श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 387, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ७ ] विवाहकाण्डम् २७१
ततः सर्वान्नृपादींश्च ददावाज्ञां सुहृज्जनान् । ततः पुनस्तानाहूय पूर्ववन्मार्गशीर्षके ॥२८॥
नभस्याथ सुबाहोश्च विवाहानकरोत्प्रभुः । ततः सर्वान्नृपान् रामो ददावाज्ञां सुहृज्जनान् ।२९।
ततः पुनस्तानाहूय माघमासे मुदन्नृपान् । गुरवेतारगदस्य चित्रकेतोर्महोत्सवैः ॥३०॥
विवाहानकरोद्रामः पथिराम्न व्यसर्जयत् । पुष्करस्याथ तक्षस्य सुबाहोश्च महोत्सवैः ॥३१॥
चकार फाल्गुने मासि विवाहान् जानकीधवः । एवं कृत्वा विवाहंश्च रामो द्वादश सादरम् ॥३२॥
नृपैः संपूजितः सर्वांन्नृप्याज्ञां नृपनान् ददौ । पूजयित्वा मुनींश्चापि विससर्ज रघूद्वहः ॥३३॥
गन्धर्वपन्नगाः सर्व ते सकेतेऽत्र मधिष्ठिताः । राम मुक्त्वा न ते नैजं स्थल जगमुर्मुदान्विताः ॥३४॥
मन्त्रिणः प्रेषयामासुः स्वस्वराज्येषु ते पृथक् । यदा रामः स वैकुण्ठमग्रे गच्छति कालतः ॥३५॥
तदासत्तानिकंल्लोकोन्ते गच्छन्ति न संशयः । अथ रामः पन्नगानां गन्धर्वाणां च सद्यसु ॥३६॥
वार्षकेषूत्सवेष्वत्र सावरोधः गृहज्जनेः । पौरैः स्वायैर्भोजनादे गत्वा पूर्णाकरोत्प्रदा ॥३७॥
सदा महोत्सवाद्यामन्नयोध्याया गृहे गृहे । आनन्दः सकलानामासीन्नकुत्राप्यमगलम् ॥३८॥
अथ तेषां गभ१ण पुत्राणां च पृथक् पृथक् । अह कृत्वा तु गेहानि पृथक्कृत्या च शनयः । ३९।
तेषु ते स्थापिताः स, स्वस्वस्त्रीभि पृथक्सुखम् । तथा ते लक्ष्मणाद्याश्च पृथग्गेहेषु चाधवाः । ४०॥
पूर्वमेव स्थापिताश्च स्वस्वपत्न्य। सुदान्विताः । सुमित्रायाः स सौमित्रिा स्वीयगेहेऽवसत्सुखम् । ४१॥
कैकेयी भरतस्याथ गेहे मसमवाम मा । तस्यो शत्रुघ्नगेहेऽपि नाममेकं पयाम्यम् ॥४२॥
एवं सा पुत्रयोर्गेहऽवसद्गम सुदान्विता, कौसल्या ना रामगेह तस्थौ सीतानिसेविता ।४३॥
ते सर्वे चाधवाः पुत्रा निजवानैश्च सेरुकैः । स्वदासीगोधनार्यैश्च सुखमापुः पृथक् पृथक् ॥४४॥
अथ ते लक्ष्मणाद्यश्च कुशाद्या बालका अपि। स्वस्वगेहेषु वै प्रातः स्नात्वा होमान् विचार्यनम् । ४५।
पसन्द त्रितासु हे सुत्रोंका विवाह ३२॥ इसके बाद सब राजाओं और मुनियोंको अपने-अपने घर जानेकी आज्ञा दी। फिर भरतजीके सब्रह्लद, कुमुदका तथा तर और सुबाहुका विवाह किया। बादमें सबको आज्ञा देकर राजा का अनुमति देकर माघ मासमे बुलाया और दधपुत्रोंका विवाह सम्पन्न किया ॥ २८-३० ॥ माघके बाद मेघनादका विवाह करके पुनः फाल्गुन मासमें पुष्कर, तक्ष तथा सुबाहुका विवाह किया। इस तरह बारह विवाहोंका प्रबन्ध कर सब महमानोंका यथायोग्य पूजा की और उनका पूजन स्वीकार किया। सब सेवक अपने-२ राज्यको चले गये। इसका अनुमान हो । इसी तरह उन मुनियोंका भी विधिवत् पूजन करके विदा किया। अयोध्याका राजाका नाम था ॥ ३१-३३ ॥ किन्तु गन्धर्व और पन्नगगण अयोध्यामे ही रहे। वे अपने-अपने मन्त्रियोंको राजधानी भेजकर रामके पास रहने लगे। ये सब तक अयोध्या में रहे जब तक राम अपने वैकुण्ठधामको नहीं चले जायेंगे। रामके चले जानेपर वे भी सत्तानिक लोकोंमें चले जायेंगे। इसके अतिरिक्त वार्षिक उत्सवों और त्योहारोंपर राम अपने घरकी स्त्रियों, मित्रों तथा सम्बन्धीयों के साथ पल्ली और गन्धर्वराजके यहाँ जाकर भोजन आदि करते थे ॥ ३४-३७ ॥ उन दिनों अयोध्या में घर-घर उत्सव मनाये जाते थे; उस समय सर्वत्र आनन्द था। कही भी किसी प्रकारका अमंगल नहीं दिखलाई पड़ता था ॥ ३८ ॥ इसके पश्चात् रामने उन बारह भाइयोंके लिए अलग-अलग घर बनवाये और विधिवत् शान्तिपाठ कराके उनको अपनी-अपनी स्त्रियोंके साथ उन घरोंमें बसा दिया। उसी तरह लक्ष्मण आदि भ्राता बहुत शुभ अलग-अलग महलोंमें अपनी-अपनी स्त्रियोंके साथ सुखपूर्वक रह रहे थे। सुमित्राके पुत्र लक्ष्मण अपने महलमें आनन्दपूर्वक रहते थे ॥ ३९-४१ ॥ कैकेयी एक महीना भरतके यहाँ और एक महीना शत्रुघ्नके यहाँ रहा करती थी, इस तरह अपने दोनों पुत्रोंके साथ रहती हुई वह सुखसे समय बिता रही थी। कौसल्या सीताका सदा ग्रहण करती हुई रामके महलमें रहती थीं ॥ ४२-४३ ॥ वे सब भ्राता और उनके पुत्र अलग-अलग अपनी सवारी, सेवक, दासी, गोधन आदि तथा सम्पत्तियाँ रखकर आनंद से रहते थे ॥ ४४ । यह सब का नियम था कि लक्ष्मण आदि सब भ्राता और कुश आदि