श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 316, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें३०० आनन्दरामायणे [ सर्गः २
मयाऽऽलभ्य तन्मुखेन्दुसुधया स्वास्थ्यमाप्यते । आत्मानं विह्वलं दृष्ट्वा सीतामाश्रित्यमाश्रये । ३५॥ अधुना जानकीं दृष्ट्वा कामो मेऽतीव बाधते । पञ्चमासोर्ध्वतः सङ्गं गर्हयन्ति मुनीश्वराः । ३६॥ प्रसूत्यर्थं पञ्चमासं स्त्री स्वास्थ्यं प्राप्यते पुनः । पञ्चममार्गविनः सङ्गादपत्योः क्षाणतेरिति । ३७। अत्र किं करणीयं हि वद त्वं श्वशुराय माम् । चेत्प्रेषणीया सीतेयं मिथिलां प्रति वै मया । ३८॥ तर्हि तत्रापि मे गन्तुं मविष्यति समुद्यमः । किञ्चित्कालं तु सीताया वियोगो येन मे भवेत् । ३९॥ उपायः संविधातव्यश्चिन्तितोऽस्ति मयाऽपि च । लोकापवादभीत्याऽहं रजकोक्तेश्छलादपि । ४०॥ गङ्गाया दक्षिणे तीरे वाल्मीकेराश्रमे शुभे । त्यजामि जानकीं शुद्धां किञ्चित्कालान्तरात्पुनः॥४१॥ एनां ममानयिष्यामि प्रत्ययं मां प्रदास्यति ।ततोऽनया चिरं कालं नानाभोगान भजाम्यहम् ॥ ४२॥ जनकोऽथ त्वया तत्र निजपत्न्या सुमेधया । वाल्मीकेराश्रमे गत्वा स्थेयं वर्षाणि पञ्च वै ॥४३॥ तथेत्यङ्गीचकाराथ जनकोऽपि सुमेधया । सीताऽप्यङ्गीचकाराथ विहस्य तद्वचः पतेः ॥४४॥ अथ रामो ददावाज्ञां सप्रियं जनकं मुदा । मगन्त्वा मिथिलाराज्ये स्वायं संस्थाप्य मन्त्रिणाम् ॥४५॥ ययौ सुमेधया शीघ्रं वाल्मीकेराश्रमं मुदा । किंचिद्दासीदामनेन्यवाशिवारणवेष्टितः ॥४६॥ नानोपचारानीतार्थे मगृश्च शकटादिभिः । चकार गेहं विपुलं वाल्मीकेश्च सुखावहम् ॥४७॥ सर्वसम्पत्तिमंयुक्तं बहुगोमहिषीयुतम् । पूरितं धान्यसंघैश्च वस्त्रैराभरणादिभिः । ४८। कामारोपवनारामपुष्पवाटिशताङ्गतम् । गवाक्षैश्चन्द्रकान्तानां कपाटैश्च समन्वितम् ॥४९॥ कृष्णागुरुसकर्पूरैःशीतमल्यादिमादिभिर् । कांचनैःशृङ्खलारत्नैरत्नपर्यङ्कमण्डितम् ॥५०॥ हंसापायतपिककेकांशुकनिनादितम् । मुक्तागुच्छवितानाद्यैः शोभिनं चित्रिताश्वितम् । ५१॥
आता हूँ तो इनके मुखचन्द्रकी सुधासे स्वस्थ हो जाता हूँ । जिस समय मुझको कुछ भी घबराहट होती है, उस समय में सीताके ही समीप रहता हूँ ॥ ३३-३५ । इस समय सीताको देखकर मुझ कामपीड़ा हो रही है और मुनियोंकी सलाह यह है कि गर्भ वःह हो जानेपर पाँच महीने बाद स्त्रीप्रसङ्ग करना निन्दित है ॥ ३६ ॥ प्रसव होनेके अनन्तर पाँच महीने बाद ही स्त्री स्वस्थ होती है। बिना पाँच महीने बाद प्रसङ्ग करनेसे दोनोंको हानि ही हानि है। ऐसे असमञ्जसके समय मुझे क्या करना चाहिये, सो आप बतलाइये। यदि मैं सीताको मिथिला भेज देता हूँ तो मुझ को भी वहाँ जाना पड़ेगा। किन्तु मै कुछ दिन तक सीतासे अलग रहना चाहता हूँ। जिस तरह मेरा इच्छा पूर्ण हो, वही इस समय करना चाहिए। मैंने तो यह सोच रक्खा है कि लोकापवादके डरसे अथवा उस धाबीके ख्यालसे गङ्गाके दक्षिण तटपर वाल्मीकिके पवित्र आश्रमम कुछ समयके लिए परम शुद्ध जानकी को छोड़ दूँ। थोड़े दिन बाद शास्त्र ले आऊँगा फिर मैं इनके साथ चिरकालतक नाना प्रकारके भोगांको भोगूंगा ॥ ३७-४२॥ उस समय आपको अपनी सुमेधाके साथ वाल्मीकिके आश्रमपर जाकर पाँच वर्ष पर्यन्त निवास करना होगा ॥ ४३। सुमेधा और जनकने रामकी सलाह स्वीकार की और सीताने भी हँसकर पतिका कहना मान लिया ॥ ४४। इसके अनन्तर रामने जनकको अपन देश जानकी आज्ञा दी। वे अपने देश गये और राज्यका सब भार मन्त्रीपर छोड़कर अपनी स्त्री सुमेधाके साथ वाल्मीकि ऋषिके आश्रमको चल दिये। चलते समय अपने साथ कुछ दास, दासी, सैनिक तथा हाथी-घोड़े भी ले लिये । ४५ ॥ ४६ ॥ सीताके लिए बहुत सी सामग्रियाँ गाड़ियोंपर लदवाकर साथ ले गये। महर्षि वाल्मीकिके आश्रमको जनकने सब सुखांका भण्डार बना दिया । ४७ ॥ जनकजीके वहाँ पहुंचतेही वह आश्रम सब सम्पत्तियों एवं बहुत सी गौओ और भैंसोंसे भर गया । विविध प्रकारके अन्नों और भाँति-भाँतिके वस्त्राभूषणों से वह पूरा हो गया । ४८ ॥ अनेक पास सैकड़ों पसार, उपवन, बगीचे बावड़ी तथा कुएं तैयार हो गये । चन्द्रकान्त मणिके दरवाजों तथा फटकाबाल भव्य भवन बने । ४६ ॥ कृष्णागुरु, कपूर, खस तथा विविध प्रकारके सुगन्धित द्रव्योंसे वह आश्रम सुगन्धमय हो गया जगह-जगह पर सोनेकी जंजीरोंसे सुसज्जित पलङ्ग पड़ हुए थे ॥ ५० ॥ हंस, कबूतर, कोयल, मयूर तथा तोतोंके शब्दोंसे