श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 390, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ें३७४ आनन्दरामायणे [ सर्गः ८
भविष्यसि त्वं रामस्य स्नुषा यत्नं करोम्यहम् । इत्युक्त्वा तां समाश्वास्य खमार्गेण मुनिर्ययौ ॥२७॥ एतस्मिन्नन्तरेऽथाऽऽयात्स्यन्दनं भूरिकेतनः । यूपकेतुर्नि... पश्यन्तमवतीर्याऽथायौ ॥२८॥ किञ्चित्सैन्ययुतो बालस्तमटव्यां दिदृक्षुः सः । यावन्सन्ध्याटिकं कर्तुमृषिविष्टस्तदा मुनिम् ॥२९॥ ददर्श नारदं नत्वा पूजयामास सादरम् । ततः पप्रच्छ मुनये यूपकेतुः पुरःस्थितः ॥३०॥ कुतः समागतं चेति सन्तुल्या नारदो मुनिः । सर्वं वृत्तं सविस्तारं कथयामास बालकम् ॥३१॥ तच्छ्रुत्वा सकलं वृत्तं नत्वा तं नारदं मुनिम् । अत्रायं क्रोलको वाक्यं सक्रोधः संभ्रमान्वितः ॥३२॥ मुने नृपाणां सर्वेषां द्वेषबुद्धिञ्च राघवे । वा अज्ञा माऽद्य सर्वेषां कुंभाण्डमयंकेणे जवात् ॥३३॥ कमुकटादिभूपानां सारं पश्याक्यहं रणे । मुने त्वत्कृपया सर्वान् जित्वानापामयाक्यहम् । ३४॥ इत्युच्यन्वा स ययौ कान्ति पञ्चमेऽहनि सेनया । नारदोऽपि ययौ रामं द्रष्टु प्रीतमनाम्तदा ॥३५॥ रामेण पूजितः प्रेम्णा भोजनार्थं निमन्त्रितः । अथ भोजनवेलायां यूपकेतुं रघूत्तमः ॥३६॥ अदृष्ट्वा लक्ष्मणं प्राह यूपकेतुर्न दृश्यते । बालेषु च भोजनार्थे लक्ष्मणात्र समाह्वय । ३७॥ तदा समालतीं गत्वा पप्रच्छ लक्ष्मणो जवात् । सा प्राह वनमध्येऽद्य किञ्चित्सैन्ययुतो गतः । ३८॥ श्रुत्वैतद्यथावत्स गत्वा रामं जगाद ह । अथ रामो भोजनादि सपाद्य मुनिना मुदा ॥३९॥ ययौ सभागयासीनस्तं मुनिं वाक्यमब्रवीत् । पञ्चप्रकृतिनान्यत्र स्थेयं मद्वचनान्मया ॥४०॥ तथेति नारदः प्राह सभायां संस्थितः सुखम् । अथ रात्रौ यूपकेतुमदृष्ट्वा रघुनन्दनः ॥४१॥ उपाहारं कृतुकामः पुनर्लक्ष्मणमब्रवीत् । आकारय यूपकेतुं मायं दृष्टो मया शिशुः ॥४२॥ तथेति रामवचनात्पुनर्गत्वा तु मालतीम् । पप्रच्छ यूपकेतुं म सा प्राह नागतस्त्विति ॥४३॥ स्वतः स विह्वलो भूत्वा रामं वृत्तं न्यवेदयत् । रामोऽपि नागतं श्रुत्वा बभूवार्त्ता विह्वलोऽभवत् ॥४४॥
हे ... ! तुम किसी प्रकार की चिन्ता न करो, उठो ॥ २१-२७ ॥ तुम अवश्य रामकी पतोहू बनोगी । मैं इसके लिए उद्योग करूँगा - ऐसा कह और उसे इस तरह बंधाकर नारदजी आकाशमार्गसे चल दिये ॥ २७ ॥ इसी समय यूपकेतु रथपर बैठकर अटवी में निन्द्रेय और राहुल के पत्तोंको देखते हुए तमसा नदीके किनारे पहुंचे । २८ ॥ उस समय यावत्-पो सन् उन्मत्त मद्य थे । उसके साथ भृत्योंने तालाबमे स्नान किया और सन्ध्यावन्दन करनेको बैठे थे कि वि. नारदजी को देखा । तब उनको प्रणाम करके सादर पूजन किया । इसके बाद नारद मुनिने विस्तारपूर्वक उस कन्या मदनमुग्धा का सारा वृत्तान्त कहा। उसे सुनकर क्रोध और घबराहटसे पूर्ण होकर यूपकेतुने कहा - "हे देवर्षि मुने ! इस समय जो सब राजे रामसे द्वेषबुद्धि रखते हैं, वह उनके लिए अगोचरिणी विड होगी । ३३ ॥ कम्बुकण्ठ आदि राजाओका बल में संग्रामभूमिम पहुँचकर देखता हूँ। हे मुनिवर ! मैं आपकी कृपासे उन सबको बांधकर मदोन्मत्तीको लिये आता हूँ । ३४ ॥ ऐसा कहकर यूपकेतु अपनी सेनाके साथ पांचवें दिन कान्तिपुरीमें पहुंचे और नारदजी प्रसन्नतापूर्वक रामका दर्शन करनेके लिए अयोध्या चले गये । ३५ ॥ वहाँ पहुँचनेपर रामने प्रेमसे नारदजीका पूजन करके भोजनका निमन्त्रण दिया । जब भोजनका समय हुआ, तब यूपकेतुको न देखकर रामने लक्ष्मणसे कहा कि इस समय यूपकेतु नहीं दिखायी देता । हे लक्ष्मण ! और-और बालकोंके साथ उसे भी भोजन करनेके लिए बुलाओ ॥ ३६ ॥ ३७ ॥ रामके आज्ञानुसार लक्ष्मण मालतीके पास पहुंचे और यूपकेतुको पूछा । उसने कहा कि वे अपने साथ थोड़ी-सी सेना लेकर वनको गये हैं ॥ ३८ ॥ यह वृत्तान्त लक्ष्मणने जाकर रामको सुना दिया । तत्पश्चात् मुनिके साथ राम भोजन आदि करके अपने सभाभवनमें गये और वहाँ बैठकर नारद मुनिसे कहने लगे कि आप मेरे कहनेसे पाँच-सात दिन यहीं ही ठहर जाइये । 'तथास्तु' कहकर नारदजी भी ठहर गये । तदनन्तर भोजनके समय रात्रिमें भी यूपकेतुको न देखकर रामने लक्ष्मणसे कहा- यूपकेतुको बुलाओ। आज मैंने दिनभर उस बच्चेको नहीं देख पाया है । ३६-४२ ॥ 'बहुत अच्छा' कहकर लक्ष्मण फिर मालतीके पास गये और यूपकेतुको पूछा उसने कहा कि वे अभी तक