श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)
Srimad Ananda Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा
स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)
पृष्ठ 43, कुल 811 में से
संदर्भ में पढ़ेंसर्गः ३ ] सारकाण्डम् २७
संसर्गात्सितेता यस्यासीत्तेनैषा प्रगीयते । पद्माभूत्स्वैः कन्या तस्मान्पद्मेति सा स्मृता ॥२७३॥ एवं नामान्यनेकानि सीतायाः संति भो नृप । आकाशनीलवर्णाभवपुषाऽनेन जानकी ॥२७४॥ लब्धा रामेण पद्माक्षप्रतिज्ञा सफलीकृता । एवं मया यथा दृष्टं तथा स्वां विनिवेदितम् ॥२७५। अतस्त्वं स्नुषास्त्वत्र कर्तुमर्हसि भो नृप । श्रीशिव उवाच एतस्मिन्नंतरे तत्र पूर्वं दशरथेन च ॥ २७७ ॥ महासुहृद् ययुः पैत्र्यैः स्त्रीपुत्रैः ससुताश्च ते । कोशलो मगधेशश्च कैकयश्च युधाजितः ॥२७८॥ मानयामास तान् राजा जनकोऽपि मुदान्वितः । ततो दशरथं पूज्य श्रीरामं लक्ष्मणं तथा ॥२७९॥ भरतं चापि शत्रुघ्नं संपूज्याभरणादिभिः । निनाय जनकस्तुष्टः स्वपुरीं परमोत्सवः ।२८०॥ तदा रामो नृपं नत्वा राज्ञा चालिङ्गितो मुहुः । वसिष्ठं गाधिनं नत्वा कौसल्यादि प्रणम्य च ।२८१॥ राज्ञो दशरथस्याग्रे संस्त्रीभिर्बन्धुभिः सह । गजारूढौ ययावग्रे तेऽप्यभूवन् गजस्थिताः ।२८२॥ नदत्सु वाद्यसंघेषु नृत्यत्सु मागधादिषु स्तौत्सु नागरस्त्रीषु विवेश नगरीं प्रभुः ॥२८३॥ तदाऽऽत्तासंभ्रमः पौरस्त्रीणां श्रीरामदर्शने । विसृज्य स्वायकृत्यानि ददृशुर्द्वारादिषु ॥२८४॥ कट्यां निधाय बालांश्च ददृशु रघुनंदनम् । राजमार्गतं रामं ववर्षुः पुष्पवृष्टिभिः ।२८५॥ एवं महोत्सवं गत्वाऽस्थात् दशरथः सुतः । यथा वस्त्रान्नतोयाद्यैः परिपूर्ण मनोरमम् ॥२८६। कृत्वा ज्योतिर्विदां लग्नाद्दिनमस्य विनिश्चयम् । मंडपैश्च तोरणानि पताकाश्च ध्वजांस्तथा ।२८७। रोपयमासु सर्वत्र मातृगो मिथिलां पुरीम् । भागाश्चंदनलिप्ताश्च पुष्पैरच्छादिता आप ॥२८८। गलाभिभारणः भूपैर्घोषाद्यस्त चकारयत् । ततो मुहूर्त्तसमये शुभांऽछां निर्गता शुभास् ॥२८९।
के कारण ... जानक कहा। पालित होनेसे जानकी सीता (फाल) के अग्रभागसे प्रकट होनेके कारण सीता और राजा पद्माक्षकी कन्या होनेसे वह पद्मा कहलायी ॥ २७३ ॥ २७४ । हे महाराज दशरथ इस प्रकार सीताके अनेक नाम हैं। आकाशके समान नीलवर्णरूपवाले रामने सीताको प्राप्त करके राजा पद्माक्षकी प्रतिज्ञा पूर्ण कर दी। इस प्रकार जो आपने पूछा सो मैंने निवेदन कर दिया। अब आपका उस सीताको स्नुषावधूं स्वीकार करना चाहिये। शिवजी बोले—इतनेमें पहिलेसे राजा दशरथके द्वारा बुलाये गये उनके बन्धुवर कोशलराज तथा मगधराज युधाजित् नामक कैकयराज अपनी स्त्री और प्रजाके साथ लश्कर वहाँ आ पहुँचे । राजा जनकने भी उनका प्रेमपूर्वक स्वागत किया । पश्चात् राजा दशरथका वस्त्र भूषण आदिसे और राम लक्ष्मण भरत तथा शत्रुघ्नकी पूजा करके राजा जनक महान् उत्सवके साथ अपने नगरमें ले गये ॥ २७५-२८० ॥ तदनन्तर रामने राजा दशरथको प्रणाम किया । राजाने उन्हें हृदयसे लगाया । फिर रामने गुरु वसिष्ठजी तथा गाधिसुत आदि माताओंको प्रणाम करके राजा दशरथके आगे उन स्त्रियोंका तथा बन्धुओंसहित हाथियोंपर चढ़कर आगे-आगे चले। उनके पीछे और सब लोग गजारूढ़ होकर चल पड़े। इस प्रकार वाद्यसमूहके शब्दका सुनते, चारणोंकी स्तुतियोंका श्रवण करते तथा वेश्याओंके नाचको देखते हुए प्रभु रामने नगरमें प्रवेश किया । उस समय रामके दर्शनके लिये नगरकी स्त्रियें व्याकुल हो उठीं। अपन-अपन गृहकार्योंको छोड़ सबके सब बालकोंको गोदमें लिये नगरके दरवाजे आदिपर आकर रघुनन्दन रामका दर्शन करने लगीं। राम जब सड़कपर आ गये, तब उन्होंने उनपर पुष्पवृष्टि की ॥ २८१-२८५ ॥ इस तरह महोत्सवके साथ राजा दशरथ राम आदिको लेकर अन्न (भोजनका सामान), वस्त्र (ओढ़ने-बिछानेका सामान) तथा जल (नहाने-धोने तथा पीने का पानी) आदिसे परिपूर्ण मनोहर वासस्थानपर (बरके ठहरनेके स्थानपर) गये ॥ २८६ ॥ मन्त्रियोंने ज्योतिषीके द्वारा लग्नका दिन निश्चय कराकर समस्त मिथिलापुरीको मण्डपोंसे, तोरणोंसे, पताकाओंसे तथा रंग-बिरङ्गी ध्वजाओंसे सजवा दिया। बड़े-बड़े रास्तोंको चन्दनसे सिपवाया गया। उनपर भाँति-