भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

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सर्गः १] सारकाण्डम् २३


रूपसौन्दर्यसंभ्रान्तांस्तां हर्तुं ते समुद्यताः । तान् कन्याहरणोद्युक्तान्नृपान् दृष्ट्वा सनिर्जरान् ॥२०६॥ चकार संगरं तैः स पद्माक्षो लोमहर्षणम् । सङ्ग्रामपीडिता देवा दानवा विमुखा रणे ॥२०७॥ बभूवुस्तत्र दैत्यैश्च पद्माक्षो निहतो रणे । ततस्ते मिलिताः सर्वे तां धर्तुं द्रुतमन्वयुः ॥२०८॥ सा दृष्ट्वा धर्तुमुद्युक्तान् हुताशाग्नौ कलेवरम् । तामदृष्ट्वा नृपाद्यास्ते विचिन्वन्नगरे तदा ॥२०९॥ समभञ्जन्गेहानि भूमिं खनन्नितस्ततः । श्मशानतुल्यं नगरं जातं वै क्षणमात्रतः ॥२१०॥ पद्माक्षनृपतेर्लक्ष्मीसङ्गाज्जातेदृशी दशा । तस्मान्न मुनयो लक्ष्मीं कामयन्ति कदाचन ॥२११॥ लक्ष्माश्रितस्य चाञ्चल्यं भयशोकाद्वधोऽपि च । भवत्येव महद्दुःखं तस्मात्तां परिवर्जयेत् ॥२१२॥ पद्माक्षे निहते युद्धे नृपपत्न्यः सहस्रशः । भर्त्रा सहैव गमनं चक्रुस्ता भयनिर्गताः ॥२१३॥ ततस्ते दैत्यवर्याद्या ययुः स्वं स्वं स्थलं प्रति । एकदा वह्निकुण्डात्सा पद्मा शक्तिः स्थिरा हरेः ॥२१४॥ बहिर्निर्गत्य कुण्डस्य समीपे समुपार्विशत् । एतस्मिन्नन्तरे तत्र पुष्पकस्थो दशाननः ॥२१५॥ विचरन् जगतीं जेतुमाकाशवर्त्मना ययौ । सारणाख्यो ददर्शाय वह्निकुण्डे बहिः स्थिताम् ॥२१६॥ सारणो दर्शयामास रावणाय वचोऽब्रवीत् । पुरा सुरमृगाक्षाद्य यां धर्तुं समुपास्थिताः ॥२१७॥ सेयं पद्माक्षनृपतेः कन्या पद्माऽग्निसन्निभा । मन्दारणवचः श्रुत्वा तां दृष्ट्वा काममोहितः ॥२१८॥ यानाज्जवाद्दूध्र्वपात्तां धर्तु माऽनलेऽक्षिपत् । तामग्नौ प्रप्रविष्टां स दृष्ट्वा हान्वाऽथ तन्स्थलम् ॥२१९॥ गतं प्राह दशग्रीवः क्व गता देवा सुरादयः । कृत्वाऽग्नौ वसतिं पूर्व भ्रमग्रन्थाः कृताः पुरा ॥२२०॥ तदद्य वासस्थानं ते मया ज्ञातं मनोरमे । पश्येऽद्यनाऽहं त्वां धर्तुं शोधयत्यनलस्थलम् ॥२२१॥


कोई अपने शरीरको आकाशके नीले रंगसे रंग लेगा अर्थात् जो ऐसा कर सकेगा) उसे ही यह अपनी पद्मा नामकी कन्या दूँगा। यह मेरी दृढ़ प्रतिज्ञा है। राजाके इस दुर्घट वचनको सुनकर वे नृपश्रेष्ठ पद्माके सौंदर्यपर मोहित होते हुए उसका हरण करनेके लिए उद्यत हो गये। देवताओ सहित उन राजाओंको कन्याहरणके लिए उद्यत देखकर राजा पद्माक्ष उनके साथ लोमहर्षण अर्थात् रोंगटे खड़े करनेवाला युद्ध किया। उनके बाणोंसे पीड़ित होकर सुर तथा दानव रणसे भागने लगे। परन्तु अन्तमें दैत्योंके द्वारा राजा पद्माक्ष रणमें मारा गया। तदनन्तर वे सब मिलकर पद्माको पकड़नेके लिए बड़े वेगसे दौड़े। उनको पकड़नेके लिए आते देखकर पद्मा अग्निमें कूद पड़ी। उसको न देखकर राजाओंने उस सारे नगरमें ढूँढ़ना आरम्भ किया। राजमहल तोड़कर गिरा दिया और बहुत-सी इधर उधरकी जमीन खोद डाली। क्षणभरमें सारा नगर श्मशान बन गया ॥२०४-२१०॥ लक्ष्मीके सम्पर्कसे राजा पद्माक्षकी ऐसी दशा हुई। इसलिये मुनि लोग लक्ष्मीको कभी नहीं चाहते ॥२११॥ लक्ष्मीसे चित्तकी चंचलता बढ़ती है भय बढ़ता है शोक बढ़ता है, मनुष्य मारा जाता है और बड़ा भारी दुःख पाता है। इस वास्ते लक्ष्मीसे दूर रहना चाहिये ॥२१२॥ युद्धमें राजा पद्माक्षके मारे जानेपर राजाकी हजारों स्त्रिये भयभीत होकर राजाके साथ ही सती हो गयी ॥२१३॥ बादमें वे सब दैत्य भी अपने अपने स्थानको चले गये। एक समय श्रीहरिकी स्थिरशक्तिरूपा लक्ष्मी अग्निकुण्डसे बाहर निकलकर कुण्डके समीप बैठी थी। इतनेमें रावण पुष्पक विमानपर बैठकर विचरता हुआ जगत्को जीतनेके लिए आकाशमार्गसे उधर ही निकला। उस रावणका मंत्री सारण पद्माको अग्निकुण्डके बाहर बैठी देख रावणको दिखलाकर कहने लगा कि पूर्वकालमें जिस राजा पद्माक्षकी कन्याके लिए देवताओं और असुरोंका राजाके साथ युद्ध करना पड़ा था, वही कन्या अग्निकुण्डके पास बैठी है। सारणके इस वचनको सुन तथा पद्माको देख कामसे मोहित होकर रावण ज्यों ही वेगसे उसको पकड़नेके लिए नीचे कूदा, त्यों ही वह फिर अग्निमें प्रवेश कर गयी। उसको अग्निमें प्रवेश करती गया उस स्थानको देखकर रावण कहने लगा-॥२१४-२१९॥ हे पद्मे ! तुमने पहिले भी अग्निमें प्रवेश करके राजाओं तथा देवताओंको बड़ा भारी दुःख दिया है। हे मनोरमे ! तुम्हारा निवास-स्थान आज मैंने देख लिया है। अब मैं तुमको खोजनेके लिये सारा अग्निकुण्ड छान डालूँगा