भारतकोश
श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

श्रीमदानन्द रामायण (९ काण्ड संपूर्ण - हिन्दी अनुवाद सहित)

Srimad Ananda Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि / अज्ञात द्वारा

स्रोत: Srimad Ananda Ramayana Complete 9 Kandas with Hindi Translation (उद्गम)

DevanagariHindipublished811 पृष्ठ

पृष्ठ 480, कुल 811 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 480
५६४आनन्दरामायणे[ सर्गः १२

तां तादृशीं प्रसमीक्ष्य क्षणं तूष्णीं व्यचिन्तयत् । धन्यो विधाता येनेयं कालिन्दी रचिता पुरा ॥११२॥
इत्याश्चर्यमना भूत्वा तत्सौंदर्यं व्यलोकयत् । अथ रामः स तां प्राह वदागमनकारणम् ॥११३॥
सा प्राह तं विलज्जन्ती सर्वं त्वं वेत्सि राघव । ततो रामोऽब्रवीद्भद्रे चैकपत्नीव्रतं मम ॥११४॥
इह जन्मनि कालिन्दि त्वं याहि स्वस्थलं जवात् ।
यावत्सीता प्रबुद्धा न जायेत तावदेव हि ॥११५॥
सा रामवाक्यैर्वज्रैरिव भिन्नमरुत्स्थला भुवि । मूर्च्छामापाथ तत्रैव तां दृष्ट्वा सोऽब्रवीत् पुनः ॥११६॥
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ कालिन्दि शृणु त्वं वचनं मम । द्वापरे कृष्णरूपेण त्वां करिष्याम्यहं स्त्रियम् ॥११७॥
विवाह्यैव मयासार्धं तदा भोक्ष्यसि मन्सुखम्
इति श्रुत्वा रामवाक्यं किंचित्तुष्टमना नदी ॥११८॥
नत्वा रामं ययौ तूष्णीं रामध्यानपरायणा ।
ततो रामोऽपि सैन्येन सीतया स्वपुरीं ययौ ॥११९॥
एवं स केतवनगरे रामः स्त्रीवधुरेहजैः ।
चरित्राण्यकरोन्नाना पापनाशानि श्रवादिना ॥१२०॥

इति श्रीमत्कोटिरामचरितान्तर्गते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये राज्यकाण्डे पूर्वार्द्धे
षोडशसहस्रस्त्रियवकालिन्दीप्यवश्रीत्वदर्शनं नाम द्वादशः सर्गः ॥ १२ ॥


था, केलेके खम्भेकी तार्ह उसकी जंघायें थीं किङ्कणी केयूर कुण्डल आदि आभूषण अपनी छटा दिखा रहे थे ॥ १११ । इस प्रकारकी एक अपरिचित नारीको अपने सामने देखकर राम थोडी देर तक यह सोचते रहे कि विधाता धन्य है, जिसने कालिन्दी जैसी नारीकी रचना की है । ११२ ॥ इस प्रकार विचार करते हुए वे उसका सौन्दर्य देखते रहे। इसके अनन्तर उससे कहने लगे-तुम अपने आनेका कारण बतलाओ ॥ ११३ ॥ रामकी बात सुनकर सकुचाती हुई कालिन्दीने कहा- हे राघव ! तुम सब कुछ जानते हो। फिर रामने कहा कि हे कालिन्दी ! इस जन्ममें मैंने एकपत्नीव्रत धारण कर रक्खा है। इसलिये सीता जाग जाय, इसके पहले ही तुम यहाँसे चली जाओ ॥ ११४ । ११५ ॥ रामके ये वाक्य वज्रके समान उसके हृदयमें लगे, जिससे वह वहींपर मूच्छित होकर गिर पड़ी। फिर रामने कहा कालिन्दी ! उठो-उठो, मेरी बात तो सुनो। द्वापर-युगमें मैं कृष्ण होकर तुम्हें अपनी स्त्री बनाऊँगा, आज तुम लौट जाओ। जन्मान्तरमें तुम मेरे साथ विहार करके सुखी होओगी। इस प्रकारकी बात सुनकर यमुनाको कुछ सन्तोष हुआ ॥ ११६-११८ ॥ तदनन्तर रामको प्रणाम करके उनका ध्यान करती हुई वह लौट गयी। उधर राम भी अपनी सेना तथा सीताके साथ अयोध्या चले गये ॥ ११९ । इस तरह रामचन्द्रजी साकेतपुरमें अपने पुत्रों तथा सीताके साथ अनेक लीलायें किया करते थे, जिनका श्रवण करनेसे समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं ॥ १२० ॥ इति शतकोटि-रामचरितामृते श्रीमदानन्दरामायणे वाल्मीकीये पं० रामतेजपाण्डेयविरचित'ज्योत्स्ना'भाषाटीकासमन्विते राज्यकाण्डे पूर्वार्द्धे द्वादशः सर्गः ॥ १२ ॥

॥ इति राज्यकाण्डं पूर्वार्द्धं समाप्तम् ॥

श्रीरामचन्द्रार्पणमस्तु ।