भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 388
३७२आनन्दरामायणे[ सर्गः ८

गोद्विजार्चादि संपाद्य ततस्ते राघवं ययुः । नत्वा रामं जानकीं ते तस्थुर्दिव्यासनेापरि ॥ ४६॥ तेषां भार्याः स्त्रियश्चापि स्नात्वा दुर्गां प्रपूज्य च । गत्वा सीतां प्रणेमुस्तास्तस्थू सीताव्र्याऽऽसने ॥४७॥ ततस्ते लक्ष्मणाद्याः कुशाद्याः स्वगुरोर्मुखात् । कथां पौराणिकीं श्रुत्वाऽऽयुः स्वं स्वं गृहं प्रति । ४८। ततः सर्वे रामगेहे समाहूता मुदान्विताः । उपाहारान् पृथक् चक्रुर्मध्याह्ने भोजनान्यपि ॥४९॥ एवं तेषां स्त्रियश्चापि समाहूतास्तु सीतया । उपाहारान् भोजनानि चक्रुः सीतागृहे सदा । ५०॥ कदा मुदा स्वीयगेहे राघवेणार्थ सीतया । उपाहारान् भोजनानि चक्रुस्ते ब्राह्मणादिभिः । ५१॥ एवं तैर्बन्धुभिश्चालैः प्रापतुर्नितरां सुखम् । सीताराभौ कदा नामोन्कलहः क्वापि कस्य हि । ५२॥ इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये विवाहकाण्डे द्वादशविवाहवर्णनं नाम सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥


अष्टमः सर्गः

( शत्रुघ्नतनय यूपकेतु द्वारा मदनसुन्दरीका हरण )

श्रीरामदास उवाच

अथैकदा दक्षिणे हि शिवकाञ्च्यां महापुरि । कम्बुकण्ठो नृपः श्रीमान्निजकन्यास्वयंवरम् । १ ॥
कर्तुकामो नृपान्सर्वानाह्वयामास सादरम् । तदा ते पार्थिवाः सर्व पत्राणि हि पृथक् पृथक् ॥ २ ॥
एवंरैरमनुस्मृत्य कुशस्यापि लवस्य च । स्वयंवरे स्वीयमानभङ्गेनोद्वग्नहिस्थतम् । ३ ।
प्रैषयामासुर्नृपतिं न ययुश्च स्वयंवरम् । तेषां पत्राणि सर्वाणि कम्बुकण्ठो ददर्श सः । ४ ।
सर्वेषु लिखितस्त्वेक एवार्थस्तं वदाम्यहम् । यदि नायाति रामस्य बालकास्ते स्वयंवरे ॥ ५ ॥
वयं सर्वे तर्हि यामो जंबूद्वीपान्तरस्थिताः । तेषामेवमभिप्रायं ज्ञात्वा स नृपविस्तदा ॥ ६ ॥
न ममाह्वय श्रीराममाह्वयामास पार्थिवान् । स्वयं चापि स्मरन्नैवं तद्वृत्तं रामपुत्रयोः । ७ ॥


बालक सबेरे स्नान करके हवन, शिवअर्चन एवं गो ब्राह्मणोंकी पूजा कर १ थे, तब रामके पास जाते और वहाँ सीता तथा रामको प्रणाम करके दिव्य आसनपर बैठते थे ॥ ४५ ॥ ४६। उसी तरह उनकी स्त्रियां भी सबेरे स्नान और दुर्गापूजनसे निवृत्त होकर सीताके पास जातीं उन्ह प्रणाम करती और आज्ञा पाकर दिव्य आसनोंपर बैठती थीं, ४७ ॥ इसके बाद वे सब लोग गुरु वसिष्ठके मुखसे पुराणोंकी कथा सुन सुनकर अपने भवनोको जाया करत थे। दोपहरको रामके बुलानेपर साथ साथ जलपान तथा भोजन करत थे। उसी तरह उनकी स्त्रियाँ भी सीताके बुलानेपर सीताके यहाँ ही आकर जलपान तथा भोजन करती थीं ॥ ४८-१० ॥ कभी-कभी वे लोग राम और बहुतसे ब्राह्मणोको अपने यहाँ बुलाकर भोजन कराते थे ॥ ५१ इस तरह उन बन्धुओं और बालकोंके साथ सीता तथा राम बड़े सुखसे जीवन व्यतीत कर रहे थे। किसीके साथ कभी किसी तरहका झगड़ा नहीं होता था ॥ ५२ । इति श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयविरचित-भाषाटीकासहिते विवाहकाण्डे सप्तमः सर्गः ॥ ७ ॥

श्रीरामदास कहने लगे—एक समय दक्षिणकी शिवकाञ्चीपुरीमें वहाँके राजा कम्बुकण्ठने अपने कन्याका स्वयंवर करनेके विचारसे सब राजाओंके यहाँ निमन्त्रणपत्र भेजकर बुलवाया। किन्तु कुश-लवके कारण वे महाराज कम्बुकण्ठके यहाँ नहीं आये और एक-एक पत्र लिखकर भेज दिया। कम्बुकण्ठने एक-एक करके सब राजाओंका पत्र देखा ॥ १-४ ॥ उन सब पत्रोंमें एक ही चर्चा थी। वह यह कि यदि रामचन्द्रके लड़के तुम्हारे स्वयंवर न आय तो हम सब जम्बूद्वीपके राज तुम्हारे यहाँ आयगें-अन्यथा नहीं। राजा कम्बुकण्ठने उनके अभिप्राय समझकर रामचन्द्रजाके पास निमन्त्रण न भेजकर बाकी सब राजाओंको बुलाया। कम्बुकण्ठको स्वयं भी वह बात याद थाार्थीकि रामके पुत्रोंने चम्पिका और सुमतिके स्वयंवरमे