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श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

३६६ आनन्दरामायणे [ सर्गः ६

न कश्चित्सूर्यवंशेऽभून्स्त्रीषु शस्त्रप्रहारकः । त्वयाऽपि रक्षिता पूर्वं स्त्रीत्वाज्ज्ञाह्नवीतटे ॥४१। पदारूढया तु शपथः कृतो मैथिलकन्यया । ताटकादिशरीरेषु यत्कृतं बाणमोचनम् ॥४२। ब्रह्मघ्नीषु त्वया पूर्वं वत्सवेर्षो दिताय च । इति तासां वचः श्रुत्वा विहस्य रघुनन्दनः ।४३। स्थापयामास तूणीरे पूर्ववच्च स्वमार्गणम् । ततस्ताभिः पूजितः स तदा दृष्टो रघूत्तमः ॥४४॥ जलदेवीर्हृदात्प्राप्तां स्वस्थलं गम्यतामिति । एतस्मिन्नन्तरे तत्र गंधर्वाश्चाथ पन्नगाः ।४५। विदित्वा सकलं रामकृत्यं रामांतिकं ययुः । नत्वा रामं सगीतं च तथा नं कुम्भसंभवम् ॥४६॥ उपायनान्यनेकानि समर्प्य रघुनन्दनम् । ऊचुस्ते मंजुलं वाक्यं प्रबद्धकरसम्पुटाः ॥४७॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये विवाहकाण्डे जलदेव्योजलदान बालिकाविमोचनं नाम पञ्चमः सर्गः ॥ ५॥


षष्ठः सर्गः

( गन्धर्वों तथा नागोंकी बारह कन्याओंका लक्ष्मणादिके पुत्रोंके साथ विवाह होनेका निश्चय )

गन्धर्वपन्नगा ऊचुः
राम कंजानन स्वामिन्मोचिता बालिकास्त्वया विवाहान्तास्त्वयास्तासां पुत्रैश्चैव कर्तुमर्हसि ॥ १ ॥
अद्य धन्या वयं सर्वे नः कुलं पावनं कृतम् । त्वया राम महाबाहो तारिताः स्मो वयं प्रभो २ ॥
सप्तजन्मसु यत्पुण्यं कृतमस्ति रघूद्वह अस्माभिस्तेन सम्बन्धस्त्वयाऽद्य भवतु प्रभो । ३ ।

श्रीरामदास उवाच
इति तेषां वचः श्रुत्वा सीतया स रघूद्वहः । अङ्गीकृत्य वचस्तेषामगस्तिमवलोकयत् ॥ ४ ॥
तदा प्राह कुम्भजन्मा राघवं वचनं मुनिः । रामान्याऽथ कुमुदस्य भार्या नाम्ना कुमुद्वती । ५ ॥
त्वयि प्राप्ते हि वैकुण्ठं कुशपत्नी भविष्यति । चम्पिकायां न तनयो भविष्यति रघूद्वह । ६ ॥


कर दें। हमपर इन बाणोंको आप मत छोड़िये । ४०॥ अब तक आपके सूर्यवंशमें स्त्रियोंपर शस्त्रका प्रहार करने-वाला कोई भी नहीं हुआ है । आपने भी उस समय गङ्गाके किनारे भीलोंके लिये जाती हुई पृथ्वीकी इसी लिए रक्षा की थी कि वह स्त्री थी । इसके सिवाय आपने जो ताड़कापर बाण छोड़ा उसका कारण यह था कि वह ब्रह्मघातिनी थी । उसे तो आपने ऋषियोंके कल्याणार्थ मारा था । उनका ऐसा विनीत बात सुनी तो मुस्कुराकर रामने अपने बाणको फिर तरकसमे रख दिया । इसके बाद उन जलदेवियोंसे पूजित रामत प्रसन्न होकर उनसे कहा कि अब तुम लोग अपने स्थानको जाओ इसके अनन्तर उन गन्धर्वों और पन्नगोंने (जिनकी कार्य्यार्थ जलदेवियोंके सदृश थी ) जब यह समाचार सुना तो रामके पास आये और सीता, राम तथा अगस्त्यको प्रणाम करके उन्होंने रामको विविध प्रकारकी भेंट दी तदनन्तर हाथ जोड़कर इस प्रकार कहने लगे - ॥ ४१-४७ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकाय पं० रामतेजपाण्डेयकृत ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते विवाहकाण्डे पञ्चमः सर्गः ५॥

गन्धर्व तथा पन्नगगण कहने लगे हे कमल सरीखे नेत्रोंवाले राम आपने हमारी पुत्रियोंको उन जलकन्याओंके हाथसे जैसे छुड़ाया है, उसी तरह अब इनका विवाह भी अपने पुत्रोंके साथ कर लीजिए ॥ १ ॥ आज हम अपनेको धन्य समझते हैं। आज हमारा कुल पवित्र हो गया । हे प्रभो ! आपने हमारा उद्धार कर दिया ॥ २ ॥ हमने अपने सात जन्ममें जो पुण्य किया था, उसके प्रतापसे आज हमारे और आपका सम्बन्ध हो जाय । ३।। श्रीरामदासने कहा- इस प्रकारकी बात सुनकर महारानी सीता और रामने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली और अगस्त्यकी ओर निहारने लगे ॥ ४ ॥ अगस्त्यने कहा हे राम जब आप वैकुण्ठधामको चले जायेंगे, तब कुमुद्वती कुशकी पत्नी होगी । हे रघूद्वह ! कुशकी वर्तमान स्त्री चम्पिकाके

सर्गः ६ ] विवाहकाण्डम् १६७

सर्गः ६ ] विवाहकाण्डम् १६७


कुशात्पुत्रः कुमुद्वत्यामतिथिस्तु भविष्यति । राज्यकर्ता वंशकर्ता स एवार्थं भविष्यति ॥ ७ ॥
अतस्त्वमधुना राम नागकन्याः कुशं विना । सप्त स्वस्वसुपुत्रेभ्यः प्रयच्छ विधिना द्विजैः ॥ ८ ॥
पञ्चगन्धर्वकन्याश्च यूपकेतुं कुशं लवम् । विना स्वस्वसुपुत्रेभ्यः प्रयच्छ रघुनन्दन । ९ ॥
राक्षसेन विवाहेन यूपकेतुः शिशुस्ततः । अग्रे पत्नीं मदानेप कश्चित्पन्नगं शुभाम् ॥ १० ॥
एवं रामसुताः सर्वे स्वस्वस्त्रीभ्यां यथासुखम् । क्रीडयिष्यन्ति पौत्रांश्चान भवितान्ति प्रपौत्रकाः ॥ ११ ॥
प्रपौत्रस्य प्रपौत्रं स्वं दृष्ट्वा सीतासमन्वितः । सुखं यास्यसि वैकुण्ठं बन्धुभिर्नगरीजनैः ॥ १२ ॥
एवं श्रुत्वा मुनेर्वाक्यमङ्गीकृत्य रघूद्वहः । तासां नामानि पप्रच्छ गन्धर्वान्पन्नगानपि ॥ १३ ॥
तदाऽब्रवीत्स गन्धर्वः स्वपुत्रीणां च तन्मनान् । तासां नामानि रामाग्रे पञ्चानां सम्प्रहृष्टधीः ॥ १४ ॥
चन्द्रिका चन्द्रवदना चञ्चला चपला चला । एवं नामानि पञ्चानां क्रमेण रघुनन्दनः ॥ १५ ॥
श्रुत्वाऽवलोकयामास पन्नगांस्तेऽपि चाब्रुवन् । कजानना कजनेत्रा कजांघी च कजावती ॥ १६ ॥
कळिका कमला चैव मालती मम कीर्त्तिताः । एवं नामानि पञ्चानां क्रमेण रघुनन्दनः ॥ १७ ॥
श्रुत्वा ताः पुष्पके स्थाप्य नैर्ऋत्यां गर्तुमैच्छिभिः । अथ प्रभाते श्रीरामः हृष्ट्वा स्नात्वा यथाविधि ॥ १८ ॥
गन्धर्वपन्नगांश्चापि तदा वचनमब्रवीत् । यमर्त्येनैव म साकं विवाहार्यं रमान्तराम् ॥ १९ ॥
नैव योग्यं समागन्तुं नगलोकान्निवासिना । तस्माच्छृणुध्व मद्वाक्यं सुहृदः सकलाः शुभम् ॥ २० ॥
यूयं गत्वा निजस्थानं स्वस्त्रीभिश्च बहुप्रजाः । आगतय्य विवाहार्यमयोध्यां मे यथासुखम् ॥ २१ ॥
अधुनाऽहं तु गच्छामि पुरीमग्र शयेन कि । विहायसा विमानेन पताकाध्वजमालिना ॥ २२ ।
तथेति रामवचनात्त गताः कक्षकूल नि हि । सोऽपि मुनिना ताभिर्बालिकाभिः सुतैः श्रिया ॥ २३ ॥
विहायसा पुष्पकस्थो ययौ पश्चवदान्ति मः । अयोध्यां प्रहरेणैव मुदा प्राप रघूद्वहः ॥ २४ ॥


कोई पुत्र नहीं होगा ॥ ५ ॥ ६ । हाँ, कुमुद्वतीमें कुशके अतिथि नामका पुत्र उत्पन्न होगा और वही पुत्र राज्यकर्ता एवं वंशका बढ़ानेवाला होगा। इससे हे राम ! कुशको छोड़कर बाकी सब कुमारोंका विवाह इन कन्याओंके साथ कर दीजिए। इनमें पाँच गन्धर्व-कन्याओंको यूपकेतु तथा कुश-लवके अतिरिक्त शेष पुत्रोंको दे दीजिए । ९ ॥ आगे चलकर यूपकेतु राक्षसविवाहके क्रमसे एक अच्छी स्त्रीके साथ विवाह करेगा ॥ १० ॥ हे राम ! ऐसा करनेसे सब पुत्र अपन-अपनी स्त्रियोंके साथ सुखपूर्वक विहार करेंगे। उनके पौत्र-प्रपौत्र आदि भी होवेंगे ११ । पश्चात् आप भी प्रपौत्रके प्रपौत्रोंको देखकर सीता अपने बन्धुओं और पुरवासियोंके साथ वैकुण्ठधामको जाओगे। इस प्रकार अगस्त्यजीकी बात सुनी तो उन्होंने अङ्गीकार कर लिया और उन गन्धर्व-पन्नगोंसे उन कन्याओंके नाम पूछने लगे ॥ १२ ॥ १३ ॥ गन्धर्वराज अपनी पाँच कन्याओंका नाम बतलाने लगे कि वे—चन्द्रिका, चन्द्रवदना, चञ्चला, चपला और चला ये इनके नाम हैं ॥ १४ ॥ कन्याओंका नाम सुनकर राम उनके ओर देखने लगे फिर पन्नग इस प्रकार अपनी सात कन्याओंके नाम बतलाने लगे—कजानना, कजनेत्रा, कजांघ्री, कजावती, कलिका, कमला और मालती ये सात नाम हैं। इस रीतिसे सबका नाम सुनकर रामने उन कन्याओंको पुष्पक विमानपर चढ़ा लिया और सब सर्षियोंके साथ सो गये। इसके अनन्तर प्रातःकालके समय राम उठे और विधिवत स्नान-हवन आदि किया ॥ १५-१८॥ फिर वे उन गन्धर्वों तथा पन्नगोंको बुलाकर कहने लगे हे गन्धर्व तथा पन्नगगण ! मैं मर्त्यलोकका निवासी मनुष्य हूँ। इस कारण मैं अपने बन्धुओंके भवनपर वा पन्नगलोकमें नहीं जा सकूँगा और न गन्धर्वोक्त यहाँ स्वर्गलोकको ही अपने बच्चोंका विवाह करने जा सकूँगा। इसपर आप लोग सब मेरी बात सुनिए ॥ १९ ॥ २० ॥ आपलोग अपने-अपने घर जायें और इनका विवाह करनेके लिए वहाँसे स्त्रियों तथा बन्धु-बान्धवोंके साथ आनन्दपूर्वक अयोध्या पधारें ॥ २१ ॥ कुछ देर बाद मैं अपने विमान द्वारा आकाशमार्गसे अपनी नगरीका रास्ता पकड़ूँगा ॥ २२ ॥ "बहुत अच्छा" कहकर वे गन्धर्व तथा पन्नग अपने-अपने स्थानको चले गये। इधर रामचन्द्रजी भी

३६८आनन्दरामायणे[ सर्गः ६

नीराजितः पुरस्त्रीभिर्विवेश निजमन्दिरम् । वसिष्ठांस्ते ताः सर्वाः प्रेषयामास राघवः ॥२५॥
अथ रामः सभामध्ये मन्त्रिभिश्चिदमब्रवीत् । धावन्तु नगरे राजन् मुमुदश्च मुनीश्वराः ॥२६॥
सीतासुराः सरोगाश्च स्वस्वजानपदैः सह । मुहूर्त्तस्यावशेषेयं परिखाः सप्त सादरम् ॥२७॥
शोधनीयास्तथा सौधमद्मेषु सुधा शुभा । नया चित्राणि लेख्यानि प्रासादेषु मर्मन्तः ॥२८॥
देवालयेषु सर्वेषु सुधा देया मनोरमा । लेखनीयानि चित्राणि रत्नयःस्थापना पृथक् ॥२९॥
वन्दनीयाः पताकाश्च रोषणीया ध्वजा अपि । दर्भाश्चतोरणानि बन्धनीयानि लक्ष्मण ॥३०॥
वेद्यः कार्या ह्युदग्रराया बन्धनायाश्च मण्डपाः । शृङ्गार्णीया दशरथातिथिवत्काश्च सहस्रशः ॥३१॥
गन्धर्वभ्यः पन्नगेभ्यो वस्तु गेहानि वै पृथक् । कृकन्य नूतनान्यायस्तत्रार्थः पूरितानि च ॥३२॥
अन्यदपि यथायोग्यं यद्यजानसि लक्ष्मण । तत्कुरुष्व मयोक्तं मया तव रघूद्वह ॥३३॥
तद्रामवचनं श्रुत्वा तथेत्युक्त्वा स लक्ष्मणः । तथा चकार तत्सर्वं यथा रामेण निश्चितः ॥३४॥
अथ गन्धर्वराजन्तु तथा वै यम पन्नगाः । महाङ्गुः सगरोधाम्न ययु शीघ्र मुदान्विताः ॥३५॥
सर्वे मानवरूपेण हस्त्यश्वरथसंस्थिताः । गन्धर्वाश्चापि सैन्यैस्ते संहतोपवनं ययुः ॥३६॥
ततस्तानागतान् श्रुत्वा प्रत्युद्गम्य रघूद्वहः । नानाद्यानि नार्थश्च नृत्यैरङ्गरमां युगम् ॥३७॥
नीत्वा संस्थापयामास विस्तीर्णेषु गृहेषु सः । अथ वैकदा रामः सभायां संस्थितः सुखम् ॥३८॥
ज्योतिर्विदः समाहूय वसिष्ठं च पुरोधसम् । पृथग्विवाहानुकल्पे स मुहूर्तानभिमङ्गलान् ॥३९॥
सम्यग्विचारयामास सभामध्ये भविष्यतः । ज्योतिर्विदन्तदा प्रोचुर्मुहूर्तानतिमोददान् ॥४०॥
पक्षान्तरेण वैशाखे द्वौ मुहूर्ती शुभावहौ । तथा तदूर्ध्वतो द्वौ ज्येष्ठे पक्षान्तरेण ते ॥४१॥
शुक्लेन मार्गशीर्षेऽपि त्रीन् मार्गफान्गुनेऽपि च । एवं द्वादशकां स्त्री चकुलैगिनिश्चियम् ॥४२॥


उन बालकोंका अपन पूजी त । रथ कि साथ ... तिर ऊपर आकाशमगत गन्धर्व कलाका देखते हुए वहांसे चल दिये ओर एक प्रहरम अयोध्या आये ॥२३ । २४ । वहाँ पहुँचनेपर पुरवासिनी स्त्रियोंने उनकी आरती उतारी और उन स...लोग रामके वहाँ भेज दिया, २५ । तदनन्तर रामने रामजी लक्ष्मणसे कहा कि सभासो, मार्गिको ओर मुनिश्वरों यों निमन्त्रण भेज दो कि सब लोग अपनी स्त्रियों तथा पुरवासियोंके साथ अयोध्य । ध्यान । भागलगे अयोध्यानगरीका शृङ्गार करो ॥२६॥ अयोध्याके सब मकान चूनेसे पुतवाये जायं और उसपर नये और विचित्र प्रकारके चित्र बनाये जायें । २७ ॥ समस्त देवालयम अच्छी तरह पुताइके, ओर लोग गन्ध अक्षत और सिन्दू बनाकर पूजनका सुप्रबन्ध किया जाय ॥ २८ ।, २९ । पताका बांधो जायं ध्वजाहरोपण कि जायं और मन्दिरोंके चारों ओर तोरण बांधे जायें । जहाँ तहाँ सुगन्धित वेदियाँ बनवाई जायं । दशरथादि समस्त अतिथियोंका सत्कार किया जाय । गन्धर्व-पन्नगादि लोगोंके लिये नये-नये मकान बनवाकर नाना भांति तरह सब दस्त आbordersका प्रबन्ध कर दो ॥ ३०-३२ ॥ हे लक्ष्मण ! जो मैं कह चुका हूँ, वह और जो मैं नहीं कहपाया हूँ और तुम जानते होसो सो भी ठीक कर लो ॥ ३३ । रामकी बात सुनकर लक्ष्मणने तथा... ही किया था, तदनुसार सब प्रबंध कर दिया ॥ ३४ ॥ इसके अनन्तर चित्राङ्गद और तक्षकप्रभृत बन्धु सम्बन्धिाने यथायोग्यतया सब हर्षपूर्वक अयोध्याको चल दिये ॥ ३५ ॥ उस समय समस्त सर्वो ने मानव रूप धारण किया ओर घोड़े तथा रथपर सवार होकर अयोध्या आये । गंधर्व भी अपनी विशाल सेनाके साथ माहेन्द्रपुर आ पहुंचे ॥ ३६ ।... ३७ ॥ इसके बाद सब रामचन्द्रजीने सुना कि वे लोग अयोध्या आ गये हैं तो विविधप्रकार के बाजों और नाचके साथ नगरीमे ले जाये और खूब लम्बे चौड़े भवनमें उनको ठहराया । इसके अनन्तर एक समय राम सब लोगोंके साथ सभामें बैठे तो वशिष्ठ तथा अनेक ज्योतिर्विदोंको बुलाकर और विवाहके लिए अलग-अलग मुहूर्ताका अच्छी तरह विचार करनेको कहा । ज्योतिष्योने गगन आकाशगत अतिशय सुखकारी मुहूर्त विचारकर कहा कि एक पक्ष बीतनेपर वैशाख मासमें दो मुहूर्त हैं । एक पक्षके अनन्तर ज्येष्ठ मासमें भी दो ही मुहूर्त हैं। ३८-४१ ॥ दो

सर्गः ७ ] विवाहकाण्डम् २६९


लक्ष्मस्याथांगदस्यापि विवाहौ तैर्विनिश्चितौ । ज्योतिर्विद्भिर्गतेऽह्ने वैशाखे राघवाग्रतः ॥४३॥
चित्रकेतोः पुष्करस्य विवाहौ तैर्विनिश्चितौ । ज्येष्ठे मासि क्रमेणैव पक्षे पक्षे पृथक् पृथक् ॥४४॥
तक्षस्याथ सुबाहोश्च विवाहौ मार्गशीर्षके । पक्षान्तरेण रामाग्रे ज्योतिर्विद्भिर्विनिश्चितौ ॥४५॥
यूपकेतोर्भदस्य चित्रकेतोर्वि निश्चिताः । माघमासे विवाहाश्च ज्योतिःशास्त्रविशारदैः ॥४६॥
पुष्करस्याथ तक्षस्य सुबाहोः फाल्गुने शुभे । विवाहा निश्चिताः पूर्वं रामाग्रे गणकैस्तदा ॥४७॥
एवं निश्चिताः सर्वे विवाहा द्वादश क्रमात् । ज्योतिर्विद्भिर्निश्चितांश्च श्रुत्वा तानर्चयद्विभुः ॥४८॥

इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये विवाहकांडे
द्वादशविवाहलग्निर्निश्चयो नाम षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥


सप्तमः सर्गः

( नागों तथा गंधर्वराजकी कन्याओंका विवाह )

श्रीरामदास उवाच
अथ ते गणकाः सर्वे वसिष्ठस्तत्पुरोधसः । कुमारीणां विभागार्थं चक्रुः श्रीराघवाग्रतः ॥ १ ॥
कञ्जाननां लक्ष्मणाथ कञ्जाक्षीमंगदाय च गणका निश्चयं चक्रुः कञ्जांघ्रीं चित्रकेतवे ॥ २ ॥
कलावतीं पुष्कराय तथा तक्षाय कालिकाए सुबाहवे च कमलां मालतीं यूपकेतवे ॥ ३ ॥
गणकैः सप्त ता एव नागकन्या विनिश्चिताः । चंद्रिकामंगदायाथ चंद्रास्यां चित्रकेतवे ॥ ४ ॥
चञ्चलाख्यां पुष्कराय तक्षाय चपलां तथा । सुबाहवे तु अचलां प्रोचुस्ते गणकादयः ॥ ५ ॥
एवं गंधर्वकन्यास्ताः पंच विप्रैर्विनिश्चिताः । एवं हि निश्चयं कृत्वा गणकादीन् रघूत्तमः ॥ ६ ॥
विसृज्य मैथिलीं गत्वा सर्वं वृत्तं न्यवेदयत् । ततो ययुः कोटिसंख्ये पार्थिवाश्च मुनीश्वराः ॥ ७ ॥
सप्तद्वीपांतरस्थाश्च सावशेषाः समलकाः । नानावाहनसंस्थाश्च पौरैर्जानपदैर्निजैः ॥ ८ ॥


मुहूर्त मार्गशीर्षमें तीन मुहूर्त माघमें और तीन ही मुहूर्त फाल्गुनमें बतलाया । इस तरह उन बारहौ कन्याओंके विवाहका लग्न बन गया । तदनन्तर वसिष्ठके साथ-साथ उन ज्योतिर्विदों ने वैशाखवाली लग्नमें लक्ष्मण और अङ्गदके विवाहका मुहूर्त निश्चित किया । चित्रकेतु और पुष्करका विवाह ज्येष्ठमासकी लग्नपर निश्चित हुआ । तक्ष और सुबाहुका विवाह एक पक्ष बाद मार्गशीर्षके ही पक्षमें निश्चित किया ॥ ४२-४५ ॥ यूपकेतु, अङ्गद तथा चित्रकेतुका विवाह माघ मासमें निश्चित हुआ ॥ ४६ ॥ पुष्कर, तक्ष तथा सुबाहुका विवाह रामके समक्ष बैठे हुए ज्योतिर्विदों ने फाल्गुन मासकी शुभ लग्नमें निश्चित किया ॥ ४७ ॥ इस तरह क्रमशः बारहौ विवाहोंके निश्चित हो जानेपर रामने ज्योतिर्विदोंकी विधिवत् पूजा की ॥ ४८ ॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानंदरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयविरचितभाषाटीकासहिते विवाहकाण्डे षष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥

श्रीरामदास कहने लगे - उपर्युक्त प्रकारसे विवाह निश्चित हो जानेपर रामके सामने ही वसिष्ठ तथा ज्योतिर्विदों ने उन कन्याओंका विवाह तय करनेके उद्देश्यसे विचार किया कि कौन-सी कन्या किसको दी जाय ॥ १ ॥ कञ्जानना नामकी कन्या लक्ष्मणके लिए, कञ्जाक्षी अंगदके लिए, कञ्जांघ्री चित्रकेतुके लिए, कलावती पुष्करके लिए, कालिका तक्षके लिए, कमला सुबाहुके लिए और मालती यूपकेतुके लिए देना निश्चित हुआ ॥ २ ॥ ३ ॥ इस प्रकार ज्योतिर्विदों ने इन सब कन्याओंको देखकर निश्चय कर दिया । चंद्रिका अङ्गदके लिए, चंद्रास्या चित्रकेतुके लिए, चंचला पुष्करके लिए, चपला तक्षके लिए और अचला सुबाहुके लिए देनेके लिए उन ज्योतिर्विदों ने निश्चित किया । इस तरह उन पाँचों गन्धर्वकन्याओंका वरका निश्चय हो जानेपर रामने आदरपूर्वक ज्योतिर्विदोंको विदा किया और स्वयम् सीताके पास जा पहुंचकर जो कुछ सभा में निश्चित हुआ था, सो उन्हें कह सुनाया । इसके बाद सातों द्वीपोंमें रहनेवाले करोड़ों मुनीश्वर तथा राजे अपने परिवार और प्रजा समेत नाना प्रकारकी सवारियोंपर सवार होकर अयोध्या आये ॥ ४-८ । उस समय उन लोगोंसे सारी अयोध्या भर

३७०आनन्दरामायणे[ सर्ग ७

यैः साऽप्योध्यापुरी व्योम्ना विरेजे निर्मला तदा । ययौ विभीषणश्चाथ सुग्रीवोऽपि प्लवंगमैः ॥ ९ ॥
ययौ स भूरिकीर्तिश्च पुत्राभ्यां संप्रमादतः । ययौ स जनकोऽपि युधाजिन्न ययौ तदा ॥ १० ॥
कौसल्यायाः सुमित्राया बांधवाद्याः समाययुः अथ रामस्तु वैशाखशुक्ले द्विजवरैः सह ॥ ११ ॥
पुरोधसा सुहृद्भिश्च स्नानमभ्यंगपूर्वकम् । कृत्वा लवाय मांगल्यस्नानार्थं स्त्रीः प्रचोदयत् ॥ १२ ॥
ततो मुहूर्तसमये वधूच्छिष्टां निशा लवम् सम्यग् लिप्त्व मुनैलाद्यैर्मान्याश्चा मगलग्रदाः ॥ १३ ।
स्वयं मन्मथप्रदा सर्वाश्चतुर्नार्यः स्वलंकृताः । अथ रामो देवकस्य प्रतिष्ठां ब्राह्मणैः सह १४॥
आदौ कृत्वा गणपतेः पूजां सम्यग्व्यधाद्विधि। पुण्याहादित्रयं चापि कृत्वा पूर्वं सविस्तरम् । १५ ।
चकार विधिनाऽऽसून पूजयामास वै मुनीन् ततो मुहूर्तसमये गत्वा पन्नगमदिरम् ॥ १६॥
लवस्य कञ्चननयनाविवाहं विनिर्वर्तयन् । चतुर्थे दिवसे वश्यान्तरस्थे मत्नदीपकैः ॥ १७ ।
नीराजितस्तदा रामो विरेजे मंडपे स्थितः । ततो निजगृहं गत्वा पूर्वोक्तनन्मवादिभिः । १८ ॥
लवेन कारयामास लक्ष्मीपूजनमुत्तमम् । ततो दानान्यनेकानि ददौ स रघुनन्दनः ॥ १९ ॥
ततस्ते पार्थिवाः सर्वे तथा ते पन्नगा अपि । मुहृदश्चाथ गंधर्वाः पौरा जानपदादयः ॥ २० ॥
पूजयामासुः श्रीरामं वस्त्रैराभरणादिभिः । तथा तान् लक्ष्मणादींश्च कुशाद्यांश्चापि बालकान् ॥ २१॥
ततस्ता नृपपत्न्यश्च सुहृत्पत्न्यः पृथक्पृथक् । नागपत्न्यश्च गंधर्वापत्यस्त्वन्याश्चतथा स्त्रियः ॥ २२॥
सीतायाः पूजयामासुर्वस्त्रैराभरणादिभिः । सीताऽपि ताः सुहृत्पत्नीस्तथा वानिककामिनीः । २३ ।
पूजयामास विधिवद्वस्त्रैराभरणादिभिः । रामोऽपि सुहृदः पौरान् गन्धर्वान्पन्नगाभटान् । २४॥
वस्त्रैराभरणाद्यैस्तैः पूजयामास सादरम् । एवं वैशाखमासे तु सिते पक्षे लवस्य च ॥ २५॥
कृत्वा विवाहं रामः स कृष्णपक्षे तु माधवे । चकार पूर्वोक्तविवाहं अंगदस्य च ॥ २६॥
चित्रकेतोः पुष्करस्य विवाहो रघुनन्दनः ज्येष्ठमासे शुक्लकृष्णपक्षयोश्चक्रे मुदा ॥ २७॥

गयी और वह बहुत ही सुन्दर दीखने लगी। बहुतस वानरोंको साथ लिए हुए सुग्रीव, अपने दोनों बेटोंके साथ राजा भूरिकीर्ति, इनके सिवाय विभीषण, जनक, युधाजित्, कौसल्या तथा सुमित्राके बन्धु-बान्धव आदि भी अयोध्यामे आ पहुँचे। इसके बाद वैशाखके शुक्लपक्षमें पुरोहितों तथा विप्रोंके साथ रामने अभ्यङ्ग-पूर्वक स्नान किया और लवको मङ्गलस्नान करानेके लिए स्त्रियोंसे कहा ॥ ९-१२ ॥ सात दिक माताओंने जब मुहूर्त्त आया, तब वधूके जूठे हल्दी-तैल तथा उबटन लेकर लवके शरीग्मे लगाया और तदनन्तर वस्त्र गहने आदि माताक साथ अलङ्करण मन्त्र स्वयम् ही किया । विवाह से प्रथम श्रीमहाराजने शाख कुलदेवताका स्थापना का । १३ ॥ १४ । स्थापनाके पूर्व यथाविधि गणपतिजी की पूजा की और निम्नाशय तीन प्रकारका पुण्याहवाचन किया इसके अनन्तर मेहूपानीमे आये हुए मुनियोंका पूजन करके उन्हें सन्तुष्ट किया । शुभ मुहूत्तमे पन्नगोंके यहाँ गये और वहाँ कञ्चननयनाके साथ लवका विधिवत् विवाह सम्पन्न किया, चौथे दिन वामकों छिटनांमे बैठे हुए रत्न-दीपकाश रामकी आरती उतारी गयी । उस समय राम सीताके साथ बहुत ही सुन्दर दीख रहे थे। इसके अनन्तर पूर्वोक्त उत्सवोंके साथ राम अपने घर गये वहाँ लवके हाथोंसे अच्छी तरह लक्ष्मीपूजन कराया और अनेक प्रकारके दान दिये । १५-१९ ॥ इसके बाद उन देश देशान्तरस आये हुए राजाओ, पन्नगो, सम्बन्धियो, पुरवासिया और जनपदवासियोने विविध प्रकारके वस्त्रों और आभूषणोंसे राम-लक्ष्मण तथा सब बालकोंकी पूजा की। इसके पश्चात् रानियों, सम्बन्धियोकी स्त्रियों, नागपत्नियों तथा गंधर्व आदिकी स्त्रियोंको सीता आदि स्त्रियान वस्त्र और आभूषण देखकर विधिवत् सस्कृत किया । रामने भी सम्बन्धियों, पुरवासियो, गन्धर्वो और पन्नगोंकी वस्त्राभूषणसे भली भाँति पूजा की। इस तरह वैशाख मासके शुक्लपक्षमे लवका विवाह सम्पन्न किया और कृष्णपक्षमें पूर्ववत् उत्साह समेत अङ्गदका विवाह किया ॥ २०-२६ ॥ उसी प्रकार ज्येष्ठ शुक्ल और कृष्ण-

सर्गः ७ ] विवाहकाण्डम् २७१


ततः सर्वान्नृपादींश्च ददावाज्ञां सुहृज्जनान् । ततः पुनस्तानाहूय पूर्ववन्मार्गशीर्षके ॥२८॥
नभस्याथ सुबाहोश्च विवाहानकरोत्प्रभुः । ततः सर्वान्नृपान् रामो ददावाज्ञां सुहृज्जनान् ।२९।
ततः पुनस्तानाहूय माघमासे मुदन्नृपान् । गुरवेतारगदस्य चित्रकेतोर्महोत्सवैः ॥३०॥
विवाहानकरोद्रामः पथिराम्न व्यसर्जयत् । पुष्करस्याथ तक्षस्य सुबाहोश्च महोत्सवैः ॥३१॥
चकार फाल्गुने मासि विवाहान् जानकीधवः । एवं कृत्वा विवाहंश्च रामो द्वादश सादरम् ॥३२॥
नृपैः संपूजितः सर्वांन्नृप्याज्ञां नृपनान् ददौ । पूजयित्वा मुनींश्चापि विससर्ज रघूद्वहः ॥३३॥
गन्धर्वपन्नगाः सर्व ते सकेतेऽत्र मधिष्ठिताः । राम मुक्त्वा न ते नैजं स्थल जगमुर्मुदान्विताः ॥३४॥
मन्त्रिणः प्रेषयामासुः स्वस्वराज्येषु ते पृथक् । यदा रामः स वैकुण्ठमग्रे गच्छति कालतः ॥३५॥
तदासत्तानिकंल्लोकोन्ते गच्छन्ति न संशयः । अथ रामः पन्नगानां गन्धर्वाणां च सद्यसु ॥३६॥
वार्षकेषूत्सवेष्वत्र सावरोधः गृहज्जनेः । पौरैः स्वायैर्भोजनादे गत्वा पूर्णाकरोत्प्रदा ॥३७॥
सदा महोत्सवाद्यामन्नयोध्याया गृहे गृहे । आनन्दः सकलानामासीन्नकुत्राप्यमगलम् ॥३८॥
अथ तेषां गभ१ण पुत्राणां च पृथक् पृथक् । अह कृत्वा तु गेहानि पृथक्कृत्या च शनयः । ३९।
तेषु ते स्थापिताः स, स्वस्वस्त्रीभि पृथक्सुखम् । तथा ते लक्ष्मणाद्याश्च पृथग्गेहेषु चाधवाः । ४०॥
पूर्वमेव स्थापिताश्च स्वस्वपत्न्य। सुदान्विताः । सुमित्रायाः स सौमित्रिा स्वीयगेहेऽवसत्सुखम् । ४१॥
कैकेयी भरतस्याथ गेहे मसमवाम मा । तस्यो शत्रुघ्नगेहेऽपि नाममेकं पयाम्यम् ॥४२॥
एवं सा पुत्रयोर्गेहऽवसद्गम सुदान्विता, कौसल्या ना रामगेह तस्थौ सीतानिसेविता ।४३॥
ते सर्वे चाधवाः पुत्रा निजवानैश्च सेरुकैः । स्वदासीगोधनार्यैश्च सुखमापुः पृथक् पृथक् ॥४४॥
अथ ते लक्ष्मणाद्यश्च कुशाद्या बालका अपि। स्वस्वगेहेषु वै प्रातः स्नात्वा होमान् विचार्यनम् । ४५।


पसन्द त्रितासु हे सुत्रोंका विवाह ३२॥ इसके बाद सब राजाओं और मुनियोंको अपने-अपने घर जानेकी आज्ञा दी। फिर भरतजीके सब्रह्लद, कुमुदका तथा तर और सुबाहुका विवाह किया। बादमें सबको आज्ञा देकर राजा का अनुमति देकर माघ मासमे बुलाया और दधपुत्रोंका विवाह सम्पन्न किया ॥ २८-३० ॥ माघके बाद मेघनादका विवाह करके पुनः फाल्गुन मासमें पुष्कर, तक्ष तथा सुबाहुका विवाह किया। इस तरह बारह विवाहोंका प्रबन्ध कर सब महमानोंका यथायोग्य पूजा की और उनका पूजन स्वीकार किया। सब सेवक अपने-२ राज्यको चले गये। इसका अनुमान हो । इसी तरह उन मुनियोंका भी विधिवत् पूजन करके विदा किया। अयोध्याका राजाका नाम था ॥ ३१-३३ ॥ किन्तु गन्धर्व और पन्नगगण अयोध्यामे ही रहे। वे अपने-अपने मन्त्रियोंको राजधानी भेजकर रामके पास रहने लगे। ये सब तक अयोध्या में रहे जब तक राम अपने वैकुण्ठधामको नहीं चले जायेंगे। रामके चले जानेपर वे भी सत्तानिक लोकोंमें चले जायेंगे। इसके अतिरिक्त वार्षिक उत्सवों और त्योहारोंपर राम अपने घरकी स्त्रियों, मित्रों तथा सम्बन्धीयों के साथ पल्ली और गन्धर्वराजके यहाँ जाकर भोजन आदि करते थे ॥ ३४-३७ ॥ उन दिनों अयोध्या में घर-घर उत्सव मनाये जाते थे; उस समय सर्वत्र आनन्द था। कही भी किसी प्रकारका अमंगल नहीं दिखलाई पड़ता था ॥ ३८ ॥ इसके पश्चात् रामने उन बारह भाइयोंके लिए अलग-अलग घर बनवाये और विधिवत् शान्तिपाठ कराके उनको अपनी-अपनी स्त्रियोंके साथ उन घरोंमें बसा दिया। उसी तरह लक्ष्मण आदि भ्राता बहुत शुभ अलग-अलग महलोंमें अपनी-अपनी स्त्रियोंके साथ सुखपूर्वक रह रहे थे। सुमित्राके पुत्र लक्ष्मण अपने महलमें आनन्दपूर्वक रहते थे ॥ ३९-४१ ॥ कैकेयी एक महीना भरतके यहाँ और एक महीना शत्रुघ्नके यहाँ रहा करती थी, इस तरह अपने दोनों पुत्रोंके साथ रहती हुई वह सुखसे समय बिता रही थी। कौसल्या सीताका सदा ग्रहण करती हुई रामके महलमें रहती थीं ॥ ४२-४३ ॥ वे सब भ्राता और उनके पुत्र अलग-अलग अपनी सवारी, सेवक, दासी, गोधन आदि तथा सम्पत्तियाँ रखकर आनंद से रहते थे ॥ ४४ । यह सब का नियम था कि लक्ष्मण आदि सब भ्राता और कुश आदि

३७२आनन्दरामायणे[ सर्गः ८

गोद्विजार्चादि संपाद्य ततस्ते राघवं ययुः । नत्वा रामं जानकीं ते तस्थुर्दिव्यासनेापरि ॥ ४६॥ तेषां भार्याः स्त्रियश्चापि स्नात्वा दुर्गां प्रपूज्य च । गत्वा सीतां प्रणेमुस्तास्तस्थू सीताव्र्याऽऽसने ॥४७॥ ततस्ते लक्ष्मणाद्याः कुशाद्याः स्वगुरोर्मुखात् । कथां पौराणिकीं श्रुत्वाऽऽयुः स्वं स्वं गृहं प्रति । ४८। ततः सर्वे रामगेहे समाहूता मुदान्विताः । उपाहारान् पृथक् चक्रुर्मध्याह्ने भोजनान्यपि ॥४९॥ एवं तेषां स्त्रियश्चापि समाहूतास्तु सीतया । उपाहारान् भोजनानि चक्रुः सीतागृहे सदा । ५०॥ कदा मुदा स्वीयगेहे राघवेणार्थ सीतया । उपाहारान् भोजनानि चक्रुस्ते ब्राह्मणादिभिः । ५१॥ एवं तैर्बन्धुभिश्चालैः प्रापतुर्नितरां सुखम् । सीताराभौ कदा नामोन्कलहः क्वापि कस्य हि । ५२॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये विवाहकाण्डे द्वादशविवाहवर्णनं नाम सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥


अष्टमः सर्गः

( शत्रुघ्नतनय यूपकेतु द्वारा मदनसुन्दरीका हरण )

श्रीरामदास उवाच

अथैकदा दक्षिणे हि शिवकाञ्च्यां महापुरि । कम्बुकण्ठो नृपः श्रीमान्निजकन्यास्वयंवरम् । १ ॥
कर्तुकामो नृपान्सर्वानाह्वयामास सादरम् । तदा ते पार्थिवाः सर्व पत्राणि हि पृथक् पृथक् ॥ २ ॥
एवंरैरमनुस्मृत्य कुशस्यापि लवस्य च । स्वयंवरे स्वीयमानभङ्गेनोद्वग्नहिस्थतम् । ३ ।
प्रैषयामासुर्नृपतिं न ययुश्च स्वयंवरम् । तेषां पत्राणि सर्वाणि कम्बुकण्ठो ददर्श सः । ४ ।
सर्वेषु लिखितस्त्वेक एवार्थस्तं वदाम्यहम् । यदि नायाति रामस्य बालकास्ते स्वयंवरे ॥ ५ ॥
वयं सर्वे तर्हि यामो जंबूद्वीपान्तरस्थिताः । तेषामेवमभिप्रायं ज्ञात्वा स नृपविस्तदा ॥ ६ ॥
न ममाह्वय श्रीराममाह्वयामास पार्थिवान् । स्वयं चापि स्मरन्नैवं तद्वृत्तं रामपुत्रयोः । ७ ॥


बालक सबेरे स्नान करके हवन, शिवअर्चन एवं गो ब्राह्मणोंकी पूजा कर १ थे, तब रामके पास जाते और वहाँ सीता तथा रामको प्रणाम करके दिव्य आसनपर बैठते थे ॥ ४५ ॥ ४६। उसी तरह उनकी स्त्रियां भी सबेरे स्नान और दुर्गापूजनसे निवृत्त होकर सीताके पास जातीं उन्ह प्रणाम करती और आज्ञा पाकर दिव्य आसनोंपर बैठती थीं, ४७ ॥ इसके बाद वे सब लोग गुरु वसिष्ठके मुखसे पुराणोंकी कथा सुन सुनकर अपने भवनोको जाया करत थे। दोपहरको रामके बुलानेपर साथ साथ जलपान तथा भोजन करत थे। उसी तरह उनकी स्त्रियाँ भी सीताके बुलानेपर सीताके यहाँ ही आकर जलपान तथा भोजन करती थीं ॥ ४८-१० ॥ कभी-कभी वे लोग राम और बहुतसे ब्राह्मणोको अपने यहाँ बुलाकर भोजन कराते थे ॥ ५१ इस तरह उन बन्धुओं और बालकोंके साथ सीता तथा राम बड़े सुखसे जीवन व्यतीत कर रहे थे। किसीके साथ कभी किसी तरहका झगड़ा नहीं होता था ॥ ५२ । इति श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयविरचित-भाषाटीकासहिते विवाहकाण्डे सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥

श्रीरामदास कहने लगे—एक समय दक्षिणकी शिवकाञ्चीपुरीमें वहाँके राजा कम्बुकण्ठने अपने कन्याका स्वयंवर करनेके विचारसे सब राजाओंके यहाँ निमन्त्रणपत्र भेजकर बुलवाया। किन्तु कुश-लवके कारण वे महाराज कम्बुकण्ठके यहाँ नहीं आये और एक-एक पत्र लिखकर भेज दिया। कम्बुकण्ठने एक-एक करके सब राजाओंका पत्र देखा ॥ १-४ ॥ उन सब पत्रोंमें एक ही चर्चा थी। वह यह कि यदि रामचन्द्रके लड़के तुम्हारे स्वयंवर न आय तो हम सब जम्बूद्वीपके राज तुम्हारे यहाँ आयगें-अन्यथा नहीं। राजा कम्बुकण्ठने उनके अभिप्राय समझकर रामचन्द्रजाके पास निमन्त्रण न भेजकर बाकी सब राजाओंको बुलाया। कम्बुकण्ठको स्वयं भी वह बात याद थाार्थीकि रामके पुत्रोंने चम्पिका और सुमतिके स्वयंवरमे

सर्गः ८ ] विवाहकाण्डम् १७३

सर्गः ८ ] विवाहकाण्डम् १७३

चण्डिकासुमतिपाणिग्रहणार्थं पुरातनम् । ततस्ते पार्थिवाः सर्वे श्वशुरस्य जिघांसवः ॥ ८ ॥ सप्तदीपाधिपस्याथ ययुः कान्तिपुरीं प्रति । अथ तां कम्बुकण्ठस्य कन्यां मदनसुन्दरीम् ॥ ९ ॥ प्रासादसंस्थितां दृष्ट्वा नारदः खात्समेययौ । सखीभिः सा मुनिं पूज्य विनयात्पुरतः स्थिता ॥ १० ॥ पप्रच्छ नारदं भक्त्या विनयानम्रा शनैः । कुतः समागतः स्वामिन् गम्यते क्वाधुना वद ॥ ११ ॥ भवतां दर्शनेनाद्य पवित्राऽहं परं गता, इति तस्या वचः श्रुत्वा किञ्चित् स्मित्वा मुनिस्तदा ॥ १२ ॥ तामाह बाले स्वलोकादागतोऽस्म्यधुना त्वहम् । अयोध्यायां गतश्चाद्य पुत्राणां तु पृथक् पृथक् ॥ १३ ॥ गेहे संभोक्तुकामोऽद्य निमन्त्रोऽस्मि विहायसा । एतस्मिन्नन्तरे कान्तिपुर्याः सैन्यानि वै बहि ॥ १४ ॥ दृष्ट्वा केषां हि सैन्यानि सन्तीति हृदि चिन्तितम् । ततः पाथमुखाच्छ्रुत्वा तत्र चात्र स्वयम्बरम् ॥ १५ ॥ तदा विनिश्चितं चित्ते मया रामः स्वयंवरे । अत्रैवास्ति ह्यागतश्च तत् पश्याम सबालकम् ॥ १६ ॥ नैवास्ति ह्यागतश्चेत् तर्हि यास्याम्यतः परम् । स्वयंवरे विना रामं न भविष्यति सान्द्रजम् ॥ १७ ॥ पश्याम्यथैवं तं राम वृथाऽग्रे गमनं मम । निश्चित्येत्थं समायातस्ततोऽदृष्ट्वा रघूत्तमम् ॥ १८ ॥ कथं रामो नागतोऽत्र चेति पृष्टा नृपा मया । नृपाभिप्रायमाकर्ण्य तदा खिन्नं मनो मम ॥ १९ ॥ सप्तद्वीपाधिपतिं रामं वधूबालकसंयुतम् । स्वयम्बरमनाहूय त्वत्पित्रा निश्चितं नृपैः ॥ २० ॥ अधुनाऽहं प्रगच्छामि साकेतञ्च रघूत्तमम् । मन्दभाग्याऽसि बाले त्वं स्नुषा राघवभूपतेः ॥ २१ ॥ यतो जाताऽसि नैवात्र विचित्रा कर्मणो गतिः । इत्युक्त्वा बालिकां पृष्ट्वा नारदो गन्तुमुद्यतः ॥ २२ ॥ ततः संप्राथयामास नारदं बालिका मुहुः । खिन्नचित्ताऽश्रुपूर्णाक्षी म्लानस्या स्फुरिताधरा ॥ २३ ॥ रोमांचिततनूर्मुग्धा गतार्थागद्गदस्वरा । येनाहं मुनिवर्यात्र स्नुषा धीराघवस्य च ॥ २४ ॥ भविष्यामि तथा कार्यं न्यथा त्वां शरणं गता । इत्युक्त्वा मुनिवर्यस्य पादयोः स्थाप्य सा शिरः ॥ २५ ॥ चकार करुणं बाला तदा तां मुनिरब्रवीत् । मा चिन्तां कुरु रम्भारु समुत्तिष्ठस्व बालिके ॥ २६ ॥

सबस वैर कर लिया ॥ ५-७ ॥ इसके अनन्तर जब सब राजाओने यह सुन लिया कि राम नहीं आयेंगे, तब वे कम्बुकण्ठके यहाँ पहुंचे । उधर कम्बुकण्ठकी कन्या मदनसुन्दरीको अट्टारीपर देखकर नारदजी आकाश-मार्गसे उतर आये । मदनसुन्दरीने सखियों के साथ आकर नारदकी पूजा की और उन मुनिके सामने जा बैठी ॥ ८-१० ॥ फिर भक्तिपूर्वक नारदसे पूछने लगा—स्वामिन् ! आप इस समय कहाँसे आ रहे हैं और अब कहाँ जायेंगे सो बताइए ॥ ११ ॥ आपके दर्शनसे मैं आज परम पवित्र हो गयी । इस प्रकार उसकी बात सुनी तो थोड़ा मुसकराकर नारद कहने लगे—हे बाले ! इस समय मैं स्वर्गलोकसे आ रहा हूँ और रामके सब पुत्रांके यहाँ अलग-अलग भोजन करनेके लिए अयोध्या जा रहा हूँ। आते समय मैंने कान्तिपुरी नगर के बाहर सेना देखी उसे देखकर मुझे बड़ा कौतूहल हुआ। रास्तेमें एक पथिकसे पूछनेपर ज्ञात हुआ कि यहाँ तुम्हारा स्वयंम्बर है तो यह सोचा कि जहाँ तक है, रामचन्द्रजी अपने बालकों समेत यहाँ अवश्य आये होंगे । चलो, वहीं ही दर्शन कर लूं। यह निश्चय करके मै यहाँ आया, किन्तु रामचन्द्रजीको नहीं देखा तो राजाओंस पूछा कि राम क्यों नहीं आये ? उन लोगोंने जो कारण बतलाया, उससे मेरा मन बहुत खिन्न हुआ ॥ १२-१९ ॥ सप्तद्वीपके अधिपति राम तथा उनके लड़कोंका न बुला सकनेका निश्चय करके ही तुम्हारे पिताने और-और राजाओंको बुलाया है ॥ २० ॥ अच्छा, अब मैं अयोध्यामें रामचन्द्रजीके पास जा रहा हूँ। हे बाले ! तुम अभागी हो, जो रामचन्द्रजी जैसे राजाकी पतोहू नहीं बन रही हो। कर्मकी भी बड़ी विचित्र गति होती है। ऐसा कह और कन्यासे पूछकर नारदजी जाने लगे। तब वह कन्या मदनसुन्दरी खिन्न मन, अन्सु भरी आँखों, म्लानमुख, काँपते हुए अधरो तथा रोमाञ्चित शरीर होकर गद्गद बाणीसे इस प्रकार विनय करती हुई कहने लगी—आप कोई ऐसी युक्ति करिए कि जिससे मैं उनकी ही पतोहू बनू । मैं आपकी शरणमें हूँ। ऐसा कहकर उसने अपना मस्तक मुनिराजके चरणोंमें रख दिया और रोने लगा। तब नारद मुनिने कहा-

३७४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ८

भविष्यसि त्वं रामस्य स्नुषा यत्नं करोम्यहम् । इत्युक्त्वा तां समाश्वास्य खमार्गेण मुनिर्ययौ ॥२७॥ एतस्मिन्नन्तरेऽथाऽऽयात्स्यन्दनं भूरिकेतनः । यूपकेतुर्नि... पश्यन्तमवतीर्याऽथायौ ॥२८॥ किञ्चित्सैन्ययुतो बालस्तमटव्यां दिदृक्षुः सः । यावन्सन्ध्याटिकं कर्तुमृषिविष्टस्तदा मुनिम् ॥२९॥ ददर्श नारदं नत्वा पूजयामास सादरम् । ततः पप्रच्छ मुनये यूपकेतुः पुरःस्थितः ॥३०॥ कुतः समागतं चेति सन्तुल्या नारदो मुनिः । सर्वं वृत्तं सविस्तारं कथयामास बालकम् ॥३१॥ तच्छ्रुत्वा सकलं वृत्तं नत्वा तं नारदं मुनिम् । अत्रायं क्रोलको वाक्यं सक्रोधः संभ्रमान्वितः ॥३२॥ मुने नृपाणां सर्वेषां द्वेषबुद्धिञ्च राघवे । वा अज्ञा माऽद्य सर्वेषां कुंभाण्डमयंकेणे जवात् ॥३३॥ कमुकटादिभूपानां सारं पश्याक्यहं रणे । मुने त्वत्कृपया सर्वान् जित्वानापामयाक्यहम् । ३४॥ इत्युच्यन्वा स ययौ कान्ति पञ्चमेऽहनि सेनया । नारदोऽपि ययौ रामं द्रष्टु प्रीतमनाम्तदा ॥३५॥ रामेण पूजितः प्रेम्णा भोजनार्थं निमन्त्रितः । अथ भोजनवेलायां यूपकेतुं रघूत्तमः ॥३६॥ अदृष्ट्वा लक्ष्मणं प्राह यूपकेतुर्न दृश्यते । बालेषु च भोजनार्थे लक्ष्मणात्र समाह्वय । ३७॥ तदा समालतीं गत्वा पप्रच्छ लक्ष्मणो जवात् । सा प्राह वनमध्येऽद्य किञ्चित्सैन्ययुतो गतः । ३८॥ श्रुत्वैतद्यथावत्स गत्वा रामं जगाद ह । अथ रामो भोजनादि सपाद्य मुनिना मुदा ॥३९॥ ययौ सभागयासीनस्तं मुनिं वाक्यमब्रवीत् । पञ्चप्रकृतिनान्यत्र स्थेयं मद्वचनान्मया ॥४०॥ तथेति नारदः प्राह सभायां संस्थितः सुखम् । अथ रात्रौ यूपकेतुमदृष्ट्वा रघुनन्दनः ॥४१॥ उपाहारं कृतुकामः पुनर्लक्ष्मणमब्रवीत् । आकारय यूपकेतुं मायं दृष्टो मया शिशुः ॥४२॥ तथेति रामवचनात्पुनर्गत्वा तु मालतीम् । पप्रच्छ यूपकेतुं म सा प्राह नागतस्त्विति ॥४३॥ स्वतः स विह्वलो भूत्वा रामं वृत्तं न्यवेदयत् । रामोऽपि नागतं श्रुत्वा बभूवार्त्ता विह्वलोऽभवत् ॥४४॥

हे ... ! तुम किसी प्रकार की चिन्ता न करो, उठो ॥ २१-२७ ॥ तुम अवश्य रामकी पतोहू बनोगी । मैं इसके लिए उद्योग करूँगा - ऐसा कह और उसे इस तरह बंधाकर नारदजी आकाशमार्गसे चल दिये ॥ २७ ॥ इसी समय यूपकेतु रथपर बैठकर अटवी में निन्द्रेय और राहुल के पत्तोंको देखते हुए तमसा नदीके किनारे पहुंचे । २८ ॥ उस समय यावत्-पो सन् उन्मत्त मद्य थे । उसके साथ भृत्योंने तालाबमे स्नान किया और सन्ध्यावन्दन करनेको बैठे थे कि वि. नारदजी को देखा । तब उनको प्रणाम करके सादर पूजन किया । इसके बाद नारद मुनिने विस्तारपूर्वक उस कन्या मदनमुग्धा का सारा वृत्तान्त कहा। उसे सुनकर क्रोध और घबराहटसे पूर्ण होकर यूपकेतुने कहा - "हे देवर्षि मुने ! इस समय जो सब राजे रामसे द्वेषबुद्धि रखते हैं, वह उनके लिए अगोचरिणी विड होगी । ३३ ॥ कम्बुकण्ठ आदि राजाओका बल में संग्रामभूमिम पहुँचकर देखता हूँ। हे मुनिवर ! मैं आपकी कृपासे उन सबको बांधकर मदोन्मत्तीको लिये आता हूँ । ३४ ॥ ऐसा कहकर यूपकेतु अपनी सेनाके साथ पांचवें दिन कान्तिपुरीमें पहुंचे और नारदजी प्रसन्नतापूर्वक रामका दर्शन करनेके लिए अयोध्या चले गये । ३५ ॥ वहाँ पहुँचनेपर रामने प्रेमसे नारदजीका पूजन करके भोजनका निमन्त्रण दिया । जब भोजनका समय हुआ, तब यूपकेतुको न देखकर रामने लक्ष्मणसे कहा कि इस समय यूपकेतु नहीं दिखायी देता । हे लक्ष्मण ! और-और बालकोंके साथ उसे भी भोजन करनेके लिए बुलाओ ॥ ३६ ॥ ३७ ॥ रामके आज्ञानुसार लक्ष्मण मालतीके पास पहुंचे और यूपकेतुको पूछा । उसने कहा कि वे अपने साथ थोड़ी-सी सेना लेकर वनको गये हैं ॥ ३८ ॥ यह वृत्तान्त लक्ष्मणने जाकर रामको सुना दिया । तत्पश्चात् मुनिके साथ राम भोजन आदि करके अपने सभाभवनमें गये और वहाँ बैठकर नारद मुनिसे कहने लगे कि आप मेरे कहनेसे पाँच-सात दिन यहीं ही ठहर जाइये । 'तथास्तु' कहकर नारदजी भी ठहर गये । तदनन्तर भोजनके समय रात्रिमें भी यूपकेतुको न देखकर रामने लक्ष्मणसे कहा- यूपकेतुको बुलाओ। आज मैंने दिनभर उस बच्चेको नहीं देख पाया है । ३६-४२ ॥ 'बहुत अच्छा' कहकर लक्ष्मण फिर मालतीके पास गये और यूपकेतुको पूछा उसने कहा कि वे अभी तक

सर्गः ८ ] विवाहकाण्डम् १७५


हतः सा जानकी श्रुत्वा विह्वला क्षिप्तमानसा । दुद्राव राघवप्रेग्ने मा मद्ये तूष्णीं कथं स्थिताः ॥४५॥
इति तान् प्राह वैदेही तदा सर्वेऽनितिष्ठिताः । त्यक्त्वोपादाशनं वेगेन मन्तोद्यर्थे ममूद्यताः । ४६।
तदा तान्विह्वलान्दृष्ट्वा नारदः प्राह राधवम् कांतिश्च यूपकेतोः प्रयाणादिप्रसादरात् ॥४७॥
हास्यं राघवः धृत्वा किञ्चित्प्रत्ययमाददा लक्ष्मणं प्राह वेगेन शत्रुघ्नोऽथैः मऋतु । ४८
सेनया चतुरङ्गिण्या उवन्कांतिं द्रुतादिभिः मथेति लक्ष्मणाथोत्क्त्वा याग्राहागनिपाय सः॥ ४९॥
सेनया बालकंवंगारुहलूनं प्रैषयन्निति । शर्म नन्त्राऽथ शत्रुघ्नः शीघ्रं स्यन्दनमस्थितः ॥५०।
ययौ कांतिसमीपं स षष्ठेऽहनि मुदान्वितः एतस्मिन्नन्तरे कांतिपुर्यां तत्र स्वयंवरे । ५१॥
सभायां राजशार्दूलाः मस्थितास्ते मुदान्विताः । अथ सा शिविकामारु ह्यययौ मदनसुन्दरी । ५२॥
किञ्चिन्म्लानमुखी दुःखामस्मरन्ती नारदेरितम् । वृद्धोघवाता तां सर्वान् दर्शयामास पार्थिवान् ॥५३॥
यूपकेतुस्तदा वेगाद्गत्वा तूणीं सभांगणम् । मोहन स्त्रं विमुच्याथ मोहयामास तां सभाम् ॥५४॥
मोहितैर्मोहनास्त्रेण न्यस्तां तद्वाहकैर्भुवि । रथेन शिविकां गत्वा धृत्वा मदनसुन्दरीम् ॥५५॥
निजाभिधानं मथाऽथ तां तुष्टासकंगमद । अथ सा त्रपयामास वीर मदनसुन्दरी । ५६।
सुमोच मालो तन्कण्ठे नवरत्नमयीं शुभाम् । ततः स यूपकेतुहि रथे मदनमन्दरीम् ५७॥
निवेश्य कांतिपुर्याः सच वेगेन्यो स्थितोऽभवत् । नापाह द्य.तंतं वीरसुन्दरीं त्वं भयं त्यज । ५८।
जित्वा सर्वान्नृपानद्य मया गच्छाम्यहं पुरि तत्तस्य वचनं श्रुत्वा सा प्राह वचनं तदा । ५९।
वहवः सन्ति राजानस्त्वमेकः स्वल्पसेनया । असंख्यव्रातानि सैन्यानि तेषां पश्य समन्ततः ॥६०॥
कथ युद्धं भवेत्तत्र मा कुरुष्वद्य मंगरम् शीघ्रं मां नय स.फेन ततो रामेण सेनया । ६१।


गङ्गीलौटे ॥ ४३ ॥ यह सुन लक्ष्मण हँसकर हाथ थामकर वचन कहा। जब रामने यह सुना तो ज्ञातानों के साथ-साथ वे भी विह्वल हो उठे ॥ ४४ ॥ जानकीने सुन सा०ह्रै भी विह्वल तथा क्षिप्त होकर दौड़ती हुई रामके पास पहुंची और कहा कि आप लोग यूपकेतुका अशुभिन्वत देखकर भी चुपचाप बैठे हैं ? ॥ ४५ ॥ यह सुनकर सब लोग घबड़ा उठे और भोजन त्यागकर तुरंत उसका तैयारी कर दिये ॥ ४६ ॥ इस प्रकार सबको व्याकुल देखकर नारदजन रदन सहितराक्षस वृत्त यंत बतलाया और यूपकेतुके प्रस्थानकी भी बात कह सुनाई ॥ ४७ ॥ यह हास्य सुना ता रामको थोरा सन्तान हुआ और तुरंत लक्ष्मणको आज्ञा दी कि सग चतुरङ्गिणी सेना लेकर शत्रुघ्न अभी कांतिपुरी जायं । "बहुत अच्छा' कहकर लक्ष्मणने भोजन आदि करवाकर राजन ह् सेना और कुछ अरि वीर बालकोंके साथ शत्रुघ्नको कांतिपुरी भेजा रामको प्रणाम करके शत्रुघ्न रथपर सवार हुए और प्रसन्नता पूर्वक प्रस्थान कर दिये ॥ ४८-५० ॥ इस तरह अयोध्यासे चलकर छठे दिन शत्रुघ्न कांतिपुरीके पास पहुंच गये उधर कांतिपुरीमें स्वयंवर हो रहा था ॥ ५१ ॥ सभा मण्डपमें बहुतस राज हर्षपूर्वक बठे हुए थे। इतनेम मदनसुन्दरी पालकीमं बैठी हुई सभामें आयी ॥ ५२ । उस समय वह दुःखस नारदका वानीका स्मरण कर रही थीं। इस कारण उसका मुख कुम्हलाया हुआ था। सभामें पहुंचकर वृद्धा वार्या न सब राजाओंको दिखलाया ॥ ५३ ॥ इसी समय वेगके साथ यूपकेतु सभाभवनमें पहुंचे और मोहनास्त्रका प्रयोग करके उन्होंने सारी सभाको मूच्छित कर दिया । ५४ ॥ महनास्त्रसे मोहित होकर शिविकावाहकोने भी शिविका जमीनपर रख दी । इतनेम रथपर बैठे हुए यूपकेतु शिविकाके पास पहुंचे और मदनसुन्दरीका हाथ पकड़कर अपना नाम बताया, जिससे वह बहुत प्रसन्न हुई और वीर यूपकेतु-के वरकर उसन उनके गलयं वह नवरत्नमयी वरमाळा डाल दी। सब प्रसन्न होकर यूपकेतुने मदनसुन्दरीको रथमें बिठा लिया ॥ ५५-५७ ॥ तब कान्तिपुरीसे बाहर निकलकर वे एक स्थानपर रुक गये । वहाँपर उन्होंने मदनसुन्दरीसे कहा कि अब तुम किसी प्रकारका भय न करो, ॥ ५८ ॥ मैं सब राजाओंको जीतकर तुम्हारे साथ अयोध्यापुरी चलूंगा । यूपकेतुकी बात सुनकर उसने कहा - ॥ ५९ ॥ ये राज बहुतसे हैं और युद्ध अकेले हें, तुम्हारे साथ सेना भी थोड़ी सी है और देखों न उनकी असंख्य सेना चारों ओर दबी हुई हैं ॥ ६० ॥

३७६आनन्दरामायणे[ सर्ग ८

युद्धं कुरु नृपैर्घोरैः शृणु मद्वचनं प्रभो । मा साहसं कुरुष्वात्रार्थये त्वां मुहुर्मुहुः ॥६२॥
इति तस्या वचः श्रुत्वा तामाश्वास्य पुनः पुनः । उपसंहारयामास मोहनास्त्रं स लीलया ॥६३॥
तदा ते पार्थिवाः सर्वे श्रुत्वान्योन्यं वधू छलन् । शत्रुघ्नतनयेनेति क्षोभात्स्वैः स्यन्दने स्थिताः ॥६४॥
निर्ययुः कोटिशो योद्धुं स्वस्वसेनायुता जवात् । चण्डिकायाः सुमन्त्राश्च पूर्ववैरेण दर्पिताः ॥६५॥
दृष्ट्वैनेमिमार्गेण ददृशुस्तं रथस्थितम् । युक्तं मदनसुन्दर्या बिभ्रतं मालिकां हृदि ॥६६॥
ततस्तं मुमुचुः सर्वे नानास्त्राणि सैनिकाः । यूपकेतुस्तदा वेगाद्गुणकृत्य महद्धनुः ॥६७॥
वायव्यास्त्रेण तत्सर्वानुद्धूय दशदिक्षु सः । प्रक्षिपत्पार्थिवान् सैन्यान्वाहनाग्र्यस्थितान् ॥६८॥
तदा स कंबुकण्ठोऽपि पूर्ववैरमनुस्मरन् । चण्डिकायाः सुमन्त्राश्च स्वयंवरसमुद्भवम् ॥६९॥
निमेषान्निजकन्याया वैभ्तो हरणं बलात् । महाक्रोधान्वितर्यद्यौ स स्वसैन्येन परिवेष्टितः ॥७०॥
कुर्वन् दुंदुभिनिर्घोषं युद्धार्थं यूपकेतुना । यूपकेतुरपि श्रुत्वा दुन्दुभीनां महन्स्वनम् ॥७१॥
कान्तिपुर्यूताद्द्वारपुरतः प्रस्थितो रथी । टङ्कृत्य महच्चापं सन्दधे शरमुत्तमम् ॥७२॥
ये ये वीराः पुरद्वारान्निर्गताश्च वहिः क्षणे । तान् जघान क्षणादेव प्रेतदुर्गं रुगोधमः ॥७३॥
तं दृष्ट्वा यूपकेतोश्च कंबुकण्ठः पराक्रमम् । ययौ स्वयं स्यन्दनेन प्रेतसंधं विदार्य च ॥७४॥
छेपसैन्येन संयुक्तो यूपकेतुं रुधा जगाद तदऽहं यूपकेतं म प्रथा म्वं मङ्गर कुरु ॥७५॥
किमेतान्मशकान् हत्वा पौरुषं मन्यसे जड । इत्युक्त्वा सप्तभिशार्यूपकेतुं जघान सः ॥७६॥
तान्बाणानागतान् दृष्ट्वा यूपकेतुर्निजैः शरैः । संछिन्त्वा नवबाणैस्तच्चापं सारथिनं ध्वजम् ॥७७॥
कवचं मुकुटं छित्वा जघान तुरगानपि पद्भ्यां तदा कंबुकण्ठो गदामादाय दुद्रुवे ॥७८॥

ऐसी अवस्था में युद्ध कैसे कराओगे ? आज तुम संग्राम न करो । मुझे शीघ्र अयोध्या पहुँचा दो और वहाँ से राम-चन्द्रजी की विशाल सेना लेकर आओ, तब युद्ध करो हे प्रभो ! ऐसा साहस इस समय करना ठीक नहीं है। मैं बार-बार यही विनती करती हूँ ॥६१। ६२। इस प्रकार मदनसुन्दरी का वचन सुनकर उन्होंने उसे आश्वासन दिया और मोहनास्त्र का संवरण कर लिया । ६३ ॥ जब उन राजाओं ने किसी के मुख से सुना कि शत्रुघ्न-के पुत्र यूपकेतुने मदनसुन्दरी का हरण किया है तो अपने-अपने रथों पर सवार हो-होकर बड़ी-बड़ी सेना लिये उसके साथ व लड़ने को निकल पड़े। एक तो चण्डेश और मन्त्रणाक्ष का ही वैर उन लोगों के मन में था, दूसरे अब मदनसुन्दरी के हरण से उनका क्रोध और भी अधिक हो गया ॥६४। ६५। फिर रथ या, शत्रु के रथके पहियाका रास्ता देखते हुए वे चले और थोड़ी ही दूर जाकर उन्होंने देखा कि यूपकेतु मदन-सुन्दरी के साथ बैठा है और उसके गले में वरमाला पड़ी हुई है ॥ ६६ ॥ देखते ही सब राजाओं ने एक साथ उस वीर बालक पर कितने ही शस्त्रोंका प्रहार कर दिया । तब यूपकेतु ने वेग के साथ अपने धनुष को टंकार किया । ६७ ॥ और वायव्य अस्त्र का प्रयोग करके इन सब राजाओं को रथ, वाहन तथा सेना समेत उठाकर दूर फेंक दिया ॥ ६८ । महाराज कम्बुकण्ठ भी पूर्वस्नेह को स्मरण करके विशेषकर उस समय चण्डिका अपनी कन्या का हरण देखकर अपनी सेना के साथ दुन्दुभिका युद्ध बजवाते हुए दुन्दुभी का घोष करते हुए निकले ॥६९। यूपकेतु ने भी जब दुंदुभीकी गर्जना सुनी तो कान्तीपुरके उनके द्वारपर पहुँचे और अपने धनुषका टंकार करके उसपर एक उत्तम बाणका संधान किया ॥ ६९-७२ । उस पुरद्वार से जो-जो योद्धा निकलते, उनको अपने बाणोंसे यूपकेतु बराबर मारते जाते थे । इतने थोड़े ही देर में वह द्वार मृतकों से भर गया । ७३ । इस तरह यूपकेतुका पराक्रम देखकर राजा कम्बुकण्ठ स्वयं अपने रथ पर सवार होकर उन शवों को चीरते हुए बड़ी वृद्ध सेना के साथ यूपकेतु के सामने जा पहुंचे और क्रोध में भरकर उन्होंने कहा-अब तू मेरे साथ संग्राम कर । ७४॥ ॥७५॥ अरे जड ! इन मच्छडोंको मारकर क्या तू अपने पौरुषको पौरुष मानता है ? ऐसा कहकर कम्बुकण्ठने सात बाणों से यूपकेतु पर प्रहार किया । ७६ ॥ उन बाणों को अपनी ओर आते देखकर यूपकेतुने अपने नौ बाणों से कम्बुकण्ठके बाणों, धनुष, सारथी, ध्वजा, कवच और मुकुट को काट डाला और घोड़ों को भी मार दिया । तब

सर्गः ८] विवाहकाण्डम् ३७७


तावन्महस्रधा बाणैर्यूपकेतुश्चकार ताम् । ततो बदध्वा दृढां मुष्टिं कम्बुकण्ठस्त्वरान्वितः ॥७९॥
हृदये यूपकेतोश्च जघानाचलसन्निभाम् । तदा स यूपकेतुस्त्वं श्वशुरं स्यन्दनोपरि । ८०।।
ध्वजे बबन्ध वेगेन खङ्गं जग्राह सम्भ्रमात् । कंबुकण्ठशिरश्छेदं कर्तुं तं समुपस्थितम् ॥ ८१॥
दृष्ट्वा धृत्वा करो तस्य सखड्गं सम्भ्रमान्विता । तमाह नत्वा माश्वश्रीमं तदा मदनसुन्दरी ॥८२॥
विह्वला विगतोत्साहा वेपती अश्रुलोचना । मम तातं कंबुकण्ठमंतं हंसि कथं प्रभो ॥८३॥
मक्षिकापतनं पूर्वं ग्रासे एतच्चया कृतम् । शुभारम्भे पूर्वमेव दुःस्वप्नंमिवलम्बिनम् ॥८४।
मद्वाक्याञ्चैव हंतव्यस्तन्ममत्वां प्रार्थयाम्यहम् । एवं मदनसुन्दर्या वचः श्रुत्वा विहस्य सः ॥८५॥
कराद्विमुच्य तं खङ्गं स्वसूतं चोदयन्मुदा । सेनया स ययौ यावत्त्वथाऽयोध्यां पुरीं प्रति ॥८६॥
तावद्दुन्दुभिनिर्घोषानग्रे शुश्राव सेनया । पुनश्चाथ दृढीकृप्य यूपकेतुस्तदा पथि ॥८७॥
कस्येयं वाहिनी चेति चिंतयामास चेतसि । ततः शरं सुमोचैकं निजनामांकितं वलात् ॥८८॥
योजनांतरसेनायां शरः शत्रुघ्नसन्निधौ । पपान तत्पदाग्रे तं दृष्ट्वा स चकितस्तदा ॥८९॥
शरपुच्छे यूपकेतोर्नाम दृष्ट्वाथ शत्रुहा । निश्चितवान्यूपकेतुर्मागेऽग्रे वर्तते ध्रुवम् ॥९०॥
ततश्चापे स शत्रुघ्नः स्वनाम कितमुत्तमम् शरं संधाय विमुञ्च यूपकेतुं सुमोच ह ॥९१॥
स शरो यूपकेतोश्च मम्नकादूर्ध्वतस्तदा । अपतत्पृष्ठभागे स तं ददर्श पितुः शरम् ॥९२॥
तदा हृष्टो यूपकेतुः कुर्वन्दुंदुभि निःस्वान् । गत्वा वेगेन शत्रुघ्नं दृष्ट्वोत्प्लुत्य रथादधः । ९३॥
ननाम पितरं पत्न्या कंबुकंठं प्रदर्शयन् । तदा तं सुहृद ज्ञात्वा मोचयामास शत्रुहा ॥९४॥
कंबुकंठमुखाच्छ्रुत्वा सर्वं वृत्तं सविस्तरम् । शत्रुघ्नः प्रापिनस्तेन सुहृदा तत्पुरो ययौ ॥९५॥


कम्बुकण्ठ पैदल ही गदा लेकर दौड़ पड़ा ॥ ७७ । ७८ ॥ यूपकेतुने अपने बाणोंसे उनकी गदाके भी हजार टुकड़े कर दिये । इसके बाद वह गदा फेंककर कटार घूंसा मारा । तब यूपकेतुने अपने ससुर कम्बुकण्ठको रथकी ध्वजामें बान्ध दिया और सिर काटनेके लिए वेगके साथ तलवार उठायी ॥ ७९-८१ ॥ इस तरह सिर काटना उद्यत एवं हाथमें खड्ग लिए यूपकेतुको देखकर मदनसुन्दरीने प्रणाम किया और आँखोंमें आँसू भरकर कहा - ॥ ८२ । हे प्रभो ! मेरे पिता कम्बुकण्ठको आप क्यों मारना चाहते हैं ? पहले ही ग्रासमें मक्खी गिर पड़नेके समान आपने शुभके स्थानमें इस दुःखदायी कर्मको क्यों अपनाया है ? ॥ ८३ ॥ ८४ । अतः मेरी बात मानकर इन्हें मत मारिए । मैं आपसे यही प्रार्थना करती हूँ। यह कहती हुई मदनसुन्दरी विह्वल हो गयी, उसका उन्माद नष्ट हो गया वा वह कांप रही थी और नेत्रोंमें आँसूकी धाराएँ बहाती जा रही थी । इस प्रकार मदनसुन्दरीकी बात सुनकर यूपकेतु मुसकराये और खड्ग फेंककर अपने सारथीको रथ चलानेका संकेत किया, वे अपनी सेनाके साथ अयोध्यापुरीकी ओर चले ही थे ॥ ८५ ॥ ८६ ॥ इतनेमें आगेसे दुन्दुभीका घोष सुनाई पड़ा । अब अपना धनुष सम्हालकर सोचने लगे कि आगेसे यह किसकी सेना आ रही है। यह सोचकर उन्होंने अपने नामसे अंकित एक बाण वेगपूर्वक छोड़ा ॥ ८७ ॥ ८८ ॥ वह बाण उड़ता हुआ एक योजन तक गया और जहाँ सेना पड़ी हुई थी, वहाँ पहुंचकर शत्रुघ्नके चरणोंके आगे गिरा । उस बाणको देखकर शत्रुघ्न चकित हो गये । ८९ ॥ फिर बाणके पुच्छमें यूपकेतुका नाम देखकर शत्रुघ्नने निश्चय किया कि यूपकेतु आगे रास्ते में ही हैं ॥ ९० ॥ तदनन्तर शत्रुघ्नने भी अपने नामसे अंकित एक बाण उठाकर यूपकेतुकी ओर छोड़ दिया ॥ ९१ ॥ वह बाण यूपकेतुके ऊपरसे होता हुआ पीछे जा गिरा । यूपकेतु-ने अपने पिताका बाण देखा ॥ ९२ । तब प्रसन्न होकर दुन्दुभि जैसा गर्जन करते हुए वेगके साथ शत्रुघ्न-के पास पहुंचे । वहाँ पिताको देखते ही वे रथसे कूद पड़े और अपनी स्त्री मदनसुन्दरीके साथ जाकर शत्रुघ्न-को प्रणाम किया और ध्वजामें बँधे हुए कम्बुकण्ठको दिखाया । शत्रुघ्नने उन्हें अपना सम्बन्धी समझकर छुड़ा दिया ॥९३॥९४। फिर शत्रुघ्नने कम्बुकण्ठके मुखसे ही विस्तारके साथ समस्त वृत्तान्त सुना । इसके बाद कम्बुकण्ठके

३७८आनन्दरामायणे[ सर्गः ९

कांतिपुर्यां बहिः स्थित्वा कंबुकंठमतेन सः । आकारणार्थं रामाय रामं दूतान्प्रचोदयत् ॥५६॥
तदा ते कंबुकंठस्य शत्रुघ्नस्यापि वेगतः आकारणार्थं श्रीराम ययुर्द्ता मुदान्विताः ॥५७॥
इति श्रीशतकोटिरामचरितांतर्गते श्रीमदानन्दरामायणे विवाहकाण्डे मदनसुन्दरीहरणं नामाष्टमः सर्गः । ८ ॥


नवमः सर्गः

(रामका वंशविस्तार)

श्रीरामदास उवाच
गत्वाऽयोध्यापुरीं दूता रामं वृत्तं न्यवेदयन् । रामोऽपि श्रुत्वा तद्वृत्तं सीतायै संन्यवेदयत् ॥ १ ॥
ततो मुहूर्ते श्रीरामः सावरोधोऽनुजैः सह । पौरैर्जानपदैः सर्वैः सुहृद्भिः सेनया सह ॥ २ ॥
नारदेन ययौ कान्तिमार्यां मुक्तिपुरीं प्रति । ततः श्रुत्वा कंबुकंठः शीघ्रं गन्धर्वमागतम् ॥ ३ ॥
स प्रत्युद्गम्य विनयान्नत्वा संपूज्यत्समुदा । यूपकेतुं ततः पूज्य वरञ्चाध्वं पुरीं शनैः ॥ ४ ॥
वारस्त्रीनृत्यगीतैश्च तूर्यघोषैर्निनाय सः । ततः कान्तिपुरीस्थान्नाः स्त्रियः प्रासादमस्थिताः ॥ ५ ॥
दृष्ट्वा रामं यूपकेतुं ववर्षुः पुष्पवृष्टिभिः । ततो रामः शनैर्हस्त्युं कन्पिनं गृहमुत्तमम् ॥ ६ ॥
गत्वा दृष्ट्वा मुहूर्ते तु पूर्वोक्तकौतुकैः सुखम् । यूपकेतोर्विवाहं स चकार महोत्सवैः ॥ ७ ॥
ततो विवाहं निर्वर्त्य कंबुकंठन पूजिताः । हस्त्यश्वरथपादातदासदासीजनादिभिः ॥ ८ ॥
ययौ मदनसुन्दर्या रामोऽयोध्यापुरीं विजाप् । ततो विवेश नागरी नेदुर्वादित्राणि वै तदा ॥ ९ ॥
मङ्गलुवारनार्यश्च तुष्टुवुर्मागधादयः । प्रासादस्थाः स्त्रियो रामं ववर्षुः पुष्पवृष्टिभिः ॥ १० ॥
मार्गे नीराजितः स्त्रीभिर्विवेश निजमन्दिरम् । कारयित्वा रमापूजां ददौ दानान्यनेकशः ॥ ११ ॥
सुहृदः पूजयमास राघवो वस्त्रादिभिः । ततो विसर्जयामास सर्वान्वस्वस्थल प्रति ॥ १२ ॥


प्रार्थना करनेपर उनके साथ ही कांतिपुरी गये ॥ ५५ ॥ वहाँ कम्बुकण्ठकी सलाहसे शत्रुघ्न नगरके बाहर ही ठहरे और रामको बुलानेके लिए दूतोंको भेजा ॥ ५६ ॥ उसी समय शत्रुघ्न तथा कम्बुकण्ठके दूत श्रीरामको बुलानेके लिए प्रसन्नतापूर्वक चल पड़े ॥ ५७ ॥ इति श्रीशतकोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे पं० रामतेजपाण्डेयविरचित'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासहिते विवाहकाण्डे अष्टमः सर्गः ॥ ८ ॥

श्रीरामदास कहने लगे वे दूत अयोध्यापुरीमें पहुंचे और रामको कान्तिपुरीका सब हाल कह सुनाया। सो सुनकर रामने सीतासे कहा ॥ १ ॥ इसके पश्चात् अच्छे मुहूर्त्तमें राम अपने अन्तःपुरकी नारियों, पुरवासियों, जनपदवासियों, समस्त सम्बन्धियों, नारद तथा सेनाके साथ आदिकुन्तिपुरी अर्थात् कांतिपुरीको चल पड़े। जब कम्बुकण्ठने सुना कि रामचन्द्र पुरके निकट आ पहुंचे हैं, तब आदरपूर्वक स्वागत करने गये। यहाँ पहुंचकर सविनय प्रणाम किया। इसके अनन्तर राम तथा यूपकेतुका पूजन करके हाथीपर बिठाकर धीरे-धीरे पुरोको चले ॥ २-४ ॥ रास्तेमें वेश्याएँ नाचती गाती थीं और दुन्दुभी आदि विविध प्रकारके बाजे बज रहे थे। उधर जब नगरकी स्त्रियोंने आते देखा तो राम और यूपकेतुपर पुष्पवृष्टि करने लगीं। तत्पश्चात् राम जनवासेमें पहुंचे ॥ ५-६ ॥ वहाँ अच्छा मुहूर्त्त देखकर पूर्वोक्त कौतुकोंके साथ बड़े उत्साहसे यूपकेतुका विवाह किया ॥ ७ ॥ विवाहकी सब रीतियाँ पूरी हो जानेपर कम्बुकण्ठसे पूजित होकर कितने ही हाथी, घोड़े, रथ, पैदल सेना, दास-दासी आदिके साथ मदनसुन्दरीको लेकर अपनी अयोध्यापुरीको चल दिये। सन्तोषकाक पार पहुंचकर व अपनी नगरी में घुसे तो विविध प्रकारके बाजे बजने लगे ॥ ८ ॥ ९ ॥ वेश्याएँ नाचने लगीं और मागध बन्दीजन स्तुति करने लगे। नगरवासिनी महिलाएँ अट्टालिकाओंपर चढ़-चढ़कर रामपर फूल बरसाने लगीं और कुछ स्त्रियाँ मार्गमें आरती उतारने लगीं। इस उत्साहसे राम अपने महल गये। वहाँ उन्होंने लक्ष्मीकी पूजा की और अनेक प्रकारके दान दिये ॥ १० ॥ ११ ॥ इसके अनंतर निमंत्रणमें आये हुए

सर्गः ९ ] विवाहकाण्डम् १७९

सर्गः ९ ] विवाहकाण्डम् १७९

अथ सप्त कुमारांश्च लवाद्याः स्वस्ववेश्मनि । पत्न्यः क्रीडां पृथक् सौख्यां कुर्वन्प्रियाऽकरोत् ॥१३॥ चंपिकायां दुहितरः कुशजाताः शुभा नव । कुशस्याग्रे कुमुद्वत्यां भविष्यंस्त्वष्ट सूनवः ॥१४॥ भविष्यति नृपा कन्या ज्येष्ठा चंपकमालिनी । कुशेन्द्रः कुशलोचेति विश्रुतिं नाम्ना राज्यं करिष्यति ॥१५॥ चतुर्दश सुमात्याद्याः स्त्रियः सर्वाः क्रमेण हि । सुषुवुस्तनयानष्ट कन्येकाऽपि पृथक् पृथक् ॥१६॥ स द्वादशशतं पौत्रान्पौत्रीश्चैव मनोरमाः । त्रयस्त्रिंशद्रामचन्द्रो लालयामास सीतया ॥१७॥ कुमुद्वतीभाविसुपुत्रसहिताः शिशवः शुभाः । विंशच्छामावसने तथा षोडशचण्डिकास्तथाः ॥१८॥ बहूविद्यन्निताश्रासन समाश्लेषाद्विते नृपैः तथा श्भागम्पौत्रैश्च नृपकन्या अनेकशः ॥१९॥ काश्चित्स्वयंवरैरेव काश्चिद्राक्षसयोगतः । काश्चिद्गान्धर्वयोगेन काश्चिद्देवैस्तुकर्मणा ॥२०॥ परिणीताः पौरुषेण तासां संख्या न विद्यते । तासां हि संततिं वक्तुं कः समर्थो भवेदिह ॥२१॥ एवं स युपकेतोश्च विवाहश्चम. शुभः । सपद्य नारदः श्रीयामश्चभार्यां रघुनन्दनम् ॥२२॥ रामनामसहस्रेण संगीतैनानभालकृतः । मुक्त्वा अगत्य पृष्टा ययावाकाशवर्त्मना ॥२३॥ श्रीरामदास उवाच एवं रामण साकेतपुर्यां भोगाश्चिरं सुखम् । भुक्तास्तेषां वर्णनेऽद्य कः समर्थो भवेन्नरः ॥२४॥ एक एव समर्थोऽभूद्वाल्मीकिस्तपसां निधिः । शतकोटिमितं येन नानालीकादिभिर्युतम् ॥२५॥ वर्णितं रामचरितं महामंगलकारकम् । यत्स्मृत्याऽपि मया किंचिच्छ्रेयो वर्णितम् ॥२६॥ एव समस्त्र्यवस्थाया पुतैः पौत्रैः समन्त्रितः । प्रपौत्रै पौत्रपौत्रैश्च रञ्जयामास जानकीम् ॥२७॥ एवं विवाहकाण्डं च शिष्य मया परिवर्णितम् । समग्रं पवित्रं च श्रवणान्मंगलप्रदम् ॥२८॥ विवाहकाण्डं परमं ये शृण्वन्तीह मानवाः । न तेषांभः पुत्रपौत्रैश्च वियोग नाप्नुवंति हि ॥२९॥

सम्पादियोंका धन आदि देकर पूजा की और स्वेच्छा अपने घर जानेकी अनुमति दी ॥१२॥ इसके बाद लव आदि सातो भाई अपना-अपना स्त्रियोंके साथ अपने-अपने महलमें विहार करने लगे और कुश अपनी स्त्री चम्पिकाके साथ केलि करने लगे ॥१३॥ इस तरह कुश प्रिया चम्पाके द्वारा चम्पिकानाम नौ कन्यायें उत्पन्न कीं। कुमुद्वतीसे आठ पुत्र और चम्पकमालिनी नामक एक पुत्रीका सादृश्य उत्पन्न होगी। कुशका सबसे बड़ा पुत्र अतिथि अयोध्याका राज्य करेगा ॥१४।१५॥ इसके सिवाय सुमति आदि चौदह स्त्रियोंने क्रमशः आठ-आठ पुत्र और एक-एक कन्यायें उत्पन्न कीं ॥१६॥ इस तरह राम सीताके साथ बारह सौ पौत्रों तथा तैंतीस सुंदर पौत्रियोंका प्रतिपालन करने लगे ॥१७॥ इस प्रकार कुमुद्वतीके भावी पुत्रो पौत्रांको भी मिलाकर बीस सौ पौत्र और चौबीस पौत्रियां हुईं ॥१८॥ जिनको रामने अच्छे-अच्छे राजाओंके साथ विवाह कर दिया और रामके पौत्रोंका विवाह जनक राजकुमात्रियोंके साथ हुआ ॥१९॥ उससमय कुछ कुमारियां स्वयंवरसे आयीं, कुछ राक्षसविवाहसे, तथा कुछ गान्धर्वविवाहसे विवाहमें आयी और उनका शुभ विवाहसम्बन्ध हुआ ॥२०॥ इसके सिवाय पौत्रोंके गुणवान पुत्रादि मणिकूट नामक महलोंमें आयीं, जिनकी कोई संख्या ही नहीं है। ऐसी स्थितिमें उनका सन्तानोका कौन गिन सकता है ॥२१॥ इस प्रकार यूथकेतुका अन्तिम शुभ विवाह सम्पन्न हो जानेपर नारदने समाप्त सुनकर फिर रामचन्द्रनामसे युक्त प्रीतिपूर्वक रामकी स्तुति करके जानेकी आज्ञा मांग ली और आकाशमार्गसे चले गये ॥२२।२३॥ श्रीरामदासने कहा- इस तरह रामने बहुत समय तक सुख भोगा, उसका वर्णन करनेमें कोई भी प्राणी समर्थ नहीं हो सकता ॥२४॥ बस एकमात्र तपस्वी वाल्मीकिजी इसके वर्णनमें समर्थ हुए थे जिन्होंने सौ करोड़ श्लोकोंमें नाना प्रकारकी कथाओं सहित रामचरित्रका वर्णन किया। यह रामचरित परम मङ्गलात्मक है। इसका स्मरण करके ही मैं तुम्हारे समक्ष कुछ कहनेमें समर्थ हुआ हूँ ॥२५।२६॥ इस प्रकार राम अपनी वयोवृद्धावस्था में पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र एवं प्रपौत्राके पुत्रोंके साथ रहते हुए सीताको आह्लादित करते रहे ॥२७॥ हे शिष्य ! इस तरह मैने नौ सर्गयुक्त पवित्र विवाहकाण्डका वर्णन किया, जो सुननेमें सर्वथा मङ्गलदायक है ॥२८॥

३८० आनन्दरामायणे [सर्गः ९

धर्मार्थी प्राप्नुयाद्धर्मं धनार्थी धनमाप्नुयात् । कामनार्थी लभेत् कामान् मोक्षार्थी मोक्षमाप्नुयात् ॥ ३०॥ स्त्रीकामुकैरयं नित्यं पठनार्थं प्रयत्नतः । विवाहकाण्डं परमं प्राप्नुयुश्चात्र ते वधूः ॥ ३१॥ पतिकाम्या कुमारी चेच्छृणुयाद्भक्तिभाविता । विवाहकाण्डमेतद्वै मनोज्ञं पतिमाप्नुयात् ॥ ३२॥ ममार्थं यः पठेदेतच्छृणुयाद्वाऽथ भक्तितः । इह स्त्रिया सुखं भुक्त्वाऽप्सरोगोष्ठ्या दिवि मोदते ॥ ३३॥ सधवा शृणुयादेतद्या नारी कांतमुत्तमम् । विवाहकाण्डं कुत्रचित्तं वियोगं नाप्नुयात्तु सा ॥ ३४॥ सप्तदशदिनैरस्य कार्यं स्त्रीकामुकैर्मुहुः । अनुष्ठानं वर्षमेकं शृण्वन्नपि स्त्रियमाप्नुयात् ॥ ३५॥ प्रथमे दिवसे सर्गं पठेद्द्वाँ च परschemaऽहनि । त्रयमेव दिने सर्गान्क्रमेण संपठेन्नव ॥ ३६॥ दशमे दिवसेऽष्टैव ह्येकमेकेन वै क्रमात् । एवं सप्तदशाद्दिनैरनुष्ठानं स्मृतं बुधैः ॥ ३७॥ अथवा सकलं काण्डं प्रथमे दिवसे पठेत् । परेऽह्नि द्विगुणं हि नवमे दिवसे क्रमात् ॥ ३८॥ नववारं पठेतच्चेद् दशमे दिवसे ततः । अष्टवारं पठेत्तावद् ह्ययमेकेन क्रमान्नृपः ॥ ३९॥ एवं नरो वर्षमेकमुणुनानांस्त्रियं लभेत् । विमलबक्त्रां च सुनासां दिव्यरूपों मनोहराम् ॥ ४०॥ विवाहकाण्डं परमं पवित्रमानन्ददं मङ्गलकारकं च । स्त्रीदं मनोज्ञं श्रुतिसौख्यदं वै नरैः सदा सश्रवणीयंमेतत् ॥ ४१॥ आनन्दरामायणमध्यसंस्थं विवाहकांडं परमं हि रम्यम् । शृण्वंति भक्त्या भुवि मानवास्ते लभन्ति कामानखिलान्मनोऽज्ञान् ॥ ४२॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य श्रीमदानन्दरामायणे विवाहकाण्डे राज्यवर्णनो नाम नवमः सर्गः ॥ ९॥ विवाहकाण्डस्य सर्वानन्दरामायण सर्वज्ञ ज्ञायतय । पञ्चशताष्ट संख्या श्लोकाश्चाप्युत्थिनाः ॥ १ ॥

जो मनुष्य विवाहकाण्डका श्रवण करते हैं, वे अपना गया हुआ पुत्र, धन व कार्य में निपुण नेहा ज्ञान ॥ २९ ॥ इसका सुननेसे धर्मार्थी धर्मको, धनार्थी धनको, काम कामको और मोक्षार्थी मोक्षको प्राप्त करता है ॥ ३० ॥ जो लोग स्त्रीकी इच्छा रखते हों, उन्हें चाहिये कि निरन्तर इस विवाहकाण्डका पाठ किया करें। इससे उन्हें स्त्री अवश्य प्राप्त होगी ॥ ३१ ॥ अच्छे पतिकी कामना इच्छा रखनेवाली कुमारी यदि भक्तिपूर्वक इस काण्डको सुने तो सुन्दर पति पावेगी ॥ ३२ ॥ जो सम्यक् रूप मनुष्य इस काण्डको पढ़ता या सुनता है सो वह इस जन्ममें स्त्रीके साथ सुख भोगकर स्वर्गमें अप्सराओके साथ विहार करता है ॥ जो सधवा नारी इस काण्डको सुनती है वह कभी पतिवियोगका दुःख नहीं पाती । जो लोग स्त्री चाहते हों वे सत्रह दिनमें इस आवृत्तिके क्रमसे एक वर्ष पर्य्यन्त अनुष्ठान करें ऐसा करनेसे मूढ मानव भी स्त्री प्राप्त कर सकता है ॥ ३३-३५ ॥ उसका क्रम इस तरह है- पहिले दिन एक सर्ग, दूसरे दिन दो सर्ग तीसरे दिन तीन सर्ग इस क्रमसे नवें दिन नौ सर्गोंका पाठ करे। फिर दसवें दिन आठ सर्ग और ग्यारहवें दिन सात सर्ग इस एक-एक घटाता हुआ सत्रह दिनमें पूर्ण करे। विद्वा- नोंने यही अनुष्ठानकी विधि बतलाई है ॥ ३६ ॥ ३७ ॥ अथवा बन पड़े तो पहिले रोज विवाहकाण्डका एक बार पाठ कर जाय, दूसरे रोज दो बार, तीसरे रोज तीन बार, इस रीतिसे बढ़ाता हुआ नवमें दिन नौ बार इस काण्डका पाठ करे और ग्यारहवें रोज सात बार इस विधानसे घटाता हुआ सत्रहवें दिन केवल एक बार पाठ करे ॥ ३८ ॥ ३९ ॥ इस तरह एक वर्ष तक अनुष्ठान करनेसे वह चन्द्रमाके मुखी, अच्छी नासिका और दिव्य रूपवाली मनोहर स्त्री पाते हैं ॥ ४० ॥ लोगोंको चाहिए कि इस परम पवित्र, आनन्ददायक, द्युतिसुखदायी तथा आनन्द देनेवाल विवाहकाण्डको नित्य पढ़कर ॥ ४१ ॥ आनन्दरामायणके अन्तर्गत इस छरे विवाहकाण्डको जो मनुष्य भक्तिपूर्वक सुनते हैं वे अपनी सब कामनाओंको प्राप्त कर लेते हैं ॥ ४२ ॥ इति श्रीम- त्काशिनाथचरणकमलार्त्त श्रीमदानन्दरामायण वाङ्मयकार्यं... रामतेजपाण्डेयविरचित ज्योत्स्ना भाषाटीका- सहिते विवाहकाण्डे नवमः सर्गः ॥ ९ ॥ इस विवाहकाण्डमें कुल नौ सर्ग हैं और उनमें पाँच सौ दस मा श्लोक कह गये हैं ॥ १ ॥ इति श्रीमदानन्दरामायणे विवाहकाण्डं समाप्तम् ।

श्रीसीतापतये नमः

श्रीवाल्मीकिमहामुनिकृतशतकोटिरामचरितान्तर्गत-

आनन्दरामायणम्

'ज्योत्स्ना'ऽभिधया भाषाटीकयाऽलंकृतम्

राज्यकाण्डम् (पूर्वार्द्धम्)

प्रथमः सर्गः

( रामसहस्रनाम )

विष्णुदास उवाच

रामदास गुरो प्रोक्तं त्वया पूर्वं ममांतिके । विवाहकाण्डचरमसर्गेऽत्र पातकापहे ॥ १ ॥
रामनामसहस्रेण नारदेन महात्मना । सूर्यलोके सभायां स रामचन्द्रः स्तुतस्त्विति ॥ २ ॥
तत्कीदृशं रामनामसहस्रं मां प्रकाशय । कथं सूतेन कथितं मुनीनामग्रतः पुरा ॥ ३ ॥

श्रीरामदास उवाच

सम्यक्पृष्टं त्वया शिष्य सावधानेमनाः शृणु । रामनामसहस्रं च सुश्लोकं प्रवदामि ते ॥ ४ ॥
यथा त्वया कृतः प्रश्नः शौनकेन तथा कृतः । सूतः प्राह तदाकर्ण्य शौनक नैमिषे वने ॥ ५ ॥

श्रीसूत उवाच

एकदा सुखमासीनौ पार्वतीपरमेश्वरौ । अन्योन्याश्लिष्टहृद्वाहू लोकरक्षणतत्परौ ॥ ६ ॥
इन्द्रादिलोकपालैश्च सेवितौ च परात्परौ । पार्वती परिपप्रच्छ तदा धर्माननुक्रमात् ॥ ७ ॥

पार्वत्युवाच

मन्नाथ जगतो नाथ सर्वज्ञ परमेश्वर । त्वत्प्रसादान्मया ज्ञातं धर्मशास्त्रमनुत्तमम् ॥ ८ ॥
प्रायश्चित्तं तु पापानां श्रुतं सर्वमशेषतः । ब्रह्महत्यादिपापानां निष्कृतिं वक्तुमर्हसि ॥ ९ ॥


विष्णुदासने कहा—हे गुरो रामदास अभी अभी आप मुझसे कह चुके हैं कि पातकोंको नष्ट करनेवाले विवाहकांडमें नारदने सुलोक रामसहस्रनामक सभायें रामचन्द्रजीकी स्तुति की थी ॥ १ ॥ २ ॥ वह रामसहस्रनाम कैसा है और किस प्रकार सूतजीने मुनियोंके समक्ष उसे प्रकट किया था। सो आप मुझसे कहें ॥ ३ ॥ श्रीरामदासने कहा—हे शिष्य ! तुमने बहुत उत्तम प्रश्न किया है, सावधान चित्त होकर सुनो ! मैं तुम्हे सूतका कहा हुआ रामसहस्रनाम सुनाता हूँ । आज जिस तरह तुम मुझसे पूछ रहे हो, उसी तरह शौनकन सूतजीसे पूछा था । उनका प्रश्न सुनकर नैमिषारण्यम सूतजीने शौनकसे कहा—एक समय कैलासमें तत्पर शिव और पार्वती गलबहियाँ डाले हुए आनन्दपूर्वक बैठे थे ॥ ४-६॥ सर्वश्रेष्ठ देवता शिव और पार्वतीकी सेवामें इन्द्रादि लोकपाल उपस्थित थे उस समय शिव-पार्वतीमें कोई धार्मिक चर्चा चल रही थी । समय पाकर पार्वती ने शिवजी से कहा-हे हमारे प्रभु जगत्के प्रभु, सर्वज्ञ एवं परमेश्वर ! आपकी कृपासे मैने समस्त धर्मशास्त्र जान लिया। पापोंका प्रायश्चित्त किस तरह हो सकता है, सो भी सुन चुकी ।

१८२ आनन्दरामायणे [ सर्गः १

श्रीमहादेव उवाच शृणु देवि प्रवक्ष्यामि गुह्याद्गुह्यतरं महत् । सनत्कुमारविघ्नेशसंवादं पापनाशनम् ॥१०॥ उपविष्टं गणाध्यक्षमेकान्ते प्रणिपत्य च । सनत्कुमारः पप्रच्छ सर्वधर्मविदां वरम् ॥११॥

सनत्कुमार उवाच भगवन् सर्वधर्मज्ञ सर्वविघ्नविनाशन । द्विजहत्याहरं धर्मं वक्तुमर्हसि मे प्रभो ॥१२॥ विना भवन्तं धर्मस्य वक्ता नास्ति जगत्त्रये ।

श्रीगणेश उवाच साधु पृष्टं त्वया ब्रह्मन्सर्वलोकोपकारकम् ॥१३॥ मया चिरं कृतं कर्म स्मारितं भवताऽनघ पुराऽहं गजरूपेण जातः पर्वतसन्निभः ॥१४॥ रुतो वृक्षान्समुत्पाट्य मुनिहिंसां समारभम् । तदा मया मुनिगणा निहता बहवो बलात् ॥१५॥ हाहाकारो महानासीद्ब्राह्मणानां समन्ततः । तदा ह्यत्याहृतेन चेष्टितः पतितोऽस्म्यहम् ॥१६॥ निःसंज्ञं मृततुल्यं मां पतितं वीक्ष्य मे पिता । अराधयज्जगतामीशं रामं सर्वहृदि स्थितम् ॥१७॥ प्रत्यक्षमकरोद्देवं मद्हेतो रघुनन्दनम् । तदा प्रोवाच भगवान् श्रीरामः पितरं मम ॥१८॥

श्रीराम उवाच प्रसन्नोऽस्मि महादेव किं मां प्रार्थयसे प्रभो दास्यामि यदभीष्टं ते त्रिषु लोकेषु दुर्लभम् ॥१९॥

श्रीमहादेव उवाच द्विजहत्यासमाविष्टं मम पुत्रमिमं प्रभो । निष्पापं कुरु देवेश यद्यस्ति मयि ते दया ॥२०॥

श्रीगणेश उवाच तथेत्युक्त्वा तदा तेन कृपादृष्ट्याऽहं निरीक्षितः । तत्क्षणाल्लब्धचैतन्यो निर्मलज्ञानबुद्धिदः ॥२१॥ बहुभिर्गद्यपद्यैश्च स्तुत्वा तं प्रणतोऽभवम् ।

अत आप मुझपर कृपा करके ब्रह्महत्यादि महापापोंके निष्कृतिका कोई उपाय बतलाइए। श्रीशिवजी बोले— हे देवि ! मैं तुम्हें अतिशय गुह्य तथा पापनाशक सनत्कुमार और गणपति का सम्वाद सुनाता हूँ ॥ ७-१० ॥ एक समय जब कि गणेशजी एकान्तमे बैठे हुए थे तब सनत्कुमारने जाकर उन्हें प्रणाम किया और कहा-हे भगवन् ! समस्त धर्मोंको जाननेवाले तथा विघ्नके विनाशक हे प्रभो मुझ ब्रह्महत्याका विनाश करनेवाला कोई कर्म बतलाइए ॥ ११ । १२ ॥ आपके सिवाय तथा लाख्या कोई सा धमका वक्ता मुझे नहीं दीखता । गणपतिने कहा-हे ब्रह्मन् ! तुमने मुझसे बहुत ठीक प्रश्न किया है। इससे सारे संसारका उपकार होगा ॥ १३ ॥ तुमने एक ही बातसे पूर्वमे किये हुए मेरे सब कर्मोका स्मरण दिला दिया है। पूर्वकालमे मैं गजरूपसे संसारमें जन्मा था और पर्वतकी भाँति लम्बा चौड़ा मेरा डील डौल था । १४ । उस समय मैने पहले तो बहुतसे वृक्ष उखाड़े । फिर मुनियोंकी हिंसा आरम्भ कर दी। मैने अपने अपरिमय बलसे कितन ही मुनियोंका बघ कर पापी बन बैठा ॥ १५ । १६ ॥ मेरे होश-हवास ठिकाने न रह तथा एक मृतककी नाईं मेरी आकृति हो गयी । मेरी दशा देखकर मेरे पिताने संसारके महाप्रभु रामकी आराधना की, इससे प्रसन्न होकर रामचन्द्रजी मेरे पिता- के सम्मुख आये और कहने लगे। रामचन्द्रजी बाले हे महादेव ! मै तुम्हारे ऊपर अति प्रसन्न हूँ । बतलाओ, तुम किसलिए इस प्रकार मेरी प्रार्थना कर रहे हो ? तुम्हारा कामना यदि तीन लोकमे दुर्लभ होगा तो भी मै उसे पूर्ण करूँगा ॥ १७-१९ ॥ श्रीशिवजीने कहा-हे प्रभो ! मेरे पुत्र गणेशको ब्रह्महत्या लग गयी है। हे देवेश ! यदि आपकी मुझपर दया हो तो उसे निष्पाप कर दीजिए ॥२०॥ श्रीगणेशजी सनत्कुमारसे कहने लगे-इसप्रकार मेरे पिताकी बात सुनकर रामचन्द्रने अपनी कृपाभरी दृष्टिसे एक बार मेरी ओर देखा। उनके देखते ही मैं चैतन्य हो गया। घेरेमें एक निर्मल ज्ञानका प्रकाश संचार हो गया ॥ २१ ॥ तब बहुतसे गद्य-पद्यों द्वारा मैने भगवान्की

सर्गः १ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ३८३

सर्गः १ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ३८३

श्रीरामचन्द्र उवाच द्विजहत्यामहंमस्य प्रायश्चित्तं वदामि ते ॥ २२ ॥ जप नामसहस्रं मे हत्याकोटिविनाशनम् । इति गुह्यं ददौ रामस्तत्त्वं नामसहस्रकम् ॥२३॥ तस्य त्वग्रहणादेव निष्पापोऽहं तदाभवम् । सदारभ्यास्मि देवानां पूज्योऽहं मुनिसत्तम ॥२४॥ त्वमप्येतदधीयानो राघवस्य महात्मना । नाम्नां सहस्रं लोकेषु प्रख्यापय महामते ॥२५॥

सनत्कुमार उवाच धन्योऽस्म्यनुगृहीतोऽस्मि कृतार्थोऽस्मि गणाधिप । त्वत्प्रसादान्मयाऽधीतं रामनामसहस्रकम् ॥२६॥

श्रीमहादेव उवाच इति विज्ञाप्य देवेशं परिक्रम्य प्रणम्य च । तदादि सततं जपन्वा स्तोत्रमेतद्वरानने ॥२७॥ अवाप परमां सिद्धिं पुण्यपापविवर्जितः ।

श्रीपार्वत्युवाच श्रोतुमिच्छामि देवेश तदहं सर्वकामदम् ॥ २८ ॥ नाम्नां सहस्रं तां ब्रूहि यद्यस्ति मयि ते दया ।

श्रीमहादेव उवाच अद्य वक्ष्यामि भो देवि रामनामसहस्रकम् । शृणुष्वैकमनाः स्तोत्रं गुह्याद्गुह्यतरं महत् ॥२९॥ ऋषिर्विनायकश्चास्य अनुष्टुप्छन्द उच्यते । परब्रह्मात्मको रामो देवता शुभदर्शने ॥३०॥

ॐअस्य श्रीरामसहस्रनाममालामंत्रस्य विनायक ऋषिः अनुष्टुप् छन्दः श्रीरामो देवता महाविष्णुरिति बीजं गुणभृन्निर्गुणो महानिति शक्ति सच्चिदानन्दविग्रह इति कीलकं श्रीराम-प्रीत्यर्थे जपे विनियोगः

ॐश्रीरामचन्द्राय अंगुष्ठाभ्यां नमः । सीतापतये तर्जनीभ्यां नमः । रघुनाथाय मध्यमाभ्यां नमः । भरताग्रजाय अनामिकाभ्यां नमः । दशरथात्मजाय कनिष्ठिकाभ्यां नमः । हनुमत्प्रभवे करतलकर-पृष्ठाभ्यां नमः । श्रीरामचन्द्राय हृदयाय नमः सीतापतये शिरसे स्वाहा रघुनाथाय शिखायै वषट् । भरताग्रजाय कवचाय हुम् । दशरथात्मजाय नेत्रत्रयाय वौषट् । हनुमत्प्रभवे अस्त्राय फट् ।

स्तुति की और उनके चरणोमे लाट गया । फिर रामचन्द्रजी कहने लगे तुजारो द्विजहत्याके पापसे उद्धार पानेका उपाय मै तुम्हें बतलाता हूँ ॥ २२ ॥ मेरे रामसहस्रनाम का जप करो वह सहस्रों हत्याओंका नाशभी नष्ट कर देता है । ऐसा कहकर रामचन्द्रजीने अपना गुप्त सहस्रनाम मुझे बताया और उसके ग्रहणमात्रसे मेरे पाप नष्ट हो गये । तभीसे हे मुनिसत्तम ! मै देवताओंका भी पूज्य हो गया हूँ ॥ २३ ॥ २४ ॥ तुम भी इसी रामसहस्रनामका पाठ करते हुए संसारमे इसका प्रचार करो । सनत्कुमारने कहा-मैं धन्य हूँ । मुझपर आपकी बड़ी कृपा है । आपकीही दयासे मैने रामसहस्रनाम पा लिया । मै कृतार्थ हो गया । श्रीशिवजीने कहा-इस तरह उस सहस्र-नामको जानकर सनत्कुमारने गणेशजीकी परिक्रमा की, प्रणाम किया और तभीसे नित्य इसका जप करके पुण्य-पापसे विवर्जित होकर वे परम सिद्धिको प्राप्त हुए । पार्वतीजी बोलीं-हे देवेश ! सब कामनाओंको पूर्ण करनेवाले रामसहस्रनामको मैं भी जानना चाहती हूँ । यदि आपकी मुझपर दया रहती हो तो मुझे बताइए । शिवजी कहने लगे-हे देवि ! मै तुम्हें वह पुनीत सहस्रनाम बतलाता हूँ । तुम भी सावधान मन होकर उस गुह्यातिगुह्य स्तोत्रको सुनो ॥ २५-२९ ॥ इस रामसहस्रनाम मंत्रमय स्तोत्रके ऋषि विनायक हैं और साक्षात् परब्रह्म राम इसके देवता हैं ॥ ३० । 'ॐ अस्य श्रीराम' इस मंत्रसे विनियोग करके 'श्रीरामचन्द्राय' कहकर अंगुष्ठ, 'सीता-पतये' कहकर तर्जनी, 'रघुनाथाय' कहकर मध्यकी अंगुली, 'भरताग्रजाय' कहकर अनामिका, 'दशरथात्मजाय' कहकर कनिष्ठिका, 'हनुमत्प्रभवे' कहकर दोनों करपृष्ठोंका न्यास करे । फिर 'रामचन्द्राय' कहकर हृदय, 'सीतापतये' कहकर शिर, 'रघुनाथाय' कहकर शिखा, 'भरताग्रजाय' से दोनों बाहुमूल, 'दशरथात्मजाय'

३८२आनन्दरामायणे[ सर्गः १

अथ ध्यानम्

ध्यायेदाजानुबाहुं धृतशरधनुषं बद्धपद्मासनस्थं
पीतं वासो वसानं नवकमलस्पर्धि नेत्रं प्रसन्नम् ।
रामांकास्तूर्णताक्षमुखकमलमलम्प्रेक्ष्यनेत्रं नीलाभं
नानालङ्कारदीप्तं दधतमुरुजटामण्डलं रामचन्द्रम् ॥३१॥

वैदेहीसहितं सुरद्रुमतले हैमे महामण्डपे
मध्ये पुष्पकमासने मणिमये वीरासने संस्थितम् ।
अग्रे वाचयति प्रभञ्जनसुते तत्त्वं मुनिभ्यः परं
व्याख्यातं भरतादिभिः परिवृतं रामं भजेच्छ्याम लम् ॥३२॥

सौवर्णेमण्डपे दिव्ये पुष्पके सुविराजिते । मूले कल्पतरोः स्वर्णपीठे सिंहासनेयुते ॥३३॥
मृदुल्लक्ष्णीतरे तत्र जानक्या सह संस्थितम् । रामं नीलोत्पलश्यामं द्विभुजं पीतवाससम् ॥३४॥
स्मितवक्त्रं सुखासीनं पद्मपत्रनिभेक्षणम् । किरीटहारकेयूरकुण्डलैः कटकादिभिः ॥३५॥
आभ्रमानं ज्ञानमुद्राधरं वीरासनन्दितम् । स्पृशन्तं स्तनयोश्च जानक्याः सव्यपाणिना ॥३६॥
वसिष्ठवामदेवाद्यैः सेवितं लक्ष्मणादिभिः । अयोध्यानागरो रम्ये अभिषिक्तं रघूद्वहम् ॥३७॥
एवं ध्यात्वा जपेन्नित्यं रामनामसहस्रकम् । हत्याकोटियुतो वापि मुच्यते नात्र संशयः ॥३८॥
ॐरामः श्रीमान्महाविष्णुर्जिष्णुर्देवहितावहः । तत्त्वं चा तारक ब्रह्म शाश्वतः सर्वसिद्धिदः ॥३९॥
राजीवलोचनः श्रीमांल्लक्ष्मण्यो रघुपूंगवः । रामभद्रः सदाचारो राजेन्द्रो जानकीपतिः ॥४०॥
अग्रगण्यो वरेण्यश्च वरदः परमेश्वरः । जनार्दनो जितमित्रः परार्थैकप्रयोजनः ॥४१॥


से दोनों नेत्र छुए तथा 'हुंफट्स्वाहे' कहकर चुटकी बजाये । अथ ध्यानम् जिनका आजानु बाहु है, जो धनुष-बाण धारण किये हैं, पद्मासन मारकर बैठे हैं, पीत वस्त्र पहने हैं, नवीन कमलदलसे होड़ करनेवाले जिनकी दोनों आँखें हैं, जिनके वामभाग सीताजी बैठी हैं सीता तथा राम दोनों आपसमें एक दूसरेके मुखकी शोभा देखनेमें संलग्न हैं, नवीन मेघके सदृश जिनका रूप है, विविध प्रकारके अलङ्कारोंसे अलंकृत तथा लम्बो लम्बी जटा धारण करनेवाले रामचन्द्रका ध्यान करे ॥३१॥ कल्पवृक्षके नीचे सुवर्णके मध्य एक सुन्दर सुवर्णके मण्डपमें पूर्वनिर्मित महासन, जिसमें अनेक प्रकारकी मणियां जड़ी हैं, उसपर श्रीराम वीरासनसे बैठे हुए हैं। उनके सामने बैठे हनुमान्‌जी मुनियोंको परम सम्बन्ध व्याख्यान कर रहे हैं। भरतादि तीनों भ्राता जिनकी बगल-बगल खड़े हैं। ऐसे श्यामस्वरूप रामका भजन करे ॥३२॥ सुवर्णनिर्मित दिव्य पुष्पक विमान कल्पतरुके नीचे रक्खा है। जिसमे आठ सिंह लगे हैं। जो कोमल और चिकने हैं, ऐसी गद्दीपर सीताके साथ बैठे हुए हैं नीलोत्पल सरीखे जिनके नेत्र हैं दो भुजाएं हैं, पीत वस्त्र है, मुसकुराता हुआ मुख है और वे आनन्दसे बैठे हैं। किरीट, हार, केयूर कुण्डल और कटकादिसे सुशोभित हो रहे हैं। वे एक ओर ज्ञानमुद्रा धारण किये हैं। दूसरी तरफ बायें हाथसे सीताके स्तनोंको छूते हैं। ॥३३-३६॥ वसिष्ठ, वामदेव तथा लक्ष्मणादिक जिनकी सेवामें तत्पर हैं। अयोध्या नगरीमें जिनका राज्यभिषेक हो चुका है। ऐसे रघूद्वह रामचन्द्रजीका ध्यान करके सर्वदा इस रामसहस्रनामका पाठ करना चाहिए। ऐसा करनेसे यदि किसीको करोड़ों हत्यायें भी लगी हैं तो दूर हो जाती हैं इसमें किसी प्रकारका संशय नहीं करना चाहिए। ॥३७-३८॥ ॥३८॥ अब सहस्रनाम कहते हैं - राम, श्रीमान्, महाविष्णु, जिष्णु (सबको जीतनेवाले), देवहितावह (देवताओंका कल्याण करनेवाले), तत्त्वात्मकस्वरूप तारकब्रह्म, शाश्वत, सर्वसिद्धिद (सब प्रकारकी सिद्धियो-को देनेवाले) ॥३९॥ कमल सरीखे नेत्रवाले, श्रीमान्, रघुपूंगव, धनु, रामभद्र, सदाचार, (पुनीत आचारवाले) राजेन्द्र, जानकीके पति ॥४०॥ सबमें अग्रेसर, वरेण्य (सर्वश्रेष्ठ), वरद (वरदायक)

सर्गः १ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ३८५

सर्गः १ ] राज्यकाण्डम् ( पूर्वार्द्धम् ) ३८५


विश्वामित्रप्रियो दाता शत्रुजिच्छत्रुतापनः । सर्वज्ञः सर्ववेदादिः शरण्यो बलिमर्दनः ॥४२॥ ज्ञानमयोऽपरिच्छेद्यो वाग्मी सत्यव्रतः शुचिः । ज्ञानगम्यो दृढप्रज्ञः शरधन्वी प्रतापवान् ॥४३॥ द्युतिमानात्मवान् वीरो जितक्रोधोऽरिमर्दनः । विश्वरूपो विशालाक्षः प्रभुः परिदृढो दृढः ॥४४॥ ईशः खड्गधरः श्रीमान् कौसल्येयोऽनसूयकः । विपुलांसो महोरस्कः परमेष्ठी परायणः ॥४५॥ सत्यव्रतः सत्यसंधो गुरुः परमधार्मिकः । लोकज्ञो लोकवत्त्वा लोकात्मा लोककृद्विभुः ॥४६॥ अनादिर्भगवान् सेव्यो जितमायो रघूद्वहः । रामो दयाकरो दक्षः सर्वज्ञः सर्वपावनः ॥४७॥ ब्रह्मण्यो नीतिमान् गोप्ता सर्वदेवमयो हरिः । सुन्दरः पीतवासाश्च सूत्रकारः पुरातनः ॥४८॥ सौम्यो महर्षिः कोदण्डः सर्वज्ञः सर्वकोविदः । कविः सुग्रीववरदः सर्वपुण्याधिकप्रदः ॥४९॥ भव्यो जिताग्निरिष्वर्गो महोदारोऽघनाशनः । सुकीर्तिरादिपुरुषः कान्तः पुण्यकृतोत्तमः ॥५०॥ अकल्मषश्चतुर्बाहुः सर्वावासो दुरासदः १०० स्मितभाषी निवृत्तात्मा स्मृतिमान् वीर्यवान् प्रभुः ॥५१॥ धीरो दान्तो घनश्यामः सर्वायुधविशारदः । अध्यात्मशामानिलयः सुमना लक्ष्मणाग्रजः ॥५२॥ सर्वतीर्थमयः शूरः सर्वयज्ञफलप्रदः । यज्ञस्वरूपो यज्ञेशो जरामरणवर्जितः ॥५३॥


परमेश्वर, जनार्दन जितमित्र (शत्रुओं को पराजित करनेवाले), परार्थकप्रयातन (परोपकार करना ही जिनका एकमात्र प्रयोजन है)। विश्वामित्रप्रिय दाता शत्रुजिच्छत्रुतापन (शत्रुओं को सतानेवाले), सर्वज्ञ, सर्ववेदादि समस्त वेदोंके आदिकारण। शरण्य, बलिमर्दन बलिको परास्त करनेवाले, ज्ञानमय, परिच्छेद्य वाग्मी (कुशल वक्ता) सत्यव्रत, शुचि, पवित्र, ज्ञानगम्य (ज्ञानद्वारा जानने योग्य), दृढप्रज्ञ (स्थिर बुद्धिकाले), शरधन्वी, प्रतापवान्, आत्मवान् वीर, जितक्रोध (जिन्होंने क्रोधको जीत लिया है), अरिमर्दन (शत्रुओंको नीचा दिखानेवाले) विश्वरूप (संसार ही जिनका स्वरूप है), विशालाक्ष (बड़ी बड़ी आंखवाले), प्रभु समस्त जगत्के ईश्वर) परिदृढ (सतर्क)। ४१-४४ ॥ ईश (सब संसारके स्वामी), खड्गधर (तलवार धारण करनेवाले), श्रीमान् कौसल्येय (कौशल्याके पुत्र), अनसूयक (किसीसे ईर्ष्या न करनेवाले), विपुलांस (जिनके स्कंध चौड़े हैं) महोरस्क (जिनकी विशाल छाती है), परमेष्ठी (जो ब्रह्मस्वरूप हैं), सत्यव्रतपरायण (सत्यवादी), सत्यसंध (सत्यप्रतिज्ञ), गुरु (सबके पूज्य), परम धार्मिक, लोकज्ञ (सब लोकोंके ज्ञाता), लोकवत्ता (सब लोकोंमें वसनेवाले, लोकात्मा (सब लोकोंके आत्मा), लोककृत (लोकोंके रचयिता, विभु (सर्वव्यापी)। ४५ । ४६ । अनादि (जिनका आदि नहीं है), भगवान् (सर्वसम्पत्तिशाली), सेव्य (सेवा योग्य), जितमाय (मायाका जीतनेवाले), रघूद्वह (रघुवंशके उजागरकर्ता), राम दयाकर, दयाके खानिस्वरूप, दक्ष (सब कार्योंमे निपुण), सर्वज्ञ, सर्वपावन (सबको पुनीत करनेवाले), ब्रह्मण्य (ब्राह्मणभक्त) नीतिमान् गोप्ता (सबका रक्षक), सर्वदेवमय, हरि, सुन्दर, पीतवासा (पीले वस्त्र धारण करनेवाले), पुरातन सूत्रकार (सर्वप्राचीन सूत्रकार अर्थात् सूत्ररूपमें ग्रंथोंके रचयिता), पुरातन (सबमे प्राचीन) ॥ ४७ । ४८ । सौम्य (जिनका सरल स्वभाव है), महर्षि, कोदण्ड (धनुर्धर), सर्वज्ञ, सर्वकोविद (सब विषयोंमें पूर्ण पण्डित, कवि, सुग्रीववरद (सुग्रीवको अभयवर देनेवाले), सर्वपुण्याधिकप्रद (सब पुण्योंसे भी अधिक फल देनेवाले) ॥ ४९, भव्य जिताग्निरिष्वर्गो (जिन्होंने अपने बलसे शत्रुके संघ-उत्साहादि छः वर्गोंको जीत लिया है), महोदार (जो सबसे उदार हैं), अघनाशन (पापका नाश करनेवाले, सुकीर्ति (जिनकी सुन्दर कीर्ति है), आदिपुरुष (जो सबके आदि पुरुष हैं), कान्त (सर्वप्रिय), पुण्यकृतोत्तम (पवित्रविचारसम्पन्न) अकल्मष (पापरहित) चतुर्बाहु (चतुर्भुज), सर्वावास (सबके निवासस्थान, दुरासद (बड़ी कठिनाईसे प्राप्त १०० स्मितभाषी (मुसकुराते हुए बातें करनेवाले), निवृत्तात्मा, जिनकी आत्मा स्वतन्त्र है, वा स्मृतिमान, वीर्यवान् और सबके प्रभु हैं। धीर, दान्त (उदारप्रकृति), घनश्याम (मेघकी नई श्यामस्वरूप), सर्वायुधविशारद (सब शस्त्रास्त्रोंमे निपुण, अध्यात्मशामनिलय (अध्यात्मशास्त्रोंके निवास), सुमना (सुन्दर चित्तवाले), लक्ष्मणाग्रज (लक्ष्मणके बड़े भ्राता), ॥ ५०-५२ ॥ तीर्थमय, शूर (महासाहस योद्धा), सर्वयज्ञफलप्रद (सब यज्ञोंके फलदाता) यज्ञस्वरूप