रत्येक देशकी राजनारियाँ अयोध्या आयीं। २९ ॥ उनके साथ आयी हुई सेनासे घिरकर वह अयोध्या नगरी और भी सुन्दर लगने लगीं। उन रानियोंने अभादि देकर सीताकी इच्छा पूर्ण की और आनन्दपूर्वक बहुतसा वस्त्र-अलंकार तथा अपने देशके विशिष्ट वस्तुएं देकर सीताकी पूजा की ॥ ३०-३२ ॥ वे रानियां एक महीना अयोध्यामे रहकर अपने अपने देशको लौट गयीं। एक दिन जब कि सुमेधा, जनक, सीता तथा रामचन्द्र एकान्तमें बैठे थे । तब रामने कहा- हे महाराज ! सीताको अपने पास न छल तथा क्षणभर भी उनके वियुक्त होकर मैं नहीं रह सक्ता। जब सीताके पास पहुँच
३०० आनन्दरामायणे [ सर्गः २
मयाऽऽलभ्य तन्मुखेन्दुसुधया स्वास्थ्यमाप्यते । आत्मानं विह्वलं दृष्ट्वा सीतामाश्रित्यमाश्रये । ३५॥ अधुना जानकीं दृष्ट्वा कामो मेऽतीव बाधते । पञ्चमासोर्ध्वतः सङ्गं गर्हयन्ति मुनीश्वराः । ३६॥ प्रसूत्यर्थं पञ्चमासं स्त्री स्वास्थ्यं प्राप्यते पुनः । पञ्चममार्गविनः सङ्गादपत्योः क्षाणतेरिति । ३७। अत्र किं करणीयं हि वद त्वं श्वशुराय माम् । चेत्प्रेषणीया सीतेयं मिथिलां प्रति वै मया । ३८॥ तर्हि तत्रापि मे गन्तुं मविष्यति समुद्यमः । किञ्चित्कालं तु सीताया वियोगो येन मे भवेत् । ३९॥ उपायः संविधातव्यश्चिन्तितोऽस्ति मयाऽपि च । लोकापवादभीत्याऽहं रजकोक्तेश्छलादपि । ४०॥ गङ्गाया दक्षिणे तीरे वाल्मीकेराश्रमे शुभे । त्यजामि जानकीं शुद्धां किञ्चित्कालान्तरात्पुनः॥४१॥ एनां ममानयिष्यामि प्रत्ययं मां प्रदास्यति ।ततोऽनया चिरं कालं नानाभोगान भजाम्यहम् ॥ ४२॥ जनकोऽथ त्वया तत्र निजपत्न्या सुमेधया । वाल्मीकेराश्रमे गत्वा स्थेयं वर्षाणि पञ्च वै ॥४३॥ तथेत्यङ्गीचकाराथ जनकोऽपि सुमेधया । सीताऽप्यङ्गीचकाराथ विहस्य तद्वचः पतेः ॥४४॥ अथ रामो ददावाज्ञां सप्रियं जनकं मुदा । मगन्त्वा मिथिलाराज्ये स्वायं संस्थाप्य मन्त्रिणाम् ॥४५॥ ययौ सुमेधया शीघ्रं वाल्मीकेराश्रमं मुदा । किंचिद्दासीदामनेन्यवाशिवारणवेष्टितः ॥४६॥ नानोपचारानीतार्थे मगृश्च शकटादिभिः । चकार गेहं विपुलं वाल्मीकेश्च सुखावहम् ॥४७॥ सर्वसम्पत्तिमंयुक्तं बहुगोमहिषीयुतम् । पूरितं धान्यसंघैश्च वस्त्रैराभरणादिभिः । ४८। कामारोपवनारामपुष्पवाटिशताङ्गतम् । गवाक्षैश्चन्द्रकान्तानां कपाटैश्च समन्वितम् ॥४९॥ कृष्णागुरुसकर्पूरैःशीतमल्यादिमादिभिर् । कांचनैःशृङ्खलारत्नैरत्नपर्यङ्कमण्डितम् ॥५०॥ हंसापायतपिककेकांशुकनिनादितम् । मुक्तागुच्छवितानाद्यैः शोभिनं चित्रिताश्वितम् । ५१॥
आता हूँ तो इनके मुखचन्द्रकी सुधासे स्वस्थ हो जाता हूँ । जिस समय मुझको कुछ भी घबराहट होती है, उस समय में सीताके ही समीप रहता हूँ ॥ ३३-३५ । इस समय सीताको देखकर मुझ कामपीड़ा हो रही है और मुनियोंकी सलाह यह है कि गर्भ वःह हो जानेपर पाँच महीने बाद स्त्रीप्रसङ्ग करना निन्दित है ॥ ३६ ॥ प्रसव होनेके अनन्तर पाँच महीने बाद ही स्त्री स्वस्थ होती है। बिना पाँच महीने बाद प्रसङ्ग करनेसे दोनोंको हानि ही हानि है। ऐसे असमञ्जसके समय मुझे क्या करना चाहिये, सो आप बतलाइये। यदि मैं सीताको मिथिला भेज देता हूँ तो मुझ को भी वहाँ जाना पड़ेगा। किन्तु मै कुछ दिन तक सीतासे अलग रहना चाहता हूँ। जिस तरह मेरा इच्छा पूर्ण हो, वही इस समय करना चाहिए। मैंने तो यह सोच रक्खा है कि लोकापवादके डरसे अथवा उस धाबीके ख्यालसे गङ्गाके दक्षिण तटपर वाल्मीकिके पवित्र आश्रमम कुछ समयके लिए परम शुद्ध जानकी को छोड़ दूँ। थोड़े दिन बाद शास्त्र ले आऊँगा फिर मैं इनके साथ चिरकालतक नाना प्रकारके भोगांको भोगूंगा ॥ ३७-४२॥ उस समय आपको अपनी सुमेधाके साथ वाल्मीकिके आश्रमपर जाकर पाँच वर्ष पर्यन्त निवास करना होगा ॥ ४३। सुमेधा और जनकने रामकी सलाह स्वीकार की और सीताने भी हँसकर पतिका कहना मान लिया ॥ ४४। इसके अनन्तर रामने जनकको अपन देश जानकी आज्ञा दी। वे अपने देश गये और राज्यका सब भार मन्त्रीपर छोड़कर अपनी स्त्री सुमेधाके साथ वाल्मीकि ऋषिके आश्रमको चल दिये। चलते समय अपने साथ कुछ दास, दासी, सैनिक तथा हाथी-घोड़े भी ले लिये । ४५ ॥ ४६ ॥ सीताके लिए बहुत सी सामग्रियाँ गाड़ियोंपर लदवाकर साथ ले गये। महर्षि वाल्मीकिके आश्रमको जनकने सब सुखांका भण्डार बना दिया । ४७ ॥ जनकजीके वहाँ पहुंचतेही वह आश्रम सब सम्पत्तियों एवं बहुत सी गौओ और भैंसोंसे भर गया । विविध प्रकारके अन्नों और भाँति-भाँतिके वस्त्राभूषणों से वह पूरा हो गया । ४८ ॥ अनेक पास सैकड़ों पसार, उपवन, बगीचे बावड़ी तथा कुएं तैयार हो गये । चन्द्रकान्त मणिके दरवाजों तथा फटकाबाल भव्य भवन बने । ४६ ॥ कृष्णागुरु, कपूर, खस तथा विविध प्रकारके सुगन्धित द्रव्योंसे वह आश्रम सुगन्धमय हो गया जगह-जगह पर सोनेकी जंजीरोंसे सुसज्जित पलङ्ग पड़ हुए थे ॥ ५० ॥ हंस, कबूतर, कोयल, मयूर तथा तोतोंके शब्दोंसे
सर्गः २ ] जन्मकाण्डम् ३०१
एवं मनोहरं गेहं सीताथं जनकोऽकरोत् । श्रीः साक्षाद्..तमुद्युक्ता यस्मिन्वसितुं चिरम् ॥५२॥
किं दुर्लभं हि तत्रास्ति वर्णनीयं मयाऽथ किम् । यस्या नेत्रकटाक्षेण शक्रादीनां विभूतयः ॥५३॥
वाल्मीकये सर्ववृत्तं जनकोऽपि न्यवेदयत् । मुनिधाप्यतिमंतुष्टो मेने स्वसपसः फलम् ॥५४॥
इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये जन्मकाण्डे द्वितीयः सर्गः । २ ।
तृतीयः सर्गः
( राम द्वारा सीताका त्याग )
श्रीरामदास उवाच
अथ रामं तु कौसल्याऽब्रवीद्रहसि संस्थिता । सीतां सीमोल्लङ्घनार्थं शीघ्रं प्रेषय राघव ॥१॥
तन्मातुर्वचनं श्रुत्वा तथेत्युक्त्वा सत्रिस्तरात् । सलक्ष्मणां निजांपत्नीं प्राह सम्मन्त्रिनं पुरः ॥२॥
वाल्मीकेराश्रमं सीतात्यागादि च सकारणम् । अथ मासेऽष्टमे प्राप्ते राधो राजीवलोचनः ॥३॥
एकान्ते जनकीं प्राह रीजयन्ता लक्ष्मणेन हि । कम्पयित्वा मिषा देवि रजकोक्तं त्वदश्रयम् ॥४॥
त्यजामि त्वां वने लोकवादाद्भीता इवापरः । त्रिमान्मार्ध्वञ्चमासाद्वाः सम् मामामुयुदाद्भिः ॥५॥
अन्तर्वत्नी न गच्छेति शास्त्राज्ञां रजकच्छलात् । त्वां त्यक्त्वा पालयिष्यामि निकटे वस्तुमक्षमाः ॥६॥
त्वां दृष्ट्वा संवदन्त्यां कामो मेन्मान बाधते । त्वद्वियागस्तु निर्बन्ध्वानिना मन्त्र कथं भवेत् ॥७॥
तस्मात्कृताऽयं निर्ग्रन्थः सत्यं विद्धि मनोरथं । पञ्चवर्षानन्तरण पुनरागत्य मण्डलेऽकम् ॥८॥
लोकानां प्रत्ययार्थं त्वं शपथं हि करिष्यसि । भूमेर्धिवरमार्गेण स्थित्वा मिहायसोपरि ॥९॥
वह आश्रम शब्दरायमान हो रहा था। यत्र तत्र मोतियोंका झालरवाली चाँदनियाँ टॅगी हुई थीं और बहुत-सी तसवीर भी जहाँ-तहाँ टॅगी थीं ॥ ५१ ॥ जनकजी ने सीताके लिए इस प्रकारका सुन्दर भवन बनाकर तैयार करवाया। यदि ऐसा दिव्य भवन सीताजीके वास्ते बन गया तो इसमें आश्चर्य ही क्या है। जहां निवास करनेके निमित्त साक्षात् लक्ष्माजी जन्मवाला हा, वहाँ कौन वस्तु दुर्लभ हो सकती है। जिसके कटाक्षमात्रसे इन्द्रादि देवनाओंकी भा सम्पत्तियां बनतानबगटता है। उसके विषयमें मैं कहाँ तक वर्णन करूंगा। जनकजीने महर्षि बाल्मीकिको भी वह सब बात बतला दी, जिसे सुनकर वे बहुत प्रसन्न हुए और सीताके उस भावी आगमनको उन्हान अपनी तपस्याका फल समझा ॥ ५२-५४ ॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयात्मजविरचित ज्योत्स्ना भाषाटीकासमन्वित जन्मकाण्ड द्वितीयः सर्गः ॥ २ ॥
श्रीरामदासने कहा—एक दिन एकान्तमे कौसल्याने रामसे कहा कि अब समय हो गया है। शीघ्र सीताको अपनी सीमासे कहीं अलग भेज दो। माताकी बातको रामने स्वीकार किया और वह भी बतलाया, जिसका निर्णय बहुत दिनों पहले कर चुके थे ॥ १ ॥ २ ॥ फिर यह भी कहा कि मेरा इस समय सीताका त्याग करना उचित है। कुछ दिन बाद आठवाँ महीना लगनेपर रामने सीताको एकान्तमें बुलाकर समझाते हुए कहा—देवि ! उस दिन एक धोबीने तुम्हारे विषयमें बड़ा कुत्सित आलोचना की थी उसीके बहाने मैं तुम्हें कुछ दिनोंके लिए वनमें छोड़ दूंगा। इससे दुनिया समझेगी कि मैं लोकापवादसे बहुत डरता हूँ। दूसरी एक बात यह है कि गर्भसे तीसरे, पाँचवे अथवा सातवे महीनेमें स्त्रीका सङ्ग नहीं करना चाहिए। यह शास्त्रोंकी आज्ञा है। इसलिए उस धोबीकी बातके व्याजसे तुम्हें दूर रखकर मैं शास्त्रकी आज्ञाका पालन करूंगा और पास रहनेमें यह न हो सकेगा कि मैं तुमसे न बोलूँ ॥ ३-६ ॥ क्योंकि तुमको देखनेसे मुझे काम सताने लगता है। तुम्हारा वियोग भी बिना किसी बहानेके नहीं हो सकता था। इसलिए मैंने ऐसा प्रबन्ध किया है और इस समय मैं जो कुछ कह रहा हूँ, उसे अक्षरशः सत्य समझो। पाँच वर्षके बीतते ही तुम फिर यहाँ आओगी और संसारको दिखानेके लिए तुम्हें शपथ लेनी होगी ॥ ७ ॥ ८ ॥ ९ ॥
३०२ आनन्दरामायण [ सर्गः ३
यदा गच्छसि पातालं जगन्त्या पूजिता तदा । भुवस्तुन्दा मीषयित्वा त्वामंके स्थापयिष्यहम् ॥१०॥ पुत्राभ्यां च मया सीते ततो भोगानवाप्स्यसि । मत्स्वकः कुश्रो ज्येष्ठस्तव पुत्रो भविष्यति ॥११॥ सुम्भवः प्रभावेण भविष्यत्यपरो लवः । वाल्मीकेराश्रमे चैवं कुमारी द्वौ भविष्यतः ॥१२॥ अग्रे गत्वा त्वन्मात्रिप्रा स्वच्छापं च गृहादिकम् । मसुमेधन सकलं कृतमस्ति ममाज्ञया ॥१३॥ कुरुष्वाद्य मया यच्चोच्यते जनकात्मजे । सात्त्विकी त्वं यथापूर्वं दंडके गौतमीतटे ॥१४॥ अज्ञानाने स्थिता यद्वन्मे वामभागे तथाधुना । वाल्मीकेराश्रमे गन्तुं शुजद्वयविमिश्रिता ॥१५॥ भूत्वा स्वमाश्रमे स्थित्वा मद्धियोगं प्रदर्शय । तत्रापि त्वां कुशोत्पत्तौ दास्यामि दर्शनं रहः ॥१६॥ तथेति रामवचनाज्जानकी सा स्मितानना । रजनमोमयीं स्वर्चा छायां निधाय सादरम् ॥१७॥ अंशाथपस्य वामांगे सत्त्वरूपा लयं ययौ । ततो रामः सभां गत्वा रत्रौ ज्ञानैकविग्रहः ॥१८॥ मविविधर्मयत्त्रासुदेलमुखैर्यथोक्तकैः । समन्ततो वेष्टितः संस्तस्थौ सिंहासनोपरि ॥१९॥ तत्रोपविष्टं राजानं सुहृद पर्युपासिरे । हास्यप्रायकथा भिश्च हासयन्तः स्थिताः सुखम् ॥२०॥ अथ प्रसङ्गात्पप्रच्छ रामो विजयनामकम् । पौरा जानपदा वा म किं वदन्ति शुभाशुभम् ॥२१॥ सीतां तां मातरं वा मे भ्रातृन्वा कैकयीमथ । न भेतव्य त्वया ब्रूहि शापितोऽसि ममापरि ।२२। इत्युक्तः प्राह विजयो देव सर्वे वदंति ते । कृतं सुदुष्करं कर्म रामेणाविदितात्मना ॥२३॥ यद्याप्येवं वदन्ति स्वां जनास्तच्चे वदाम्यहम् । किंतु हन्त्वा दशग्रीवं सीतामाहृत्य राघवः ॥२४॥ अमर्षे पृष्ठतः कृत्वा स्ववेश्म प्रत्यपादयत् । कीदृश हृदयं तस्य र्भतामभागजं सुखम् ॥२५॥
समय तुम अब एक दिव्य सिंहासनपर बैठकर भूमिके विवरमार्गसे पातालको जाने लगोगी । तब मैं भूमिकी प्रार्थना करके या धमकाके तुम्हें वापस ले लूँगा और अपने गोदमें बिठाऊँगा ॥ ९ ॥ १० ॥ उस समय तुम अपने दो बेटोंको लिय हुए मेरे साथ रहकर विविध प्रकारके सुख भोगोगी। मेरे द्वारा मुझसे एक पुत्र होगा, जिसका नाम पडेगा कुश और दूसरा बेटा ऋषि के कृपावरके प्रभावसे उत्पन्न होगा, जिसका नाम होगा लव । इस प्रकार वाल्मीकिके आश्रमपर तुम्हारे दो पुत्र होंगे ॥ ११ ॥ १२ ॥ तुम्हारी माताके साथ जनकजी पहले ही उस आश्रमपर जा चुके हैं और उन्होंने तुम्हारे आगमनकी सब सामग्रियाँ प्रस्तुत कर दी है । १३ ॥ आज मैं तुमको जैसा कह रहा हूँ हे जनकात्मजे ! तुम्हें वही करना पडेगा। जैसे उस समय गौतमीके तट-पर तुमने अपनी दो मूर्तियाँ बनाया थी । उसी प्रकार इस समय भी अपनी दो स्वरूप बनाओ और पहलेकी नाई इस समय भी तुम सात्विक रूपमें मेरे बाम अंगमें निवास करो । १४ ॥ १५ ॥ और दूसरे स्वरूपसे वाल्मीकिके आश्रमपर रहकर संसारको मेरे वियोगका दुःख दिखलाओ। आश्रमपर भी जब कुशका जन्म होगा, उस समय आकर मैं तुम्हें एकान्तमें दर्शन दूंगा । १६ ॥ रामकी बात सुनकर सीताजी मन्द मुस्कराहट के साथ 'तथास्तु' कहा और रजोगुणमयी तथा तमोगुणमयी संता अपनी छाया नामक दक्षिण भागमें बैठ गयी और सत्त्वरूपसे रामके वाम भागमें विलीन हो गयी ॥ १७ ॥ इसके बाद रामचन्द्रजी सभाभवनमें गये । वहाँ मन्त्रणानिपुण मन्त्रियों तथा कितने ही दरबारियोंसे वेष्टित होकर बैठे। मित्रोने उस समय भगवान्की विविध प्रकारसे पूजा की। तत्पश्चात् तरह-तरहकी हँसी-दिल्लगीकी बात कर-करके वे परस्पर मनोविनोद करने लगे । १८-२० ॥ प्रसंगवश रामने विजय नामक एक गुप्तचरसे पूछा कि इस समय अयोध्यावासी लोग मुझ किस दृष्टिसे देखते है। उनकी दृष्टिमं मेरा शासन कैसा है वा खराब ? इसके अतिरिक्त सीता मेरी मात, भा, भाइया अथवा कैकईके प्रति लोगक हृदयमं कमानभाव है। किसी प्रकार डरो मत, जो कुछ मालूम हा साफ़-साफ़ बतला दो । तुम्हे मेरा शपथ है। इस प्रकार रामक पूछनपर विजयने कहा-हे देव ! आपके किये महान् कार्यों की सराहना करते हुए लोग प्रशंसा ही करते है ॥ २१-२३ । फिर भी आपके विषयमे कुछ लोगोका जो दूसरा राय है। उसे भी बतलाता हूँ, वे कह रहे कि रामने रावणको मारकर सीताको उससे छुड़ाया और बिन कुछ सोच-विचार अपन घरमं बिठाल लिया। हम नहीं समझते कि रामका
सर्गः ३] उत्तरकाण्डम् ३०१
सा हृता विजने पूर्वं रावणेन वने तदा। अकस्मादपि दुष्कर्म योषित्स्वमर्षदं भवेत् ॥२६॥
यादृग्भवति वै राजा तादृश्यो नियमाः प्रजाः। इति नानाविधा वाचः प्रवदन्ति पुरेजनाः ॥२७॥
अपरञ्चिन्तयन्पश्यामि सांप्रतं रजकोदितम्। दुर्भागां स्वगृहाद्भार्यां कीदृशेन यः ॥२८॥
रजकः प्राह मोऽङ्गे मोऽहं रामो न मैथिलीम्। शरण्य शुद्धे स्पष्टं स्थित्वामगीचकार यः ॥२९॥
यथेच्छं गच्छ रंडे त्वं नाहं रामवदाचरे। गच्छता च मया मार्गे रजकेन ममोदितम् ॥३०॥
इति राम श्रुतं पूर्वं मया दृष्टं निवेदितम्। यत्पथ्यमि हितं चात्र तत्कुरुष्व रघूत्तम ॥३१॥
श्रुत्वा तद्वचनं रामः स्वजनांश्चाप्यपृच्छत्। तेऽपि तन्माञ्जब्रुवन् राममेवमेतन्न संशयः ॥३२॥
ततो विसृज्य सचिवाग्विजयं सुहृदस्तथा। ग्राहूय लक्ष्मणं रामो वचनं चेदमब्रवीत् ॥३३॥
लोकापवादस्तु महान्संयातामद्यैव मेऽभवत्। सीतां प्रातः समारोप्य वाल्मीकेराश्रमांतिके ॥३४॥
त्यक्त्वा शीघ्रं रथेन त्वं पुनरायाहि लक्ष्मण। वक्ष्यमे यदि वा किंचिदत्र मां हतवानसि ॥३५॥
छित्त्वा सीताभुजं नोऽद्यप्रत्ययार्थं समानय। इत्युक्त्वा लक्ष्मणं रामः कैकेयीं श्रूङ्गुमाययौ ॥३६॥
एतस्मिन्नन्तरे सीतां कैकेयी रहसि स्थिता। पप्रच्छ कौतुकात्सीते भित्तीलिख्य दशाननम् ॥३७॥
मामग्र दर्शयस्वाथ तां प्राह जानकी तदा। मयाऽवलोकितो नैव कदाऽपि स दशाननः ॥३८॥
यदा हर्तुं पंचवट्यां मां भ्रामो गौतम्यतटे। तदा दृष्टस्तदङ्गुष्ठो मया दक्षिणपादजः ॥३९॥
तन्सीतावचनं श्रुत्वा कैकेयी प्राह तां पुनः। यथा दृष्टस्त्वयांगुष्ठस्तथा भित्तौ लिखस्व हि ॥४०॥
तथेति जानकी लेख्य तदंगुष्ठ भयानकम्। कैकेय्यै दर्शयामास तापसंश्च गृहं ययौ ॥४१॥
हृदय कैसा है जो इतना अनर्थ होनेपर भी लोटा हुई माताके साथ विहार करते हुए सुखी हो रहे हैं ॥२४।२५॥ जो सीता उस दुष्टके द्वारा हरी गयी और कई वर्ष तक उसके घरमे रही, उसके लिए रामको कुछ सोच विचारनेकी आवश्यकता क्योंकर नहीं मालूम हुई ? उनका क्या बिगडा वे चाहे एक बार कोई दुष्कर्म भी कर लें तो कोई दृष्टि नहीं उठा सकता लेकिन इसका दुष्प्रभाव तो प्रजाके ऊपर पड़ेगा। यह साधारण नियम है कि जिस देशका जैसा राजा होता है, प्रजा भी वैसी ही हुआ करती है। इस प्रकारकी बातें बहुतोंके मुंहसे सुनी गयी हैं। एक धोबीने भी एक बात आपके बारेमें कही थी सो भी कहता हूँ। उसने कामवश अपनी व्यभिचारिणी स्त्रीको संबोधित करके कहा 'अरी ओ रण्डे ! मैं वह राम नहीं हूँ, जिन्होंने क्यों शरणके वशमें रही हुई सीताको अङ्गीकार कर लिया है। तेरी जहाँ इच्छा हो जा मैं रामकी तरह कर्म नहीं करूँगा और तुझे नहीं रखूँगा ॥२६-३०॥ मैं रास्तेमे चला जा रहा था, तब धोबीकी बात सुनी थी। सो पूछनेपर आपको बतला दी। अब आप जो अच्छा समझें, वह करें। विजयकी बातें सुनकर रामचन्द्रजीने अपने मित्रोंसे भी इस विषयमें पूछ-ताछ की। उन लोगोंने भी वही कहा जो विजयने बतलाया था। इसके बाद रामचन्द्रजीने मंत्रियों तथा विजयको बिदा कर दिया और लक्ष्मणको बुलाया। लक्ष्मणसे रामने कहा— हे लक्ष्मण ! सीताके कारण नगरमें लोग हमारी बड़ी निन्दा कर रहे हैं। इससे भी बढ़कर अपवाद होनेकी आशंका है। इसलिए कल सबेरे तुम सीताको रथम बिठाकर मुनि वाल्मीकिके आश्रमपर छोड़ आओ। इस बातके विपरीत यदि तुम कुछ कहोगे तो तुम्हें हमारी हत्या करनेका पाप लगेगा। हाँ, इतना और करना। उनसे छोटेके समय सीताकी एक भुजा भी काटकर ले आना, जिसे दिखाकर मैं अयोध्यावालोंको विश्वास दिला सकूँ॥। इतना कहकर राम कैकेयीके पास चल दिये। इसी बीच कैकेयीने आँगनमें बैठी बाते करते-करते सीतासे कहा-सीते ! इस दीवारपर रावणका चित्र लिखकर हमें दिखाओ कि वह कितना बड़ा था। इसके उत्तरमे सीताने कहा 'मैंने रावणको कभी देखा ही नहीं ॥३१ ३८ ॥ हाँ, जब वह पंचवटीमें मुझे हरनेके लिए गया था, तब मैंने उसके दाहिने पैरका अंगूठा देखा था। सीताका उत्तर सुनकर कैकेयीने कहा—अच्छा, उसका अंगूठा जैसा रहा हो, वही इस दीवारपर लिख दो। जानकीने कैकेयीके कथनानुसार दीवारपर उसके भयानक अंगूठेका चित्र लिखकर दिखा दिया और थोड़ी देर बाद अपने
३०४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ३
अङ्गुष्ठोपरि कैकेय्या यथायोग्यो दशाननः । लिखितः स्वेन हस्तेन रामं द्रष्टुं कुबुद्धितः ॥४२॥ द्वारद्वारं समायातं दृष्ट्वा सा संभ्रमान्विता । भित्तिनिके राघवाय ददावासनमुत्तमम् ॥४३॥ रामोऽपि नत्वा कैकेयीमासने संस्थितोऽभवत् । ददर्श भित्तौ लिखितं विचित्रं तं दशाननम् ॥४४॥ रामः पप्रच्छ केनात्र लिखितोऽयं दशाननः । कैकेयी कथयामास सीतया लिखितस्त्विति ॥४५॥ यत्र यत्र मनो लग्नं स्मर्यते हृदि तत्सदा । स्त्रियाश्चरित्रं को वेत्ति शिवाद्या मोहिताः स्त्रिया ॥४६॥ कैकेयीवचनं चेत्थं श्रुत्वा रामो महामनाः । सीताश्रयं समावृत्तं कैकेयीमाह विस्तरात् ॥४७॥ लक्ष्मणेन त्यजाम्यद्य श्वः सीतां जाह्नवीतटे । सीताभुजं वने छित्त्वा समानयतु मन्दिरात् ॥४८॥ सौमित्रिस्त्वां तथा पौरान्दर्शयिष्यति निश्चयात् सीतया लिखितो यस्मात्स्वभुजेन दशाननः ॥४९॥ स्त्रीहत्याभयमालस्य नहन्मे लक्ष्मणो मया । न चोदितश्च तां हिंस्रा भक्षयिष्यन्ति वै क्षणात् ॥५०॥ इति रामवचः श्रुत्वा कैकेयी मुदिताऽभवत् । सीताया विरहाद्रामो नेदं राज्यं प्रशास्यति ॥५१॥ सेवार्थं रामचन्द्रस्य लक्षमणोऽपि न शाप्स्यति । तदा श्रीरामवाक्येन भरतो मे प्रशास्यति । ५२॥ इति मञ्चिन्त्य हृदये कैकेयी मुदिताऽभवत् । रामोऽपि नत्वा कैकेयीं सुमित्रां स्वां च मातरम् ॥५३॥ समावृत्तं च कैकेयीगेहे यज्ज्ञानमादरात् । श्रावयामास सकलं वृत्तं सीताश्रयं प्रभुः ॥५४॥ नत्वा सुमित्रां कौसल्यां रामः सीतागृहं ययौ । सीतया दत्तपाद्यार्घासनमर्गांचकार सः ॥५५॥ समावृत्तं च कैकेयीगेहे यद्दष्टमादरात् । श्रावयामास तत्कृत्स्नं वृत्तं तं जानकी मुदा ॥५६॥ तच्छ्रुत्वा जानकी प्राह कैकेय्या वचनान्मया । अङ्गुष्ठ एव लिखितस्त्वयोर्ध्वं लिखितो धिया ॥५७॥ अङ्गुष्ठस्यानुरूपेण दशास्यो दुष्टबुद्धितः । तन्मेतावचनं श्रुत्वा जानकीमाह राघवः ॥५८॥
महलोंको चली गयी। सीताके चले जानेपर द्वेषवश कैकेयीने रामको दिखानेके लिए उस अंगूठेके अनुसार रावणके पूरे शरीरका चित्र अपने हाथसे बना दिया ॥ ३९-४२॥ इतनेमें कैकेयीने देखा कि राम इसी ओर आ रहे हैं। तब झटपट उसने उस दीवारके पास ही रामजीको बैठनेके लिए आसन डाल दिया। रामने वहीं पहुँचकर कैकेयीको प्रणाम किया। फिर आसनपर बैठ गये। थोडी देर बाद रामका दृष्टि उस बने हुए रावणके चित्रपर पडी ॥ ४३ ॥ ४४ । रामने पूछा यहांपर रावणका चित्र किसने बनाया है? तदुत्तरमें कैकेयीने कहा कि आपके बहू सीतने यह चित्र लिखा है। जहां जिसका मन लगा रहता है, बार बार उसीकी याद आती रहती है। यह एक साधारण नियम है। और फिर स्त्रियोंके चरित्रको कौन जान सकता है शिवाद्दिक देवता भी तो स्त्रीचरित्रका पार नहीं पा सके और वे भो मोहित हो गये ॥४५॥४६॥ कैकेयीकी बात सुनकर मनस्वी रामचन्द्रजीने कैकेयीको वह बातें भो बतलायीं, जो सभामें विजयके मुंहसे सुनी थीं। इसी सिलसिलामम उन्होंने यह भी कहा - मातः! कल सबेरे लक्ष्मणके साथ मैं सीताको गंगाजीके तटपर भेज रहा हूँ। वह उसे वहीं छोड देगा और आप तथा पुरवासियोंको दिखानेके लिए मेरे कहनेसे सीताका एक हाथ भो काट लायेगा। क्योंकि सीताने उसी हाथसे तो रावणका यह चित्र बनाया होगा। स्त्रीहत्याके भयसे मैं उसे मारनेकी आज्ञा नहीं दूँगा। लेकिन जब उसके हाथ नहीं रहेंगे तो वह जियेगी कैसे ? वनके हिंसक जीव ही उसको खा जायेंगें ॥४७-५०॥ इस प्रकार रामके वचन सुनकर कैकेयी बहुत प्रसन्न हुई और मनही मन सांचन लगी कि सीताके विरहसे दुखी होकर राम राज्यका काम नहीं कर सकते। लक्ष्मण भी रामकी सेवामें लगे रहनेके कारण राज्यका भार अपने ऊपर नहीं लेंगे। उस दशामे विवश होकर राम मेरे बेटे भरतसे राज्यका काम करनेके लिए आग्रह करेंगे। यह सोचकर कैकेयी प्रसन्न हुई । रामजी भी कैकेयीको प्रणाम करके अपने महलोंको चले गये। वहाँ अपनी माता कौसल्या तथा सुमित्राको आदिसे अन्ततक सीतासम्बन्धी सब वृत्तान्त कह सुनाया । फिर कौसल्या और सुमित्राको प्रणाम करक वे सीताके भवनमें जा पहुँचे । सीताने पाद्य-अर्घ्य-आचमनायादिसे उनकी पूजा की और रामजी एक आसनपर बैठ गये। इसके
सर्गः ३ ]
सर्गः ३ ] जन्यकाण्डम् ३०५
कौटिल्यबुद्धिं कैकेय्याः समग्रं वेद्म्यहं प्रिये । इत्युक्त्वा राघवः सीतामालिङ्ग्याग्रे चुचुम्ब सः ॥५९॥
प्रीत्या हेमपर्यङ्के भुक्त्वा भोगाननुत्तमान् । विनोदार्थं रघुपतिः प्राह रात्री विदेहजाम् ॥६०॥
स्त्रीणां माने सगर्भाणां वाञ्छितं वाञ्छते मनः । का ते वाञ्छा वदस्व त्वं तं ते दास्यामि निश्चितम् ॥६१।
इति रामवचः श्रुत्वा भाविकार्येण गर्भिणी । सा प्राह राघवं राम गङ्गास्तीरस्थितान्बहून् ॥६२।
मुनीनामाश्रमांश्चापि ऋषिपत्नीश्च तद्गतान् । वाञ्छते मे मनो द्रष्टुं शीघ्रं प्रेषय तत्र माम् ॥६३।
इति सीतावतः श्रुत्वा तथास्त्विति रघूत्तमः । प्राह प्राप्ते दिने लक्ष्मणः श्वा नेष्यति त्वां ममाज्ञया ॥६४।
पुनः प्राह रघुश्रेष्ठः सीते ने क्रीडनादिभिः । जपश्चादिकं सर्वं विस्मृतं तन्मया पुरा ॥६५।
तत्कुरुष्वार्य्यपुत्रा माते गतायां त्वयि काननम् । इत्युक्त्वा जनकीं रामः सुष्टं सुप्ताए मंचके ॥६६॥
सीताऽपि चिंतयामास यत्र माता पिता मम । किं मां न्यूनं हि तत्रास्ति किंचिद्वस्त्रादिकं महत् ॥६७।
नाहनेष्या मय्यनूणीं सख्या दास्या समन्विता । लक्ष्मणेन रथे स्थित्वा गन्ध्यामि मुदिता सुखम् ॥६८।
इति निश्चिम्य सा रात्री सुप्त सुष्टुए मंचके । अथ प्रभाते मात्याय स्नाता स्नानं रघूत्तमम् ॥६९॥
पक्वान्नादानि सन्द्रात्रे पर्य्यवेपदनुत्तमम् उपहारे कृते भर्त्रा स्वय कुन्चोपहारकम् ।.७०।
पृष्टोर्मिलादिकाः स्त्रीश्च ततः श्वश्रूः प्रणम्य च । गङ्गातीरस्थितान् दृष्ट्वा मुनीन्द्रष्टुं समुद्यता ॥७१।
ताः पप्रच्छ यनीयुक्ता दास्या मम्भार लक्ष्मणम् । ततोऽसौ लक्ष्मणो भ्रात्रा चोदितम्त्वां ययौ जवात् ७२॥
दाश्या सख्या तुलस्याद्य सीता कृत्वा स्थित्वाऽथाम् गयौ दक्षिणमार्गेण वायुवेगात्त्व जाह्नवीम् ॥७३॥
इन्द्राय्रा निर्जगत्वक्रः सीतामन्वाये पत्त्रिकथाम् । उल्लङ्घ्य तमसां पुण्यां गोमतीं जाह्नवीमपि ॥७४॥
यमुनां तां महापुण्यां तथा मंदाकिनीं नदीम् द्वितीयां तमसां पुण्यां समुल्लङ्घ्य स लक्ष्मणः ।७५।
बाद उन्होंने वह वृत्तान्त बतलाया, जो मध्यान तथा कैकेयीके भवनमें हुआ था। सीताने कहा कि माता कैकेयीके बहुतसे में केवल रामका पेटका अङ्ग बनाया था। बाकी अङ्गा अपना इतनाम गयाका सारा शरीर बना दिया। इस तरह सीताके वचन सुनकर रामने कहा प्रिये ! मैं कैकेयीकी कुटिलताको भली-भाँति जानता हूँ। इतना कहकर रामने सीताको अपना हृदयसे लगा लिया और बड़े दम्पक उनका मुँह चूमते रहे। फिर विनोद करते करते रात्री बिट गयी। थोड़ी देर बाद रामने सीतासे कहा—प्रिये ! मैं जहाँतक जानता हूँ, गर्भिणी स्त्रियों चित्तमें कई न कई चाह रहती है। तुम्हारी भी किसी वस्तुकी इच्छा है? यदि हो तो बतलाओ, मैं अवश्य दूँगा ॥५९-६१॥ इस प्रकार रामके बोल सुनकर भाविभावश सीताने गङ्गातटनिवासी ऋषियोंके आश्रमों और मुनीकी सन्ध्या देखनेकी इच्छा प्रकट की और कहा कि मुझे शीघ्र वहाँ भेज दीजिये। राम सीताका प्रति स्वीकार करके कहा कि—प्रातः काल ही लक्ष्मण तुम्हें गङ्गातटपर ले जायेंगे। थोड़ी देर बाद फिर बोले—सीते बहुत दिनसे तुम्हारे साथ भोग-विलासमें मैं इतना लीन हो गया कि जप, तप, ध्यान, धारणा आदि सब कुछ भूल गया था। यदि तुम कुछ दिनके लिए वहाँ चली जाओगी तो मैं कुछ भजन-ध्यान करूँगा। इस प्रकार बातें करके राम सो गये । सीता भी अपने मनमें सोचने लगीं कि जहाँपर मेरे पिता माता आदि परिवारके सब लोग विद्यमान हैं वहीं किस वस्तुकी न्यूनता हो ही नहीं सकती। अब मैं साथ कुछ न ले जाऊँगी ॥६२-६७॥ अब केवल रित ही मैंम नहीं चलना दूँगी, बल्कि अपनी सखियो दासियों और तुलसाके साथ ईसें; सुखी उनकी अवश्य जाऊँगी । यह निश्चय करके सीता जी आनन्दपूर्वक सो गयी ॥६८॥६९॥ सबेरे होकर उठकर स्नान किय और भोजन बनाया। उधर रामने भी स्नान कर लिया और भोजन करने बैठे । सीताने बड़े प्रेमसे सम्हारकर उन्हें भोजन कराया । तदनन्तर आप भोजन किया । ७०॥ फिर उर्मिला आदि बहन से पूछकर सासजीको प्रणाम किया और गङ्गातट के बनाय रहनेवाले मुनियोंको देखनेके लिए जानेको तैयार हो गयीं । ७१॥ उन्होंने रथ लानेके लिए लक्ष्मणजीको बुलाया। रामचंद्रके आज्ञानुसार लक्ष्मण शीघ्र रथ लेकर आ पहुंचे ॥७२। सीता अपनी सखियो, दासियो तथा तुलसावृक्षके साथ रथमें बैठीं और लक्ष्मणने दक्षिण मार्गमें गङ्गातटकी ओर पवनवेगके समान रथको चलाया ॥७३॥७४।
३०६ आनन्दरामायणे [ सर्गः ३
चित्रकूटोपत्यकायां वाल्मीकेराश्रमांतिके । पिप्पलाधो मैथिलीं तां सख्या सास्त्या वरासने ॥७६॥
निवेश्य नत्वा स प्राह साश्रुनेत्रः सगद्गदः । लोकापवादभीत्या त्वां त्यक्तवान् राघवो वने ॥७७॥
दोषो न कश्चिन्मे मातर्गच्छाश्रमपदं मुनेः ।
इत्युक्त्वा तां परिक्रम्य सख्या दास्याऽपि वीजिताम् ॥७८॥
ययौ रथेन सौमित्रिः पूर्वमार्गेण जाह्नवीम् । शिष्यैः श्रुत्वाऽथ वाल्मीकिर्जनकेन सुमेधसा ॥७९॥
ययौ स्त्रीभिर्द्विजैर्युक्तः पूजयामास जानकीम् । शिविकायां संनिवेश्य वीजितां चामरादिभिः ॥८०॥
नानावाद्यनिनादैश्च वेश्यानां नर्तनैर्वरैः । स्तवनैर्मागवादीनां नटादीनां सुगायनैः ॥८१॥
निनाय अन्तः सीतां वाल्मीकेराश्रमे मुदा । मुनिपत्न्यो वन्यपुष्पैर्ववर्षुर्जांनकीं मुदा ॥८२॥
जानकीशिविकाग्रे ते ददृशुर्वज्रपाणयः । एवं विवेश सा सीता वाल्मीकेराश्रमं मुनेः ॥८३॥
चक्रुर्नीराजनं दीपैर्मुनिपत्न्यश्च जानकीम् । जानकीं हेमपर्यङ्के घृताधौकोपबर्हणा ॥८४॥
सुखमापाश्रमे तस्य वाल्मीकेश्च तपस्विनः । जानकीं पूजयमासुर्मुनिपत्न्यः पृथक् पृथक् ॥८५॥
दिव्यान्नैर्वनजैर्वस्त्रैर्मुनिपत्न्योर्निरन्तरम् । ज्ञात्वा परात्मनो लक्ष्मीं मुनिवाक्येन भक्तितः ॥८६॥
दोहदान् पूरयामासुः सीतपत्या मुनिस्त्रियः । शिविकासंस्थिता सीता ददर्श वनकौतुकम् । ८७॥
यथापूर्वं तु साकेते सुखमाप विदेहजा ।
तथा मुनेराश्रमेऽपि सुखमाप पतिव्रता ।८८॥
इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये
जन्मकाण्डे सीताया वाल्मीक्याश्रमगमनं नाम तृतीयः सर्गः । ३ ॥
जब वे परम पवित्र यमुना, मन्दाकिनी तथा तमसा नदीको पार करके चित्रकूटकी तलेटीमें वाल्मीकिआश्रमके समीप पहुंचे, तब लक्ष्मणने रथको रोका और एक पीपल वृक्षकी छायामे आसन बिछा दिया। उस सखियोंके साथ सीताजी उसपर जा बैठी ॥७५ । ७६ । तब आँखोंमें आंसू भरकर गद्गद कण्ठसे लक्ष्मणजी कहने लगे-माता ! लोकापवादके भयसे रामचन्द्रजीने आपको इस वनमें छोड़नेके लिए मुझे आज्ञा दी है। इसमें मेरा कोई दोष नहीं है। अब आप यहाँसे ऋषि वाल्मीकिके आश्रमपर चली जायं। इतना कहकर लक्ष्मणने सीताकी परिक्रमा की और प्रणाम किया, उस समय दासी और सखियां सीतापर पङ्खा झल रही थी ॥७७।७८॥ फिर वे अपने रथपर बैठकर उसी मार्गसे अयोध्याके लिए लौट पड़े, जिधरसे गये थे। उधर वाल्मीकिने कुछ शिष्योंसे यह वृत्तांत सुना तो जनकजी, सुमेधा तथा कितनी ही स्त्रियों और ब्राह्मणोंके साथ वहाँ पहुँचे, जहाँ सीता बैठी थीं। वहाँ पहुँचकर उन्होंने सीताकी पूजा की। फिर उन्हें सुन्दर पालकीमें बिठाया और अपने आश्रमकी ओर चले। रास्तेमे अनेक प्रकारके बाजे बज रहे थे। वेश्यायें नाच रही थीं और भाट विरुदावली बखान रहे थे। नट-गायक आदि सुन्दर गायन गा रहे थे । ७९-८१॥ जब सीताजी आश्रमपर पहुंच गयीं, उस समय मुनिपत्नियोंने सहर्ष उनपर विविध प्रकारके वनफूल बरसाये ॥८२॥ उन्होंने आरती उतारी और एक सुवर्णनिर्मित पलंगपर बिठाया ॥८३॥ वहाँ पहुँचकर सीताको बड़ा आनन्द मिला। आश्रमकी ऋषिपत्नियोंने अलग-अलग सीताकी पूजा की ॥८४॥ उस दिनसे कितने ही तरहके दिव्य अन्न, वनके सुस्वाद फल तथा फूल आदि दे-देकर सीताको सब स्त्रियें प्रसन्न किये रहती थीं। क्योंकि उन लोगोंने वाल्मीकिसे सुन रक्खा था कि सीता कोई साधारण स्त्री नहीं साक्षात् विष्णुभगवानकी भार्या लक्ष्मी हैं। जब इच्छा होती तब सीता पालकीपर सवार होकर वनको देखनेके लिये जाया करती थीं। सीताको जो सुख अयोध्यामे मिलता था, वही यहाँपर भी सुलभ था ॥८५-८८॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये जन्मकाण्डे पं० रामतेजपाण्डेयविरचितभाषाटीकायां तृतीयः सर्गः ॥ ३ ॥
सर्गः ४ ] उत्तरकाण्डम् २०७
सर्गः ४ ] उत्तरकाण्डम् २०७
चतुर्थः सर्गः
( वाल्मीकिके आश्रममें लव-कुशका जन्म )
श्रीरामदास उवाच
अथ गङ्गातटं गत्वा लक्ष्मणोऽचिन्तयद्धृदि । स्वेच्छया कौतुकास्मीनौ मया शुद्धां स त्यक्तवान् ॥ १॥
स्वीयकामप्रशान्त्यर्थं शास्त्राज्ञां प्रतिपालयन् । एवं सति पुनस्तेन किं ममाज्ञापितं रहः ॥ २ ॥
वनात्सीताभुजं छित्त्वा नयस्वेत्यतिदुर्घटम् । मयापि शपथं बन्धा न पृष्टः स विचिन्त्य च ॥ ३ ॥
अधुना किं करोम्यत्र कथं रामं प्रगम्यते । सीताभुजं विना दृष्ट्वा रामो मां किं वदिष्यति ॥ ४ ॥
छेत्तुं सीताभुजं शक्तो भविष्यामि कथं त्वहम् । ययाऽहं पुत्रवन्नित्यं पालितो लालितस्त्वपि ॥ ५ ॥
अधुनाऽग्निं विशाम्यत्र रामापास्यं न दर्शये । एवं निश्चित्य सौमित्रिश्चितां कर्तुं मनो दधे ॥ ६ ॥
एतस्मिन्नन्तरे तत्र विश्वकर्मा विधेर्गिरा । कुठारहस्तो विपिने बभ्राम तक्षकपृथक् ॥ ७ ॥
तं दृष्ट्वा लक्ष्मणः प्राह त्वं मे साहाय्यमाचर । कुठारेण तरूंश्छित्त्वा चितार्थं देहि मां जवात् ॥ ८ ॥
यथेष्टं वस्तु दास्यामि त्वामहं नियमेन हि । सोऽप्याह लक्ष्मण वीर चितार्थं वदस्व माम् ॥ ९ ॥
सौमित्रिः कथयामास पूर्ववृत्तं सविस्तरम् । तच्छ्रुत्वा मद्दल तक्षः सौमित्रिं प्राह सस्मितः ॥ १० ॥
अल्पार्थे स्वोपकुरुष मा मुञ्चस्व स्वमायुज । अहं सीताभुजं कृत्वाऽधुना दास्यामि ते क्षणात् ॥ ११ ॥
इत्युक्त्वा लक्ष्मणं कृत्वा जानकीभुजमुत्तमम् । सद्रुर्मामास्थिनायुक्तपूरितं कञ्चुकोयुतम् ॥ १२ ॥
सीतालङ्कारसहितं सद्यश्चाविर्विवाहिनम् । ददौ लक्ष्मणहस्ते तं स्वयमन्तर्दधे क्षणात् ॥ १३ ॥
सीताभुजं समादाय लक्ष्मणोऽपि पुरीं ययौ । गतश्रियं निरुत्साहां वात्यातितृणितुशराम् ॥ १४॥
ददर्श नगरीं स्वीयां नारीहीनगृहोपमाम् । विवेशाथोसृजः सूर्य नत्वा महसि राघवम् ॥ १५॥
श्रीरामदास बोले उत्तर गङ्गातट के समीप पहुंचकर लक्ष्मण अपने मनमें सोचा कि यद्यपि लङ्कासे लौटनेपर मैंने ही अग्निमें डालकर सीताको पवित्र किया था। फिर भी रामचन्द्रजीने सीता माताका परित्याग कर दिया है ॥ १ ॥ इसका दो कारण है। एक तो रामचन्द्रजीको अपनी कामवासना कम करनी है, दूसरे शास्त्रकी आज्ञाका पालन करना है। परन्तु, रामके आज्ञानुसार मैने सीताका परित्याग तो कर दिया, किंतु एक और आज्ञा थी कि 'लौटते समय सीताकी एक भुजा भी काटकर लेते आना'। यह बहुत ही कठिन काम है। उस समय रामजीने कसम रचा दिया था, इसलिए विशेष बातचीत भी नहीं कर सका ॥ २ ॥ ३ ॥ अब मैं क्या करूँ ? कैसे प्रभुक पास लौटकर जाऊँ ? सीताके बिना हाथ लिये मुझे लौटते देखेंगे तो क्या कहेंगे और फिर यदि हाथ काटना चाहूँ तो कैसे काटूँ । जिन्होंने अपने बच्चेके समान मेरा दुलार किया, उन सीताके साथ यह कस ईका काम करनेके लिये मैं क्योंकर आगे बढ़ सकूँगा ॥ ४ ॥ ५ ॥ इसलिए सबसे अच्छा उपाय यह है कि यहीं आगमे जलकर मर जाऊँ। रामको मुंह ही न दिखाऊँ तो अच्छा हो । इस प्रकार विचार करके लक्ष्मणने चिता बनानेका निश्चय किया ॥ ६ ॥ इसी बीचमें ब्रह्माके आज्ञानुसार विश्वकर्मा एक बढ़ईका रूप धारण करके हाथमें कुल्हाड़ी लिये वनमें घूमते फिरते वहाँ आ पहुंचे । ७ । तब लक्ष्मणने उससे कहा—कृपया आप अपनी कुल्हाड़ासे थोड़ीसी लकड़ी काटकर मुझे चिता बनानेको दे दीजिये ॥ ८ । आप जितना धन माँगेंगे, दूँगा। बढ़ईने कहा—हे वीर आप अपने लिये चिता बनानेका कारण तो हमें बताइये ॥ ९ । लक्ष्मणने आद्यन्त अन्ततक सारा वृतान्त बता दिया। उसे सुनकर मुसकराते हुए विश्वकर्माने कहा ॥ १० ॥ इतनी सी बातके लिये आप अपने इस बहुमूल्य शरीरको आगमें मत जलाइये। मैं अभी क्षणभरमें सीताका हाथ बनाकर आपको देता हूँ ॥ ११ ॥ तदनुसार तनिक ही देरमें विश्वकर्माने सीताका ऐसा हाथ बना दिया, जिसपर रुधिर बह रहा था, मांसके लोथड़े झूल रहे थे और कञ्चुकी चढ़ी हुई थी ॥ १२ ॥ सीताके उस हाथमें सब चिह्न विद्यमान थे और अलङ्कार पड़े थे। उस हाथको लक्ष्मणके हाथमें देकर विश्वकर्मा अन्तर्धान हो गये ॥ १३ ॥ तब लक्ष्मण वह भुजा लेकर अयोध्यापुरीकी
३०८ आनन्दरामायणे [ सर्गः ४
दर्शयामास सीताया भुजं कङ्कणमण्डितम् । तं निरीक्ष्य भृतं रामोऽधोमुखः प्राह लक्ष्मणम् ॥ १६॥ कैकेयीं सुहृदः पौरान्त् सर्वान् जानपदान् बहून् । सीताभुजां दर्शनीयस्त्वयाऽद्य मम शासनात् ॥ १७॥ तथेत्युक्त्वा लक्ष्मणोऽपेमं चकार यथोदितः । भुजं संस्थापयामास पेटिकायां निधाय सः ॥ कैकेयी तं भुजं दृष्ट्वा तुतोष नितरां हृदि । १८॥ रामोऽपि सीतारहितः परात्मा विज्ञानहस्तस्त्वथ चादिदेवः । मत्स्येव भोगानखिलान्विरक्तो मुनिव्रतोऽभून्मुनिसेवितांघ्रिः ॥ १९॥ अथ सीताऽपि वाल्मीकेर्मुनिपत्नीभिगाश्रमे । प्रत्यहं पूजिता वन्यैः सुखं तस्यौ मुदान्विता ॥ २० ॥ एवं मासद्वयं तत्र नीत्वा सीताऽऽश्रमे मुनेः । सुदिने सुषुवे रात्रौ पुत्ररत्नं रविप्रभम् । २१॥ एतस्मिन्नन्तरे रात्रौ ज्ञात्वा तं ससखं प्रभुः । राघवः किङ्किणीमालाघटां शुश्रावऽथ वपुना ॥ २२॥ पुष्पकस्य ततस्तस्मिन् स्थित्वाऽकाशपथा ययौ । वाल्मीकेराश्रमे वेगाल्लक्ष्मणञ्चानं ननाम सः । २३॥ ततो वाल्मीकिना विप्रैर्गर्भनेरेव रघूत्तमः । जातकमादिसंस्कारांश्चकार विधिपूर्वकम् ॥ २४॥ मातायाः पुरतः पुत्राननमलोकयन्मुदा । ददौ दानान्यनेकानि वस्त्रस्वाभरणान्यपि । २५॥ चकार विविधन्नाडं पुत्रजन्महडोत्सवे । देवदुन्दुभयो नेदुर्देवर्षूः पुष्पवृष्टिभिः । २६॥ सुराः सीतां शिशुं रामं ननृतु खे सुरस्त्रियः नेदुर्जनकवायानि ननृतुर्वारयोषितः ॥ २७॥ तुष्टुवुमागधाद्याश्च सीतां रामं शिशुं मुहुः । ऋषिपत्न्यः शिशुं सीतां रामं दीपः प्रपूषितः । २८॥ प्रथैर्नीराजनं कृत्वा जगुर्गीतं हि सुस्वरम् । वस्त्राद्यैः पूजयामास ताः प्रत्रा रघुनन्दनः ॥ २९॥ सीतारामौ विदेहोऽपि पूजयामास विस्तरान् । वाल्मीकिस्तु कुतं. शांतिं चकार विधिना शिशोः ३०॥
कर चल पड़े। अयोध्यामें घुसते ही लक्ष्मणने देखा कि, 'एव ही दिनमें अयोध्यापुरी सर्वथा श्रीहीन हो गयी है। उनिहूँ ... उठ रहा है और चारों ओर उदासी दीखती है। यह सब देखकर उस दिन अयोध्यापुरी ऐसी लग रही थी, जैसे बिना स्वाका दिना घर । लक्ष्मण जान जाते महलोंमें पहुंचे और २ मचन्द्रज को सोताका हाथ दिखलाया। उस कङ्कण विभूषित सीताके भुजाको देखकर रामने अपना मुस नीचा किया और- १४-१६। इस न जाकर माता कैकेयी, मेरे मित्रो, राजाओं एवं पुरवासियो- को दिखला दो, यह मेरी आज्ञा है॥ १७ । 'तथास्तु' कहकर लक्ष्मणने भी आज्ञाका पालन किया और एक पेटामे सम्हालकर सीताकी भुजा रख ली। १८॥ कंकणन माताका भुजा देखा तो बहुत प्रसन्न हुई। इधर र मचंद्रजीने सासस वियुक्त होकर सब सांसारिक भोगाक त्याग दिया और तपस्वियोके समान अपना जीवन विताने लगे, १९॥ उधर मलाजी भी वल्मीकिके आश्रमपर वहाँकी मुनिपत्नियोंस पूजित होती हुई सानन्द जीवन विताने लगीं ॥ २०॥ इस तरह दो महीना बीतनेपर साताने शुभ दिन और शुभ घड़ीमें एक पुत्ररत्नका जन्म दया ॥ २१॥ उसी समय गभनन्दका था यह समाचार मिल गया और रात्रिको अपन पुष्पक विमानपर चढ़कर लक्ष्मणजीक साथ आकाशमार्गस श्रीवाल्मीकिजीके आश्रमपर जा पहुंचे और लक्ष्मण तथा रामने मुनिका प्रणाम किया। २२। २३॥ इसके अनन्तर वाल्मीकिने आश्रममें उपस्थित बड़े२ ब्राह्मणोंक साथ बन्लक विधिवत् जातकर्मादि संस्कार किया ॥ २४ ॥ सीताक समझ राम- चन्द्रने हर्षपूर्वक बेटेका मुख देखा और अनेक प्रकारक वस्त्र-आभरण आदि दान करके ब्राह्मणोंको दिये ॥ २५ ॥ उस पुत्र-जन्मके प्रसन्नताम रामने नान्दीमुख-श्राद्धादि किया। देवताआन प्रसन्न होकर दुन्दुभी बजायो और उनपर फूल बरसाये । २६॥ सीता और साताके पुत्रका मुख देखकर देवांगनाय नाचने लगीं । उधर जनकजाक द्वारा नियुक्त बजाये बाजा बजाने लगे और वेश्याएं नाचन लगीं । २७॥ वन्दीजन सीता और रामका स्तुति करन लगे । ऋषिपत्नियोंने सुन्दर थालमें दीपक टपक जलाकर राम, सीता तथा नवजात शिशुक आरती उतारी और विविध प्रकारके मङ्गलगान गाये । रामन अनेक तरहके वस्त्र, भूषणोंसे उनका सत्कार किया ॥ २८ ॥ २९ ॥ महाराज जनकने भी राम और सीताका विधिवत् पूजन किया और वाल्मीकिने
सर्गः ४ ] जन्मकाण्डम् ३०९
शान्त्यर्थं प्रोक्षितो दम्भाङ्कुरुतैर्ब्राह्मणैस्ततः । सर्वार्थिनां शमार्थाय निर्मितो बालकृन्त्य हि ।३१। एवं नानाममुन्नीय नीत्वा तत्र निशां सुखम् । प्रत्युषस्य मुदानाह समत्रागमनस्य हि ।३२। दस्माद्वार्ता बहिर्गच्छेद्धाभपादस्य वै मुनेः । स यं दण्ड्यो भवेदेव शङ्कारूपा न संशयः । ३३। इत्युक्त्वा सकलांस्तृष्टा मुनीन्नत्वा पुनः पुनः । सीतामादाय श्रीरामो यान भ्रात्राऽऽरुरोह सः ॥३४॥ विहायसा क्षणात्प्राप साकेतं रघुनन्दनः । प्रवरेश विपानास्य पुरप्रविद्रिता गृहे ॥३५॥ अथ रामो वाजिमेधशतं कर्तुं मनो दधे । कृत्वा सौवर्णमयीं सीतां नानालङ्कारभूषिताम् ॥३६॥ पापिनीं मलिनां दुष्टां भर्तृनिन्दापरायणाम् । भर्तुर्विद्वेषिणीं शूरां चांशुकमातृ तन्मनाम् ॥३७॥ भर्तारं घातुमिच्छन्तीं सदा कलहकारिणीम् । बन्धुक्तां दारुणां भर्तुर्विपरीतार्थगामिनीम् ॥३८॥ स्वीयेच्छानुवर्तिनीं नष्टां मृतां नांतो गतां श्रियम् । त्यक्त्वा कुशमयीं विप्रैः कार्या पत्नी स्वकर्मसु ॥३९॥ हैमी कार्या क्षात्रैश्च वैश्यैः कार्या तु राजती । शूद्रैः कार्या ताम्रमयी स्वस्वकर्मप्रसिद्धये । ४०॥ अथवा सर्ववर्णैश्च कार्या पत्नी तु कांचनी । रामोऽपि कृत्वा सौवर्णीमग्निहोत्रं चकार सः । ४१। रावणेन यदा नीता सीता सा दण्डके तदा । हेम्नोऽभावात्कुशमयी कृता रामेण जानकी ॥४२॥ अन्ये कुशमयीं पत्नीं विधाय गृहमेधिनः । अग्निहोत्रमुपासन्ते विरहस्यानलोग्नर्हितः ॥४३। व्यभिचारवती पाषा भर्तुर्विद्वेषिणी तथा । अभाने वा परित्याज्यान वान्येऽप्या सर्वतोऽश्राद् । ४४॥ पक्षे पक्षे नवम्यां हि एकनं शरभृथाविधम् । कर्तुं निश्चितवान् रामस्तदा विप्रैः पुरोधसा ॥४५॥ भागीरथ्युत्तरे तीरे यज्ञभूमिं चकार सः । श्रयथाच्छाम्मुद्गलस्याश्रामो यावदुद्द दक्षिणे ॥४६॥
विधिपूर्वक कुशासे अभिषेक करते हुए शार्डित-बाट किया ॥ ३० ॥ बालिकाके निमित्त दाहिनाकिन कुशासे शान्ति की थी। इसीलिये उन्होंने रामक सामच ही उस बच्चाका नाम कुश रक्खा ॥ ३१ ॥ इस तरह नाना प्रकारके उत्सवमें वह रात वहीं बितायी और पिछली रातको रामने आश्रमके लोगोंसे कहा कि जो कोई मनुष्य मेरे यहाँ आनेका समाचार किसोसे कहेगा, वह मेरा शत्रु होगा और मैं उसको दंड दिये बिना न रहूँगा ॥ ३२ ॥ ३३ ॥ ऐसा कहकर सबने सबाथका याराम आनन्द लिए लोटने लगे। सीता और मुनियोंको प्रणाम किया। फिर सीताम एटककर रामचन्द्रजी लक्ष्मणके साथ विमानपर आरूढ़ हुए और थोड़ा देरम अयोध्या जाकर नियतका दृष्टि अपना अरण्यपर सा गया ॥ ३४ ॥ ३५ ॥ कुछ दिन बीतनेके बाद रामने ही अश्वमेध यश करनेका विचार किया । उस समय सीता तो था नहीं । इसलिए रामने सुवर्णकी सीता बनाकर यज्ञ करना निश्चित किया । क्योंकि शास्त्रमें लिखा है कि पापिन मैली कुचैली, दुष्ट स्वभावकी, निन्दा करनेवाली, पतिसे लडाई करनेवाली, क्रूर प्रकृतिक्री, चोट्टिन, स्वामीको मारनेकी इच्छा रखनेवाली, सदा लडाई करनेवाली, कुलटा, स्वामीके बताये प्रतिकूल चलनेवाली और स्वच्छन्दाचारिणी स्त्री यदि खो जाय, मर जाय या किसीके द्वारा भगा ली जाय अथवा स्वर्ग प्राप्त जाय तो उसको त्यागकर ब्राह्मण कुशकी क्षत्रिय सुवर्णकी, वैश्य चाँदीका और शूद्र ताम्बेकी स्त्री बनाकर यज्ञ द्वि कर्म करे ॥ ३६-४० ॥ अथवा सामर्थ्य अनुसार सब जातिके लोग सुवर्णकी नारी बनाकर अपना काम चलायें । इन्हीं शास्त्रीय आज्ञाओंस रामने सुवर्णकी सीता बनाकर अपना यज्ञ प्रारम्भ किया ०४१ ॥ पहले जब दण्डक वनमें सीता हर ली गयी थी और रातको रामेश्वर स्थापनके समय साताकी आवश्यकता पडी थी, तब उन्होंने सुवर्णके अभावसे कुशकी ही सीता बनाकर रामेश्वरका स्थापन का थी ॥ ४२ ॥ कुछ गृहस्थ नारीके अभावमें कुशकी स्त्री बनाकर अग्निहोत्र करते हैं, वह भी ठीक है। कहनेका मतलब यह कि स्त्रीके अभावमें किसी प्रकारकी स्त्री अवश्य बना लेनी चाहिए। क्योंकि स्त्रीके बिना कोई भी याज्ञिक कार्य सम्पन्न नहीं होता । कुछ आचार्योका मत है कि - "व्यभिचारिणी, पापिनी तथा स्वामीसे द्रोह करनेवाली स्त्रीका सदाके लिए परित्याग कर देना चाहिए' कुछका यह मत है कि "परित्याग न भी करे तो कोई हानि नहीं" ॥ ४३ ॥ ४४ ॥ रामने प्रत्येक नवमीको एक अश्वमेध यज्ञ पूर्ण करनेका निश्चय किया और भागीरथीके उत्तरी तटपर यज्ञशाला बनानेकी बात
२१० आनन्दरामायणे [सर्ग ४
अकृष्टपक्तताञ्चकार स्वर्णलाङ्गलैः। यस्याश्रमस्य सान्निध्ये भागीरथ्यप्युदङ्मुखा ॥४७॥ रुक्ममय्याऽथ जानक्या यज्ञारम्भं चकार सः। अज्ञातसंख्यां द्रष्टुं वै चकार स्वर्णनिर्मिताम् ॥४८॥ वामांगस्थां शुभरूपां शान्तहृद्यञ्च सात्त्विकीम्। विभ्रन्देवैः श्रीरामो जानकीं लोकमातरम् ॥४९॥ यज्ञान्ते स्वर्णजां सीतां ददौ स्वगुरवे प्रभुः। एवं यज्ञशतैश्चत्र गुरवे शतमूर्तयः ॥५०॥ याः समर्पिता रामेण तासां दानफलेन हि षोडशस्त्रीसहस्रेभ्योऽप्यूर्ध्वं स्त्रीणां शत पुनः ॥५१॥ द्वारकायां कृष्णरूपो विग्रहेनोद्वहिष्यति । प्रतियज्ञं श्यामकर्णमश्वं रामो मुमोच ह ॥५२॥ चतुर्दिनाच्चतुर्दिक्षु परिक्रम्य ययौ हयः। एवं सर्वेषु यज्ञेषु वयौ वाजी पृथग्जवात् ॥५३॥ पुष्पकस्थः स शत्रुघ्नो हयरक्षां चकार वै। एवं सदा यजराजे विरेजे दीक्षया विभुः ॥५४॥ एवं च नवतिसंख्या रामेण नर वै कृताः। सप्तमस्यापि प्रारभ्य रामो यज्ञस्य सोऽकरोत् ॥५५॥ गंगाया दक्षिणे तीरे मुद्गलस्याश्रमोऽस्ति हि तत्र नद्यान्तिके गंगोदक्तीरे च तद्गृह् ॥५६॥ दिनानि दश वाल्मीकिर्निशायां सन्ध्ययोरपि । भोगमङ्गल्या चक्रे बालकस्र्याभिमंत्रणम् ॥५७॥ कुशं नाम तदा चक्रे मुनिरेकादशे दिने चकार सर्वसंस्कारान् मुनिः श्रीराघवाज्ञया ॥५८॥ एवं स बालकस्तत्र ववृधे मातृलालितः जनकश्च सुमेधा च नानावस्त्रैः सुभोजनैः ॥५९॥ तोषयामास दौहित्रं नानाश्चाश्चन्नखादिभिः । बालोऽपि रंजयामास स्वक्रीडा भर्विदेहजाम् ॥६०॥ एकदा निद्रितं प्रेखे दृष्ट्वा बालं मुनेः पुरः अन्यकर्मणि व्यग्रा साऽथ सीताऽस्मातम् ॥६१॥ जनक वापि सा सीता दृष्ट्वा मत्रीं बहिर्गतान्। आश्विने रविवारे च नदीं स्नातुं समुद्यता ॥६२॥ मुनिं तं बालरक्षार्थं कृत्वाऽथ तमसां ययौ । दृष्ट्वा मार्गेण गच्छन्ती ददर्श पथि वानरीम् ॥६३॥ कटिसंस्थमथस्कंधेषु बिभ्रतीं पञ्च बालकान् तां दृष्ट्वा स्वशिगुं स्मृत्वाऽचितयज्जानकी हृदि ॥६४॥
ठहराया गया। प्रयागस लेकर मुद्गल मुनिके आश्रमपर्यन्त जितना स्थान था, वह सुवर्णके हलसे जोता गया। जानकी उस यज्ञशालाके पास न गई थीं। उक्त उनका और बढ़ रहा था । ॥४१-४७॥ इसके अनन्तर अपने सुवर्णमयी सीताके साथ यज्ञकार्य प्रारम्भ किया वह सुवर्णकी सीता अज्ञानी लोगोंको देखनेके लिए रखी गयी थी, किन्तु अज्ञानियोंका दृष्टिम तासीवको जानकी सदा रामके वामभागम निवास करती थी ॥४८-४९॥ प्रत्येक यज्ञके समाप्त हो जानेपर राम वह स्वणमयी सीता अपने गुरु वसिष्ठको दान दे दिया करते थे। इस प्रकार प्रत्येक यज्ञकी पूर्णतापर स्वर्णमयी सीता दानकरके मत सीताओका दान किया। उस दानके फलस्वरूप आगे कृष्णावतारम उनका मान्दुह हजार एक सो नियटी मिली। प्रत्येक यज्ञम राम अपना श्यामकर्ण घोड़ा दिग्विजयके लिए छोड़त थ। वह चार दिनों में चारों ओर घूमकर लौट आया करता था। साथमे शत्रुघ्न पुष्पक विमानपर बैठकर घाड़की रक्षाके लिए जाया करते थे और रामचन्द्रजी दीक्षा लेकर यज्ञशालामें बैठे रहते थे ॥ ५०-५४ । इस प्रकार रामचन्द्रजीने निन्यानवे यज्ञ पूर्ण किया और अन्तिम सोवां यज्ञ का प्रारम्भ कर दिया । ५५ ॥ गंगाक दक्षिण तटपर मुद्गल नामक एक ऋषिका आश्रम था और उत्तरवाहिनी गंगाके तटपर ही बाल्मीकि सन्ध्या के समय रामके पुत्र कुशका रामरक्षामन्त्रस अभिषेक कर रहे थे ॥ ५६ ॥ ५७ ॥ ग्यारहवें दिन वाल्मीकिन बालकका नामकरण करके रामके आज्ञानुसार सब सस्कार किया ॥ ५८ ॥ बच्चा भी बड़े लाड़-प्यारक साथ समय बिताता हुआ बढ़ने लगा । जनक और सुमेधा अनेक प्रकारके सुन्दर वस्त्रों और स्वादुअन्न आदि तरह तरहके बहुमूल्यवान् आहुत करत रहत थे । बच्चा अपन कौतुक से जानकीजीको प्रसन्न किया करता था । एक दिन कुश वाल्मीकिक पास पालनेपर सो गया । सखियां अन्य कामम व्यस्त थीं । सीताके माता-पिता कहीं घूमन चल गये थ । उस रोज आश्विन मासके रविवारका दिन था। इसलिए सीताने नदाम स्नान करनकी इच्छा की । सीताने वाल्मीकिजीसे बच्चेको दखने रहनेके लिए कह दिया और स्वयं एक दासीको साथ लेकर तमसाकी ओर चल पड़ी । रास्ते में सीतान देखी कि एक वानरी अपने पाच बच्चोंको कमर-कन्धे और मस्तकपर बैठाये चली जा रही है। उसे
सर्गः ४ ] जन्मकाण्डम् ३२१
सर्गः ४ ] जन्मकाण्डम् ३२१
तिर्यग्योनी जन्मवत्या वानर्या बालकानहो । स्नेहात्सहैव नीयन्ते धिङ्मां मानवदेहजाम् ॥ ६५ ॥ एकं चापि निजं बालन्त्यक्त्वा गेहेऽथ गम्यते मया विमूढया स्नातुं शुभ्यत्र क्षणिकं सुखम् ॥ ६६ ॥ इति धिकृत्य चात्मानं परितृत्त्याश्रमं ययौ । एतस्मिन्नन्तरे गेहे वाल्मीकिर्मुनिपुङ्गवः ॥ ६७ ॥ गतः स ह्युद्यत्काष्ठं ह्यर्थार्थे बटवो गताः गृहीत्वा सा कुशं प्रेम्णापयौ सीता बहिः पुनः ॥ ६८ ॥ हारत्वा सह नदीं गत्वोपसि स्नानं चकार वै । महदाश्चर्यं मुनिपाल दार्षे निःशम्य वै मुहुः ॥ ६९ ॥ मात्राशापभयाच्चक्रे लवंवालं स पूर्ववत् तपोबलेन तं प्रोक्ष्य जीवयामास योगतः ॥ ७० ॥ ज्ञानदृष्ट्या तीव्रेण मुनिना नावलोकितम् । ततः सीताऽपि मुस्नाता दाभ्या गेहं शनैर्ययौ ॥ ७१ ॥ कटौ गृहीत्वा तं बाल रुदन्तं पुननिःस्वना । प्रेक्षेऽन्यं बालकं दृष्ट्वा मुनिं पप्रच्छ जानकी ॥ ७२ ॥ प्रेवे कस्याः शिशुश्चाय मोऽपिरुष्टामहाकुशम् । कटिप्रदेशे जानक्या विस्मयं परमं यतः ॥ ७३ ॥ नमस्कृत्य ततः सीतां सर्वं वृत्तं न्यवेदयत् । अंके निधाय तं बाल सीताया द्रवरीन्मुनिः ॥ ७४ ॥ प्रसादान्मम वैदेहि द्वितीयोऽप्यं सुतस्तव । भवत्वद्य लवो नाम्ना सर्वयस्माद्विनिर्मितः ॥ ७५ ॥ वान्यांकैर्वचनन्साऽपि शिशुं जग्राह जानकी । मुनिस्तयोनाम चक्रे कुश्रो ज्येष्ठोऽनुजो लवः ॥ ७६ ॥ जातकर्मादिसंस्कारान् लवस्यापि चकार सः । तदा निनेदुर्वाद्वानि भुव्यां मेर्षविद्दिरीरुमाम् ॥ ७७ ॥ वर्षपुर्जानकीं क्त्वा वाल्मीकि कुसुमैः सुराः । चकार जनकश्चापि सुमेधा परमोत्सवान् ॥ ७८ ॥ क्रमेण विद्यामपन्नो श्रोत्रपुत्रौ विरेचतुः । धनुर्विद्यामस्त्रविद्यां शिक्षयामास तौ मुनिः ॥ ७९ ॥ कृत्स्नं रामायणं स्वीयं कृतं तौ शिक्षयन्मुदा यस्मिन्नानन्दगम्यं च चरित्रं राघवस्य हि ॥ ८० ॥ कुमारौ स्वरसम्पन्नौ सुन्दरश्चश्विनाविब । तन्त्रीलयममायुक्तौ गायन्तौ चेतुर्तने ॥ ८१ ॥ तत्र तत्र मुनीनां तु समानेषु महर्षिणौ । गायन्तावपि तौ दृष्ट्वा विस्मिता मुनयोऽभवन् ॥ ८२ ॥
देखकर उन्होंने अपने मनमे साचा कि तिर्यग्योनीका स्त्री होकर भी यह बानरी कितन प्रेमसे बच्चोको अपने साथ रखती है। मुझ मानवजातिकी भामिनीको धिक्कार है जो अपने एक लडकेको बाश्रमपर छोडकर तमसा स्नान करने जा रही हूँ ॥ ६५-६५ ॥ इस तरह अपनेको धिक्कारकर सीता वहाँसे फिर आश्रमकी ओर पवीं । इसी बीच बाल्मीकिजी समिदाहरणके लिये बाहर चले गये थे। विद्यार्थी भी अपने अपने कामत पहले ही बले जा चुके थे। इतनमे सीता पहुंची। उसोम कुशको उठा लिया और दानीके साथ तमसाकी और चन गयी ॥ ६६ । ६७ उधर वाल्मीकि लौटकर आये तो उनकी निगाह पालनेपर पडी । उसपर बच्चे-को नही देखा तोही अकस्मात मुनिराजने एक लच्छी घास ली और सीताके शापके भयसे अपने तपोबल द्वारा पहिले कुशके समान ही एक बालक और बना दिया । ६८-७०॥ पररभूटके कारण उन्होंने अपनी ज्ञानदृष्टिसे यह नही देखा कि सीता इसको अपने साथ ले गयी है। कुछ देर बाद स्नान करके साता भी दासके साथ धीरे धीरेसे कुटियाम आयी ॥ ७१ ॥ वहाँ उन्होंने देखा कि कुशके समान ही अलकारादिके विभूषित एक बालक पालनेपर पड़ा सो रहा है। यह देखकर सीताने ऋपिम पूछा कि यह किसका बच्चा है ? उधर ऋषिने देखा कि कुश तो सीताकी कमरपर है, तब उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ ॥७२॥७३॥ फिर उन्हें नमस्कार करके वाल्मीकिने वह वृत्तात बतलाया, जिसके कारण दूसरा बच्चा बनाना पडा था। उसके पश्चात मुनिन पुचकारकर लवको सीताकी गोदमे दे दिया और कहा- ॥ ७४ ॥ देवि ! इसे भी सम्हालो । तब सीताने उस बच्चेको भी अगीकार किया । मुनिने कहा-इन दोनोमें उष्ठकुश होगा और कनिष्ठ (छोटा) लव ॥७५॥ इसके अनन्तर उन्होंने लवका भी जातकर्म आदि संस्कार किया । उस समय विविध प्रकारके बाज वज। स्वर्गम देवताओने भी मगलवाद्य बजाकर बालका, शिशु तथा वाल्मीकिके ऊपर फूलोकी वर्षा की। सुमेधा तथा जनकने विविध उत्सव किये। क्रमशः दोनो पुत्र बड़े हुए उन्होंने अनेक विद्याओका अध्ययन किया और महपि वाल्मोकिने उनको धनुविद्या तथा अस्नविद्या भो सिखायी ॥ ७६-७९ ॥ फिर अपनी बनायो सम्पूर्ण रामायणको भी उन्ह शिक्षा दी । जिसमें रामचन्द्रजीका आनन्ददायक चरित्र वणित था ॥ ८० । अश्विनीकुमारकी भांति सुन्दर वे दोनों बालक मधुर स्वरसे
| ३१२ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ५ |
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गन्धर्वेष्विह किन्नरेषु भुवि वा देवेषु देवालये पातालेष्वथ वा चतुर्मुखगृहे लोकेषु सर्व्वेषु च । अस्माभिश्चिरजीविभिश्चिरतरं दृष्टा दिशः सर्व्वतो न श्यायीदृशगीतवाद्यगरिमा नादर्शि नाश्श्रावि च ॥ ८३ ॥
एवं स्तुवद्भिरखिलैर्मुनिभिः प्रतिवासरम् । आसते सुखमेकांते वाल्मीकेराश्रमे चिरम् ॥ ८४ ॥ हेमकंकणमञ्जीरनूपुरैश्च विभूषितौ । केयूररशनाहारकुंडलैर्गतिशोभितौ ॥ ८५ ॥ निजक्रीडाकौतुकैश्च बालवाक्यैर्मनोहरैः । सीतां सुमेधां जनकं रञ्जयामासतुर्मुनिम् ॥ ८६ ॥
इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये विलासकाण्डे कुशलवजन्मकथनं नाम चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥
पञ्चमः सर्गः
( रामरक्षा-महामंत्र )
विष्णुदास उवाच श्रीरामाश्रया प्रोक्तं कुशस्य चाभिमन्त्रणम् । कृतं तेनैव मुनिना पुरा तां मे प्रकाशय ॥ १ ॥ रामरक्षां वरां पुण्यां बालानां शान्तिकारिणीम् ।
इति शिष्यवचः श्रुत्वा रामदासोऽब्रवीद्वचः ॥ २ ॥
श्रीरामदास उवाच सम्यक् पृष्टं त्वया शिष्य रामरक्षाऽधुनोच्यते । या प्रोक्ता शम्भुना पूर्व्वं स्कंदार्थे गिरिजां प्रति ॥ ३ ॥
श्रीशिव उवाच देव्यद्य स्कंदपुत्राय रामरक्षामिमंत्रणम् । कुरु तारकघाताय समर्थोऽयं भविष्यति ॥ ४ ॥ इत्युक्त्वा कथयामास रामरक्षां शिवः प्रिये । नमस्कृत्य रामचन्द्रं शुचिर्भूत्वा जितेन्द्रियः ॥ ५ ॥
वीणाकी झनकारके साथ उत्तम रामचरित्र गाया करते थे ॥ ८१ ॥ जहाँ-तहाँ मुनियोंकी मण्डलीमें जब ये दोनों सुकुमार बालक रामचरित्रका गान करते थे तो सबके मुँहसे सहसा यह वाक्य निकल पड़ता था कि हम लोगोंने अपनी लम्बी आयुमें गंधर्वों, किन्नरों, मनुष्यों, देवताओं, पाताललोकवासियों, ब्रह्मलोकवासियों एवं सारे ब्रह्माण्डवासियोंके अनेक गायकोंके गायन सुने हैं लेकिन उनमें कहीं न तो मैंने इस प्रकार वाद्यकलाकी निपुणता देखी और न गायनमें ऐसी मिठास ही पायी । ८२ ॥ ८३ ॥ इस तरह सब ऋषियोंसे प्रशंसित होकर वे दोनों एकान्तमे वाल्मीकिके आश्रमपर रहा करते थे । सुवर्णके कङ्कण, नूपुर, केयूर, करधनी, हार तथा कुण्डल पहननेसे वे और भी सुन्दर दीखते थे । ८४ ॥ ८५ ॥ प्रतिदिन उनकी मनोहर बाललीला देख देखकर मुनि, सीता, सुमेधा और जनकजी मारे खुशीके फूले नही समाते थे । ८६ । इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयकृतभाषाटीकासमन्विते जन्मकाण्डे चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥
विष्णुदासने कहा है गुरुदेव ! जिस रामरक्षा-मंत्रसे वाल्मीकिने कुशका अभिमंत्रण किया था, उसे हमको बताइए ॥ १ ॥ क्योंकि मैने सुना है कि वह रामरक्षामंत्र बड़ा पवित्र सुन्दर और बालकोंको शान्ति प्रदान करनेवाला है । शिवजीने कहा-इस प्रकार शिष्यकी प्रार्थना सुनकर श्रीरामदास कहने लगे-हे प्रिय शिष्य ! तुमने बहुत अच्छा प्रश्न किया है मैं तुम्हें वह रामरक्षामन्त्र बतलाता हूँ, जिसे एक बार शिवजीने पार्वतीको स्वामिकार्तिकेयकी रक्षाके लिए बतलाया था ॥ २ ॥ ३ ॥ श्रीशिवजी बोले—हे देवि ! आज षडानन्दके
सर्गः ५ ] जन्मकाण्डम् ३१३
अथ ध्यानम्
वामे कोदण्डदण्डं निजकरकमले दक्षिणे बाणमेकं
पश्चाद्भागे च निश्चं ध्वजतमभिमितं सासितूणीरभारम् ।
पार्श्वेनाग्रेण सव्यं मह मिलिततनु जानकीलक्ष्मणाभ्यां
श्यामं रामं भजेऽहं प्रणतजनमनःखेदविच्छेददक्षम् ॥ ६ ॥
अस्य श्रीरामरक्षास्तोत्रमन्त्रस्य बुधकौशिकऋषिः श्रीरामचंद्रो देवता राम इति बीजम्
अनुष्टुप् छंदः श्रीरामप्रीत्यर्थं जपे विनियोगः ।
चरितं रघुनाथस्य शतकोटिप्रविस्तरम् । एकैकमक्षरं पुंसां महापातकनाशनम् ॥ ७ ॥
ध्यात्वा नीलोत्पलश्यामं रामं राजीवलोचनम् । जानकीलक्ष्मणोपेतं जटामुकुटमण्डितम् ॥ ८ ॥
सासितूणधनुर्बाणपाणिं नक्तंचरान्तकम् । स्वलीलया जगत्त्रातुमाविर्भूतमजं विभुम् ॥ ९ ॥
रामरक्षां पठेत्प्राज्ञः पापघ्नीं सर्वकामदाम् । शिरो मे राघवः पातु भालं दशरथात्मजः ॥ १० ॥
कौसल्येयो दृशौ पातु विश्वामित्रप्रियः श्रुती । घ्राणं पातु मखत्राता मुखं सौमित्रिवत्सलः ॥ ११॥
जिह्वां विद्यानिधिः पातु कंठं भरतवंदितः । स्कंधौ दिव्यायुधः पातु भुजौ भग्नेशकार्मुकः ॥ १२॥
करौ सीतापत्तिः पातु हृदयं जामदग्न्यजित् । पार्श्वे रघुवरः पातु कुक्षी इक्ष्वाकुनंदनः ॥ १३ ॥
मध्यं पातु खरध्वंसी नाभिं जांबवदाश्रयः । सुग्रीवेशः कटिं पातु सक्थिनी हनुमत्प्रभुः ॥ १४॥
ऊरू रघूत्तमः पातु गुह्यं रक्षःकुलान्तकृत् । जानुनी सेतुकृत्पातु जंघे दशमुखांतकः । १५॥
पादौ विभीषणश्रीदः पातु रामोऽखिलं वपुः ।
एतां रामबलोपेतां रक्षां यः सुकृती पठेत् । स चिरायुः सुखी पुत्री विजयी विनयी भवेत् ॥ १६॥
पातालभूतलव्योमचारिणश्छद्मचारिणः । न द्रष्टुमपि शक्तास्ते रक्षितं रामनामभिः ॥ १७॥
रामेति रामभद्रेति रामचंद्रति वा स्मरन् । नरो न लिप्यते पापैर्भुक्तिं मुक्तिं च विंदति ॥ १८॥
[हिन्दी टीका]
स्नाय तुम्हें रामरक्षामन्त्र बतला रहा हूँ। अथ ध्यानम् । जिन रामचन्द्रजीके बाय हाथमें धनुष, दक्षिणे हाथमें एक बाण और पीठपर बाणोंसे भरा हुआ तरकस है। जिनकी बायीं तथा दाहिनी ओर लक्ष्मण और सीता हैं। भक्तोंके मनकी पीडा नष्ट करनेमें निपुण श्रीरामचन्द्रजीका मैं भजन करता हूँ ॥ ४-६ ॥ विनियोगाक अनन्तर—सौ करोड़ श्लोकोंमें विस्तारसे वर्णित भगवान् रामके चरित्रका एक एक अक्षर महान् पापोंका भी नाश करता है। नीलकमलकी नाई श्याम तथा राजीवलोचन, जिनके आसपास लक्ष्मण तथा जानकीजी विराज रही हैं। जिनका मस्तक जटामुकुटसे अलंकृत है। तलवार, तरकस, धनुष और बाणोंके लिये जो राक्षसोंका यमराज सदृश भीषण दीखते हैं। जो जगत्की रक्षाके निमित्त अपने इच्छानुसार जगतोलपर अवतीर्ण हुए हैं, ऐसे रामका ध्यान करके सब कामनाओंको पूर्ण करने तथा पापोंका नाश करनेवाला रामरक्षा-मन्त्रका पाठ करे । राघव यह रामचन्द्रजीका नाम मेरे शिरकी रक्षा करे ॥ ७-१० ॥ दशरथात्मज ललाटकी रक्षा करे । कौसल्या नक्षत्री, विश्वामित्रप्रिय कानोंकी, मखत्राता नाककी और सौमित्रवत्सल मुखकी रक्षा करे ॥ ११ ॥ विद्यानिधि जिह्वाकी, भरतवंदित कण्ठकी, दिव्यायुध दोनों कन्धोंकी, भग्नेशकार्मुक भुजाओंकी, सीतापत्ति हाथोंकी, बामदग्न्यजित् हृदयकी, रघुवर पार्श्वभागकी, इक्ष्वाकुनन्दन पेटकी, खरध्वंसी शरीरके मध्यभागकी, जांबवदाश्रय नाभिकी, सुग्रीवेश कमरकी, हनुमत्प्रभु हड्डियोंकी, रघूत्तम दोनों घुटनोंकी, रक्षःकुलन्तकृत् गुदाकी और दशमुखातक मेरी जंघोंकी रक्षा करे ॥ १२-१५ ॥ विभीषणको राज देनेवाले पैरोंकी और राम सारे शरीरकी रक्षा करे । जो मनुष्य रामके बलसे परिपूर्ण इस रामरक्षामन्त्रका पाठ करता है वह चिरायु, सुखी, पुत्रवान्, विजयी और विनयी होता है ॥ १६ ॥ पातालचारी, भूमिचारी, व्योमचारी और छद्मचारी कोई भी भूत प्रेतादि बाधा रामरक्षा-मंत्रसे अभिमंत्रित जनपर दृष्टिपात नहीं कर सकती। जो मनुष्य राम, रामभद्र अथवा रामचन्द्र इस नामका स्मरण करता है, वह पापसे
| ३१४ | आनन्दरामायणे | [ सर्गः ५ |
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जगज्जैत्रैकमंत्रेण रामनाम्नाभिरक्षितम् । यः कंठे धारयेत्तस्य करस्थाः सर्वसिद्धयः ॥१९॥
वज्रपञ्जरनामेदं यो रामकवचं पठेत् । अव्याहताज्ञः सर्वत्र लभते जयमंगलम् ॥२०॥
आदिष्टवान् यथा स्वप्ने रामरक्षामिमां हरः । तथा लिखितवान् प्रातः प्रबुद्धो बुधकौशिकः ॥ २१॥
रामो दाशरथिः शूरो लक्ष्मणानुचरो बली । काकुत्स्थः पुरुषः पूर्णः कौसल्यानंदवर्धनः ॥२२॥
वेदांतवेद्यो यज्ञेशः पुराणपुरुषोत्तमः । जानकीवल्लभः श्रीमानप्रमेयपराक्रमः ॥२३॥
इत्येतानि जपेन्नित्यं मद्भक्तः श्रद्धयान्वितः । अश्वमेधायुतं पुण्यं संप्राप्नोति न संशयः ॥२४॥
सन्नद्धः कवची खड्गी चापबाणधरो युवा । गच्छन् मनोरथोऽस्माकं रामः पातु सलक्ष्मणः ॥२५॥
तरुणौ रूपसंपन्नौ सुकुमारौ महाबलौ । पुण्डरीकविशालाक्षौ चीरकृष्णाजिनांबरौ ॥२६॥
फलमूलाशनौ दांतौ तापसौ ब्रह्मचारिणौ । पुत्रौ दशरथस्यैतौ भ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥२७॥
धन्विनौ दंडनिखिंशौ काकपक्षकधरो श्रुतौ । वीरौ मां पथि रक्षेतां तावुभौ रामलक्ष्मणौ ॥२८॥
शरण्यौ सर्वसत्त्वानां श्रेष्ठौ सर्वधनुष्मताम् । रक्षःकुलनिहंतारौ त्रायेतां नो रघूत्तमौ ॥ २९॥
आत्तसज्जधनुषाविषुस्पृशावक्षयाशुगनिषंगसंगिनौ ।
रक्षणाय मम रामलक्ष्मणावग्रतः पथि सदैव गच्छताम् ॥३०॥
आरामः कल्पवृक्षाणां विरामः सकलापदाम् । अभिरामस्त्रिलोकानां रामः श्रीमान्स नः प्रभुः ॥३१॥
रामाय रामभद्राय रामचंद्राय वेधसे । रघुनाथाय नाथाय सीतायाः पतये नमः ॥३२॥
श्रीराम राम रघुनंदन राम राम श्रीराम राम भरताग्रज राम राम ।
श्रीराम राम रणकर्कश राम राम श्रीराम राम शरणं भव राम राम ॥३३॥
लोकाभिरामं रणरंगधीरं राजीवनेत्रं रघुवंशनाथम् । कारुण्यरूपं करुणाकरं तं श्रीरामचंद्रं शरणं प्रपद्ये ॥
दक्षिणे लक्ष्मणो यस्य वामे च जनकात्मजा । पुरतो मारुतिर्यस्य तं वंदे रघुनंदनम् ॥३५॥
विमुक्त होकर मुक्ति और भुक्तिका भागी होता है ॥ १७ ॥ १८ ॥ समस्त जगतको जीतनेवाले इस रामरक्षा-मन्त्रको जो मनुष्य कण्ठस्थ कर लेता है तो संसारकी सारी सिद्धियां उसके हाथमें आ जाती हैं ॥ १९ ॥ जो प्राणी इस वज्रपंजर रामकवचका पाठ करता है, उसकी आज्ञा कहीं भी नहीं टलती और सर्वत्र उसकी विजय होती है ॥ २० ॥ स्वप्नमें यह रामरक्षामंत्र शिवजीने जैसा बतलाया था, सवेरे सोकर उठते ही विश्वामित्रने उसी तरह लिख दिया ॥ २१ ॥ राम, दाशरथि शूर, लक्ष्मणानुचर, बली काकुत्स्थ, पुरुष, कौसल्यानन्दवर्धन, वेदान्तवेद्य यज्ञेश, पुराणपुरुषोत्तम जानकीवल्लभ, श्रीमान् तथा अप्रमेय पराक्रम इन नामोंका श्रद्धापूर्वक जप करनेवाला भक्त दस हजार अश्वमेध यज्ञ करनेका फल पाता है। इसमें कोई संशय नहीं है ॥ २२-२४ ॥ सन्नद्धकवची, खड्गी, चापबाणधर, युवा और लक्ष्मणके साथ जाते हुए श्रीरामचंद्र हमारे मनोरथोंकी रक्षा करें ॥२५॥ तरुण, रूपसंपन्न, सुकुमार महाबली, कमलकी नाईं बड़ी-बड़ी आँखोंवाले, पीतांबरधारी, फल-मूल खानेवाले, उदारप्रवृत्ति तपस्वी, ब्रह्मचारी, धन्वी, निस्त्रिंशधारी तथा काकपक्षकौ धारण किये दशरथके दोनों पुत्र राम और लक्ष्मण रास्तेमें जाते समय हमारी रक्षा करें । संसारी जीवोंके आधार, धनुर्धारियोंमें श्रेष्ठ, राक्षसकुलके विनाशक राम और लक्ष्मण मेरी रक्षा करें ॥ २६-२९ ॥ विल्कुल तैयार धनुष जिसपर बाण चढ़ा है, उसे लिये और अक्षय बाणवाले तूर्णीरको कसे राम-लक्ष्मण सदा रास्तेमें हमारे आगे-आगे चलें ॥ ३० ॥ जो कल्पवृक्षके आराम (बगीचा) समस्त विपत्तियोंके विराम (समाप्ति) और तीनों लोकोंमें अभिराम (सुन्दर) हैं, वे श्रीमान् रामचन्द्रजी हमारे प्रभु हैं ॥३१॥ राम, रामभद्र, सर्वस्रष्टा, रामचन्द्र, रघुनाथ, तथा सीताके पति रामचन्द्रजीको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ३२ । हे श्रीराम, हे रघुनन्दन राम, हे भरताग्रज राम, हे रणकर्कश श्रीराम, हे राम, हमको शरण हूजिए ॥ ३३ ॥ संसार भरमें अतिशय सुंदर, संग्राममें निपुण, कमल सरीखे नेत्रोंवाले, रघुवंशके स्वामी करुणाकी मूर्ति और दयाके भण्डार श्रीरामचन्द्रकी मैं शरणमें हूँ ॥३४॥ जिनकी दाहिनी ओर लक्ष्मण, बाईं ओर सीता और सामने हनुमान्जी उपस्थित हैं, ऐसे रघुनन्दव रामको मैं
सर्गः ५ ] अरण्यकाण्डम् ११५
गोष्पदीकृतवारीशं मशकीकृतराक्षसम् रामायणमहामालारत्नं वन्देऽनिलात्मजम् ॥३६॥
अशेष तिष्ठ दूरे त्वं रोगास्तिष्ठतु दूरतः । शरीरात् मदाऽस्माकं हृदि रामो धनुर्धरः ॥३७॥
मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम् ।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये ॥३८॥
राम राम तव पादपङ्कजं चिंतयामि भवबन्धमुक्तये ।
वंदितं सुरनरैर्मौलिभिर्ध्यापितं मनसि योगिभिः सदा ॥३९॥
रामं लक्ष्मणपूर्वं रघुवरं सीतापतिं सुन्दरं काकुत्स्थं करुणार्णवं गुणनिधिं विप्रप्रियं धार्मिकम् ।
राजेन्द्रं सत्यसन्धं दशरथतनयं श्यामलं शान्तिमूर्ति वन्दे लोकाभिरामं रघुकुलतिलकं राघवं रावणारिम् ।
एतानि रामनामानि प्रातःरुत्थाय यः पठेत् , अपुत्रो लभते पुत्रं धनार्थी लभते धनम् ॥४१॥
माता रामो मत्पिता रामचन्द्रः स्वामी रामो मत्सखा रामचन्द्रः ।
सर्वस्वं मे रामचन्द्रो दयालुनान्यं जाने नैव जाने न जाने ॥४२॥
श्रीरामनामामृतमन्त्रराजसंजीवनी चेन्मनसि प्रविष्टा ।
हालाहलं वा प्रलयानल वा मृत्योर्मुखं वा विशतां प्रविष्टा ॥४३॥
श्रीशब्दपूर्वं जयशब्दमध्यं जयद्वयेनापि पुनः प्रयुक्तम् ।
त्रिःसप्तकृत्वो रघुनाथनाम जपंस्त्रिहन्त्याद्द्विजकोटिहत्या ॥४४॥
एतद्गिरीजै प्रोक्ता रामरक्षा मया तव । मयोपदिष्टा या स्वाप्न्येविश्वामित्राय वै पुरा ॥४५॥
श्रीरामदास उवाच
इति शिवेनोपदिष्टां श्रुत्वा देवीं गिरीन्द्रजा । रामरक्षां पठित्वा सा स्कन्द समभिमन्त्रयत् ॥४६॥
वन्दना करता हूँ ॥ ३५ ॥ जिन्होने समुद्रको गोके खुरभर जलवाला बनाया, राक्षसोंको मच्छड़ोंके समान नष्ट किया और जो रामायणरूप महामालाके पुखरत्न हैं, ऐसे पवनकुमार हनुमान्जीको मैं प्रणाम करता हूँ ॥३६॥ हे पापोंके समूह ! तुम हमसे दूर रहो और हे रोगाण ! तुम हमारे पासस भाग जाओ क्योंकि हमारे हृदयमें धनुर्धारी रामचन्द्रजी बैठे हुए हैं ॥ ३७ ॥ मनके सदृश जिनकी गति है, वायुके सदृश जिनका वेग है, जिन्होने इन्द्रियोंको वशमें कर लिया है जा बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ है ऐसे वायुके पुत्र, वानरी सेनाके सेनापति और श्रीरामचन्द्रजीके दूत हनुमान्की मै शरणमें हूँ ॥३८॥ हे राम ! हे राम ! सांसारिक बन्धनोंसे मुक्त होनेके लिए सुर-नर इत्यादि सकल मस्तक से पूजित आपके चरणोंका मैं सदा ध्यान करता हूँ। क्योंकि योगी लोग भी सदा सर्वदा उन चरणोंके चित्तरूप ध्यान रखते हैं ॥ ३९ ॥ लक्ष्मणके ज्येष्ठ भ्राता, रघुकुलमे श्रेष्ठ, सीताके पति, परमरूपवान्, ककुत्स्थके वंशज, करुणाके वारिनिधि, गुण के निधि, ब्राह्मणोंके प्रिय, धर्मके तत्त्वज्ञ, राजाओंके राजा, सत्यप्रतिज्ञ दशरथके पुत्र श्यामरूप, शांतिके मूर्त्तिस्वरूप, संहारक आनन्ददाता, रघुकंशके तिलक-स्वरूप, रघुकुलश्रेष्ठ एवं रावणके शत्रु रामचन्द्रजीको मै प्रणाम करता हूँ ॥ ४० ॥ जो प्राणी सबेरे उठकर इन नामोंका पाठ करता है, वह यदि अपुत्र हो तो उसे पुत्र मिलता है और धनकी इच्छा रखनेवाला हो तो धन मिलता है ॥ ४१ ॥ राम ही मेरे पिता हैं, राम ही माता हैं, वे ही मेरे स्वामी और सखा हैं। दयालु श्रीराम-चन्द्रजी ही मेरे सर्वस्व हैं। उन्हें छोड़कर मै और किसीको नहीं जानता — किसीको नहीं जानता ॥ ४२ ॥ जिसके हृदयमें रामनामामृतमन्त्ररूपी संजीवनी विद्यमान रहत है, वह हलाहल, प्रलयानन्द अथवा मृत्युके मुखमें भी क्यों न कूद जाय, उसको कहीं भी भय नहीं है ॥ ४३ ॥ पहले श्रीशब्द, बादमे रामनाम फिर जय शब्द, फिर रामनाम, फिर दो बार जयशब्द जोड़कर, अर्थात् श्रीराम जय राम जय जय राम ) इक्कीस बार जप करनेवाला प्राणी करोड़ों ब्रह्महत्याओं जैसे महान् पातकोंको भी नष्ट कर देता है ॥ ४४ ॥ हे पार्वती ! मैंने तुम्हें यह रामरक्षामन्त्र बतलाया है, जिसे एक बार स्वप्नमे मैंने महर्षि विश्वामित्रको बतलाया था । श्रीराम-दासने कहा— इस प्रकार शिवजीके बतलाये हुए रामरक्षामन्त्रको सुनकर पार्वतीजीने स्वामिकार्तिकेयका उन्हीं