श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
by महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात
Source: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (origin)
Page 382 of 811
Read in context३६६ आनन्दरामायणे [ सर्गः ६
न कश्चित्सूर्यवंशेऽभून्स्त्रीषु शस्त्रप्रहारकः । त्वयाऽपि रक्षिता पूर्वं स्त्रीत्वाज्ज्ञाह्नवीतटे ॥४१। पदारूढया तु शपथः कृतो मैथिलकन्यया । ताटकादिशरीरेषु यत्कृतं बाणमोचनम् ॥४२। ब्रह्मघ्नीषु त्वया पूर्वं वत्सवेर्षो दिताय च । इति तासां वचः श्रुत्वा विहस्य रघुनन्दनः ।४३। स्थापयामास तूणीरे पूर्ववच्च स्वमार्गणम् । ततस्ताभिः पूजितः स तदा दृष्टो रघूत्तमः ॥४४॥ जलदेवीर्हृदात्प्राप्तां स्वस्थलं गम्यतामिति । एतस्मिन्नन्तरे तत्र गंधर्वाश्चाथ पन्नगाः ।४५। विदित्वा सकलं रामकृत्यं रामांतिकं ययुः । नत्वा रामं सगीतं च तथा नं कुम्भसंभवम् ॥४६॥ उपायनान्यनेकानि समर्प्य रघुनन्दनम् । ऊचुस्ते मंजुलं वाक्यं प्रबद्धकरसम्पुटाः ॥४७॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये विवाहकाण्डे जलदेव्योजलदान बालिकाविमोचनं नाम पञ्चमः सर्गः ॥ ५॥
षष्ठः सर्गः
( गन्धर्वों तथा नागोंकी बारह कन्याओंका लक्ष्मणादिके पुत्रोंके साथ विवाह होनेका निश्चय )
गन्धर्वपन्नगा ऊचुः
राम कंजानन स्वामिन्मोचिता बालिकास्त्वया विवाहान्तास्त्वयास्तासां पुत्रैश्चैव कर्तुमर्हसि ॥ १ ॥
अद्य धन्या वयं सर्वे नः कुलं पावनं कृतम् । त्वया राम महाबाहो तारिताः स्मो वयं प्रभो २ ॥
सप्तजन्मसु यत्पुण्यं कृतमस्ति रघूद्वह अस्माभिस्तेन सम्बन्धस्त्वयाऽद्य भवतु प्रभो । ३ ।
श्रीरामदास उवाच
इति तेषां वचः श्रुत्वा सीतया स रघूद्वहः । अङ्गीकृत्य वचस्तेषामगस्तिमवलोकयत् ॥ ४ ॥
तदा प्राह कुम्भजन्मा राघवं वचनं मुनिः । रामान्याऽथ कुमुदस्य भार्या नाम्ना कुमुद्वती । ५ ॥
त्वयि प्राप्ते हि वैकुण्ठं कुशपत्नी भविष्यति । चम्पिकायां न तनयो भविष्यति रघूद्वह । ६ ॥
कर दें। हमपर इन बाणोंको आप मत छोड़िये । ४०॥ अब तक आपके सूर्यवंशमें स्त्रियोंपर शस्त्रका प्रहार करने-वाला कोई भी नहीं हुआ है । आपने भी उस समय गङ्गाके किनारे भीलोंके लिये जाती हुई पृथ्वीकी इसी लिए रक्षा की थी कि वह स्त्री थी । इसके सिवाय आपने जो ताड़कापर बाण छोड़ा उसका कारण यह था कि वह ब्रह्मघातिनी थी । उसे तो आपने ऋषियोंके कल्याणार्थ मारा था । उनका ऐसा विनीत बात सुनी तो मुस्कुराकर रामने अपने बाणको फिर तरकसमे रख दिया । इसके बाद उन जलदेवियोंसे पूजित रामत प्रसन्न होकर उनसे कहा कि अब तुम लोग अपने स्थानको जाओ इसके अनन्तर उन गन्धर्वों और पन्नगोंने (जिनकी कार्य्यार्थ जलदेवियोंके सदृश थी ) जब यह समाचार सुना तो रामके पास आये और सीता, राम तथा अगस्त्यको प्रणाम करके उन्होंने रामको विविध प्रकारकी भेंट दी तदनन्तर हाथ जोड़कर इस प्रकार कहने लगे - ॥ ४१-४७ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकाय पं० रामतेजपाण्डेयकृत ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते विवाहकाण्डे पञ्चमः सर्गः ५॥
गन्धर्व तथा पन्नगगण कहने लगे हे कमल सरीखे नेत्रोंवाले राम आपने हमारी पुत्रियोंको उन जलकन्याओंके हाथसे जैसे छुड़ाया है, उसी तरह अब इनका विवाह भी अपने पुत्रोंके साथ कर लीजिए ॥ १ ॥ आज हम अपनेको धन्य समझते हैं। आज हमारा कुल पवित्र हो गया । हे प्रभो ! आपने हमारा उद्धार कर दिया ॥ २ ॥ हमने अपने सात जन्ममें जो पुण्य किया था, उसके प्रतापसे आज हमारे और आपका सम्बन्ध हो जाय । ३।। श्रीरामदासने कहा- इस प्रकारकी बात सुनकर महारानी सीता और रामने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और अगस्त्यकी ओर निहारने लगे ॥ ४ ॥ अगस्त्यने कहा हे राम जब आप वैकुण्ठधामको चले जायेंगे, तब कुमुद्वती कुशकी पत्नी होगी । हे रघूद्वह ! कुशकी वर्तमान स्त्री चम्पिकाके