भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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पृष्ठ 389

सर्गः ८ ] विवाहकाण्डम् १७३

चण्डिकासुमतिपाणिग्रहणार्थं पुरातनम् । ततस्ते पार्थिवाः सर्वे श्वशुरस्य जिघांसवः ॥ ८ ॥ सप्तदीपाधिपस्याथ ययुः कान्तिपुरीं प्रति । अथ तां कम्बुकण्ठस्य कन्यां मदनसुन्दरीम् ॥ ९ ॥ प्रासादसंस्थितां दृष्ट्वा नारदः खात्समेययौ । सखीभिः सा मुनिं पूज्य विनयात्पुरतः स्थिता ॥ १० ॥ पप्रच्छ नारदं भक्त्या विनयानम्रा शनैः । कुतः समागतः स्वामिन् गम्यते क्वाधुना वद ॥ ११ ॥ भवतां दर्शनेनाद्य पवित्राऽहं परं गता, इति तस्या वचः श्रुत्वा किञ्चित् स्मित्वा मुनिस्तदा ॥ १२ ॥ तामाह बाले स्वलोकादागतोऽस्म्यधुना त्वहम् । अयोध्यायां गतश्चाद्य पुत्राणां तु पृथक् पृथक् ॥ १३ ॥ गेहे संभोक्तुकामोऽद्य निमन्त्रोऽस्मि विहायसा । एतस्मिन्नन्तरे कान्तिपुर्याः सैन्यानि वै बहि ॥ १४ ॥ दृष्ट्वा केषां हि सैन्यानि सन्तीति हृदि चिन्तितम् । ततः पाथमुखाच्छ्रुत्वा तत्र चात्र स्वयम्बरम् ॥ १५ ॥ तदा विनिश्चितं चित्ते मया रामः स्वयंवरे । अत्रैवास्ति ह्यागतश्च तत् पश्याम सबालकम् ॥ १६ ॥ नैवास्ति ह्यागतश्चेत् तर्हि यास्याम्यतः परम् । स्वयंवरे विना रामं न भविष्यति सान्द्रजम् ॥ १७ ॥ पश्याम्यथैवं तं राम वृथाऽग्रे गमनं मम । निश्चित्येत्थं समायातस्ततोऽदृष्ट्वा रघूत्तमम् ॥ १८ ॥ कथं रामो नागतोऽत्र चेति पृष्टा नृपा मया । नृपाभिप्रायमाकर्ण्य तदा खिन्नं मनो मम ॥ १९ ॥ सप्तद्वीपाधिपतिं रामं वधूबालकसंयुतम् । स्वयम्बरमनाहूय त्वत्पित्रा निश्चितं नृपैः ॥ २० ॥ अधुनाऽहं प्रगच्छामि साकेतञ्च रघूत्तमम् । मन्दभाग्याऽसि बाले त्वं स्नुषा राघवभूपतेः ॥ २१ ॥ यतो जाताऽसि नैवात्र विचित्रा कर्मणो गतिः । इत्युक्त्वा बालिकां पृष्ट्वा नारदो गन्तुमुद्यतः ॥ २२ ॥ ततः संप्राथयामास नारदं बालिका मुहुः । खिन्नचित्ताऽश्रुपूर्णाक्षी म्लानस्या स्फुरिताधरा ॥ २३ ॥ रोमांचिततनूर्मुग्धा गतार्थागद्गदस्वरा । येनाहं मुनिवर्यात्र स्नुषा धीराघवस्य च ॥ २४ ॥ भविष्यामि तथा कार्यं न्यथा त्वां शरणं गता । इत्युक्त्वा मुनिवर्यस्य पादयोः स्थाप्य सा शिरः ॥ २५ ॥ चकार करुणं बाला तदा तां मुनिरब्रवीत् । मा चिन्तां कुरु रम्भारु समुत्तिष्ठस्व बालिके ॥ २६ ॥

सबस वैर कर लिया ॥ ५-७ ॥ इसके अनन्तर जब सब राजाओने यह सुन लिया कि राम नहीं आयेंगे, तब वे कम्बुकण्ठके यहाँ पहुंचे । उधर कम्बुकण्ठकी कन्या मदनसुन्दरीको अट्टारीपर देखकर नारदजी आकाश-मार्गसे उतर आये । मदनसुन्दरीने सखियों के साथ आकर नारदकी पूजा की और उन मुनिके सामने जा बैठी ॥ ८-१० ॥ फिर भक्तिपूर्वक नारदसे पूछने लगा—स्वामिन् ! आप इस समय कहाँसे आ रहे हैं और अब कहाँ जायेंगे सो बताइए ॥ ११ ॥ आपके दर्शनसे मैं आज परम पवित्र हो गयी । इस प्रकार उसकी बात सुनी तो थोड़ा मुसकराकर नारद कहने लगे—हे बाले ! इस समय मैं स्वर्गलोकसे आ रहा हूँ और रामके सब पुत्रांके यहाँ अलग-अलग भोजन करनेके लिए अयोध्या जा रहा हूँ। आते समय मैंने कान्तिपुरी नगर के बाहर सेना देखी उसे देखकर मुझे बड़ा कौतूहल हुआ। रास्तेमें एक पथिकसे पूछनेपर ज्ञात हुआ कि यहाँ तुम्हारा स्वयंम्बर है तो यह सोचा कि जहाँ तक है, रामचन्द्रजी अपने बालकों समेत यहाँ अवश्य आये होंगे । चलो, वहीं ही दर्शन कर लूं। यह निश्चय करके मै यहाँ आया, किन्तु रामचन्द्रजीको नहीं देखा तो राजाओंस पूछा कि राम क्यों नहीं आये ? उन लोगोंने जो कारण बतलाया, उससे मेरा मन बहुत खिन्न हुआ ॥ १२-१९ ॥ सप्तद्वीपके अधिपति राम तथा उनके लड़कोंका न बुला सकनेका निश्चय करके ही तुम्हारे पिताने और-और राजाओंको बुलाया है ॥ २० ॥ अच्छा, अब मैं अयोध्यामें रामचन्द्रजीके पास जा रहा हूँ। हे बाले ! तुम अभागी हो, जो रामचन्द्रजी जैसे राजाकी पतोहू नहीं बन रही हो। कर्मकी भी बड़ी विचित्र गति होती है। ऐसा कह और कन्यासे पूछकर नारदजी जाने लगे। तब वह कन्या मदनसुन्दरी खिन्न मन, अन्सु भरी आँखों, म्लानमुख, काँपते हुए अधरो तथा रोमाञ्चित शरीर होकर गद्गद बाणीसे इस प्रकार विनय करती हुई कहने लगी—आप कोई ऐसी युक्ति करिए कि जिससे मैं उनकी ही पतोहू बनू । मैं आपकी शरणमें हूँ। ऐसा कहकर उसने अपना मस्तक मुनिराजके चरणोंमें रख दिया और रोने लगा। तब नारद मुनिने कहा-