श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 395, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ९ ] विवाहकाण्डम् १७९
अथ सप्त कुमारांश्च लवाद्याः स्वस्ववेश्मनि । पत्न्यः क्रीडां पृथक् सौख्यां कुर्वन्प्रियाऽकरोत् ॥१३॥ चंपिकायां दुहितरः कुशजाताः शुभा नव । कुशस्याग्रे कुमुद्वत्यां भविष्यंस्त्वष्ट सूनवः ॥१४॥ भविष्यति नृपा कन्या ज्येष्ठा चंपकमालिनी । कुशेन्द्रः कुशलोचेति विश्रुतिं नाम्ना राज्यं करिष्यति ॥१५॥ चतुर्दश सुमात्याद्याः स्त्रियः सर्वाः क्रमेण हि । सुषुवुस्तनयानष्ट कन्येकाऽपि पृथक् पृथक् ॥१६॥ स द्वादशशतं पौत्रान्पौत्रीश्चैव मनोरमाः । त्रयस्त्रिंशद्रामचन्द्रो लालयामास सीतया ॥१७॥ कुमुद्वतीभाविसुपुत्रसहिताः शिशवः शुभाः । विंशच्छामावसने तथा षोडशचण्डिकास्तथाः ॥१८॥ बहूविद्यन्निताश्रासन समाश्लेषाद्विते नृपैः तथा श्भागम्पौत्रैश्च नृपकन्या अनेकशः ॥१९॥ काश्चित्स्वयंवरैरेव काश्चिद्राक्षसयोगतः । काश्चिद्गान्धर्वयोगेन काश्चिद्देवैस्तुकर्मणा ॥२०॥ परिणीताः पौरुषेण तासां संख्या न विद्यते । तासां हि संततिं वक्तुं कः समर्थो भवेदिह ॥२१॥ एवं स युपकेतोश्च विवाहश्चम. शुभः । सपद्य नारदः श्रीयामश्चभार्यां रघुनन्दनम् ॥२२॥ रामनामसहस्रेण संगीतैनानभालकृतः । मुक्त्वा अगत्य पृष्टा ययावाकाशवर्त्मना ॥२३॥ श्रीरामदास उवाच एवं रामण साकेतपुर्यां भोगाश्चिरं सुखम् । भुक्तास्तेषां वर्णनेऽद्य कः समर्थो भवेन्नरः ॥२४॥ एक एव समर्थोऽभूद्वाल्मीकिस्तपसां निधिः । शतकोटिमितं येन नानालीकादिभिर्युतम् ॥२५॥ वर्णितं रामचरितं महामंगलकारकम् । यत्स्मृत्याऽपि मया किंचिच्छ्रेयो वर्णितम् ॥२६॥ एव समस्त्र्यवस्थाया पुतैः पौत्रैः समन्त्रितः । प्रपौत्रै पौत्रपौत्रैश्च रञ्जयामास जानकीम् ॥२७॥ एवं विवाहकाण्डं च शिष्य मया परिवर्णितम् । समग्रं पवित्रं च श्रवणान्मंगलप्रदम् ॥२८॥ विवाहकाण्डं परमं ये शृण्वन्तीह मानवाः । न तेषांभः पुत्रपौत्रैश्च वियोग नाप्नुवंति हि ॥२९॥
सम्पादियोंका धन आदि देकर पूजा की और स्वेच्छा अपने घर जानेकी अनुमति दी ॥१२॥ इसके बाद लव आदि सातो भाई अपना-अपना स्त्रियोंके साथ अपने-अपने महलमें विहार करने लगे और कुश अपनी स्त्री चम्पिकाके साथ केलि करने लगे ॥१३॥ इस तरह कुश प्रिया चम्पाके द्वारा चम्पिकानाम नौ कन्यायें उत्पन्न कीं। कुमुद्वतीसे आठ पुत्र और चम्पकमालिनी नामक एक पुत्रीका सादृश्य उत्पन्न होगी। कुशका सबसे बड़ा पुत्र अतिथि अयोध्याका राज्य करेगा ॥१४।१५॥ इसके सिवाय सुमति आदि चौदह स्त्रियोंने क्रमशः आठ-आठ पुत्र और एक-एक कन्यायें उत्पन्न कीं ॥१६॥ इस तरह राम सीताके साथ बारह सौ पौत्रों तथा तैंतीस सुंदर पौत्रियोंका प्रतिपालन करने लगे ॥१७॥ इस प्रकार कुमुद्वतीके भावी पुत्रो पौत्रांको भी मिलाकर बीस सौ पौत्र और चौबीस पौत्रियां हुईं ॥१८॥ जिनको रामने अच्छे-अच्छे राजाओंके साथ विवाह कर दिया और रामके पौत्रोंका विवाह जनक राजकुमात्रियोंके साथ हुआ ॥१९॥ उससमय कुछ कुमारियां स्वयंवरसे आयीं, कुछ राक्षसविवाहसे, तथा कुछ गान्धर्वविवाहसे विवाहमें आयी और उनका शुभ विवाहसम्बन्ध हुआ ॥२०॥ इसके सिवाय पौत्रोंके गुणवान पुत्रादि मणिकूट नामक महलोंमें आयीं, जिनकी कोई संख्या ही नहीं है। ऐसी स्थितिमें उनका सन्तानोका कौन गिन सकता है ॥२१॥ इस प्रकार यूथकेतुका अन्तिम शुभ विवाह सम्पन्न हो जानेपर नारदने समाप्त सुनकर फिर रामचन्द्रनामसे युक्त प्रीतिपूर्वक रामकी स्तुति करके जानेकी आज्ञा मांग ली और आकाशमार्गसे चले गये ॥२२।२३॥ श्रीरामदासने कहा- इस तरह रामने बहुत समय तक सुख भोगा, उसका वर्णन करनेमें कोई भी प्राणी समर्थ नहीं हो सकता ॥२४॥ बस एकमात्र तपस्वी वाल्मीकिजी इसके वर्णनमें समर्थ हुए थे जिन्होंने सौ करोड़ श्लोकोंमें नाना प्रकारकी कथाओं सहित रामचरित्रका वर्णन किया। यह रामचरित परम मङ्गलात्मक है। इसका स्मरण करके ही मैं तुम्हारे समक्ष कुछ कहनेमें समर्थ हुआ हूँ ॥२५।२६॥ इस प्रकार राम अपनी वयोवृद्धावस्था में पुत्र, पौत्र, प्रपौत्र एवं प्रपौत्राके पुत्रोंके साथ रहते हुए सीताको आह्लादित करते रहे ॥२७॥ हे शिष्य ! इस तरह मैने नौ सर्गयुक्त पवित्र विवाहकाण्डका वर्णन किया, जो सुननेमें सर्वथा मङ्गलदायक है ॥२८॥