श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 315, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें| सर्गः २ ] | जन्मकाण्डम् | २९९ |
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कदा चित्रकथा रम्यारवेणूत्थानानि वा कदा । कदा दन्तरुहोत्तादिकौतुकानि ददर्श सा ॥१७॥
कदा सम्मोहनं दिव्यं दृश्यं कौतुक महद् । कदा रम्भास्तम्भशूल्कं वस्त्रग्रंथिविनिर्मितम् ॥१८॥
कदा कृत्रिमहस्त्यादिनाणारूपाणि वै वने । सीता ददर्श कुशलैश्चातुर्यान्मृगतान्पयि ॥१९॥
एवं सीतोऽश्रममध्ये मासमेकं निनाय सा । ययौ रामेण नगरीं नृत्यगीतादिभिः शनैः ॥२०॥
सौधस्थानिः पुरस्त्रीभिर्विना कुसुमादिभिः । नीराजिता कुम्भदीपेर्दीपैदपोदनोद्भवैः ॥२१॥
माषतिलसर्षपार्यैर्नानाबलिभिगदगद् । ययौ निजगृहं सीता राघवेण समन्विता ॥२२॥
एवं नानाकौतुकैश्च नानादोहदपूरणैः । रामपत्नीं रमयामास माऽपि रामं स्वलीलया ॥२३॥
षष्ठे मासे त्वथ प्राप्ते सीतया राघवो मुदा । सीमन्तोन्नयनं चैव वसिष्ठेन चकार सः ॥२४॥
सुमेधां जनकं चापि समाहूयादरेण वि । ददौ दानान्यनेकानि ब्राह्मणेभ्यो रघूत्तमः ॥२५॥
जनकः पूजयामास रामं स्वान्यसुतयुतम् । कौसल्यादांश्च संक्लैन्वामिनो वसनादिभिः ॥२६॥
पौराश्च सुहृदः सर्वे भोजनार्थं विदेहजाम् । स्वस्वगेहं पुत्राऽनिन्युः श्रीरामादिमहोत्सवैः ॥२७॥
नानावाद्यनिनादैश्च वरस्त्रीनृत्यगायनैः । स्त्रीमुखपुष्पवर्षैर्नानाकौतुकदर्शनैः ॥२८॥
नानादेशनिवासिन्यः कोटिशश्चा नृपस्त्रियः । समाययुर्योध्यायां सीतां द्रष्टुं मुदान्विताः ॥२९॥
तया सैन्यैश्च सर्वत्र वेष्टिता नगरी बभौ । ताः सदा नृपपत्न्यश्च सीतायाः परमान् वरान् ॥३०॥
दोहदान् पूरयामासुर्दिव्यवस्त्रादिसादरम् । ददुर्वस्त्राण्यलङ्कारान् दिव्यांश्चित्रविचित्रितान् ॥३१॥
स्वस्वदेशोद्भवोद्देषनानाहस्त्यादिसादगत् । जानकीं पूजयामासुस्ताः सर्वाः पार्थिवस्त्रियः ॥३२॥
स्थिन्त्वा ता मासमेकं तु जग्मुर्दैवं निजं निजम् । अथैकदा तु श्रीरामः सुमेधा जनक तथा ॥३३॥
सीतायाः पुरतः प्राह गुह्यं रहसि हम्स्थितम् । सीतामदृष्ट्वा साभिध्ये क्षणञ्च विरद्वेष ताम् ॥३४॥
कभी मधुर तथा पत्रपोर अथवा बाजाका धुन सुनती थी। कब विविध प्रकारका चित्र देखती थी, कभी बाजीगरो और बाँसपर चढ़कर नटवरन के करतूत खेल देखा करती थी ॥ १७ ॥ ॥ १८ ॥ कभी स्तम्भके सुन्दर कौतूहों तथा मुख्यसभामे वैदा कलात्मक काज तब कला बनावटी हाथ आदिके विविध रूपाको देखा करती थी ॥१९-०१९॥ इस तरह सीताजी उस बग़ीचाम एक महीना बिताया। फिर नृत्य-गीतादिक देखती-सुनती हुई रामचन्द्रके साथ अपनी नगरी अयोध्याको लौट आयीं ॥ २० ॥ जब सीता और रामने नगरमें प्रवेश किया, उस समय नगरके स्त्रियोंने अंटारीपर चढ़कर उन दोनोपर फूलोकी वर्षा की, आरती उतारी और दही, भात, उड़द, तेल तथा सरमों आदिके बलि दिये। तब राम सीताके साथ अपने महलको गये ॥ २१ ॥ २२ ॥
इस तरह विविध प्रकारका अभ्यास रामने माताजी तथा सतान रामको आनन्दित किया ॥ २३ ॥ जब गर्भका छठौं महीना आया तब राघवने अपने कुलगुरु वसिष्ठके द्वारा सीताका सीमन्तोन्नयन संस्कार कराया ॥ २४ ॥ सुमेधा और जनकके पास निमत्रण भेजकर उन्हें अपने यहाँ बुलवाया और ब्राह्मणोंको रामने विविध प्रकारक दान दिये ॥ २५ ॥ जनकने आकर सीता तथा अपने सब भाइयोंके साथ बैठे हुए राम और कौसल्यादि माताओका नाना प्रकारके वस्त्राभूषणों द्वारा सत्कार किया ॥ २६ ॥ अयोध्यावासी नागरिकों तथा मित्रोंने रामचन्द्र और सीताको अपने यहाँ भोजन करनेके लिए बुलाया ॥ २७ ॥ अनेक बाजोके साथ-साथ वराङ्गनाओंके नाच-गान हुए स्त्रियोंके हाथसे फूलोंकी वर्षा हुई और कितने ही तरहके खेल-तमाशे हुए ॥ २८ ॥ उस समय सीताको देखनेके लिए प्रत्येक देशकी राजनारियाँ अयोध्या आयीं। २९ ॥ उनके साथ आयी हुई सेनासे घिरकर वह अयोध्या नगरी और भी सुन्दर लगने लगीं। उन रानियोंने अभादि देकर सीताकी इच्छा पूर्ण की और आनन्दपूर्वक बहुतसा वस्त्र-अलंकार तथा अपने देशके विशिष्ट वस्तुएं देकर सीताकी पूजा की ॥ ३०-३२ ॥ वे रानियां एक महीना अयोध्यामे रहकर अपने अपने देशको लौट गयीं। एक दिन जब कि सुमेधा, जनक, सीता तथा रामचन्द्र एकान्तमें बैठे थे । तब रामने कहा- हे महाराज ! सीताको अपने पास न छल तथा क्षणभर भी उनके वियुक्त होकर मैं नहीं रह सक्ता। जब सीताके पास पहुँच