भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 379

सर्गः ६ ] विवाहकाण्डम् ३६३

कुशः स्त्रिया चंपिकया जलक्रीडां करिष्यति । तस्य दक्षिणहस्तस्य कंकणं रुक्मनिर्मितम् ॥ ५० ॥ सरयूजलमध्ये तु पतिष्यति महोज्ज्वलम् । तत्र तोये कुमुदस्य पन्नगस्य कुमुद्वती ॥ ५१ ॥ स्वसा दृष्ट्वा कंकणं तद्गृहीत्वा सप्र यास्यति । कुशोऽपि कंकणार्थे हि बाणं संधायिष्यति ॥ ५२ ॥ सरयूशोषणाथं हि मनयुद्धो भविष्यति । ततः सा कुमुदं गत्वा सरयूः प्रार्थयिष्यति ॥ ५३ ॥ सोऽपि दृष्ट्वा कुशं क्रुद्धं स्वसामादाय सादरम् । कुजमागत्य तं नत्वा स्वसां तस्मै प्रदास्यति ॥ ५४ ॥ रत्नानि ककणं दत्त्वा तेन सख्यं करिष्यते । एवं कुमुद्वतीभार्याऽग्रे तस्यान्या भविष्यति ॥ ५५ ॥ तस्यां कुशान्मुतनयोऽतिथिर्नाम्ना भविष्यति । चंपिकाया दुहितरः समविष्यन्ति नो सुताः ॥ ५६ ॥ अतिथेः सूर्यवंशोऽग्रे चिरं विस्तारमेष्यति । एवं कुशस्य द्वे पत्न्यौ वर्णिते शिष्य वै मया ॥ ५७ ॥ अथ स्वीयगृहे पत्न्याऽकरोत्क्रीडां कुशः सुखम् । तथा स्वीयगृहे पत्न्याऽकरोत्क्रीडां लवोऽपि च ॥ ५८ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये विवाहकाण्डे कुशलवयोर्विवाहवर्णनं नाम चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥


पञ्चमः सर्गः

( रामका गन्धर्वकन्याओं और नागकन्याओंको जलदेवीके पंजेसे छुड़ाना )

श्रीरामदास उवाच

एकदा रघुवीरः स सीतया बालवधुभिः । पौरैर्मन्त्रिजनैरिष्टैः पुष्पकस्थो ययौ वनम् ॥ १ ॥ पश्यमानान्कौतुकानि रञ्जयन् जानकीं मुदा । ययौ स दण्डकारण्‍यमगस्तेराश्रमान्तिकम् ॥ २ ॥ रामस्यागममाकर्ण्य कुम्भजन्मा मुनीश्वरः । प्रत्युद्गम्य रघुश्रेष्ठं निनाय स्वाश्रमं प्रति ॥ ३ ॥ ततः स मुनिवर्यस्तु स्नात्वा रहसि संस्थितः । अन्नपूर्णां महालक्ष्मीं चिंतयामास चेतसि ॥ ४ ॥


आगे जब कि रामचन्द्रजीका राज्यारोहण हो जायगा । तब एक समय अयोध्यापुरीके सरयूजलमें कुश अपनी स्त्री, चम्पिकाके साथ जलक्रीड़ा करते रहेंगे । उसी समय कुशके दाहिने हाथका सुवर्णकंकण जल-में गिर पड़ेगा । उस जन्म कुमुद नामक सर्पकी बहिन कुमुद्वती उस कङ्कणको लेकर घर चली जायगी और कुश अपने कङ्कणके लिए धनुषपर बाण चढ़ावेंगे ॥ ४९-५२ ॥ इस प्रकार क्रुद्ध कुश सरयूको सुखा देना चाहेंगे । इसपर सरयू कुमुदके पास जाकर प्रार्थना करेंगी । ५३ ॥ कुमुद भी सरयूके कथनानुसार कुशको कुपित देखकर उनके पास आयगा और उन्हें प्रणाम करके अपनी बहिन कुमुद्वती कुशको दे देगा और बहुतसे रत्न तथा वह खोया हुआ कङ्कण देकर उनसे मित्रता कर लेगा । इस तरह कुछ समय बाद कुशकी कुमुद्वती नामकी एक दूसरी भार्या भी होगी ॥ ५४ ॥ ५५ ॥ उससे कुशका सुन्दर पुत्र अतिथि होगा । चम्पिकासे कन्यायें ही होंगी, पुत्र नहीं होंगे । ५६ ॥ आगे चलकर इसी अतिथिसे सूर्यवंशका विस्तार होगा । हे शिष्य ! इस प्रकार मैंने कुशकी दोनों पत्नियोंकी कथा यह सुनायी ॥ ५७ ॥ यह सब हो जानेपर कुश अपनी स्त्री चम्पिका तथा लव सुमतीके साथ आनन्दपूर्वक जीवनय पन करेंगे । ५८ । इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्द-रामायणे पण्डितरामतेजशास्त्रिविरचितभाषाटीकासहितं विवाहकाण्डे चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥

श्रीरामदास बोले-एक बार रामचन्द्रजी बालवधुओ, पुरवासियों, मन्त्रियों तथा इष्टजनोंके साथ पुष्पकविमानपर बैठकर अनेक प्रकारके कौतुक देखते और सीताको प्रसन्न करते हुए वनमें गये । वहाँ दण्डकारण्यमें अगस्त्य ऋषिके आश्रमपर जा पहुंचे ॥ १ ॥ २ ॥ जब कि अगस्त्यजीको रामके आनेका समाचार मिला तो अगवानीके लिए स्वयं गये और उन्हें आदरपूर्वक अपने आश्रममे ले आये । ३ ॥ इसके अनन्तर स्नान करके अगस्त्यजी एकान्तमे बैठ गी मन ही मन महालक्ष्मी अन्नपूर्णाका ध्यान किया ॥ ४ ॥