भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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२९८ आनन्दरामायणे [ सर्गः २


द्वितीयः सर्गः

( रामसीताका उपवनविहार )

श्रीरामदास उवाच

अथ सीता राघवेण रम्योपवनभूमिषु । क्रीडञ्चकार विविधाश्चिन्त्यैरपि सुरैर्नुताः ॥ १ ॥
कदा वनान्तःप्रागङ्गे कदा वस्त्रगृहेष्वपि । कदाऽऽम्रवृक्षच्छायायां कदा पुष्पवनेषु सा ॥ २ ॥
कदा सा जलप्रश्रावां सर्वयन्त्रवरासने । कदा सरोवरतटे कदा नगान्तरेऽपि च ॥ ३ ॥
नौकास्था मन्दतोये सा रामेणञ्चक्रे कदा । कदा रात्रौ जलक्रीडामथ दिनाऽपि कदा मुदा ॥ ४ ॥
कदा तटाके नौकास्था कदा रम्यावनेषु सा । कदा वृक्षोध्वगेहेषु कदलीगृहेष्वपि ॥ ५ ॥
कदा सा सुरयन्त्राणां निर्मितेषु गृहेषु वा । कदा कृत्रिमगेहेषु पुस्तगेहेषु सा कदा ॥ ६ ॥
कदा सा चित्रशालायां पुष्पके वा कदा मुदा । कदा सा केतकीपत्रैः कृतकञ्चुकमम्बरनि ॥ ७ ॥
कदा नौकोर्ध्वगेहस्था गन्धर्वाः सैकते कदा । एकस्तम्भोर्ध्वगेहेऽपि सखीभिः परिवेष्टिता ॥ ८ ॥
कदा रामेण रहसि कदा दोलकसंस्थिता । पर्यङ्कचक्रमध्यस्था कदा सा दाडिमीवने । ९ ।
सूक्ष्मवस्त्रपर्यङ्कसंस्थिता राघवेण हि । चकार सा कदा क्रीडां षोड़शांगी सुसुन्दरी ॥१०॥
हरिद्वस्त्रयुतस्कन्धयुक्ता जातकौतुका । गोपयित्वा निजं देहं सीता वृक्षदलैर्धनैः ॥११॥
सकार व्याकुलं रामं विनोदेन स्मितानना । ज्ञात्वात्मानं राघवेण दृष्टां मत्वाऽथविध्य च ॥१२।
दुद्राव संभ्रमाद्रामं कण्ठे दोर्लतयोर्बभौ । एवं सीताराघवयोः क्रीडनं परमाद्भुतम् ॥१३॥
विस्तारेणेह को वक्तुं समर्थः पृथिवीतले । एक एव समर्थोऽभूद्वान्मीकिर्मुनिपुंगवः ॥१४॥
शतकोटिमितं येन चरितं वर्णितं तयोः । सारं सारं मया यस्माद्गृह्यते तत्प्रवर्ण्यते ॥१५॥
गन्धर्वीणां कदा नृत्यं सीताऽपश्यद् ददर्श सा । कदा शुश्राव वाद्यानि मङ्गुलानि महोति च ॥१६॥


श्रीरामदासजी कहते हैं इसके बाद सीता रामचन्द्रजीके साथ उस रमणीक उपवनमें देवताओं द्वारा प्रशंसित विविध प्रकारकी क्रीड़ायें करने लगीं ॥ १ ॥ कभी उस बगीचेके बगलेमें, कभी तम्बूके भीतर, कभी शाम्रवृक्षकी छायामें कभी फूलोंकी शय्याओंमें कभी फौव्वारेके समीप बने हुए किसी एक सुन्दर आसनपर, कभा सरोवरके तटपर और कभी नहर के समीप जाकर बिहार करती थीं ॥ २ ॥ ३ ॥ कभी वे नौकापर सवार होकर मन्दगति मन्दम गन्धके साथ बिहार करतीं थीं कभी रात्रिके समय और कभी दिनमें ही जल-क्रीडा करती थीं ॥ ४ ॥ कभी सरोवरमें नौकापर कभी-कभी उत्तम तथा वृक्षके ऊपर बने हुए भवनमें, कभी सुन्दर सुन्दरालय कभी कदली भवन कभी अन्य भवनोंमें, कभी बनावटी मकानोंमें, कभी पुस्तकोंकी कभी चित्रण कभी मण्डप विमानपर कभी मयूरके समूह और कभी एक खम्भेके ऊपर बने भवनमें समय साथ बिहार करती थी । ५-८ । कभी नौका के ऊपर बने बंगलेमें, कभी बालूकी वेदीपर कथा अपनी सखियोंके सहित एक खंभपर ऊपर बनी हुई जगह अंदर जाकर कभी रामके साथ एकान्तमें कभी झूलेपर बैठकर, कभी चक्करदार पलंगपर कभी अनारके बगीचेमें और कभी किसी वृक्षके समान पड़े हुए पलंगपर सुहावने वस्त्रोके दुकाल सीता रामके साथ साठ क्रीड़ा करती थी । ८-१० । वे कभी हरे रङ्गके कपड़े तथा साठ कंचुकी पहनकर रामके साथ क्रीड़ा करती हुई वृक्षोंके घने पत्तोंमें छिपकर रामको व्याकुल कर देतीं और स्वयं सिर्फ हँसी मुखपर रखती थीं । जब वे समझतीं कि रामने लख लिया है तो दौड़ती हुई आतीं और रामके गलेमें गलबहियाँ डालकर उनके हृदयसे लिपट जाती थीं । इस प्रकार सीता तथा रामका अद्भुत कौतूहल हुआ करता था ॥ ११-१३ ॥ इस विस्तारपूर्वक कहनेको सामर्थ्य भला किसीमें है ? हाँ एकमात्र महर्षि वाल्मीकिजी समर्थ हुए थे, जिन्होंने सौ करोड़ श्लोकोंमें उनके चरितोंका वर्णन किया है । उनमेंसे सार-सार लेकर मैं तुमसे कह रहा हूँ । १४ । १५ ॥ कभी सीताजी उस बगीचेमें वेश्याओंके नृत्य देखती थीं